शनिवार, 7 अगस्त 2021

रानी रामपाल- कप्तान

रानी रामपाल- कप्तान
 “मैं अपने जीवन से भागना चाहटी थी  बिजली की कमी से, सोते समय हमारे कानों में भिनभिनाने वाले मच्छरों तक, बमुश्किल दो वक्त का खाना खाने से लेकर बारिश होने पर हमारे घर में पानी भरते हुए देखने तक।  मेरे माता-पिता ने पूरी कोशिश की, लेकिन वे इतना ही कर सकते थे - पापा गाड़ी चलाने वाले थे और माँ नौकरानी के रूप में काम करती थीं।
 मेरे घर के पास एक हॉकी अकादमी थी, इसलिए मैं घंटों खिलाड़ियों को अभ्यास करते हुए देखता थी- मैं वास्तव में खेलना चाहता थी।  पापा प्रतिदिन 80 रुपये कमाते थे और मेरे लिए एक छड़ी नहीं खरीद सकते थे।  हर दिन, मैं कोच से मुझे भी सिखाने के लिए कहता थी।  उसने मुझे अस्वीकार कर दिया क्योंकि मैं कुपोषित था।  वह कहते थे, 'आप अभ्यास सत्र के माध्यम से खींचने के लिए पर्याप्त मजबूत नहीं हैं।'
 इसलिए, मुझे मैदान पर एक टूटी हुई हॉकी स्टिक मिली और उसी के साथ अभ्यास करना शुरू किया- मेरे पास प्रशिक्षण के कपड़े नहीं थे, इसलिए मैं सलवार कमीज में इधर-उधर भाग रही थी।  लेकिन मैंने खुद को साबित करने की ठान ली थी।  मैंने कोच से एक मौका मांगा - मैंने आखिरकार उसे बड़ी मुश्किल से मना लिया!
 लेकिन जब मैंने अपने परिवार को बताया, तो उन्होंने कहा, 'लड़किया घर का काम ही करता है,' और 'हम तुम्हारे स्कर्ट पहनने नहीं देंगे।' मैं उनसे यह कहते हुए विनती करूं गि, 'कृपया मुझे बताएं।  अगर मैं असफल होटी हूं, तो आप जो चाहें करेंगे। 'मेरे परिवार ने अनिच्छा से हार मान ली।
 प्रशिक्षण सुबह से शुरू होगा।  हमारे पास घड़ी भी नहीं थी, इसलिए माँ उठती थीं और आसमान की ओर देखती थीं कि क्या यह मुझे जगाने का सही समय है।
 अकादमी में प्रत्येक खिलाड़ी के लिए 500 मिलीलीटर दूध लाना अनिवार्य था।  मेरा परिवार केवल २०० मिली का दूध ही खरीद सकता था;  बिना किसी को बताए मैं दूध में पानी मिलाकर पी लेटी थी क्योंकि मैं खेलना चाहता थी
 मेरे कोच ने मोटे और पतले के माध्यम से मेरा समर्थन किया;  वह मुझे हॉकी किट और जूते खरीदता था।  उन्होंने मुझे अपने परिवार के साथ रहने दिया और मेरी आहार संबंधी जरूरतों का भी ध्यान रखा।  मैं कड़ी मेहनत करटी और अभ्यास का एक भी दिन नहीं छोड़टी।
 मुझे अपनी पहली तनख्वाह याद है;  मैंने एक टूर्नामेंट जीतकर 500 रुपये जीते और पापा को पैसे दिए।  इतना पैसा उसके हाथ में पहले कभी नहीं था।  मैंने अपने परिवार से वादा किया था, 'एक दिन, हमारा अपना घर होगा';  मैंने उस दिशा में काम करने के लिए अपनी शक्ति में सब कुछ किया।
 अपने राज्य का प्रतिनिधित्व करने और कई चैंपियनशिप में खेलने के बाद, मुझे आखिरकार 15 साल की उम्र में एक राष्ट्रीय कॉल मिला!  फिर भी, मेरे रिश्तेदार मुझसे केवल तभी पूछते थे जब मैं शादी करने की योजना बना रहा था।  लेकिन पापा ने मुझसे कहा, 'अपने दिल की संतुष्टि तक खेलो।' अपने परिवार के समर्थन से, मैंने भारत के लिए अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करने पर ध्यान केंद्रित किया और आखिरकार, मैं भारतीय हॉकी टीम का कप्तान बन गई!
 इसके तुरंत बाद, जब मैं घर पर थी, एक दोस्त पापा हमारे साथ काम करते थे।  वह अपनी पोती को साथ ले आया और मुझसे कहा, 'वह तुमसे प्रेरित है और हॉकी खिलाड़ी बनना चाहती है!' मैं बहुत खुश थी;  मैं बस रोने ल गी।
 और फिर 2017 में, मैंने आखिरकार अपने परिवार से किए गए वादे को पूरा किया और उनके लिए एक घर खरीदा।  हम एक साथ रोए और एक दूसरे को कसकर पकड़ लिया!  और मैंने अभी तक नहीं किया है;  इस साल, मैं उन्हें और कोच को कुछ ऐसा चुकाने के लिए दृढ़ संकल्पित हूं जिसका उन्होंने हमेशा सपना देखा है- टोक्यो से उम्मीद” #ladwahandballfoundation #olympics2020 #Olympics #RingKeBaazigar #जय_हिंद #Cheer4India #proud #challenge sabhar ladawa handball foundation Facebook wall

शुक्रवार, 30 जुलाई 2021

स्वामी विवेकानंद – एक क्रांतिकारी सन्यासी



स्वमी विवेकानंद को रामकृष्ण परमहंस ने पहली बार समाधि का अनुभव कराया था। जानते हैं कि गुरु रामकृष्ण परमहंस के साथ रहकर उनमें क्या बदलाव आए और क्या अनुभव हुए...


 

सौ साल से अधिक समय गुजर जाने के बाद भी आज भी विवेकानंद युवाओं के प्रिय हैं। आखिर कैसे? कैसा था उनका जीवन? क्या खास किया था उन्होंने ?


