
By Lindsay Zoladz from NYT Arts https://ift.tt/OJwhfpt
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वीर्य में मुख्य रूप से पानी होता है, जो इसका लगभग संपूर्ण भाग बनाता है। इसके अलावा, इसमें शुक्राणु, प्रोटीन, शर्करा, खनिज और विटामिन जैसे तत्व शामिल होते हैं। शुक्राणु की संख्या अलग-अलग हो सकती है और यह व्यक्ति के स्वास्थ्य और जीवनशैली पर निर्भर करता है।
इसमें मौजूद प्रोटीन की मात्रा बहुत कम होती है, लेकिन इसमें फ्रक्टोज़ और ग्लूकोज़ जैसी शर्करा मौजूद होती है, जो शुक्राणुओं को ऊर्जा प्रदान करती है। खनिज तत्वों में जिंक, कैल्शियम, मैग्नीशियम, सोडियम और पोटैशियम शामिल होते हैं। वहीं, इसमें विटामिन C और B12 जैसे पोषक तत्व भी पाए जाते हैं।
वीर्य हल्का क्षारीय होता है, जिससे यह महिला प्रजनन प्रणाली के अम्लीय वातावरण को संतुलित करने में सहायता करता है। इसका रंग सफेद या हल्का धूसर हो सकता है, जो भोजन, हाइड्रेशन और स्वास्थ्य पर निर्भर करता है।
वीर्य पीना आमतौर पर सुरक्षित होता है, क्योंकि यह जैविक पदार्थों से बना होता है। हालांकि, यदि किसी व्यक्ति को कोई यौन संचारित संक्रमण हो, तो वीर्य के संपर्क में आने से संक्रमण फैलने की संभावना हो सकती है।
हालांकि वीर्य में प्रोटीन, खनिज और विटामिन होते हैं, लेकिन इतनी कम मात्रा में कि इसका कोई महत्वपूर्ण पोषण मूल्य नहीं होता। दैनिक आहार से मिलने वाले पोषक तत्वों की तुलना में इसकी पोषण सामग्री नगण्य होती है।
#stars #physicslovers #spaceart #milkyway #astronaut #astronomynerd #outerspace #isro साभार फेस बुक ब्रह्मांड ज्ञान
#रामदाना : अंतरिक्ष तक यात्रा कर चुके इस गुणकारी अनाज से अनजान हैं पृथ्वी के ज्यादातर लोग
3 अक्टूबर, 1985 को अपनी पहली यात्रा करने वाले स्पेस शटल अटलांटिस में रामदाना भेजा गया था। चालक दल के सदस्यों ने अंतरिक्ष में रामदाना को अंकुरित करने का एक्सपेरिमेंट किया और नासा के शेफ ने मिशन के दौरान अंतरिक्ष यात्रियों के खाने के लिए रामदाना की कुकीज़ तैयार की थी।
हालांकि जो रामदाना अंतरिक्ष की सैर कर चुका है उसके बारे में पृथ्वी पर कम ही लोग जानते होंगे।
अब तो भूले-बिसरे ही याद आता है हमें रामदाना. उपवास के लिए लोग इसके लड्डू और पट्टी खोजते हैं. पहले इसकी खेती का भी खूब प्रचलन था. मंडुवे यानी कोदों के खेतों के बीच-बीच में चटख लाल, सिंदूरी और भूरे रंग के चपटे, मोटे गुच्छे जैसे दिखने वाली फसल चुआ (चौलाई) होती थी जिसके पके हुए बीज रामदाना कहलाते हैं. जब पौधे छोटे होते थे तो वे चौलाई के रूप में हरी सब्जी के काम आते थे. तब पहाड़ों में मंडुवे की फसल के साथ चौलाई उगाने का आम रिवाज था. यह तो शहर आकर पता लगा कि रामदाना के लड्डू और मीठी पट्टी बनती है. पहाड़ में रामदाना के बीजों को भून कर उनकी खीर या दलिया बनाया जाता था. एक बार, नाश्ते में रामदाने की मुलायम और स्वादिष्ट रोटी खाई थी. रोटी का वह स्वाद अब भी याद है. अब तो पहाड़ में भी खेतों में दूर-दूर तक चौलाई के रंगीन गुच्छे नहीं दिखाई देते हैं.
