संदेश

स्वामी विवेकानंद – एक क्रांतिकारी सन्यासी

स्वमी विवेकानंद को रामकृष्ण परमहंस ने पहली बार समाधि का अनुभव कराया था। जानते हैं कि गुरु रामकृष्ण परमहंस के साथ रहकर उनमें क्या बदलाव आए और क्या अनुभव हुए...   सौ साल से अधिक समय गुजर जाने के बाद भी आज भी विवेकानंद युवाओं के प्रिय हैं। आखिर कैसे? कैसा था उनका जीवन? क्या खास किया था उन्होंने ? स्वामी विवेकानंद का जन्म 12 जनवरी 1863 को कोलकाता में विश्वनाथ दत्ता और भुवनेश्वरी देवी के घर नरेंद्र नाथ दत्त के रूप में हुआ था। 4 जुलाई, 1902 को बेलूर मठ में उनका देहांत हुआ। अपने देहांत तक उन्होंने एक ऐसी क्रांति ला दी थी, जिसकी गूंज आज तक दुनिया भर में है। अपने गुरु के संदेश वाहक के रूप में, वह एक शताब्दी से दुनिया भर के युवाओं के लिए एक प्रेरणास्रोत रहे हैं। इस लेख में, सद्गुरु स्वामी विवेकानंद के जीवन की कुछ घटनाओं के बारे में बता रहे हैं जिनसे यह पता चलता है कि अपने गुरु के साथ उनका क्या रिश्ता था और वह उनका कौन सा संदेश लोगों में फैलाना चाहते थे। रामकृष्ण परमहंस को दिव्यज्ञान प्राप्त होने के बाद, उनके बहुत सारे शिष्य बन गए। उनके एक शिष्य थे, स्वामी विवेकानंद। विवेकानंद अमेरिका जाने वाले प

विश्व की प्रथम वायुयान आधारित प्रेक्षणशाला 'सोफिया' द्वारा प्रथम खगोलिकी प्रेक्षण

  दूरबीन को एक 747 जम्बो जेट वायुयान के अंदर लगाया गया। दूरबीनों को पृथ्वी तथा अंतरिक्ष में स्थापित करके अनेक खगोलिकी प्रेक्षण किए जा चुके हैं। खगोलिकी की समतामंडल प्रेक्षणशाला-सोफिया (स्ट्रैटोस्फेयरिक ऑब्जर्वेटरी फॉर इंफ्रारेड एस्ट्रोनॉमी) प्रथम प्रेक्षणशाला है जिसके अंतर्गत 2.5 मीटर दर्पण व्यास वाली एक है तथा इसके द्वारा प्रथम खगोलिकी प्रेक्षण 26 मई 2010 को किया सोफिया गया । प्रेक्षणशाला अमेरिकी अंतरिक्ष संस्था 'नासा' और जर्मन एरोस्पेस सेंटर की संयुक्त परियोजना है। 'नासा' के अंतरिक्ष भौतिकी विभाग के निदेशक जॉन मोर्स के अनुसार प्रोसेसिंग कर रहे हैं। इस उड़ान के साथ सोफिया को 20 वर्ष की खगोलिकी यात्रा प्रारंभ हती है जिसके अंतर्गत यह उन दुर्लभ ३ खगोलिकी प्रेक्षणों को संपन्न करनी जो मू और अंतरिक्ष आधारित दूरबीनों के द्वारा संभव नहीं हैं। वैज्ञानिक सोफिया द्वारा प्राप्त प्रथम खगोलिकी डेटा के आधार पर इसका नाम दिया गया है sabhar aviskar  # latest #aajtak.in #amarujala # space #American science 

ब्रह्मांड विज्ञान

 ब्रह्मांड विज्ञान अभी नहीं जानता कि 23 प्रतिशत पदार्थ का रंग रूप क्या है और शेष 73 प्रतिशत किस प्रकार की ऊर्जा है, अर्थात् विज्ञान अभी ब्रह्मांड का निर्माण करने वाले पदार्थ तथा अपदार्थ (ऊर्जा) का मात्र 4 प्रतिशत ही जानता है। इस घोर अज्ञान के लिए 'विज्ञान' को कोई खेद प्रकट करने की आवश्यकता नहीं है। क्योंकि इस ‘अज्ञान' का जानना भी एक बहुत बड़ी उपलब्धि है। ब्रह्मांड विज्ञान ने हमें ज्ञान दिया है कि ब्रह्मांड का उद्भव 13.7 अरब वर्ष पहले हुआ था, कि उसका विकास किस तरह हुआ, अर्थात् किस तरह ग्रह, तारे, मंदाकिनियां, मंदाकिनियों के समूह और किस तरह इन समूहों की चादरें निर्मित हुई; कि ब्रह्मांड में पदार्थ इतनी दूर-दूर क्यों हैं; कि पदार्थ और प्रति पदार्थ का निर्माण हुआ था किंतु अब हमारे देखने में केवल पदार्थ ही है; कि दिक और काल निरपेक्ष नहीं वरन् वेग के सापेक्ष हैं कि वे चार आयामों में गुंथे हुए हैं; कि दिक का वेग के साथ संकुचन होता है और काल का विस्फारण; कि ब्रह्मांड की दशा स्थाई नहीं है वरन् उसका प्रसार हो रहा है और वह भी त्वरण के साथ; कि एक और 'जगत' है जो हमें दिखता नहीं ह

