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शुक्रवार, 26 जून 2026

महाकवि कालिदास द्वारा रचित महाकाव्य 'रघुवंशम्'

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 महाकवि कालिदास द्वारा रचित महाकाव्य 'रघुवंशम्' (Raghuvaṃśa) लगभग 1,600 वर्ष पुराना है। इसके लेखन का काल और यह किस माध्यम व विषय पर लिखा गया है, उसकी पूरी जानकारी नीचे दी गई है:1. यह कितना पुराना है? (कालखंड)रचना का समय: अधिकांश इतिहासकारों और Encyclopaedia Britannica के अनुसार, कालिदास गुप्त राजवंश के राजा चंद्रगुप्त द्वितीय 'विक्रमादित्य' के समकालीन थे। इस आधार पर 'रघुवंशम्' की रचना 5वीं शताब्दी ईस्वी (लगभग 400-450 ईस्वी) में हुई थी।पांडुलिपियों की आयु: मूल ग्रंथ 1,600 वर्ष पुराना होने पर भी उस समय की भौतिक प्रतियां नष्ट हो चुकी हैं। वर्तमान में कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय पुस्तकालय में इसकी सबसे प्रसिद्ध प्राचीन हस्तलिखित पांडुलिपियां सुरक्षित हैं, जिनमें से एक नेपाल से प्राप्त 17वीं शताब्दी (लगभग 300-400 वर्ष पुरानी) की है जो प्रचलित नेवारी लिपि में कागज़ पर लिखी गई है।2. यह किस पर लिखा गया है? (लेखन माध्यम और लिपि)लेखन सामग्री: प्राचीन काल में मूल रूप से यह काव्य भोजपत्रों (Birch-bark) या ताड़पत्रों (Palm-leaves) पर प्राकृतिक स्याही और नरकट की कलम से लिखा गया था। बाद के काल में इसकी प्रतिलिपियां हाथ से बने मोटे कागजों पर उतारी गईं।मूल भाषा और लिपि: यह ग्रंथ मूलतः संस्कृत भाषा में रचा गया है। शुरुआत में इसे प्राचीन ब्राह्मी या गुप्त लिपि में लिखा गया था, जिसके बाद सदियों तक यह देवनागरी, शारदा और ग्रन्थ जैसी क्षेत्रीय लिपियों में प्रतिलिपि के रूप में आगे बढ़ता रहा।3. इसकी विषय-वस्तु क्या है? (यह किस पर आधारित है)सूर्यवंश के राजाओं का इतिहास: 'रघुवंशम्' में भगवान श्री राम के पूरे रघुवंश (इक्ष्वाकु/सूर्यवंश) के वैभव और पराक्रम का वर्णन है।19 सर्ग और 29 राजा: इस महाकाव्य को 19 सर्गों (अध्यायों) में विभाजित किया गया है, जिसमें कुल मिलाकर लगभग 1,570 श्लोक हैं। इसमें सूर्यवंश के आदि राजा दिलीप से शुरू होकर राजा रघु, अज, दशरथ, भगवान श्री राम, लव-कुश से लेकर अंतिम विलासी राजा अग्निवर्ण तक 29 प्रतापी राजाओं की जीवन गाथा को बेहद काव्यात्मक ढंग से पिरोया गया है

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सोमवार, 22 जून 2026

अखिलेश बहादुर पाल: अपनी जड़ों की खोज में समर्पित एक इतिहास साधक

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अखिलेश बहादुर पाल: अपनी जड़ों की खोज में समर्पित एक इतिहास साधक

भूमिका

इतिहास केवल अतीत की घटनाओं का संग्रह नहीं होता, बल्कि वह किसी समाज की पहचान, संस्कृति और गौरव का दर्पण भी होता है। जब कोई व्यक्ति अपने पूर्वजों, अपनी परंपराओं और अपनी विरासत को समझने का प्रयास करता है, तो वह केवल अपने परिवार का नहीं बल्कि पूरे समाज के इतिहास को जीवित रखने का कार्य करता है। ऐसे ही व्यक्तित्वों में अखिलेश बहादुर पाल का नाम उल्लेखनीय है, जिन्होंने कत्यूरी-पाल वंश, अस्कोट राजपरिवार और महुली-हरिहरपुर की ऐतिहासिक विरासत के अध्ययन में विशेष रुचि दिखाई।

पारिवारिक पृष्ठभूमि

अखिलेश बहादुर पाल उत्तर प्रदेश के महुली-हरिहरपुर क्षेत्र से जुड़े हैं और स्वयं को प्राचीन कत्यूरी-पाल वंश की परंपरा से संबंधित मानते हैं। उनका मानना है कि कत्यूरी साम्राज्य की विभिन्न शाखाएँ समय के साथ उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश और नेपाल के अनेक क्षेत्रों में स्थापित हुईं, जिनका इतिहास आज भी शोध का विषय है।

