
By Santul Nerkar from NYT Business https://ift.tt/4wvk35O
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आज #हिमाचल_प्रदेश के अनदेखे #हिल_स्टेशन की झलक देखिए, क्यों की #शिमला और #मनाली के तो नाम पूरी दुनिया ने सुन रखे हैं तो आज अनदेखे हिल स्टेशन की झलक आपके सामने हैं,#हिमाचल_प्रदेश एक ऐसा राज्य है जो अपनी प्राकृतिक सुंदरता, शांत वातावरण और साहसिक गतिविधियों के लिए प्रसिद्ध है। यहाँ कुछ अनदेखे हिल स्टेशन हैं जो आपको जरूर पसंद आएंगे:
*1. #त्रिउंड (Triund)*
त्रिउंड एक छोटा सा हिल स्टेशन है जो धर्मशाला से लगभग 9 किमी की दूरी पर स्थित है। यहाँ से आप दhauladhar श्रृंखला के सुंदर दृश्यों का आनंद ले सकते हैं।
*2. #बीर_बिलिंग (Bir Billing)*
बीर बिलिंग एक छोटा सा गाँव है जो पालमपुर से लगभग 35 किमी की दूरी पर स्थित है। यहाँ पैराग्लाइडिंग और ट्रेकिंग जैसी साहसिक गतिविधियों का आनंद लिया जा सकता है।
*3. #कल्पा (Kalpa)*
कल्पा एक छोटा सा गाँव है जो रेकोंग पियो से लगभग 15 किमी की दूरी पर स्थित है। यहाँ से आप किन्नौर कैलाश के सुंदर दृश्यों का आनंद ले सकते हैं।
*4. #चितकुल (Chitkul)*
चितकुल एक छोटा सा गाँव है जो सांगला घाटी में स्थित है। यहाँ से आप हिमालय की सुंदर चोटियों और हरे-भरे जंगलों का आनंद ले सकते हैं।
*5. #पालमपुर (Palampur)*
पालमपुर एक छोटा सा हिल स्टेशन है जो काँगड़ा घाटी में स्थित है। यहाँ से आप दhauladhar श्रृंखला के सुंदर दृश्यों का आनंद ले सकते हैं।
*6. #बारोटvally (Barot)*
बारोट एक छोटा सा गाँव है जो मंडी जिले में स्थित है। यहाँ से आप उहल नदी के सुंदर दृश्यों का आनंद ले सकते हैं।
*7. #जीबी जीभी (Jibhi)*
जीबी एक छोटा सा गाँव है जो कुल्लू जिले में स्थित है। यहाँ से आप तीर्थन घाटी के सुंदर दृश्यों का आनंद ले सकते हैं।
*8. #गुशैनी (Gushaini)*
गुशैनी एक छोटा सा गाँव है जो कुल्लू जिले में स्थित है। यहाँ से आप तीर्थन घाटी के सुंदर दृश्यों का आनंद ले सकते हैं।
*9. #नारकंडा (Narkanda)*
नारकंडा एक छोटा सा हिल स्टेशन है जो शिमला जिले में स्थित है। यहाँ से आप हिमालय की सुंदर चोटियों का आनंद ले सकते हैं।
*10. #कोटगढ़ (Kotgarh)* #sandeep_soni
कोटगढ़ एक छोटा सा गाँव है जो शिमला जिले में स्थित है। यहाँ से आप हिमालय की सुंदर चोटियों का आनंद ले सकते हैं।,ये हिल स्टेशन सेब की खेती के लिए फेमस है
इन अनदेखे हिल स्टेशनों में से कुछ आपको जरूर पसंद आएंगे। यहाँ की प्राकृतिक सुंदरता, शांत वातावरण और साहसिक गतिविधियों का आनंद लेने के लिए आपको जरूर आना चाहिए।, तस्वीरें और जानकारी अच्छी लगी हो तो आप ज्यादा से ज्यादा शेयर कीजिए,और मुझे फॉलो भी कर सकते हैं 🙏🙏🙏♥️♥️ साभार संदीप सोनी फेसबुक वॉल