स्वामी विवेकानंद का जन्म 12 जनवरी 1863 को कोलकाता में विश्वनाथ दत्ता और भुवनेश्वरी देवी के घर नरेंद्र नाथ दत्त के रूप में हुआ था। 4 जुलाई, 1902 को बेलूर मठ में उनका देहांत हुआ। अपने देहांत तक उन्होंने एक ऐसी क्रांति ला दी थी, जिसकी गूंज आज तक दुनिया भर में है। अपने गुरु के संदेश वाहक के रूप में, वह एक शताब्दी से दुनिया भर के युवाओं के लिए एक प्रेरणास्रोत रहे हैं।

इस लेख में, सद्गुरु स्वामी विवेकानंद के जीवन की कुछ घटनाओं के बारे में बता रहे हैं जिनसे यह पता चलता है कि अपने गुरु के साथ उनका क्या रिश्ता था और वह उनका कौन सा संदेश लोगों में फैलाना चाहते थे।

रामकृष्ण परमहंस को दिव्यज्ञान प्राप्त होने के बाद, उनके बहुत सारे शिष्य बन गए। उनके एक शिष्य थे, स्वामी विवेकानंद। विवेकानंद अमेरिका जाने वाले पहले योगी थे। वह 1893 में दुनिया के धर्मों की संसद में शामिल होने शिकागो गए थे। वहां जाने के बाद उन्होंने एक आध्यात्मिक लहर चला दी। जिस समय किसी नई चीज को लेकर लोगों में बहुत आशंकाएं होती थीं, उस समय आकर उन्होंने कुछ हद तक लोगों के लिए द्वार खोले।


स्वामी विवेकानंद को रामकृष्ण ने भेजा काली मंदिर में


रामकृष्ण का विवेकानंद से बहुत अलग तरह का जुड़ाव था क्योंकि वह विवेकानंद को अपना संदेश दुनिया तक पहुंचाने का एक जरिया मानते थे। रामकृष्ण यह काम खुद नहीं कर सकते थे, इसलिए वह विवेकानंद को अपने संदेशवाहक के रूप में देखते थे।

रामकृष्ण के आस-पास के लोग समझ नहीं पाते थे कि वह विवेकानंद को लेकर इतने पागल क्यों थे। अगर एक भी दिन विवेकानंद उनसे मिलने नहीं आते, तो रामकृष्ण उनकी खोज में निकल जाते क्योंकि वह जानते थे कि इस लड़के में संप्रेषण की जरूरी समझ है। विवेकानंद भी रामकृष्ण परमहंस के लिए उतने ही पागल थे। उन्होंने कोई नौकरी नहीं ढूंढी, उन्होंने कोई ऐसा काम नहीं किया, जो उनकी उम्र के लोग आम तौर पर करते हैं। वह बस हर समय रामकृष्ण का अनुसरण करते थे।

विवेकानंद के जीवन में एक बहुत अद्भुत घटना घटी। एक दिन, उनकी मां बहुत बीमार थीं और मृत्युशैय्या पर थीं। अचानक विवेकानंद के दिमाग में आया कि उनके पास बिल्कुल भी पैसा नहीं है और वह अपनी मां के लिए दवा या खाना नहीं ला सकते। यह सोचकर उन्हें बहुत गुस्सा आया कि वह अपनी बीमार मां का ध्यान नहीं रख सकते। जब विवेकानंद जैसे इंसान को गुस्सा आता है, तो वह गुस्सा वाकई भयानक होता है। वह रामकृष्ण के पास गए। वह कहीं और नहीं जा सकते थे, गुस्से में भी वह यहीं जाते थे।

उन्होंने रामकृष्ण से कहा, ‘इन सारी फालतू चीजों, इस आध्यात्मिकता से मुझे क्या लाभ है। अगर मेरे पास कोई नौकरी होती और मैं अपनी उम्र के लोगों वाले काम करता तो आज मैं अपनी मां का ख्याल रख सकता था। मैं उसे भोजन दे सकता था, उसके लिए दवा ला सकता था, उसे आराम पहुंचा सकता था। इस आध्यात्मिकता से मुझे क्या फायदा हुआ?’

रामकृष्ण काली के उपासक थे। उनके घर में काली का मंदिर था। वह बोले, ‘क्या तुम्हारी मां को दवा और भोजन की जरूरत है? जो भी तुम्हें चाहिए, वह तुम मां से क्यों नहीं मांगते?’ विवेकानंद को यह सुझाव पसंद आया और वह मंदिर में गए।

एक घंटे बाद जब वह बाहर आए तो रामकृष्ण ने पूछा, ‘क्या तुमने मां से अपनी मां के लिए भोजन, पैसा और बाकी चीजें मांगीं?’

विवेकानंद ने जवाब दिया, ‘नहीं, मैं भूल गया।’ रामकृष्ण बोले, ‘फिर से अंदर जाओ और मांगो।’

विवेकानंद फिर से मंदिर में गए और और चार घंटे बाद वापस लौटे। रामकृष्ण ने उनसे पूछा, ‘क्या तुमने मां से मांगा?’ विवेकानंद बोले, ‘नहीं, मैं भूल गया।’

रामकृष्ण फिर से बोले, ‘फिर अंदर जाओ और इस बार मांगना मत भूलना।’ विवेकानंद अंदर गए और लगभग आठ घंटे बाद बाहर आए। रामकृष्ण ने फिर से उनसे पूछा, ‘क्या तुमने मां से वे चीजें मांगीं?’

