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विश्व की प्रथम वायुयान आधारित प्रेक्षणशाला 'सोफिया' द्वारा प्रथम खगोलिकी प्रेक्षण

  दूरबीन को एक 747 जम्बो जेट वायुयान के अंदर लगाया गया। दूरबीनों को पृथ्वी तथा अंतरिक्ष में स्थापित करके अनेक खगोलिकी प्रेक्षण किए जा चुके हैं। खगोलिकी की समतामंडल प्रेक्षणशाला-सोफिया (स्ट्रैटोस्फेयरिक ऑब्जर्वेटरी फॉर इंफ्रारेड एस्ट्रोनॉमी) प्रथम प्रेक्षणशाला है जिसके अंतर्गत 2.5 मीटर दर्पण व्यास वाली एक है तथा इसके द्वारा प्रथम खगोलिकी प्रेक्षण 26 मई 2010 को किया सोफिया गया । प्रेक्षणशाला अमेरिकी अंतरिक्ष संस्था 'नासा' और जर्मन एरोस्पेस सेंटर की संयुक्त परियोजना है। 'नासा' के अंतरिक्ष भौतिकी विभाग के निदेशक जॉन मोर्स के अनुसार प्रोसेसिंग कर रहे हैं। इस उड़ान के साथ सोफिया को 20 वर्ष की खगोलिकी यात्रा प्रारंभ हती है जिसके अंतर्गत यह उन दुर्लभ ३ खगोलिकी प्रेक्षणों को संपन्न करनी जो मू और अंतरिक्ष आधारित दूरबीनों के द्वारा संभव नहीं हैं। वैज्ञानिक सोफिया द्वारा प्राप्त प्रथम खगोलिकी डेटा के आधार पर इसका नाम दिया गया है sabhar aviskar  # latest #aajtak.in #amarujala # space #American science 

ब्रह्मांड विज्ञान

 ब्रह्मांड विज्ञान अभी नहीं जानता कि 23 प्रतिशत पदार्थ का रंग रूप क्या है और शेष 73 प्रतिशत किस प्रकार की ऊर्जा है, अर्थात् विज्ञान अभी ब्रह्मांड का निर्माण करने वाले पदार्थ तथा अपदार्थ (ऊर्जा) का मात्र 4 प्रतिशत ही जानता है। इस घोर अज्ञान के लिए 'विज्ञान' को कोई खेद प्रकट करने की आवश्यकता नहीं है। क्योंकि इस ‘अज्ञान' का जानना भी एक बहुत बड़ी उपलब्धि है। ब्रह्मांड विज्ञान ने हमें ज्ञान दिया है कि ब्रह्मांड का उद्भव 13.7 अरब वर्ष पहले हुआ था, कि उसका विकास किस तरह हुआ, अर्थात् किस तरह ग्रह, तारे, मंदाकिनियां, मंदाकिनियों के समूह और किस तरह इन समूहों की चादरें निर्मित हुई; कि ब्रह्मांड में पदार्थ इतनी दूर-दूर क्यों हैं; कि पदार्थ और प्रति पदार्थ का निर्माण हुआ था किंतु अब हमारे देखने में केवल पदार्थ ही है; कि दिक और काल निरपेक्ष नहीं वरन् वेग के सापेक्ष हैं कि वे चार आयामों में गुंथे हुए हैं; कि दिक का वेग के साथ संकुचन होता है और काल का विस्फारण; कि ब्रह्मांड की दशा स्थाई नहीं है वरन् उसका प्रसार हो रहा है और वह भी त्वरण के साथ; कि एक और 'जगत' है जो हमें दिखता नहीं ह

रोनाल्डो हेनरी निक्सनकृष्ण को छोटा भाई कहते थे

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 एक थे रोनाल्डो हेनरी निक्सन. इंग्लैंड निवासी अंग्रेज थे और मात्र 18 वर्ष की उम्र में प्रथम जर्मनी युद्ध में उन्होंने बड़े अफसर के रूप में भाग लिया था. नरसंहार से इतने व्यथित हुए कि सेना छोड़ दी. घूमते हुए एक दिन कैंब्रिज विश्वविद्यालय में पहुंच गये, यहाँ उन्हें सनातन, वेदांत, ईश्वर और महात्मा बुद्ध के बारे में जानकारी मिली तो, भारत आ गए. भारत में टहलते हुए ब्रज आ गये और फिर यहाँ आकर कृष्ण के दिवाने हो गये. कृष्ण को छोटा भाई कहते थे .  एक दिन उन्होंने हलवा बनाकर भोग लगाया. पर्दा हटा कर देखा तो, कटोरी में छोटी-छोटी अँगुलियों के निशान थे, जिन्हें देख कर वे आश्चर्य चकित हो कर  रोने लगे कि उन्हें शायद इतना प्रेम करते हैं कि भोग खाने बाल स्वरूप में ही स्वयं आते हैं.. निक्सन कृष्ण को प्रतिदिन भोजन करा कर और सुला कर ही स्वयं सोते थे. कहते हैं कि सर्दियों के मौसम में निक्सन कुटिया के बाहर सो रहे थे तभी, मध्य रात्रि को उन्हें लगा कोई आवाज दे रहा है  .. हो दादा ... हो दादा ... वे उठकर अंदर गये. देखा तो, कोई नहीं दिखा. भ्रम समझ कर पलटे तभी, फिर आवाज सुनाई दी ..ईस बार साफ थी . हो दादा ... हो दादा ..