इतिहास टटोला तो पता लगा, चौलाई के गुच्छे तो हजारों वर्ष पहले दक्षिणी अमेरिका के एज़टेक और मय सभ्यताओं के खेतों में लहराते थे. रामदाना उनके मुख्य भोजन का हिस्सा था और इसकी खेती वहां बहुत लोकप्रिय थी. जब सोलहवीं सदी में स्पेनी सेनाओं ने वहां आक्रमण किया, तब चौलाई की फसल चारों ओर लहलहा रही थी. वहां के निवासी चौलाई को पवित्र फसल मानते थे और उनके अनेक धार्मिक अनुष्ठानों में रामदाना काम आता था. विभिन्न उत्सवों, संस्कारों और पूजा में रामदाने का प्रयोग किया जाता था. स्पेनी सेनापति हरनांडो कार्टेज को चौलाई की फसल के लिए उन लोगों का यह प्यार रास नहीं आया और उसने इसकी खड़ी फसल के लहलहाते खेतों में आग लगवा दी. चौलाई की फसल को बुरी तरह रौंद दिया गया और उसकी खेती पर पाबंदी लगा दी गई. इतना ही नहीं, हुक्म दे दिया गया कि जो चौलाई की खेती करेगा उसे मृत्युदंड दिया जाएगा. इस कारण चौलाई की खेती खत्म हो गई.
चौलाई का जन्मस्थान पेरू माना जाता है. स्पेनी सेनाओं ने एज़टेक और मय सभ्यताओं के खेतों में चौलाई की फसल भले ही उजाड़ दी, लेकिन दुनिया के दूसरे देशों में इसकी खेती की जाती रही. दुनिया भर में इसकी 60 से अघिक प्रजातियां उगाई जाती हैं.
पहाड़ों में चौलाई सब्जी और बीज दोनों के काम आती है लेकिन मैदानों में इसका प्रयोग हरी सब्जी के लिए किया जाता है. इसकी ‘अमेरेंथस गैंगेटिकस’ प्रजाति की पत्तियां लाल होती हैं और लाल साग या लाल चौलाई के रूप में काम आती हैं. ‘अमेरेंथस पेनिकुलेटस’ हरी चौलाई कहलाती है. ‘अमेरेंथस काडेटस’ प्रजाति की चौलाई को रामदाने के लिए उगाया जाता है. हालांकि, मैदानों में यह हरी सब्जी के रूप में काम आती है. चौलाई के एक ही पौधे से कम से कम एक किलोग्राम तक बीज मिल जाते हैं. इस फसल की सबसे बड़ी खूबी यह है कि इसे कम वर्षा वाले और रूखे-सूखे इलाकों में भी बखूबी उगाया जा सकता है. इस भूली-बिसरी फसल के बारे में हम यह भूल गए हैं कि यह एक पौष्टिक आहार है. कई विद्वान तो इसे गाय के दूध और अंडे के बराबर पौष्टिक बताते हैं.
राजगिरा (चौलाई) के फायदे – Benefits of Rajgira (Amaranth) in Hindi
राजगिरा के स्वास्थ्य संबंधी कई फायदे हैं, जिसकी जानकारी हम यहां विस्तार दे रहे हैं।
1. ग्लूटन फ्री (Gluten-Free)
राजगिरा को ग्लूटेन फ्री डाइट के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है। ग्लूटेन प्राकृतिक रूप से गेहूं, राई और जौ में पाया जाता है (2)। कुछ मामलों में इसका सेवन स्वास्थ्य के लिए हानिकारक हो सकता है। वैज्ञानिक रिपोर्ट की मानें, तो ग्लूटेन का सेवन सीलिएक रोग (Celiac disease) के जोखिम को बढ़ा सकता है (3)। यह छोटी आंत की बीमारी होती है। वहीं, राजगिरा ग्लूटेन से मुक्त होता है, जो आपको इस बीमारी से बचाए रखने का काम कर सकता है (4)।
2. प्रोटीन का उच्च स्रोत
प्रोटीन के लिए लोग न जाने कितने खाद्य पदार्थों का सहारा लेते हैं। इस मामले में राजगिरा अहम भूमिका निभा सकता है, क्योंकि यह प्रोटीन का अच्छा स्रोत है। दरअसल, शरीर की कोशिकाओं की मरम्मत करने और नई कोशिकाओं को बनाने के लिए प्रोटीन की आवश्यकता होती है (5)। विशेषज्ञों के द्वारा किए गए एक अध्ययन के अनुसार, राजगिरा को प्रोटीन के बेहतरीन विकल्प के रूप में शामिल किया जा सकता है (6)।
3. सूजन रोकने में मददगार