विवेकानंद बोले, ‘नहीं, अब मैं नहीं मांगूंगा। मुझे मांगने की जरूरत नहीं है।’

रामकृष्ण ने जवाब दिया, ‘यह अच्छी बात है। अगर आज तुमने मंदिर में कुछ मांग लिया होता, तो यह तुम्हारे और मेरे रिश्ते का आखिरी दिन होता। मैं तुम्हारा चेहरा फिर कभी नहीं देखता क्योंकि कुछ मांगने वाला मूर्ख यह नहीं जानता कि जीवन क्या है। मांगने वाला मूर्ख जीवन के मूल सिद्धांतों को नहीं समझता।’

प्रार्थना एक तरह का गुण है। अगर आप प्रार्थनापूर्ण बन जाते हैं, अगर आप आराधनामय हो जाते हैं, तो यह होने का एक शानदार तरीका है। लेकिन यदि आप इस उम्मीद से प्रार्थना कर रहे हैं कि इसके बदले आपको कुछ मिलेगा, तो यह आपके लिए कारगर नहीं होगा।


स्वामी विवेकानंद को हुआ समाधि का अनुभव


विवेकानंद जब सिर्फ 19 साल के थे, तो वह बहुत तर्कसम्मत और बुद्धिमान थे। साथ ही, वह जोश से भरे हुए थे। वह हर चीज का जवाब चाहते थे। उन्होंने आकर रामकृष्ण से कहा, ‘आप हर समय बस भगवान, भगवान करते रहते हैं। इसका क्या प्रमाण है कि भगवान हैं? मुझे सुबूत दीजिए।’ रामकृष्ण बहुत साधारण इंसान थे। वह पढ़े-लिखे नहीं थे। वह विद्वान नहीं, आध्यात्मिक पुरुष थे। तो उन्होंने कहा, ‘मैं ही प्रमाण हूं।’

रामकृष्ण बोले, ‘मैं इस बात का प्रमाण हूं, कि ईश्वर है।’

विवेकानंद को समझ नहीं आया कि वह क्या करें क्योंकि यह तो बस पागलपन था। वह किसी बौद्धिक जवाब की उम्मीद कर रहे थे कि ‘बीज का अंकुरण और पृथ्वी का घूमना ईश्वर के होने का प्रमाण है।’ मगर रामकृष्ण बोले, ‘मैं इसका प्रमाण हूं कि ईश्वर का अस्तित्व है।’ रामकृष्ण के कहने का मतलब यह था कि ‘मैं जैसा हूं, यह प्रमाण है।’ विवेकानंद को समझ नहीं आया कि वह क्या कहें और वह चले गए।

तीन दिन बाद, उन्होंने वापस आकर पूछा, ‘ठीक है, क्या आप मुझे ईश्वर के दर्शन करा सकते हैं?’ रामकृष्ण ने पूछा, ‘तुम्हारे पास उन्हें देखने की हिम्मत है?’ उस साहसी लड़के ने कहा, ‘हां’ क्योंकि यह बात उसे परेशान कर रही थी। रामकृष्ण ने विवेकानंद की छाती पर अपने पैर रख दिए और विवेकानंद समाधि की अवस्था में चले गए, जहां वह मन की सीमाओं से परे चले गए। वह लगभग 12 घंटे बाद समाधि से बाहर आए और जब आए, तो वह पूरी तरह बदल चुके थे। उसके बाद उन्होंने अपने जीवन में कभी कोई प्रश्न नहीं पूछा।


विवेकानंद को मां शारदा का आशीर्वाद


जब तक आप भक्त नहीं हैं, जीवन को आपके लिए उन्मुक्त नहीं होना चाहिए क्योंकि यदि वह उन्मुक्त होता है, तो आप खुद को और बाकी हर किसी को नुकसान ही पहुंचाएंगे। भारत में कभी किसी ऐसे इंसान को ज्ञान नहीं सौंपा जाता था, जिसमें भक्ति की कमी हो।

विवेकानंद के जीवन में एक खूबसूरत घटना हुई। रामकृष्ण परमहंस का देहांत हो चुका था, विवेकानंद ने देश भर में घूम-घूम कर युवकों का एक समूह इकट्ठा किया। वह देश को बनाने और देश की सूरत को बदलने की कोशिश कर रहे थे। तभी किसी ने उन्हें बताया कि अमेरिका के शिकागो में धर्म संसद आयोजित हो रही है। लोगों ने विवेकानंद को वहां जाने की सलाह दी क्योंकि यहां कोई उनकी बात नहीं सुन रहा था। कोई भी नहीं! एक युवक जगह-जगह जाकर बड़ी-बड़ी बातें कर रहा था, जो धर्मग्रंथों में लिखी हुई नहीं हैं। कौन उसे सुनना चाहता? उन्होंने कहा, ‘तुम वहां जाकर उन्हें झकझोरो। अगर तुम वहां उन्हें झकझोरोगे, तो यहां हर किसी का ध्यान तुम्हारी ओर जाएगा।’

पश्चिम के लिए निकलने से पहले वह रामकृष्ण की पत्नी शारदा का आशीर्वाद लेने गए। वह पहली बार रामकृष्ण का संदेश लेकर अमेरिका जा रहे थे।

जब विवेकानंद पहुंचे, उस समय शारदा खाना बना रही थीं। वह कोई धुन गुनगुना रही थीं। भारतीय महिलाओं में यह बहुत आम बात है, खास तौर पर खाना बनाते समय वे गुनगुनाती हैं। अब ऐसा नहीं होता क्योंकि बहुत से लोग अब आई-पैड बजाते हैं मगर पहले के समय में खूब प्यार से खाना बनाना और उसे परोसना सबसे महत्वपूर्ण कामों में माना जाता था। किसी को अच्छी तरह खाते देखकर उन्हें गहरी संतुष्टि होती थी। खाना बनाना बहुत ही आनंददायक प्रक्रिया थी। 20-30 मिनट का भोजन बनाने में, वे कम से कम तीन से चार घंटे लगाती थीं और हमेशा खाना बनाते समय गाती रहती थीं। कम से कम मेरी मां हर समय गाती थीं।

