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बुधवार, 29 अक्टूबर 2025

खेत से विदेश तक: जैविक खेती ने बदली किसानों की किस्मत | FPO Success Story

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Keywords: जैविक खेती, किसान उत्पादक संगठन, FPO, जैविक भिंडी, कृषि निर्यात, देसी बीज संरक्षण, किसानों की आमदनी, जैविक खाद उत्पादन, दुबई निर्यात, भारतीय कृषि सफलता

भारत की कृषि तेजी से बदल रही है। अब किसान केवल अनाज पैदा नहीं करते, बल्कि वैश्विक बाजारों में अपनी पहचान बना रहे हैं। इसी बदलाव की शानदार मिसाल है भारत का एक FPO (किसान उत्पादक संगठन) जिसने जैविक खेती के दम पर 613 किसानों की आय को दोगुना कर दिया है और दुबई तक निर्यात कर रहा है।

FPO: किसानों के लिए मालिकाना भविष्य

यह संगठन किसानों को एक साथ जोड़कर:

• उत्पादन
• पैकेजिंग
• निर्यात
• बाज़ार मूल्य निर्धारण

सब कुछ किसानों के नाम से कर रहा है।
सबसे अच्छी बात यह कि किसानों को बाजार से दोगुना भाव मिल रहा है।

अब बिचौलिया नहीं, किसान ही मालिक!

 जैविक खेती का चमत्कार

इस एफपीओ का मुख्य फोकस है Organic Farming:

• मिट्टी की उर्वरता बढ़ाना
• रसायनों से छुटकारा
• सुरक्षित और पौष्टिक भोजन

सबसे बड़ी कामयाबी है जैविक भिंडी का निर्यात।
विशेष रूप से राधिका भिंडी की अंतरराष्ट्रीय मांग है।

दुबई में चमकी भारतीय भिंडी

जब फसल जैविक तरीके से उगाई जाती है,
तो उसका मूल्य कई गुना बढ़ जाता है।

इस एफपीओ की भिंडी दुबई के बाजार में पहुँच रही है।
विदेशी उपभोक्ता भारत की जैविक सब्जियों को
Premium Quality के रूप में पहचानते हैं।

देसी किस्मों के संरक्षण का महाअभियान

यह संगठन न केवल व्यापार कर रहा है
बल्कि भारत की धरती की विरासत को बचा रहा है।

संरक्षित की गई दुर्लभ किस्में:

• देसी अंबा अदरक
• कुसुम करेला
• राधिका भिंडी
विष्णु भोग चावल (सुंगधित और पारंपरिक किस्म)

इन्होंने PPBFR के साथ 232 देसी बीज किस्में संरक्षित की हैं
जो जैव विविधता के लिए बहुत बड़ा योगदान है।

जैविक खाद: मांग इतनी कि सप्लाई कम!

जैविक खेती बढ़ने के साथ Organic Manure की मांग भी आसमान छू रही है।

एफपीओ के पास ऑर्डर ज्यादा और उत्पादन कम पड़ रहा है।
यह संकेत है कि किसान अब
जहर-मुक्त खेती की ओर लौट रहे हैं।

किसानों की आय दोगुनी कैसे हुई?

आमदनी बढ़ने के तीन प्रमुख कारण:

  1. सीधे निर्यात — बिना बिचौलिया

  2. जैविक खेती — उच्च कीमत

  3. देसी किस्म — ब्रांड वैल्यू

यह मॉडल भारत के अन्य किसानों के लिए
रेडी-टू-कॉपि सफलता मंत्र साबित हो रहा है।

भारत की नई कृषि पहचान

पहलू पुरानी तस्वीर नई तस्वीर
खेती रसायनिक, लागत ज्यादा जैविक, मुनाफा ज्यादा
बिक्री बिचौलिया आधारित किसान सीधे बाजार से जुड़े
पहचान स्थानीय अंतरराष्ट्रीय