शरीर में सूजन की समस्या से लड़ने में भी राजगिरा के फायदे देखे जा सकते हैं। एक वैज्ञानिक अध्ययन में इसके एंटी-इंफ्लेमेटरी गुण के बारे में पता चला है, जो सूजन की समस्या को दूर करने का काम कर सकता है (7)।
4. हड्डियों के स्वास्थ्य के लिए
हड्डियों को मजबूत बनाने के लिए आप राजगिरा को प्रयोग में ला सकते हैं। दरअसल, राजगिरा में कैल्शियम की भरपूर मात्रा पाई जाती है और यह तो आप जानते ही होंगे कि हड्डियों के निर्माण से लेकर उनके विकास के लिए कैल्शियम कितना जरूरी है (8), (9)।
5. हृदय स्वास्थ्य के लिए
राजगिरा में हृदय स्वास्थ्य को बरकरार रखने के भी गुण पाए जाते हैं। दरअसल, हृदय जोखिम का एक कारण रक्त में कोलेस्ट्रॉल की मात्रा बढ़ना भी है। रक्त में बढ़ा हुआ कोलेस्ट्रॉल हार्ट अटैक सहित कई हृदय रोग का कारण बन सकता है (10)। यहां राजगिरा अहम भूमिका अदा कर सकता है, क्योंकि यह ब्लड कोलेस्ट्रॉल को नियंत्रित कर सकता है (11)।
एक वैज्ञानिक शोध के अनुसार, राजगिरा का तेल कुल कोलेस्ट्रॉल, ट्राइग्लिसराइड्स (रक्त में फैट), एलडीएल (खराब कोलेस्ट्रॉल) की मात्रा को कम कर सकता है (12)।
6. डायबिटीज के जोखिम को कम करने के लिए
राजगिरा का सेवन डायबिटीज से बचे रहने के लिए भी किया जा सकता है। एक वैज्ञानिक अध्ययन में पता चला है कि राजगिरा और राजगिरा के तेल का सप्लीमेंट एंटीऑक्सीडेंट थेरेपी के रूप में काम कर सकता है, जो हाइपरग्लाइसीमिया (हाई ब्लड शुगर) को ठीक करने और मधुमेह के जोखिम को रोकने में फायदेमंद साबित हो सकता है (13)।
एक अन्य वैज्ञानिक अध्ययन में यह देखा गया है कि पर्याप्त इंसुलिन की मात्रा के बिना खून में मौजूद अतिरिक्त ग्लूकोज टाइप 2 डायबिटीज का कारण बन सकता है (14)। वहीं, राजगिरा और राजगिरा के तेल का मिश्रण सीरम इंसुलिन की पर्याप्त मात्रा बढ़ा सकता है (13)।
7. कैंसर के जोखिम को कम करने में
कैंसर के जोखिम से बचने के लिए भी राजगिरा का इस्तेमाल फायदेमंद साबित हो सकता है। राजगिरा में उपयोगी एंटीऑक्सीडेंट होता है, जो आपके इम्यून सिस्टम को मजबूत करता है और कैंसर से होने वाले खतरे को भी कम कर सकता है (15)।
इसके अलावा, राजगिरा में विटामिन-ई पाया जाता है (8)। विटामिन-ई एक एंटीऑक्सीडेंट की तरह काम करता है। यह फ्री-रेडिकल्स से कोशिकाओं को बचाता है और साथ ही कई प्रकार के कैंसर के खतरे को भी रोकने में सक्रिय भूमिका निभा सकता है (16)।
8. लाइसिन (एमिनो एसिड) का उच्च स्रोत
लाइसिन एक प्रकार का एमिनो एसिड है और शरीर में प्रोटीन की पूर्ति के लिए एमिनो एसिड एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। यहां राजगिरा के फायदे देखे जा सकते हैं, क्योंकि इसमें लाइसिन की भरपूर मात्रा पाई जाती है (17) (18)।
9. प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने के लिए
प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने के लिए भी चौलाई के फायदे देखे जा सकते हैं। राजगिरा में जिंक की मात्रा पाई जाती है, जो इम्यून सिस्टम को बढ़ाने का काम कर सकता है (19)। इसके अलावा, राजगिरा में विटामिन-ए की मात्रा भी पाई जाती है और विटामिन-ए इम्यूनिटी को बूस्ट कर सकता है (8), (20)।
10. पाचन शक्ति को बढ़ाने में
स्वस्थ जीवन के लिए पाचन क्रिया का स्वस्थ रहना बहुत जरूरी है। यहां चौलाई के फायदे देखे जा सकते हैं, क्योंकि यह फाइबर से समृद्ध होता है (8)। फाइबर एक जरूरी पोषक तत्व है, जो पाचन क्रिया में सुधार के साथ-साथ कब्ज जैसी समस्या से छुटकारा दिलाने में मदद करता है (21)।