जब विवेकानंद ने आकर कहा, ‘मैं अपने गुरु का संदेश पूरी दुनिया तक पहुंचाने के लिए अमेरिका जाना चाहता हूं,’ तो शारदा ने जवाब नहीं दिया। फिर वह अचानक बोलीं, ‘नरेन, वह चाकू मुझे देना।’ विवेकानंद ने उन्हें चाकू पकड़ाया और एक खास तरीके से उसे दिया। फिर मां शारदा बोलीं, ‘तुम जा सकते हो, मैं तुम्हें आशीर्वाद देती हूं।’ विवेकानंद ने पूछा, ‘आपने मुझे इतनी देर बाद आशीर्वाद क्यों दिया और सबसे पहले तो आपने मुझसे चाकू क्यों मांगा? आप तो सब्जियां काट चुकी थीं?’ वह बोलीं, ‘मैं सिर्फ यह देखना चाहती थी कि अपने गुरु के जाने के बाद तुम्हारे अंदर क्या बदलाव आया है? जिस तरह से तुमने मुझे चाकू पकड़ाया, उससे मुझे पता चल गया कि तुम वहां जाने के लिए बिल्कुल सही इंसान हो, तुम अपने गुरु का संदेश लेकर जाने के लिए बिल्कुल उपयुक्त हो।’


स्वामी विवेकानंद और रामकृष्ण का संदेश


आपने देखा होगा कि ज्यादातर गुरु अपने आप प्रसिद्ध नहीं होते। उन्हें एक अच्छे शिष्य की जरूरत होती है जो उनका संदेश फैला सके क्योंकि हो सकता है कि गुरु खुद दुनिया के तौर-तरीकों से बहुत परिचित नहीं हो। आज, हर कोई रामकृष्ण परमहंस के बारे में बात करता है। रामकृष्ण की चेतनता बहुत ठोस थी। वह एक अद्भुत चीज थी। मगर उसके साथ ही, सांसारिक स्तर पर वह पूरी तरह अनजान थे। अगर विवेकानंद उनसे न मिलते, तो वह अपने आप में, एक भूला-बिसरा फूल बनकर रह जाते। फूल तो बहुत सारे खिलते हैं, मगर कितने फूलों को पहचान मिल पाती है?


प्रार्थना के बारे में स्वामी विवेकानंद के विचार


स्वामी विवेकानंद ने एक बार कहा, ‘फुटबॉल खेलना आपको प्रार्थना से कहीं ज्यादा ईश्वर के करीब ले जा सकता है।’ यह सच है क्योंकि आप पूरी तरह डूबे बिना फुटबॉल नहीं खेल सकते। इसमें कोई व्यक्तिगत मकसद नहीं होता, बस पूर्ण भागीदारी होती है। आप क्या कर सकते हैं और क्या नहीं कर सकते, यह सब पहले से तय होता है और आप कई सालों से इसके लिए तैयार होते हैं। अब यह सिर्फ भागीदारी का सवाल रह जाता है, इसमें कोई मकसद नहीं होता।

प्रार्थना में ऐसा होता है कि कुछ समय बाद आप बहुत सारी दूसरी चीजें करते हुए प्रार्थना करने लगते हैं, आप अपनी मर्जी की चीजें करने लगते हैं। भारत में, प्रार्थना को, पूजा-पाठ को, बहुत जटिल बना दिया गया। वह सिर्फ मौखिक नहीं रह गई। इसका उद्देश्य यह था कि आप पूरी तरह खुद को उसमें डुबो दें। क्योंकि उन्होंने हजारों सालों से देखा था कि ‘प्रार्थना करने’ के नाम पर क्या-क्या होता था। उन्हें पता था कि लोग क्या करेंगे, इसलिए उन्होंने प्रार्थना को बहुत जटिल बना दिया। ताकि आपको एक पूरी प्रक्रिया याद रखनी पड़े और उसके मुताबिक सही तरह से उसे करना पड़े, वरना पूजा अपवित्र हो जाएगी। जब इस हद तक जटिलता होती है, तो आप प्रार्थना करते समय कुछ और नहीं कर सकते। इस रूप में फुटबॉल का खेल आपके अंदर उस स्तर की भागीदारी ले आता है, जहां आप कुछ और कर ही नहीं सकते। कुछ और करना संभव नहीं होता क्योंकि इसमें इतनी भागीदारी की जरूरत होती है कि आप कुछ और कर ही नहीं सकते।

फुटबॉल के खेल में, आपको अपने पैरों को किसी सर्जन के औजारों की तरह इस्तेमाल करना सीखना पड़ता है। यह एक ऐसा खेल है, जिसमें एक खास भागीदारी की जरूरत पड़ती है क्योंकि आप जिन पैरों से गेंद को संभालते हैं, उन्हीं पैरों से खुद को पूरी गति से इधर से उधर भगाते हैं। साथ ही, आपको उसी समय दस और लोगों से बचना होता है, जो आपसे उलझने की पूरी कोशिश करते हैं। आपको लोगों को चकमा देना होता है, गेंद लेनी होता है, पूरी गति से दौड़ना होता है इसलिए आपके पैरों को किसी सर्जन के औजारों की तरह दक्ष होना चाहिए। उस गति में, सक्रियता के उस स्तर पर, गेंद को किसी दिशा की ओर धकेलने में बहुत दक्षता लगती है। इसमें उस हद तक भागीदारी की जरूरत होती है, जहां आपका मन लगभग काम करना बंद कर देता है।

जब आप पूरी भागीदारी के साथ कोई काम करते हैं तो उसमें सिर्फ सक्रियता होती है, मन कहीं और होता है। इसलिए फुटबॉल के खेल में खिलाड़ी अक्सर उस अवस्था में होते हैं क्योंकि एक ही चीज में मन लगा होता है। इसी वजह से जब पूरी तीव्रता से खेल होता है, तो आधी दुनिया बैठकर उसे देखती है। इसमें एक तरह से लोग परे चले जाते हैं, यह आध्यात्मिक रूप से परे जाना नहीं है मगर निश्चित रूप से इसमें लोग अपनी सीमाओं से परे चले जाते हैं। यही बात हर किसी को जोश से भर देती है।