बिहार में कमरख को स्टार फल के नाम से जाना जाता है।कमरख का पेड उत्तर और मध्य भारत के वनीय भागो में अक्सर देखा जा सकता है....अंग्रेजी भाषा में इसे स्टार फ्रूट के नाम से जाना जाता है और इसका वानस्पतिक नाम #एवेरोहा_करम्बोला है....स्वाद में इसके फल काफी खट्टे होते है, ज्यादा पक जाने पर इनमें थोडी मिठास भी आ जाती है..... आदिवासियों के अनुसार इसका पका हुआ फल शक्तिवर्धक और ताजगी देने वाला होता है.... गर्मियों में इस फल के सेवन से लू की मार नहीं पडती तथा यह ज्यादा गर्मी की वजह से होने वाले बुखार में भी लाभकारी होता है..... कमरख एक देशी फल हैं....इसका स्वाद खाने में बहुत ही खट्टा होता हैं..... इसीलिए इसे खाना ज्यादा लोग पसंद करते हैं..... कमरख के पेड़ बहुत ही बड़े और घने होते हैं..... सदाबहारी कमरख के पेड़ पर पतझड़ नहीआती वर्ष भर हरा भरा रहता है ....सर्दियों के शुरुआती अर्थात सितम्बर अक्टूम्बर के मौसम में मिलने वाला फल कमरख इस सीजन में काफी लाभदायक होता है.....जिससे त्वचा संबंधी विकार नही होते हैं....यह आंख के घाव में भी बहुत फायदा करता है....कमरख हृदय की शक्ति बढाने के लिए भी अत्यंत फायदेमंद होते हैं...इसीलिए यदि किसी व्यक्ति को हृदय से सम्बन्धित कोई रोग हो तो उसे इसका सेवन जरूर करना चाहिए... #कैंसर और #डायबिटीज रोगियों के लिए भी बहुत फायदेमंद है.....कमरख के पके पके हुए फल का सेवन करने से शरीर में ताजगी आती हैं और शरीर की शक्ति में वृद्धि होती हैं।
#अनूप साभार फेसबुक वॉल
वनभोज: प्रकृतिवाद की महान परम्परा है जो सदियों पुरानी है
तनावमुक्त जीवन और उत्तम स्वास्थ्य की कुंजी है यह वनभोज और जब यह पातालकोट में हो तो फिर इसके क्या कहने..
आप सभी ने एक मास्टर की याने कुंजी के विषय मे जरूर सुना होगा। मास्टर की एक ऐसी चाबी होती है जिससे कोई भी ताला खोला जा सके। ठीक ऐसे ही यह वनभोज है जिसे में आपके हर सवाल का मास्टर स्ट्रोक कह सकता हूँ। यकीन न आये तो सवाल दागिये जबाब तैयार मिलेगा। पोस्ट महत्वपूर्ण है इसीलिये यादों के पिटारे से निकालकर पुनः पोस्ट कर रहा हूँ। ये उस दौर की यादों का पिटारा है, जब गुरूदेव दीपक आचार्य जी का परोक्ष मार्गदर्शन मुझे मिलता रहता था। चलिये विषय पर लौटते हैं।
यहाँ क्या क्या है पहले ये बता देता हूँ। खाने में है पातालकोट की घाटियों में तैयार किया गया स्वादिष्ट बैगन भर्ता, बाटी/ पानगे, मक्के की रोटी, आलू-बैगन-भेजरे की सब्जी, बल्लर की दाल, चावल। ये सब कुछ पारंपरिक थालियों में परोसा गया जो कि माहुल के ताजे पत्तो से बनाई गई। हर व्यक्ति को पहले थाली और प्लेट बनाना सिखाया गया फिर अपनी अपनी थाली में भोजन सम्पन हुआ। अब एक से मेरा काम नही होता इसीलिये मेरी थाली 2 के बराबर है 😜।