11. वजन को नियंत्रित करने में
चौलाई के फायदे वजन नियंत्रित करने के लिए भी देखे जा सकते हैं। यहां पर एक बार फिर चौलाई में मौजूद फाइबर का जिक्र होगा (8)। फाइबर पाचन क्रिया को मजबूत करने के साथ-साथ वजन को नियंत्रित करने का काम कर सकता है। दरअसल, फाइबर युक्त भोजन का सेवन देर तक पेट को भरा रखता है, जिससे अतिरिक्त खाने की आदत को नियंत्रित किया जा सकता है (21)।
12. अच्छी दृष्टि के लिए
आंखों की दृष्टि को ठीक रखने के लिए चौलाई का सेवन फायदेमंद साबित हो सकता है। राजगिरा में विटामिन-ए पाया जाता है (8)। विटामिन-ए आंखों के स्वास्थ्य के लिए उपयोगी होता है (22)। इसकी पूर्ति के जरिए बढ़ती उम्र के साथ होने वाली दृष्टि संबंधित समस्याओं को भी कम किया जा सकता है (23)।
13. गर्भावस्था के लिए लाभदायक
गर्भावस्था में मां को पोषण युक्त आहार की जरूरत होती है और चौलाई को गर्भावस्था में बेहतरीन पोषण के रूप में शामिल किया जा सकता है। यह गर्भावस्था में कब्ज की समस्या से बचने के लिए फाइबर, एनीमिया के खतरे को दूर रखने के लिए आयरन और हड्डियों के स्वास्थ्य के लिए कैल्शियम की पूर्ति का काम कर सकता है (24) (8)।
इसके अलावा, गर्भावस्था में जो महिलाएं धूम्रपान करती हैं, उनके लिए विटामिन-सी की पर्याप्त मात्रा जरूरी होती है, जो राजगिरा के जरिए पूरी की जा सकती है (8), (25)। हालांकि, इसका अधिक मात्रा में सेवन करने से पहले एक बार डॉक्टर से सलाह जरूर लें। साथ ही स्टाइलक्रेज आपको धूम्रपान न करने की सलाह देता है।
14. बालों और त्वचा के लिए लाभदायक
बालों और त्वचा के अच्छे स्वास्थ्य के लिए भी राजगिरा का सेवन किया जा सकता है। बालों को स्वस्थ बनाने के लिए हम राजगिरा का सेवन कर सकते हैं, क्योंकि इसमें मौजूद जिंक बालों के लिए फायदेमंद हो सकता है। दरअसल, जिंक का सेवन करने से सिर में होने वाली खुजली कम हो सकती है और बालों का झड़ना रुक सकता है (8) (26)।
त्वचा के बेहतर स्वास्थ्य के लिए भी राजगिरा लाभकारी परिणाम दे सकता है, क्योंकि इसमें मौजूद विटामिन-सी त्वचा के लिए उपयोगी माना जाता है। विटामिन-सी एक एंटीऑक्सीडेंट है, जो त्वचा को यूवी विकिरण से होने वाले नुकसान से बचा सकता है। इसके अतिरिक्त विटामिन-सी मुंहासों को दूर करने और त्वचा में कोलेजन को बढ़ाने में मदद कर सकता है (8), (27)।
15. एनीमिया से लड़ने में
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राजगिरा के फायदों में एनीमिया से बचाव करना भी शामिल है। एनीमिया एक ऐसी चिकित्सकीय स्थिति है, जो शरीर में लाल रक्त कोशिकाओं की कमी के कारण उत्पन्न होती है। यहां राजगिरा के लाभ देखे जा सकते हैं, क्योंकि यह आयरन से समद्ध होता है। आयरन एक जरूरी पोषक तत्व है, जो लाल रक्त कोशिकाओं के उत्पादन को बढ़ाने का काम करता है (8), (28)।
राजगिरा के फायदे जानने के बाद आइए अब लेख के अगले भाग में जानते हैं कि राजगिरा में कौन-कौन से पौष्टिक तत्व होते हैं।
रामदाना में प्रोटीन
12-15 प्रतिशत, वशा (6-7 प्रतिशत)
फीनाल्स 0.045-0.068 प्रतिशत एवं एन्टीआक्सीडेन्ट डी०पी०पी० एच 22.0-27.0 प्रतिशत पाया जाता है।
खेती
बुवाई का समय