स्त्रियों के बारे में स्वामी विवेकानंद के विचार


एक बार एक समाज सुधारक विवेकानंद के पास गया और बोला, ‘यह बहुत अच्छी बात है कि आप स्त्रियों की भी बेहतरी चाहते हैं। मुझे क्या करना चाहिए? मैं उनकी हालत सुधारना चाहता हूं। मैं इसमें मदद करना चाहता हूं।’ तो विवेकानंद ने कहा, ‘उनसे दूर रहो। तुम्हें उनके लिए कुछ करने की जरूरत नहीं है। बस उन्हें अकेला छोड़ दो। उन्हें जो करना होगा, वे कर लेंगी।’ बस यही जरूरी है। किसी पुरुष को स्त्री की स्थिति सुधारने की जरूरत नहीं है। अगर वह सिर्फ उसे मौका दे, तो वह अपने लिए जरूरी चीजें कर लेगी।

जब मैं बारह-तेरह साल का था, तो मुझे कुछ किताबें पढ़ने को मिलीं, जिनमें स्वामी विवेकानंद ने कहा था, ‘मुझे सौ पूरी तरह समर्पित लोग दीजिए और मैं इस देश की सूरत बदल कर रख दूंगा।’ उस समय इस देश में 23 करोड़ लोग रहे होंगे, मगर उन्हें पूरी तरह समर्पित सौ लोग भी नहीं मिले। मैंने सोचा, ‘क्या विडंबना है। विवेकानंद जैसा इंसान एक अद्भुत चीज है। ऐसे इंसान रोज-रोज नहीं होते। ऐसे लोग जब दुनिया में आए, तो हम इस विशाल देश में उन्हें सौ लोग भी नहीं दे पाए।’ मुझे यह इस संस्कृति और इस देश के लिए एक महान त्रासदी लगी।

एक इंसान के पास इतनी जबर्दस्त दूरदझर्शिता थी और उसकी दूरदर्शिता के कारण बहुत सी चीजें हुईं। आज भी, उनके नाम पर मानव कल्याण के बहुत से काम हो रहे हैं। उनकी दूरदर्शिता के कारण काफी विकास हुआ। उस समय जो बाकी लोग थे, वे कहां हैं? मगर उनकी दृष्टि अब भी किसी न किसी रूप में काम कर रही है। उसकी वजह से काफी खुशहाली आई।

अगर हजारों लोगों में यही दूरदर्शिता होती, तो हालात और भी बेहतर होते। एक गौतम बुद्ध या एक विवेकानंद की दूरदर्शिता काफी नहीं है। जब अधिकांश लोगों में वह दूरदर्शिता होती है, तभी समाज में वाकई खूबसूरत चीजें होंगी।


Isha Foundation

बुधवार, 28 जुलाई 2021

परब्रह्म का स्वरुप

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परब्रह्म की श्रेष्ठता चार बातो से सिद्ध होती है १- वह सबको धारण करने वाला है २- वह सबसे बडा है ३- वह समस्त प्रकृतियों का स्वामी, शासक एवं संचालक है तथा प्रकृतियाँ इससे संचालित है ४- वह इस प्रकृतियों से भिन्न भी है इस प्रकार परब्रह्म सबसे श्रेष्ठ एवं विलक्षण है ।
जब वह परब्रह्म अपनी कारण अवस्था मे रहता है तो उसकी परा, एवं अपरा प्रकृति रूप दोनो शक्तियाँ सृष्टि से पूर्व उसमे अभिन्न रूप से विधमान रहती हुई अप्रकट रहती है यही उसकका निराकार स्वरूप उसकी कारण अवस्था है जब वह किसी कार्य रूप मे स्थित होता है तो उसकी विभिन्न शक्तियाँ भिन्न भिन्न नाम रूपों मे प्रकट होती है यही साकार रूप उसकी कार्य अवस्था है ।
जिस प्रकार प्रकाश और सुर्य तेज दृष्टि से अभिन्न है वैसे ही परब्रह्म और उसकी शक्ति अभिन्न होते हुए भी उनका अलग अलग वर्णन किया गया है।
सगुणब्रह्म ( कार्य ब्रह्म) तथा निर्गुण ब्रह्म (परब्रह्म) ब्रह्म के भिन्न भिन्न दो स्वरूप नही है बल्कि वही इन दोने लक्षणों से युक्त है दो रूपो वाला नही है जिस प्रकार विधुत अप्रकट रूप है तथा अग्नि उसका प्रकट रूप है अप्रकट ही प्रकट होता है तथा प्रकट का आधार अप्रकट ही है इसलिए विधुत और अग्नि जयोति के दो रूप नही है
वह परब्रह्म अपनी जड़ चेतन रूप दोनो प्रकृतियों अपरा तथा परा से सर्वथा विलक्षण है प्रकृतियों को क्षर और अक्षर क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ प्रकृति औक पुरूष कहा गया है। जिनका विस्तार ही यह दृश्य जगत् है ।
परमात्मा ही कर्मफल दाता है अन्य कोई नही यह प्रकृति उस परब्रह्म की ही शक्ति है जो उससे अभिन्न है सांख्य मत की भांति इसकी स्वतन्त्र सत्ता नही है इस परब्रह्म की ही परा, प्रकृति, चेतन समुदाय है तथा अपरा प्रकृति ही जड़ समुदिय है दोनो उस परब्रह्म की ही शक्तियाँ है।
यह परब्रह्म सत् चित एवं आनन्द स्वरूप है वह नित्य एवं शाश्वत है प्रकृति अनित्य है शाश्वत नही है वह सत् के ज्ञान के अभाव में नितमय जैसी प्रतीत हेती है। यही भ्रम है जो बन्धन का कारण है सत् का ज्ञान होने पर प्रकृति ( जीवात्मा) तथा अपरा प्रकृति (जड़ प्रकृति) दोनो पर शासन करने वाला है प्रकृति स्वतन्त्र नही है 

अ• वशिष्ट sabhar satsang Facebook wall

मंगलवार, 27 जुलाई 2021

पूंजीवाद का एक पहलू यह भी है

छोटे से बॉक्‍स में किचन, टॉयलेट और बेड! 'कॉफिन होम' में कैसे रहती है Hong Kong की एक बड़ी आबादी?