यूँ तो अक्सर हमारे हाथ का ही कच्चा पक्का स्वादिष्ट भोजन हर बार हम ग्रहण करते थे लेकिन इस बार तो पातालकोट की कुशल माताओं और बहनों के हाथों बने भोजन से मन, जिव्हा और पेट सभी तृप्त हो गये। इस खाने को और अधिक स्वादिष्ट बनाते हैं यहाँ के सुंदर दृश्य, बहुमूल्य औषधियाँ और इनके साथ नदी का शीतल जल, जिसमे घंटे भर तैराकी के बाद भूख अपने चरम तक पहुँच जाती है। ऐसे में हम सभी ने एक एक बाटी बिना किसी सब्जी, दाल या चटनी के अपने पेट मे उतार दी पता ही नही चला। वैसे इतना पौष्टिक भोजन 3- 4 किलो मीटर पहाड़ चढ़ने और उतरने के लिए जरूरी भी होता है। नादियों के जल को बिना छाने पीना और गर्मागर्म रेत में लोटपोट होना भी इस मजेदार वनभोज का एक हिस्सा होता है। भोजन के बाद बची जूठी पत्तलें जानवर खा लेते हैं तो मन मे एक सुकून सा रहता है कि कुछ भी व्यर्थ नही गया। ये वनभोज हम सभी के लिए बहुत आवश्यक हैं। वैसे और भी कई कारण हैं कि हमे ऐसे आयोजन करते रहना चाहिए, आइये जानते हैं उन्हें भी..।
आप बुढ़ापे में ढेर सारा धन कमाने के बाद कभी न कभी डॉक्टर साहेब के चक्कर मे पड़ ही जाते होंगे। यदि वे बड़े वाले हस्पताल के बड़े साहब रहे तो फिर आपकी जेब ढीली होना निश्चित है लेकिन अगर वे आपके करीबी मित्र या शुभचिंतको में से एक हुये तो थोड़ी राहत मिलती है। दरियादिली दिखाते हुए वे एक शार्ट ट्रिक यानि फंडा बताते हैं कि ये दवाई गोली ज्यादा काम की नही हैं, फिट रहना है तो दिन में 2 बार सुबह और शाम आसपास टहल आइये।
अब टहलने से आराम मिलता है या नही, इसे पता करने के लिए तो आपको टहल ही आना चाहिए। लेकिन मैं जरा दूसरे किसम के फायदे बताने के मूड में हूँ। ये जो इंसानी जीव है न वो बहुत डरपोक टाइप का होता है। अकेले-अकेले इससे कुछ होता नही है। इसीलिए फिर साथी तलाशने में जुट जाता है, और देखते ही देखते कुछ साथ मे भटकने को तैयार बीमार और सताये हुये प्राणी उसे मिल जाते है। फिर साथ घूमते टहलते भटकते न जाने वे कब दोस्त बन जाते हैं उन्हें भी पता नही होता है, तब जाकर इन्हें पता चलता है कि काश ये पहले कर लेते तो फला फला बीमारी लगती ही नही। दोस्त बनाना भी एक फायदा ही हुआ न?
अब बुढ़ापे में प्रदूषण भरे माहौल में सड़क के किनारे टहलने को ही हर मर्ज की दवा मत मान लीजियेगा। ये भी सत्य है लेकिन आपको अभी परम सत्य की तलाश करना है। तो चलते हैं परम सत्य की खोज में, मेरे यानि डॉ. Vikas Sharma के साथ...