किसानों ने अब दुनिया भर के उपभोक्ताओं के साथ सीधा रिश्ता बना लिया है।

निष्कर्ष

जैविक खेती किसानों की असली उन्नति का मार्

FPO कृषि व्यापार की नई शक्ति
भारत की देसी किस्में वापस शान से लौटीं
छोटे किसान भी अब बन रहे हैं वैश्विक ब्रांड

इन 613 किसानों की कहानी यह साबित करती है कि
अगर इच्छाशक्ति और सही मॉडल मिले
तो भारतीय किसान खेत से दुनिया तक इतिहास लिख सकते 


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कानपुर के छुपे मंदिर और उनका प्राचीन इतिहास

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कानपुर को  उद्योग और शिक्षा के शहर के रूप में जाना जाता है, लेकिन इस धरती पर इतिहास के कई ऐसे रहस्य छिपे हैं जिनके बारे में बहुत कम लोग जानते हैं। यहाँ कई अति प्राचीन मंदिर मौजूद हैं, जिनका संबंध हिंदू सभ्यता के शुरुआती काल से माना जाता है 

मानसून का संदेशवाहक: कानपुर के पास स्थित चमत्कारी प्राचीन मंदिर की अनोखी कहानी

उत्तर प्रदेश के कानपुर शहर से लगभग 40 किलोमीटर दूर, घाटमपुर तहसील के पास बसा है एक छोटा-सा गांव — **बेटा**। गांव शांत है, प्रकृति से घिरा है, लेकिन इसकी पहचान बेहद असाधारण है। यहां मौजूद है एक **प्राचीन जगन्नाथ मंदिर**, जो न केवल आस्था का केंद्र है, बल्कि **मानसून की भविष्यवाणी** में भी चमत्कारी माना जाता है।

स्थानीय लोगों के अनुसार, यह मंदिर कभी झूठ नहीं बोलता। वर्षा कब आएगी, हल्की होगी या तेज, इसका संकेत मंदिर के **गुंबद पर लगे एक रहस्यमयी पत्थर** से मिलता है। लोगों का कहना है कि इस शक्ति ने कई बार वैज्ञानिकों को भी हैरान किया है।

 रहस्यमयी पत्थर जो बताता है आसमान का हाल

मंदिर के गुंबद पर जड़ा यह प्राचीन पत्थर बिल्कुल सामान्य नहीं है। इसकी विशेषता मानसून के मौसम में जीवंत हो उठती है।

कैसे करता है भविष्यवाणी?

1. समुद्र की सांस महसूस करता है
   जैसे ही समुद्र में मानसून बनना शुरू होता है, वैसे ही यह पत्थर पसीजने लगता है। अचानक टप-टप करते बूंदों का गिरना शुरू हो जाता है।

2. समय की सटीक पकड़
   कई बार अखबारों और मौसम विभाग से पहले यह मंदिर अपना संकेत दे देता है। जब-जब यह पत्थर टपका है, वर्षा ने देर नहीं लगाई।

3. बूंदों का भविष्य
   पत्थर की बूंदें सिर्फ पानी नहीं, बल्कि **संदेश** होती हैं:
   • अगर *हल्की बूंदाबांदी* हो — मौसम नरम रहेगा, बारिश हल्की होगी
   • अगर *बड़ी और तेज बूंदें* टपके — तैयार रहें, बारिश झमाझम होगी

4. **बारिश रुकते ही मौन**
   जैसे ही वर्षा का मौसम समाप्त होता है, पत्थर फिर शांत। न बूंद, न नमी… मानो उसने अपना कार्य पूरा कर लिया हो।

 विज्ञान के सामने पहेली

इस मंदिर की खास बात यह है कि समुद्र तो दूर-दूर तक नहीं है। फिर यह पत्थर कैसे मानसून की गतिविधियों को इतनी दूर से महसूस कर लेता है?