होन्ग-कोन्ग. वो देश, जहां पर दुनियाभर की चकाचौंध मौजूद है. वह देश जिसकी अर्थव्यवस्था बहुत तेज़ी से आगे बढ़ रही है और जहां एक से बढ़कर एक ऊंची और चमकती इमारते हैं. ऐसे देश को देखकर कोई भी सोचेगा कि भला यहां के लोगों की जिंदगी क्या ही बुरी हो सकती है. हालांकि, सब सुविधाओं से भरे पड़े होन्ग-कोन्ग में भी एक हिस्सा ऐसा है जहां लोग बद से बद्दतर जिंदगी गुजारते हैं. 
यहां के लोग जिस तरह के घर में रहते हैं वो किसी ‘कॉफिन’ यानी ताबूद जैसा है जिसमें किसी लाश की तरह इन्हें पड़े रहना पड़ता है. तो चलिए आज जानते हैं कि आखिर कैसी होती है इन लोगों की जिंदगी कॉफिन होम में.

हांगकांग में क्यों नरक की जिंदगी जीने को मजबूर है लोग?

अगर हम बात करें दुनिया के सबसे महंगे शहरों की तो उनमें से एक होन्ग-कोन्ग भी है. यहाँ पर जीवन बिताना बहुत ही खर्चीला काम है. इस मॉडर्न ज़माने की हर सुविधा आपको यहाँ मिलेगी मगर उन सुविधाओं का दाम भी देना पड़ता है. यह तो स्वाभाविक है कि हर कोई इतना धनी नहीं है कि इतना खर्चा कर सकें. होन्ग-कोन्ग की महंगाई में लोग रोटी और कपड़ा तो जुटा लेते हैं, मगर घर का इंतज़ाम करना बहुत मुश्किल होता है.

यही वह मूल वजह है जिसके चलते होन्ग-कोन्ग के कई लोग आज कॉफिन होम में रहने को मजबूर हैं. अगर सरकारी आंकड़ों पर एक नज़र डाली जाए तो पता चलता है कि होन्ग-कोन्ग के इन कॉफिन होम में रहने वालों की संख्या बहुत ज्यादा है. अमूमन 2,00,000 से ज्यादा लोग इस समय इन घरों में रह रहे हैं. करीब 75 लाख की जनसंख्या वाले इस देश में 2 लाख लोग ऐसे हालातों में रह रहे हैं, जिनकी कल्पना भी नहीं की जा सकती है.
होन्ग-कोन्ग में न सिर्फ घर खरीदना बल्कि किराए पर लेना भी बहुत महंगा होता हिया. इसलिए यह लोग किराय पर भी कहीं नहीं रह सकते. कॉर्पोरेट के लिए मशहूर होन्ग-कोन्ग में ये लोग सड़कों पर भी अपना गुज़ारा नहीं कर सकते हैं क्योंकि वहां से भी इन्हें भगा दिया जाता है. आखिर में मजबूरन यह कॉफिन होम ही इनका सहारा बनते हैं. यह कॉफिन होम होन्ग-कोन्ग की चकाचौंध का वह दाग है, जिसे वह दुनिया से छिपाने की कोशिश करते हैं. वो बात और है कि इन लोगों के हालात कैसे न कैसे करके दुनिया के सामने आ ही जाते  हैं. 
कैसे होते हैं कॉफिन होम और लोग यहां पर कैसे रहते हैं?
कहते हैं कि घर छोटा ही हो मगर अपने पास जरूर हो. हालांकि, कॉफिन होम के आगे ये बातें गलत पड़ जाती हैं. अगर कोई आपको कहें कि आपको सिर्फ 6 फुट के कमरे में अपनी जिंदगी बितानी है तो आप क्या कहेंगे? सिर्फ इतना ही नहीं. उस 6 फुट के कमरे में जिसमें में आप बड़ी मुश्किल से समा पाएंगे उसमें ही आपको अपना खाना भी बनाना है और अपनी ज़रूरत की सारी चीज़ें जैसे पंखा, बेड और फ्रिज भी रखना है. जिस चीज़ को सोचने में ही इतना बुरा लग रहा है तो कल्पना कीजिए कि लोग वहां भला रहते कैसे होंगे. कॉफिन होम को बनाने का तरीका बहुत ही आसान है. एक 400 स्क्वायर फुट के मकान को 20 हिस्सों में बाँट दो. कमरों का साइज़ इतना छोटा रखो की बिल्डिंग में ज्यादा से ज्यादा कमरे बन पाएँ भले ही उसमें कोई इंसान गुस पाएँ या नहीं. डीलरों को पता है कि इसी का नाम मजबूरी है. कुछ जगहों पर कमरे थोड़े बड़े भी हैं जो उन लोगों के लिए बनाए गए हैं जिनके अपने परिवार हैं मगर अधिकाँश लोगों के लिए यह उतने ही बड़े बनाए जाते हैं जिसमें सिर्फ वह अकेले रह पाएं.  यहां रहने वाले लोगों के अपने तरीके हैं. कोई ऐसे सोता है कि वो करवट नहीं ले सकता तो कोई ऐसे सोता है कि वो पैर भी सीधे नहीं कर सकता. इन्हें बस इस बात का आसरा रहता है कि इनके सर के ऊपर एक छत है.
बाथरूम जाना यहां पर एक बड़ी चुनौती है. ऐसा इसलिए क्योंकि एक बाथरूम को करीब 20-25 लोग इस्तेमाल करते हैं. इतना ही नहीं यह गंदगी इन्हीं लोगों में बीमारी का कारण भी बनती है. जिस तरह से लोग इन कमरों में किसी लाश की तरह बिना हिले पड़े रहते हैं उन्हें देखकर ही यहाँ का नाम कॉफिन होम रखा गया था. इस सब के बाद भी यहाँ रहने के लिए लोगों को करीब 250 अमेरिकी डॉलर किराए के रूप में देने पड़ते हैं.