रोनाल्डो हेनरी निक्सनकृष्ण को छोटा भाई कहते थे

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 एक थे रोनाल्डो हेनरी निक्सन. इंग्लैंड निवासी अंग्रेज थे और मात्र 18 वर्ष की उम्र में प्रथम जर्मनी युद्ध में उन्होंने बड़े अफसर के रूप में भाग लिया था. नरसंहार से इतने व्यथित हुए कि सेना छोड़ दी. घूमते हुए एक दिन कैंब्रिज विश्वविद्यालय में पहुंच गये, यहाँ उन्हें सनातन, वेदांत, ईश्वर और महात्मा बुद्ध के बारे में जानकारी मिली तो, भारत आ गए. भारत में टहलते हुए ब्रज आ गये और फिर यहाँ आकर कृष्ण के दिवाने हो गये. कृष्ण को छोटा भाई कहते थे .  एक दिन उन्होंने हलवा बनाकर भोग लगाया. पर्दा हटा कर देखा तो, कटोरी में छोटी-छोटी अँगुलियों के निशान थे, जिन्हें देख कर वे आश्चर्य चकित हो कर  रोने लगे कि उन्हें शायद इतना प्रेम करते हैं कि भोग खाने बाल स्वरूप में ही स्वयं आते हैं.. निक्सन कृष्ण को प्रतिदिन भोजन करा कर और सुला कर ही स्वयं सोते थे. कहते हैं कि सर्दियों के मौसम में निक्सन कुटिया के बाहर सो रहे थे तभी, मध्य रात्रि को उन्हें लगा कोई आवाज दे रहा है  .. हो दादा ... हो दादा ... वे उठकर अंदर गये. देखा तो, कोई नहीं दिखा. भ्रम समझ कर पलटे तभी, फिर आवाज सुनाई दी ..ईस बार साफ थी . हो दादा ... हो दादा ..

कहानी राजा भरथरी (भर्तृहरि) की

  ========================= उज्जैन में  भरथरी  की गुफा स्थित है।  इसके संबंध में यह माना जाता है कि यहां भरथरी ने तपस्या की थी। यह गुफा शहर से बाहर एक सुनसान इलाके में है।  गुफा के पास ही शिप्रा नदी बह रही है।  गुफा के अंदर जाने का रास्ता काफी छोटा है। जब हम इस गुफा के अंदर जाते हैं तो सांस लेने में भी कठिनाई महसूस होती है। गुफा की ऊंचाई भी काफी कम है, अत: अंदर जाते समय काफी सावधानी रखनी होती है।  यहाँ पर एक गुफा और है जो कि पहली गुफा से छोटी है। यह  गोपीचन्द कि गुफा है जो कि भरथरी का भतीजा था। यहां प्रकाश भी काफी कम है, अंदर रोशनी के लिए बल्ब लगे हुए हैं। इसके बावजूद गुफा में अंधेरा दिखाई देता है। यदि किसी व्यक्ति को डर लगता है तो उसे गुफा के अंदर अकेले जाने में भी डर लगेगा।  यहां की छत बड़े-बड़े पत्थरों के सहारे टिकी हुई है। गुफा के अंत में राजा भर्तृहरि की प्रतिमा है और उस प्रतिमा के पास ही एक और गुफा का रास्ता है। इस दूसरी गुफा के विषय में ऐसा माना जाता है कि यहां से चारों धामों का रास्ता है। गुफा में भर्तृहरि की प्रतिमा के सामने एक धुनी भी है, जिसकी राख हमेशा गर्म ही रहती है। गौर