कुछ विशेषज्ञों ने माना कि इसमें **मैग्नेटिक या भू-ऊर्जा** से जुड़ी कोई क्षमता हो सकती है, जो वातावरण में होने वाले परिवर्तनों को पकड़ लेती है।

वैज्ञानिकों ने यहां शोध किया, यंत्र लगाए, लेकिन रहस्य आज भी आधा-छिपा, आधा-खुला है। शायद यही इसकी जादूभरी खूबसूरती है।

मंदिर की प्राचीन महिमा

पुजारियों और किवदंतियों के अनुसार, यह मंदिर साधारण नहीं, **इतिहास की गहराइयों** में जड़ें जमाए है। कई लोग इसे:

• लगभग **4200 ईसा पूर्व** का
• **सिंधु घाटी सभ्यता** से जुड़े प्रतीकों वाला

मानते हैं। इसकी संरचना और पत्थर उस समय के ज्ञान और ऊर्जा को दर्शाते हैं, जिसकी आज की दुनिया भी तलाश में है।

 स्थानीय लोगों की आस्था

गांव वाले कहते हैं:
“मंदिर टपका तो समझो बरसात आने ही वाली है।”

मानसून यूपी की धड़कन है। किसान इसी उम्मीद पर बीज डालते हैं, धरती मुस्कुराने को तैयार रहती है। इसलिए मंदिर का हर टपका हुआ कण उनके लिए पानी नहीं, **उम्मीद** होता है।

निष्कर्ष

यह मंदिर सिर्फ पत्थरों और दीवारों का ढांचा नहीं है।
यह **आस्था, प्रकृति और इतिहास का संगम** है।
मानव की जिज्ञासा और देवत्व के रहस्य का संयुक्त रूप है।

हो सकता है विज्ञान एक दिन इसका राज़ पूरी तरह खोल दे।
लेकिन जब तक वह होता है, यह मंदिर मानसून का पहला संदेश
आस्था की भाषा में 

बालाजी विश्वनाथ मंदिर, बिहटा बुजुर्ग, कानपुर नगर


 बालाजी विश्वनाथ मंदिर कानपुर का इतिहास

यह मंदिर कानपुर नगर के बिहटा बुजुर्ग क्षेत्र में स्थित है। स्थानीय मान्यताओं के अनुसार यह मंदिर बहुत प्राचीन है और इसका स्वरूप व स्थापत्य शैली इसे विशेष बनाते हैं।

यहाँ स्थापित बालाजी विश्वनाथ का स्वरूप साधारण मंदिरों से बिल्कुल अलग दिखाई देता है। कुछ शोधकर्ताओं का मानना है कि यह मंदिर प्राचीन भारतीय सभ्यता, संभवतः सिंधु घाटी से प्रेरित कला शैली का प्रमाण हो सकता है।


 मंदिर की मुख्य विशेषताएँ

विशेषता विवरण
स्थान बिहटा बुजुर्ग, कानपुर नगर
प्रमुख देवता बालाजी विश्वनाथ
विशेषता अद्भुत प्राचीन चिन्ह और संरचना
मान्यता प्राचीन सभ्यता से संबंध होने की संभावना

यहाँ मिले कुछ विशेष अभिलेख और चिन्ह आज भी शोधकर्ताओं के लिए आकर्षण का विषय बने हुए हैं।


 क्यों है यह मंदिर अनोखा?

• मंदिर में दिखाई देने वाले चिन्ह, मूर्तियाँ व आकृतियाँ सामान्य शैली से अलग हैं
• पिछली सभ्यताओं से जुड़ाव के स्थानीय प्रमाण मिलते हैं
• कम प्रसिद्ध होने के बावजूद आस्था का प्रमुख केंद्र है

यह मंदिर भारतीय संस्कृति की अनवरत धरोहर को समझने के लिए एक महत्वपूर्ण स्थान है।


 कैसे पहुँचे?