कभी प्रवासियों के लिए बनाए गए थे ये 'कॉफिन होम'
अगर आप सोच रहे हैं कि कॉफिन होम होन्ग-कोन्ग के गरीब लोगों के लिए हुआ है तो आप गलत हैं. ऐसा इसिलए क्योंकि कॉफिन होम का इतिहास आज का नहीं बल्कि सालों पुराना है. इनकी शुरुआत उस समय में हुई थी जब सालों पहले कई चीनी प्रवासी काम की तलाश में यहाँ पर आए थे. उनके रहने के लिए कोई जगह मौजूद नहीं थी और इसलिए सबसे पहले उनके लिए इन कॉफिन होम को बनाया गया.
हालांकि, उस समय यह आज से थोड़ा बड़े हुआ करते थे लेकिन हालात आज से भी बुरे थे. ऐसा इसलिए क्योंकि 1950 के दशक में हज़ारों की संख्या में चीनी प्रवासी यहाँ आए थे. ऐसे में उनके लिए रहने की जगह मौजूद नहीं थी तो शुरुआती कॉफिन होम लोहे से बनाए गए थे. गर्मी में वह लोहे के बने घर आग से तपते थे और सर्दी में वह बर्फ से ठंडे हो जाते थे. जिस तरह से कसाईखाने में मुर्गियों को लोहे के पिंजरे में रखा जाता है. कुछ ऐसे ही प्रवासियों को भी यहां रखा जाता था. 

आज यह कॉफिन होम काफी बदल गए हैं, मगर यहां पर रहने वालों की जिंदगी आज भी वैसी ही है. आज भी यहाँ पर लोग किसी जिंदा लाश की तरह रहते हैं. कॉफिन होम में लोगों की ज़िंदगी एक त्रासदी है. यह लोग अब इसमें ढल चुके हैं. अब सिर्फ इनकी आँखें इस अँधेरे में बस उम्मीद की एक रौशनी ढूँढती रहती है. आशा है कि आने वाले वक्त में वो उम्मीद इन्हें मिल जाए. 
 

सोमवार, 25 जनवरी 2021

नारमन इ बोरलाग

नारमन इ बोरलाग एक ऐसे ब्यक्ति का नाम है जो जीवन पर्यंत मानव जाती के लिए भूख से लड़ता रहा इस ऋषि को भारत सहित दुनिया के अनेक देश के लोग इन्हें हरित क्रांती का जनक कहते है २० वी सदी की इस क्रांति ने तीसरी दुनिया की करीब एक अरब कुपोषित आबादी को दो जून की रोटी उपलब्ध कराई डा बोरलाग को इस कार्य हेतु १९७० में नोबेल विश्व शांति पुरस्कार दिया गया इस वैज्ञानिक को भारत का अन्नदाता भी कहा जाता है और दुनिया इन्हें प्यार से प्रो व्हीट कहती है इनका जन्म २५ मार्च १९१४ को हुआ १९३९ इन्होने विश्विद्यालय से बी एसी करने के बाद १९४२ में पी यच डी की डिग्री प्राप्त करने के बाद १९४४ में मेक्सिको में गेहूं शोध से जुड़े उस समय गेहूं की उत्पादकता बहूत कम थी पुरे विश्व में लगभग आकाल की स्थिति थी परन्तु इस वैज्ञानिक ने हार न मानते हुए गेहूं के मोटे और छोटे ताने के विकाश के लिए १९५३ में नोरिन -१० नामक गेहूं की एक जापानी किस्म को अधिक उपजाऊ अमेरिकी किस्म बेबर -१४ से संकरण कराया इस प्रकार लगभग तीन गुना अधिक उत्पादन वाली जातीय प्राप्त हुयी जिससे भारत सहित अन्य विकाश शील देशो में खाद्य समस्या हल हुई हम इस ऋषि केआभारी रहेंगे रहेंगे

जीवन प्रत्याशा में हर साल 3 महीने की वृद्धि हो रही है

ब्रिटेन की एक बैग यह प्रसिद्ध वैज्ञानिक का दावा है कि जीवन का 150 वां बसंत देखने वाला आदमी तो पहले ही जन्म ले चुका है लेकिन यह तो कुछ भी नहीं अगले दशकों में ऐसे कई पहले व्यक्ति पैदा होंगे जो उम्र के 1000 में पड़ाव तक पहुंचेंगे लोग भले ही इस बात पर विश्वास ना करें लेकिन डॉक्टर डी ग्रे नामक इस वैज्ञानिक को पूरा विश्वास है कि उनके ही जीवन काल में बैठ डॉक्टरों के पास वह सभी साधन और औजार होंगे जिससे वे बुढ़ापे का इलाज करने में पूरी तरह सक्षम होंगे बायोमेडिकल जेंटो लार्जेस्ट तथा अध्यक्षता पर पिछले कई वर्षों से शोध करने वाले संस्थान के प्रमुख वैज्ञानिक डॉक्टर डि gre  का दावा है कि ऐसा संभव होगा तमाम तरह की बीमारियों को समाप्त कर ऐसा करने से जीवन को अनिश्चित काल  के लिए बढ़ाया जा सकता है तब आदमी उम्रदराज तो होगा ना है वह स्पष्ट है इस समय जीवन प्रत्याशा में हर साल 3 महीने की वृद्धि हो रही है और विशेषज्ञों का मानना है कि वर्ष 2030 में 100 वर्ष की उम्र पार करने वाले की संख्या कई लाख में होगी इस समय दुनिया में सबसे ज्यादा जीने वाला व्यक्ति कार्यकाल 122 वर्ष का है जापान में वर्ष 2010 में 44000 से ज्यादा लोग 100 वर्ष से ज्यादा उम्र के थे उनका मानना है कि विकासशील देशों में कारण बाधित हो सकती है डॉक्टर डिग्री ऐसे समय को हकीकत बनते देखते हैं जब लोग अपने डॉक्टरों के पास नियमित मेंटेनेंस के लिए जाया करेंगे 
 उस समय तक जीन थेरेपी स्टेम सेल थेरेपी इम्यून सिस्टम स्टिमुलेशन एडवांस मेडिकल तकनीक आम लोगों की पहुंच तक होगी जिससे लोग अपने को फिट एवं फाइंड रख सकेंगे डॉक्टर डिग्री मानते हैं कि बुढ़ापा कुल मिलाकर हमारे शरीर में जीवन भर संजीत होने वाला अलग अलग  किस्म का सूक्ष्म और कोशिकीय loss  है और इसे रोकना संभव है इस बात पर अभी बात हो सकती है कि भविष्य में आदमी की औसत आयु कहां तक पहुंचेगी लेकिन जो प्रवृतियां है वह स्पष्ट है इस समय जीवन की प्रत्याशा में हर साल 3 महीने की वृद्धि हो रही है