श्री होयसलेश्व मन्दिर, हलेबीदु, कर्नाटक

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 सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड जिनकी शक्ति से संचालित है उन देवाधिदेव महादेव का अद्वितीय मन्दिर, होयसल साम्राज्य के राजा विष्णुवर्धन द्वारा एक मानव निर्मित कृत्रिम झील के किनारे होयसलेश्व मन्दिर का निर्माण १२ वीं सदी में करवाया गया था। श्री होयसलेश्व मन्दिर भगवान शिव को समर्पित है। श्री होयसलेश्व मन्दिर का निर्माण soapstone पत्थरों से किया गया है। इस मन्दिर का कोई भी एक फीट स्थान कलाकृतियों से रहित नहीं है। कितना श्रमसाध्य रहा होगा यह कार्य जिन्हें सनातनी शिल्पकारों ने अपने निपुण हाथों से सम्भव किये हैं। इस दिव्य कला को शुक्रवारी ने कलाकारों के हाथों को काटकर और पुस्तकालयों को जलाकर लुप्त कर दिया। जो कुछ शेष कला बचा उसे इतवारियों ने ग्रँथ चौर्य कर निर्लज्जता से अपने नाम करवा लिया। अद्भुत सनातन धरोहर!! जय सनातन धर्म🙏🚩 जय महाकाल🔱🚩 #प्रेमझा. Sabhar soniya Singh Facebook wall

शिखा बन्धन (चोटी) रखने का महत्त्व

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 #अच्छे काम के लिए सिर्फ #सलाह दी जाती है #दबाव नहीं #शिखा_बन्धन (#चोटी) रखने का महत्त्व शिखा का महत्त्व विदेशी जान गए हिन्दू भूल गए। हिन्दू धर्म का छोटे से छोटा सिध्दांत, छोटी-से-छोटी बात भी अपनी जगह पूर्ण और कल्याणकारी हैं। छोटी सी शिखा अर्थात् चोटी भी कल्याण, विकास का साधन बनकर अपनी पूर्णता व आवश्यकता को दर्शाती हैं। शिखा का त्याग करना मानो अपने कल्याणका त्याग करना हैं। जैसे घङी के छोटे पुर्जे कीजगह बडा पुर्जा काम नहीं कर सकता क्योंकि भले वह छोटा हैं परन्तु उसकी अपनी महत्ता है।  शिखा न रखने से हम जिस लाभ से वंचित रह जाते हैं, उसकी पूर्ति अन्य किसी साधन से नहीं हो सकती। 'हरिवंश पुराण' में एक कथा आती है हैहय व तालजंघ वंश के राजाओं ने शक, यवन, काम्बोज पारद आदि राजाओं को साथ लेकर राजा बाहू का राज्य छीन लिया। राजा बाहु अपनी पत्नी के साथ वन में चला गया। वहाँ राजा की मृत्यु हो गयी। महर्षिऔर्व ने उसकी गर्भवती पत्नी की रक्षा की और उसे अपने आश्रम में ले आये। वहाँ उसने एक पुत्र को जन्म दिया, जो आगे चलकर राजा सगर के नाम से प्रसिद्ध हुआ। राजासगर ने महर्षि और्व से शस्त्र और शास्त्र विद्या

संभोग में आसनों के विभिन्न प्रकार

 वन डे ई विल डे नामक कामशास्त्री ने अपनी पुस्तक आइडियल मैरिज में आसनों के वर्गीकरण का आधार स्त्री व पुरुष के शरीर की स्थिति को बताया है जबकि महर्षि वात्सायन नामक कामशास्त्री ने अपनी पुस्तक कामसूत्र में आसनों का उच्चतरतोपयोगी नीचरतो पयोगी के रूप में विभाजित किया है जो अधिक व्यवहारिक व वैज्ञानिक है हमारे विचार से विभिन्न आसनों का विभाजन या वर्गीकरण करने का प्रयास ना तो पूर्णता सफल है ना ही विशेष आवश्यक है वास्तव में आसनों का विभाजन करना बहुत कठिन कार्य है इंद्रधनुष में कौन सा रंग कहां से प्रारंभ होता है और कहां समाप्त कहना कठिन है तथापि स्वयं इंद्रधनुषी छटा बड़ी मनोहारी और चिता चिता कर सकती है इसी तरह से काम के आकाश में छाए मिथुन की विविध आसन होते तो फिर दाग राही और अलौकिक आनंद की वर्षा करने वाले ही हैं फिर भी सुविधा की दृष्टि से प्रमुख व्यवहारिक आसनों को निम्नलिखित वर्गों में उनके गुण और दोष देते हुए वर्गीकृत किया गया है प्रथम वर्ग उत्तान वे आसन जिसमें स्त्री पीठ के बल लेट थी और पुरुष सामने से ऊपर आकर मिथुन करता है द्वितीय वर्ग आनत वे अपन जिसमें स्त्री पेट के बल पर लेटती है और पुरुष पीस