ऊपर की लाइन पढ़कर आपको ये तो समझ आ गया होगा कि सही समय मे घूमते फिरते रहेंगे तो बाद में अस्पताल के चक्कर नही लगेंगे। लेकिन आजकल एक नए तरह की चिंता युवाओं में माफ कीजियेगा बुढ़ापे की दहलीज पर खड़े युवाओं में देखने को मिलती है, और वो है लाइफ सेटल करने की टेन्शन। अब पढ़ने लिखने में आधा जीवन झौकने के बाद पता चलता है कि इससे अच्छा तो बिजनेस है, और जिस उम्र में पहले के माता पिता बच्चे की शादी कर दिया करते थे, ठीक उस उम्र में आजकल के युवाओं को अब शादी ब्याह की बातें भी नीरस सी लग रही होती हैं, और वहीं पर पता चलता है कि आप Bp और सुगर के पेशेंट भी हो गए हैं, तब मन ये सोचकर परिवार बसाने की ओर राजी हों जाता है कि इस बीमारी में देखभाल करने वाला कोई तो होना चाहिये यानि अब शादी कर ही लेना चाहिये। अब समझौते के साथ समझदारी वाले काम करने की टेंशन अलग होती है। आप यकीन नही मानेंगे, ऐसे में फिर यही घूमना फिरना ही नये जीवन का स्टार्टअप साबित होता है। खैर वर्तमान समय मे यहीं पर एक खुशहाल जीवन की नींव रखी जाती है। याने घूमने फिरने वाले लोग अधिक जिंदादिल हुआ करते हैं।।
लेकिन ये सब फालतू की बातें यहाँ क्यों करना अपने पास भरपूर समय है। जीवन को शुरू से ही प्रकृति से जोड़ कर रखें। घर पर छोटा मोटा बगीचा तैयार करें। आसपास उपलब्ध जीव जंतुओं के प्रति आदर का भाव रखें उनका सम्मान और संरक्षण करें। मन मे नकारात्मकता और तनाव दोनो ही कभी नही पनपेंगे।
अब इन सब चीजों की शुरुवात कहाँ से करें, तो इसका उत्तर है ये वनभोज। समय समय और अपने परिवार के साथ, दोस्तों के साथ या जिस स्थान पर आप कार्य करते हैं।उनके लोगों के साथ वनभोज पर जायें। प्रकृति की गोद मे कुछ घंटे सो आयें। इससे तनाव मिटेगा, साथ ही पैदल चलने से शरीर की फ्री सर्विसिंग भी हो जाएगी। वनभोज में वहीं उपलब्ध संसाधनों और भोजन का प्रयोग करें ताकि प्रकृति के प्रति आपके मन मे श्रद्धा पैदा हो सके। ज्यादा दूर की बात तो नही करता कभी अपने घर के बाहर से आसमान में टकटकी लगाकर देखिए और इस दृश्य को अपनी याद में कैद करने की कोशिश कीजिये। अब इसके बाद कभी जंगल जाएं और रात में इसी पल को पुनः दोहरायें तो आप पायेंगे कि इन दोनों में जमीन आसमान का अंतर है। तो सोच लीजिये देखने मे जब इतना अंतर है तो खाने पीने, रहने, भटकने और जीवन जीने में कितना अंतर नही होता होगा। ऐसे वनभोज से साथ मिलकर कार्य करने की आदतों के विकास होता है जो आजकल शहरी जीवन मे कम हो देखने को मिलता है।
ऐसे ही भटकने में अड़चन लगे तो थोड़ा सा धार्मिक हो जाएं क्योंकि हिन्दू धर्म मे बहुत से ऐसे तीज त्योहार हैं जो आपको जंगलों में जाकर वनभोज का अवसर प्रदान करते हैं। अगर आप बड़े इवेंट की तलाश में हैं तो फिर नागद्वार यात्रा, महादेव यात्रा, नर्मदा परिक्रमा और पंचक्रोसी यात्रा पर निकल पड़ें। वरना घर के नजदीक रहकर वन महोत्सव, आमला नवमी और वट सावित्री आदि मनायें। मेरे गुरूदेव हमेशा कहते थे कि भटकने में ही मजा है, मंजिल में क्या रखा है। इसीलिए #भटको...
डॉ. विकास शर्मा
वनस्पति शास्त्र विभाग
शासकीय महाविद्यालय चौरई
जिला छिन्दवाड़ा (म.प्र.)