रविवार, 24 जनवरी 2021

रोबोटिक इंसान

आने वाले समय में इंसान में मशीन का कम्बीनेशन एक साथ हो सकता है कभी स्वास्थ्य कारणों से तो कभी सेना में जरूरत के लिए रोबोटिक कंकालों पर शोध होता है. बीते दशक में इंसान के शरीर की ही तरह हरकतें करने में सक्षम रोबोटिक हाथ, पैर और कई तरह के बाहरी कंकाल विकसित किए जा चुके हैं.पूरी तरह रोबोटिकआइला नाम की यह मादा रोबोट दिखाती है कि एक्सो-स्केलेटन यानि बाहरी कंकाल को कैसे काम करना चाहिए. जब किसी व्यक्ति ने इसे पहना होता है तो आइला उसे दूर से ही नियंत्रित कर सकती है. आइला को केवल उद्योग-धंधों में ही नहीं अंतरिक्ष में भी इस्तेमाल किया जा सकता है.हाथों से शुरु जर्मनी में एक्सो-स्केलेटन पर काम करने वाला डीएफकेआई नाम का आर्टिफीशियल इंटेलिजेंस रिसर्च सेंटर 2007 में शुरू हुआ. शुरुआत में यहां वैज्ञानिक रोबोटिक हाथ और उसका रिमोट कंट्रोल सिस्टम बनाने की ओर काम कर रहे थे. तस्वीर में है उसका पहला आधुनिक प्रोटोटाइप. बेहद सटीक डीएफकेआई ने 2011 से दो हाथों वाले एक्सो-स्केलेटन पर काम शुरू किया. दो साल तक चले इस प्रोजेक्ट में रिसर्चरों ने इंसानी शरीर के ऊपरी हिस्से की कई बारीक हरकतों की अच्छी नकल कर पाने में कामयाबी पाई और इसे एक्सो-स्केलेटन में भी डाल सके रूस का रिमोट कंट्रोलकेवल जर्मन ही नहीं, रूसी रिसर्चर भी रिमोट कंट्रोल सिस्टम वाले एक्सो-स्केलेटन बना चुके हैं. डीएफकेआई ब्रेमन के रिसर्चरों को 2013 में रूसी रोबोट को देखने का अवसर मिला. इसके अलावा रूसी साइंटिस्ट भी आइला रोबोट पर अपना हाथ आजमा चुके हैं.बिल्कुल असली से हाथदुनिया की दूसरी जगहों पर विकसित किए गए सिस्टम्स के मुकाबले डीएफकेआई के कृत्रिम एक्सो-स्केलेटन के सेंसर ना केवल हथेली पर लगे हैं बल्कि बाजू के ऊपरी और निचले हिस्सों पर भी. नतीजतन रोबोटिक हाथ का संचालन बेहद सटीक और असली सा लगता है. इसमें काफी जटिल इलेक्ट्रॉनिक्स इस्तेमाल होता है. भार ढोएंगे रोबोटिक पैर डीएफकेआई 2017 से रोबोटिक हाथों के साथ साथ पैरों का एक्सो-स्केलेटन भी पेश करेगा. यह इंसान की लगभग सभी शारीरिक हरकतों की नकल कर सकेगा. अब तक एक्सो-स्केलेटन को पीठ पर लादना पड़ता था, लेकिन भविष्य में रोबोट के पैर पूरा बोझ उठा सकेंगे.लकवे के मरीजों की मदद इन एक्सो-स्केलेटनों का इस्तेमाल लकवे के मरीजों की सहायता के लिए हो रहा है. ब्राजील में हुए 2014 फुटबॉल विश्व कप के उद्घाटन समारोह में वैज्ञानिकों ने इस तकनीकी उपलब्धि को पेश किया था. आगे चलकर इन एक्सो-स्केलेटन में बैटरियां लगी होंगी और इन्हें काफी हल्के पदार्थ से बनाया जाएगा. फिलहाल इन एक्सो-स्केलेटन की अंतरिक्ष में काम करने की क्षमता का परीक्षण त्रिआयामी सिमुलेशन के द्वारा किया जा रहा है. इन्हें लेकर एक महात्वाकांक्षी सपना ये है कि ऐसे रोबोटों को दूर दूर के ग्रहों पर रखा जाए और उनका नियंत्रण धरती के रिमोट से किया जा सके. भविष्य में खतरनाक मिशनों पर अंतरिक्षयात्रियों की जगह रोबोटों को भेजा जा सकता है.बिल्कुल असली से हाथ दुनिया की दूसरी जगहों पर विकसित किए गए सिस्टम्स के मुकाबले डीएफकेआई के कृत्रिम एक्सो-स्केलेटन के सेंसर ना केवल हथेली पर लगे हैं बल्कि बाजू के ऊपरी और निचले हिस्सों पर भी. नतीजतन रोबोटिक हाथ का संचालन बेहद सटीक और असली सा लगता है. इसमें काफी जटिल इलेक्ट्रॉनिक्स इस्तेमाल होता है.जर्मनी में एक्सो-स्केलेटन पर काम करने वाला डीएफकेआई नाम का आर्टिफीशियल इंटेलिजेंस रिसर्च सेंटर 2007 में शुरू हुआ. शुरुआत में यहां वैज्ञानिक रोबोटिक हाथ और उसका रिमोट कंट्रोल सिस्टम बनाने की ओर काम कर रहे थे और सफल भी रहे sabhar dW.COM