इसकी खेती खरीफ एवं रबी दोनों सीजन में की जाती है। भारत में जम्मू कश्मीर, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखण्ड, तमिलनाडु, बिहार, गुजरात, पूर्वी उत्तर प्रदेश, बंगाल एवं हिमाचल प्रदेश इत्यादि में माइनर फसल के रूप में उगाते है।
जलवायु
अच्छी उपज के लिए गर्म एवं नम जलवायु की आवश्यकता होती है, उन सभी स्थानों पर जहाँ वर्षा कम होती है वहाँ पर इसकी खेती की जा सकती है।
उन्नतिशील प्रजातियाँ
जी०ए०-1 यह किस्म 110-115 दिन में पक कर तैयार होती है। इसके पौधे की ऊँचाई 200-210 सेमी०, बाली का रंग हल्का हरा एवं पीला, 1000 दाने का वजन 0.8 ग्राम, उपज 20-23 कुन्तल प्रति हे० है।
जी०ए०-2
यह किस्म 98-102 दिन में पक कर तैयार होती है। पौधों की ऊँचाई 180-190 सेमी०, बाली का रंग लाल, 1000 दाने का वजन 0.8 ग्राम, उपज 23-25 कुन्तल प्रति हे० है।
अन्नपूर्णा
यह किस्म 105-110 दिन में पक कर तैयार होती है। इसके पौधों की ऊँचाई 200-205 सेमी बाली का रंग हरा एवं पीला होता है। उपज 20-22 कुन्तल प्रति हे० है।
भूमि की तैयारी
खेत की एक जुताई मिट्टी पलटने वाले हल से तथा 2-3 जुताई देशी हल से या हैरो से करनी चाहिए। जुताई के बाद पाटा लगाकर खेत को भुरभुरा कर लेना चाहिए।
बीज की दर एवं उपचार
एक किलोग्राम बीज प्रति हेक्टेयर की दर से प्रयोग करते है। थीरम 2-2.5 ग्राम से 1 किलोग्राम बीज का उपचार करना चाहिए।
बोने का समय
खरीफ में जून के अन्तिम सप्ताह से जुलाई के मध्य तक बुवाई कर देनी चाहिए।
बोन की विधि
रामदाना की बुवाई छिटकवा विधि ( बीज को खेत में छिड़ककर जुताई करके पता चला देते हैं।)
लाइन में बोआई
लाइन से लाइन की दूरी 45 सेमी एवं पौधे की दूरी 15 सेमी रखते है। कूड़ की गहराई 2 इंच की दूरी पर रखते है।
खाद एवं उर्वरक
60 किग्रा नत्रजन, 40 किग्रा० फास्फोरस एवं 20 किग्रा० पोटाश प्रति हेक्टेयर की आवश्यकता पड़ती है। बुआई के समय नत्रजन की आधी मात्रा फास्फोरस एवं पोटाश की सम्पूर्ण मात्रा देनी चाहिए, नत्रजन की आधी मात्रा का दो बार में छिड़काव करना चाहिए।
सिंचाई
खरीफ ऋतु में सिंचाई वर्षा के आधार पर ही की जाती है।
निराई-गुड़ाई
बीज बोने के 20-25 दिन बाद खेत की निराई-गुड़ाई की जाती है। फसल की दो बार निराई गुड़ाई अवश्य करनी चाहिए।
कटाई-मड़ाई
फसल पीले पड़ने के बाद कटाई-मड़ाई कर लेनी चाहिए।
उपज
20-25 कुन्तल प्रति हेक्टेयर पैदावार होती है।
कीट
बिहार हेयरी कैटर पिलर
इसकी सूंडी पत्तियों का हानि पहुँचाती है। कभी-2 तने पर भी आक्रमण करती है। फालीडाल 15-20 किग्रा० प्रति हे० की दर से प्रयोग करने पर नियन्त्रण हो जाता है।
बीमारियां एवं रोकथाम
ब्लास्ट (झोंका) ब्लास्ट व सड़न आदि बीमारियों का आक्रमण होता है। खड़की फसल में डाइथेन जेड 78 पर 0.05 प्रतिशत बेविस्टीन के घोल का छिड़काव से भी रोग का प्रभाव कम हो जाता है।
रामदाने की खेती लिए एक एकड़ खेती में लगभग आठ हजार से दस हजार की लागत आती है। अच्छी फसल होने पर प्रति एकड़ 15 से 18 कुंतल तक पैदावार होने की सम्भावना रहती है। तैयार फसल मंडी में 3500 से लेकर 7200 रुपए प्रति कुंतल तक बिक जाती है। जिससे प्रति एकड़ लगभग 50 हजार तक शुद्ध मूनाफा होने की उम्मीद रहती है। साभार अमृत कटारिया फेसबुक वॉल
महाकवि कालिदास द्वारा रचित महाकाव्य 'रघुवंशम्' (Raghuvaṃśa) लगभग 1,600 वर्ष पुराना है। इसके लेखन का काल और यह किस माध्यम व विषय पर ...