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जून, 2022 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

कहानी राजा भरथरी (भर्तृहरि) की

  ========================= उज्जैन में  भरथरी  की गुफा स्थित है।  इसके संबंध में यह माना जाता है कि यहां भरथरी ने तपस्या की थी। यह गुफा शहर से बाहर एक सुनसान इलाके में है।  गुफा के पास ही शिप्रा नदी बह रही है।  गुफा के अंदर जाने का रास्ता काफी छोटा है। जब हम इस गुफा के अंदर जाते हैं तो सांस लेने में भी कठिनाई महसूस होती है। गुफा की ऊंचाई भी काफी कम है, अत: अंदर जाते समय काफी सावधानी रखनी होती है।  यहाँ पर एक गुफा और है जो कि पहली गुफा से छोटी है। यह  गोपीचन्द कि गुफा है जो कि भरथरी का भतीजा था। यहां प्रकाश भी काफी कम है, अंदर रोशनी के लिए बल्ब लगे हुए हैं। इसके बावजूद गुफा में अंधेरा दिखाई देता है। यदि किसी व्यक्ति को डर लगता है तो उसे गुफा के अंदर अकेले जाने में भी डर लगेगा।  यहां की छत बड़े-बड़े पत्थरों के सहारे टिकी हुई है। गुफा के अंत में राजा भर्तृहरि की प्रतिमा है और उस प्रतिमा के पास ही एक और गुफा का रास्ता है। इस दूसरी गुफा के विषय में ऐसा माना जाता है कि यहां से चारों धामों का रास्ता है। गुफा में भर्तृहरि की प्रतिमा के सामने एक धुनी भी है, जिसकी राख हमेशा गर्म ही रहती है। गौर

श्री होयसलेश्व मन्दिर, हलेबीदु, कर्नाटक

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 सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड जिनकी शक्ति से संचालित है उन देवाधिदेव महादेव का अद्वितीय मन्दिर, होयसल साम्राज्य के राजा विष्णुवर्धन द्वारा एक मानव निर्मित कृत्रिम झील के किनारे होयसलेश्व मन्दिर का निर्माण १२ वीं सदी में करवाया गया था। श्री होयसलेश्व मन्दिर भगवान शिव को समर्पित है। श्री होयसलेश्व मन्दिर का निर्माण soapstone पत्थरों से किया गया है। इस मन्दिर का कोई भी एक फीट स्थान कलाकृतियों से रहित नहीं है। कितना श्रमसाध्य रहा होगा यह कार्य जिन्हें सनातनी शिल्पकारों ने अपने निपुण हाथों से सम्भव किये हैं। इस दिव्य कला को शुक्रवारी ने कलाकारों के हाथों को काटकर और पुस्तकालयों को जलाकर लुप्त कर दिया। जो कुछ शेष कला बचा उसे इतवारियों ने ग्रँथ चौर्य कर निर्लज्जता से अपने नाम करवा लिया। अद्भुत सनातन धरोहर!! जय सनातन धर्म🙏🚩 जय महाकाल🔱🚩 #प्रेमझा. Sabhar soniya Singh Facebook wall

शिखा बन्धन (चोटी) रखने का महत्त्व

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 #अच्छे काम के लिए सिर्फ #सलाह दी जाती है #दबाव नहीं #शिखा_बन्धन (#चोटी) रखने का महत्त्व शिखा का महत्त्व विदेशी जान गए हिन्दू भूल गए। हिन्दू धर्म का छोटे से छोटा सिध्दांत, छोटी-से-छोटी बात भी अपनी जगह पूर्ण और कल्याणकारी हैं। छोटी सी शिखा अर्थात् चोटी भी कल्याण, विकास का साधन बनकर अपनी पूर्णता व आवश्यकता को दर्शाती हैं। शिखा का त्याग करना मानो अपने कल्याणका त्याग करना हैं। जैसे घङी के छोटे पुर्जे कीजगह बडा पुर्जा काम नहीं कर सकता क्योंकि भले वह छोटा हैं परन्तु उसकी अपनी महत्ता है।  शिखा न रखने से हम जिस लाभ से वंचित रह जाते हैं, उसकी पूर्ति अन्य किसी साधन से नहीं हो सकती। 'हरिवंश पुराण' में एक कथा आती है हैहय व तालजंघ वंश के राजाओं ने शक, यवन, काम्बोज पारद आदि राजाओं को साथ लेकर राजा बाहू का राज्य छीन लिया। राजा बाहु अपनी पत्नी के साथ वन में चला गया। वहाँ राजा की मृत्यु हो गयी। महर्षिऔर्व ने उसकी गर्भवती पत्नी की रक्षा की और उसे अपने आश्रम में ले आये। वहाँ उसने एक पुत्र को जन्म दिया, जो आगे चलकर राजा सगर के नाम से प्रसिद्ध हुआ। राजासगर ने महर्षि और्व से शस्त्र और शास्त्र विद्या