इतिहास के प्रति रुचि

बचपन से ही उन्हें अपने पूर्वजों और स्थानीय इतिहास के प्रति विशेष जिज्ञासा रही। यही जिज्ञासा आगे चलकर शोध और ऐतिहासिक तथ्यों की खोज में बदल गई। उन्होंने ताम्रपत्रों, शिलालेखों, गजेटियरों, वंशावलियों और ऐतिहासिक ग्रंथों का अध्ययन कर अपने वंश और क्षेत्र के इतिहास को समझने का प्रयास किया।

उनका विश्वास है कि इतिहास को केवल लोककथाओं के आधार पर नहीं, बल्कि प्रमाणिक दस्तावेजों और अभिलेखीय साक्ष्यों के आधार पर समझा जाना चाहिए।

अस्कोट यात्रा: पूर्वजों की धरती पर

अपनी ऐतिहासिक खोज के क्रम में अखिलेश बहादुर पाल ने उत्तराखंड के पिथौरागढ़ जनपद स्थित अस्कोट की यात्रा की। इस यात्रा का उद्देश्य अपने पूर्वजों की ऐतिहासिक जड़ों का अध्ययन करना और कत्यूरी-पाल वंश की विभिन्न शाखाओं के बीच संबंधों को समझना था।

उन्होंने स्थानीय राजपरिवार, इतिहासकारों और समाज के वरिष्ठ लोगों से संवाद स्थापित किया तथा पारंपरिक वंशावलियों और स्थानीय इतिहास का अध्ययन किया। यह यात्रा उनके लिए केवल एक भ्रमण नहीं, बल्कि अपनी सांस्कृतिक पहचान को समझने का एक महत्वपूर्ण पड़ाव थी।

शोध और जनजागरूकता

अखिलेश बहादुर पाल का मानना है कि भारत के अनेक प्राचीन राजवंशों का इतिहास अभी भी व्यापक शोध की प्रतीक्षा कर रहा है। वे कत्यूरी-पाल वंश, महुली-हरिहरपुर और अस्कोट से संबंधित ऐतिहासिक तथ्यों को समाज के सामने लाने के पक्षधर हैं।

वे युवाओं को प्रेरित करते हैं कि वे अपने गाँव, अपने परिवार और अपने क्षेत्र के इतिहास को जानें तथा उपलब्ध अभिलेखों और प्रमाणों के आधार पर उसका अध्ययन करें।

सांस्कृतिक दृष्टिकोण

उनके विचार में इतिहास केवल अतीत की स्मृति नहीं बल्कि भविष्य की दिशा भी तय करता है। यदि समाज अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जुड़ा रहेगा, तो वह अपनी पहचान और परंपराओं को सुरक्षित रख सकेगा।

प्रेरणा

अखिलेश बहादुर पाल का जीवन इस बात का उदाहरण है कि अपनी विरासत के प्रति समर्पण और इतिहास के प्रति सम्मान समाज में जागरूकता और आत्मगौरव की भावना को मजबूत कर सकता है। उनकी ऐतिहासिक यात्राएँ और शोध रुचि नई पीढ़ी के लिए प्रेरणा का स्रोत हैं।

निष्कर्ष

अखिलेश बहादुर पाल इतिहास, संस्कृति और वंश परंपरा के संरक्षण के प्रति समर्पित एक ऐसे व्यक्तित्व के रूप में देखे जा सकते हैं, जिन्होंने अपनी जड़ों की खोज को एक सामाजिक और सांस्कृतिक अभियान का रूप देने का प्रयास किया। उनका संदेश स्पष्ट है—"जो समाज अपने इतिहास को जानता है, वही अपने भविष्य को सही दिशा दे सकता है।"

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मंगलवार, 28 अप्रैल 2026

काम-ऊर्जा (sexual energy) भी एक महत्वपूर्ण ऊर्जा है

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 मनुष्य के भीतर कई तरह की ऊर्जाएँ होती हैं, जिनमें काम-ऊर्जा (sexual energy) भी एक महत्वपूर्ण ऊर्जा है। अगर यह ऊर्जा असंतुलित है, दबाई गई है या अधूरी रह जाती है, तो मन में बेचैनी, अशांति और बार-बार विचारों का आना स्वाभाविक है। ऐसे में ध्यान (मेडिटेशन) करना मुश्किल लग सकता है, क्योंकि मन बार-बार उसी दिशा में खिंचता है।

लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि जब तक सेक्स पूरी तरह संतुष्ट न हो, तब तक कोई भगवान या ध्यान की ओर नहीं जा सकता। असल बात यह है:

1. काम-ऊर्जा को समझना जरूरी है

काम-ऊर्जा को केवल शरीर तक सीमित समझना गलत है। यही ऊर्जा जब जागरूकता के साथ ऊपर उठती है, तो वही प्रेम, करुणा और ध्यान में बदल सकती है। अगर इसे सिर्फ भोग (physical pleasure) तक ही सीमित रखोगे, तो यह बार-बार मांग करती रहेगी।

2. अधूरी इच्छा मन को भटकाती है

अगर मन में लगातार कोई इच्छा अधूरी रह जाए, तो वह ध्यान में बाधा बनती है। इसलिए पहले मन को समझना और उसे शांत करना जरूरी है। लेकिन शांति सिर्फ इच्छा पूरी करने से नहीं आती—समझ से आती है।

3. संतोष बाहर नहीं, अंदर से आता है

बहुत लोग सोचते हैं कि “जब यह मिल जाएगा, तब मैं शांत हो जाऊंगा।”

लेकिन सच्चाई यह है कि एक इच्छा पूरी होती है, तो दूसरी पैदा हो जाती है। यह एक अंतहीन चक्र है।

इसलिए असली शांति तब आती है जब इंसान अपने मन को देखना सीख जाता है।

4. ध्यान का असली मतलब

ध्यान का मतलब यह नहीं कि सारे विचार खत्म हो जाएं, बल्कि यह है कि तुम अपने विचारों को बिना उलझे देख सको।

जब तुम अपने मन को देखने लगते हो, तो धीरे-धीरे उसकी पकड़ कम होने लगती है—चाहे वह काम-इच्छा हो या कोई और।

5. संतुलन ही सही रास्ता है

ना तो इच्छाओं को पूरी तरह दबाना सही है, और ना ही उनमें पूरी तरह खो जाना।

सही रास्ता है—सजगता (awareness)।

जब तुम जागरूक होकर जीते हो, तो धीरे-धीरे ऊर्जा अपने आप ऊपर उठने लगती है और मन शांत होने लगता है।

निष्कर्ष:

हाँ, मन की शांति बहुत जरूरी है, और अगर अंदर अशांति है तो ध्यान करना कठिन लगता है। लेकिन शांति केवल शारीरिक संतुष्टि से नहीं आती—बल्कि समझ, जागरूकता और संतुलन से आती है।

जो व्यक्ति अपने मन को समझ लेता है, वही सच्चे ध्यान और भगवान के करीब जा सकता है।

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रविवार, 1 फ़रवरी 2026

इस बजट में किसानों को क्या मिला? नारियल उत्पादन योजना का ऐलान

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Budget Kisan: वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण नौवीं बार बजट पेश कर रही हैं। उन्होंने देश के किसानों के लिए सौगात दी है। उन्होंने बजट भाषण में कहा कि छोटे और सीमांत किसानों पर विशेष ध्यान देने की बात कही। वित्त मंत्री ने उत्पादकता बढ़ाने के लिए नारियल उत्पादन योजना की घोषणा की। 

source https://www.livehindustan.com/business/what-did-farmers-get-in-this-budget-a-coconut-production-scheme-was-announced-201769923182823.html

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मंगलवार, 20 जनवरी 2026

Budget 2026: वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण से किसानों को क्या है उम्मीद

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Budget 2026: उम्मीद है कि कृषि बजट 2025-26 के 1.37 लाख करोड़ रुपये से बढ़कर लगभग 1.5 लाख करोड़ रुपये हो जाएगा। इसमें पीएम-किसान, प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना और पीएम कृषि सिंचाई योजना के तहत सिंचाई योजनाओं के लिए अधिक धनराशि शामिल हो सकती है।

source https://www.livehindustan.com/business/budget-2026-what-are-farmers-expecting-from-finance-minister-nirmala-sitharaman-201768896854383.html

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सोमवार, 19 जनवरी 2026

Budget Expectations: क्या इस बजट में बढ़ेगी पीएम किसान सम्मान निधि की राशि

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Budget Expectations Farmers: वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण 1 फरवरी को आम बजट पेश करने वाली हैं। ऐसे में देशभर के किसानों को उनसे बड़ी उम्मीदें हैं। यह उम्मीद पीएम किसान की सहायता राशि को 6000 रुपये से बढ़कार 9000 रुपये सालाना करने को लेकर है।

source https://www.livehindustan.com/business/budget-expectations-will-the-amount-of-pm-kisan-samman-nidhi-be-increased-in-this-budget-2026-201768812016268.html