#दीपकआचार्य #हर्बलवर्बल Deepak Acharya #पातालकोट #वनभोज #विकासशर्मा
सर्दियों में फूलगोभी (Cauliflower) को गमले या ग्रो बैग में बहुत आसानी से उगा सकते हैं। फूलगोभी उगाने के लिए सबसे पहले 50% मिट्टी और 50% गोबर की खाद या वर्मीकम्पोस्ट मिलाए। फिर तैयार की गई मिट्टी को सीडलिंग ट्रे या छोटे गमले में भर लीजिए, इसके बाद अच्छी क्वालिटी के फूलगोभी के बीज लीजिए और मिट्टी में इन बीजों को लगभग 0.5 इंच की गहराई में दबा दीजिए। बीज लगाने के बाद स्प्रे पंप या वाटर कैन की मदद से पानी दें और सेमी-शेड वाली जगह पर रखें, जहां सुबह की 4-5 घंटे की हल्की धूप आती हो। इसकी मिट्टी में नमी को हमेशा बनाए रखें, लेकिन ओवरवाटरिंग से बचें।
फूलगोभी के बीजों को जर्मिनेट होने में लगभग 10 से 12 दिन का समय लग सकता हैं। जब पौधा 5-6 इंच का हो जाए तो उन्हें निकालकर गमले या ग्रो बैग में लगा दीजिए। लगभग 45 से 50 दिन बाद पौधे में फूलगोभी बनना शुरू हो जाता हैं। उम्मीद करते हैं पोस्ट पसंद आया होगा तो Like करके अपने मित्रों को भी साझा करें, धन्यवाद साभार :
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खीरे की आधुनिक खेती करने के लिए कुछ महत्वपूर्ण कदम और तकनीकें अपनानी चाहिए, जिनसे फसल की गुणवत्ता और उत्पादन दोनों में वृद्धि हो सकती है। नीचे दिए गए हैं खीरे की आधुनिक खेती के लिए कुछ प्रमुख टिप्स:
भूमि चयन और तैयारी:
बीज चयन:
उर्वरक और पोषण प्रबंधन:
सिंचाई:
पौधों की उगाई और समर्थन:
कीट और रोग प्रबंधन:
फसल की देखभाल और प्रबंधन:
कटाई:
विपणन और लाभ:
इस प्रकार, इन आधुनिक विधियों को अपनाकर खीरे की फसल की गुणवत्ता और उत्पादन को बढ़ाया जा सकता है, जिससे किसानों को बेहतर लाभ मिल सकता है।
केसर (Saffron) को अब कश्मीर के अलावा अन्य राज्यों में भी उगाया जाने लगा हैं। केसर उगाने के लिए 10°c से 20°c तापमान होना जरूरी होता हैं। अगर आपके राज्य में सर्दियां (Winter) पड़ती हैं तो आप केसर को बहुत आसानी से घर पर गमले में उगा सकते हैं। इसे उगाने के लिए इसके बल्ब चाहिए जो कि ऑनलाइन मिल जाते हैं। केसर के बल्ब अक्टूबर-नवम्बर तक लगा सकते हैं। इसके बल्ब लगाने के लिए 40% मिट्टी, 30% वर्मीकम्पोस्ट, 30% बालू लेंगे, फिर तीनों को अच्छे से मिक्स करके गमले, कंटेनर या ग्रो बैग में भर दीजिए। फिर इस मिट्टी में 1 इंच गहराई में केसर के बल्ब को दबा दीजिए। ध्यान दें कि केसर का चोटी वाला हिस्सा मिट्टी के ऊपरी तरफ रखना हैं। इसके बाद पानी का स्प्रे करके गमले, कंटेनर या ग्रो बैग को सेमी-शेड वाली जगह पर रख दीजिए, जहां सुबह की 2-3 घंटे की हल्की धूप आती हो। केसर के पौधे को तेज धूप से बचाकर रखें। इसमें पानी तभी डाले जब इसकी मिट्टी सूखी दिखाई दें। लगभग 10 से 12 दिन में इसके बल्ब अंकुरित होने लगेंगे और 35 से 40 दिन बाद इनमें फूल आना शुरू हो जाएंगे। केसर के फूल हल्के बैंगनी रंग के होते हैं और इसके फूलों के अंदर नारंगी या लाल रंग के तीन स्टिग्मा होते हैं, इन्हें ही केसर बोला जाता हैं। इनको तोड़कर निकाल लीजिए और छांव में सुखा दीजिए। सूख जाने के बाद आप इनका इस्तेमाल कर सकते हैं। पोस्ट पसंद आया हो तो Like करके हमारे फेसबुक पेज को Follow जरूर करें, धन्यवाद 🙏 साभार फेस बुक वॉल
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महाकवि कालिदास द्वारा रचित महाकाव्य 'रघुवंशम्' (Raghuvaṃśa) लगभग 1,600 वर्ष पुराना है। इसके लेखन का काल और यह किस माध्यम व विषय पर ...