संभोग में आसनों के विभिन्न प्रकार

 वन डे ई विल डे नामक कामशास्त्री ने अपनी पुस्तक आइडियल मैरिज में आसनों के वर्गीकरण का आधार स्त्री व पुरुष के शरीर की स्थिति को बताया है जबकि महर्षि वात्सायन नामक कामशास्त्री ने अपनी पुस्तक कामसूत्र में आसनों का उच्चतरतोपयोगी नीचरतो पयोगी के रूप में विभाजित किया है जो अधिक व्यवहारिक व वैज्ञानिक है हमारे विचार से विभिन्न आसनों का विभाजन या वर्गीकरण करने का प्रयास ना तो पूर्णता सफल है ना ही विशेष आवश्यक है वास्तव में आसनों का विभाजन करना बहुत कठिन कार्य है इंद्रधनुष में कौन सा रंग कहां से प्रारंभ होता है और कहां समाप्त कहना कठिन है तथापि स्वयं इंद्रधनुषी छटा बड़ी मनोहारी और चिता चिता कर सकती है इसी तरह से काम के आकाश में छाए मिथुन की विविध आसन होते तो फिर दाग राही और अलौकिक आनंद की वर्षा करने वाले ही हैं फिर भी सुविधा की दृष्टि से प्रमुख व्यवहारिक आसनों को निम्नलिखित वर्गों में उनके गुण और दोष देते हुए वर्गीकृत किया गया है प्रथम वर्ग उत्तान वे आसन जिसमें स्त्री पीठ के बल लेट थी और पुरुष सामने से ऊपर आकर मिथुन करता है द्वितीय वर्ग आनत वे अपन जिसमें स्त्री पेट के बल पर लेटती है और पुरुष पीस

क्या स्वप्नदोष एक रोग है

स्वप्न मैं श्वेत तरल के स्खलित होने को स्वप्नदोष कहा जाता है अत्यधिक हस्तमैथुन अत्यधिक संभोग से यह रोग हो जाता है हमेशा यही समझा जाता है कि इस कारण धात रोग जाने का रोग हो जाता है साधारण सा लोग यह समझते हैं कि श्वेत सरल उस समय जो स्खलित होता है वह वीर्य होता है प्रयोग द्वारा सिद्ध हो गई है कभी-कभार को छोड़कर स्वप्नदोष में वीर्य का स्खलन नहीं होता बल्कि वह अधिकतर प्रोस्टेट या काऊपर ग्रंथों का स्त्राव होता है इस बात का प्रयोग हर कोई सफलतापूर्वक कर सकता है कि रोगी का का स्वप्नदोष स्खलित कौन सा तरल स्खलित हुआ है यदि वीर्य होगा तो उस पर में वीर्य अवश्य होंगे यदि प्रोस्टेट ग्रंथि का तरल होगा उसमें एक प्रकार की कलमें ऐसी होंगी एक अति उत्तम श्रेणी का सूक्ष्मदर्शी लेकर उसकी जांच की जा सकती है अत्यधिक पंपोष का वार्षिक कार्य है कि हस्तमैथुन आपसे प्रोस्टेट ग्रंथि बिगड़ जाती है उसमें इतनी शक्ति नहीं रहती है कि थोड़ी सोते जरा को सॉफ्ट कर सके इसलिए स्वप्न में कोई गंदा विचार आते ही सरल साबित हो जाता है युवकों को स्वप्नदोष प्रायर 13 से 14 वर्ष की आयु में प्रारंभ होता है यह एक स्वाभाविक प्रक्रिया है