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बुधवार, 29 अक्टूबर 2025

खेत से विदेश तक: जैविक खेती ने बदली किसानों की किस्मत | FPO Success Story

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Keywords: जैविक खेती, किसान उत्पादक संगठन, FPO, जैविक भिंडी, कृषि निर्यात, देसी बीज संरक्षण, किसानों की आमदनी, जैविक खाद उत्पादन, दुबई निर्यात, भारतीय कृषि सफलता

भारत की कृषि तेजी से बदल रही है। अब किसान केवल अनाज पैदा नहीं करते, बल्कि वैश्विक बाजारों में अपनी पहचान बना रहे हैं। इसी बदलाव की शानदार मिसाल है भारत का एक FPO (किसान उत्पादक संगठन) जिसने जैविक खेती के दम पर 613 किसानों की आय को दोगुना कर दिया है और दुबई तक निर्यात कर रहा है।

FPO: किसानों के लिए मालिकाना भविष्य

यह संगठन किसानों को एक साथ जोड़कर:

• उत्पादन
• पैकेजिंग
• निर्यात
• बाज़ार मूल्य निर्धारण

सब कुछ किसानों के नाम से कर रहा है।
सबसे अच्छी बात यह कि किसानों को बाजार से दोगुना भाव मिल रहा है।

अब बिचौलिया नहीं, किसान ही मालिक!

 जैविक खेती का चमत्कार

इस एफपीओ का मुख्य फोकस है Organic Farming:

• मिट्टी की उर्वरता बढ़ाना
• रसायनों से छुटकारा
• सुरक्षित और पौष्टिक भोजन

सबसे बड़ी कामयाबी है जैविक भिंडी का निर्यात।
विशेष रूप से राधिका भिंडी की अंतरराष्ट्रीय मांग है।

दुबई में चमकी भारतीय भिंडी

जब फसल जैविक तरीके से उगाई जाती है,
तो उसका मूल्य कई गुना बढ़ जाता है।

इस एफपीओ की भिंडी दुबई के बाजार में पहुँच रही है।
विदेशी उपभोक्ता भारत की जैविक सब्जियों को
Premium Quality के रूप में पहचानते हैं।

देसी किस्मों के संरक्षण का महाअभियान

यह संगठन न केवल व्यापार कर रहा है
बल्कि भारत की धरती की विरासत को बचा रहा है।

संरक्षित की गई दुर्लभ किस्में:

• देसी अंबा अदरक
• कुसुम करेला
• राधिका भिंडी
विष्णु भोग चावल (सुंगधित और पारंपरिक किस्म)

इन्होंने PPBFR के साथ 232 देसी बीज किस्में संरक्षित की हैं
जो जैव विविधता के लिए बहुत बड़ा योगदान है।

जैविक खाद: मांग इतनी कि सप्लाई कम!

जैविक खेती बढ़ने के साथ Organic Manure की मांग भी आसमान छू रही है।

एफपीओ के पास ऑर्डर ज्यादा और उत्पादन कम पड़ रहा है।
यह संकेत है कि किसान अब
जहर-मुक्त खेती की ओर लौट रहे हैं।

किसानों की आय दोगुनी कैसे हुई?

आमदनी बढ़ने के तीन प्रमुख कारण:

  1. सीधे निर्यात — बिना बिचौलिया

  2. जैविक खेती — उच्च कीमत

  3. देसी किस्म — ब्रांड वैल्यू

यह मॉडल भारत के अन्य किसानों के लिए
रेडी-टू-कॉपि सफलता मंत्र साबित हो रहा है।

भारत की नई कृषि पहचान

पहलू पुरानी तस्वीर नई तस्वीर
खेती रसायनिक, लागत ज्यादा जैविक, मुनाफा ज्यादा
बिक्री बिचौलिया आधारित किसान सीधे बाजार से जुड़े
पहचान स्थानीय अंतरराष्ट्रीय

किसानों ने अब दुनिया भर के उपभोक्ताओं के साथ सीधा रिश्ता बना लिया है।

निष्कर्ष

जैविक खेती किसानों की असली उन्नति का मार्

FPO कृषि व्यापार की नई शक्ति
भारत की देसी किस्में वापस शान से लौटीं
छोटे किसान भी अब बन रहे हैं वैश्विक ब्रांड

इन 613 किसानों की कहानी यह साबित करती है कि
अगर इच्छाशक्ति और सही मॉडल मिले
तो भारतीय किसान खेत से दुनिया तक इतिहास लिख सकते 


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