कानपुर शहर से यहाँ पहुँचना आसान है।
नजदीकी प्रमुख स्थान:
कानपुर सेंट्रल रेलवे स्टेशन
किसी भी स्थानीय माध्यम से बिहटा बुजुर्ग पहुँच सकते हैं


 निष्कर्ष

यदि आप इतिहास, पुरातत्व और भारतीय सभ्यता के रहस्यों में रुचि रखते हैं, तो बालाजी विश्वनाथ मंदिर आपके लिए एक महत्वपूर्ण शोध और यात्रा स्थल बन सकता है।
यह मंदिर बताता है कि कानपुर सिर्फ एक शहर नहीं बल्कि आस्था और प्राचीन संस्कृति का जीवंत 

  • कानपुर के प्राचीन मंदिर

  • बालाजी विश्वनाथ मंदिर कानपुर

  • बिहटा बुजुर्ग कानपुर इतिहास

  • Kanpur Hidden Temples

  • कानपुर धार्मिक स्थल



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कत्यूरी राजवंश की कई शाखाएं केंद्रीय सत्ता के कमजोर होने के कारण उभरीं

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 उत्तराखंड के इस महत्वपूर्ण राजवंश की उत्पत्ति, राजधानियों (जैसे बैजनाथ), और अभिलेखीय साक्ष्यों (ताम्रपत्र और मूर्ति लेख) पर चर्चा है। राजवंश के भीतर मौजूद विभिन्न क्षेत्रीय शाखाओं जैसे अस्कोट, पाली पछाऊं और सिरा केवल का उल्लेख करते हुए उनके संस्थापक राजाओं और उनके शासनकाल की प्रमुख घटनाओं का वर्णन करता है। वक्ता ऐतिहासिक स्रोतों की कमी के कारण जागरणों (स्थानीय लोक कथाओं) और पुरातात्विक साक्ष्यों के बीच समानता स्थापित करने की चुनौती पर भी प्रकाश डालता है, और वीडियो में कत्यूरी स्थापत्य शैली और राजाओं के क्रूर शासन को राजवंश के पतन का कारण बताया गया है।

विभिन्न कत्यूरी शाखाओं के बीच अंतर्संबंध, स्वतंत्रता और समकालीन सत्ता संघर्ष कैसे थे?

 कत्यूरी राजवंश के पतन और बाद की सत्ता संरचना को समझने के लिए विभिन्न शाखाओं के बीच के अंतर्संबंध, स्वतंत्रता की घोषणा, और उनके समकालीन संघर्षों को जानना आवश्यक है।

आपके स्रोतों के आधार पर, विभिन्न कत्यूरी शाखाओं के बीच अंतर्संबंध, स्वतंत्रता और सत्ता संघर्ष निम्नलिखित रूप से परिभाषित किए जा सकते हैं:

I. शाखाओं का उद्भव और अंतर्संबंध (Formation and Interrelationships)

मूल रूप से, कत्यूरी राजवंश की कई शाखाएं केंद्रीय सत्ता के कमजोर होने के कारण उभरीं, जो शुरू में प्रशासनिक इकाइयाँ थीं और बाद में स्वतंत्र हो गईं।

1. मूल केंद्र और राज्यपाल: कत्यूरियों का मूल स्थान बैजनाथ (कत्यूर घाटी) था। पहले के समय में, जेष्ठाधिकार की परंपरा के कारण (जहाँ सबसे बड़ा बेटा राजा बनता था), छोटे राजकुमारों को छोटे-छोटे क्षेत्रों का राज्यपाल (गवर्नर) बना दिया जाता था।

2. केंद्रीय सत्ता की कमजोरी: जब बैजनाथ की मूल शाखा कमजोर हो गई (केंद्र कमजोर हुआ), तो इन राज्यपालों और स्थानीय शासकों ने स्वयं को स्वतंत्र कर लिया।

3. प्रमुख शाखाएँ: ज्ञात शाखाओं में बैजनत्था, अस्कोट, ड्यूटी, दानपुर, पाली पछाऊं (द्वाराहाट), बारामंडल और शिरा शामिल थीं। अस्कोट शाखा भी बैजनाथ की मूल शाखा के अधीन ही थी, क्योंकि उन्हें पूजा आदि के लिए हमेशा बैजनाथ जाना पड़ता था।

4. समांतर सत्ता: महत्वपूर्ण बात यह है कि सभी कत्यूरी शासक एक ही क्रम में समाप्त नहीं हुए। कुछ कत्यूरी शाखाएं ऐसी भी थीं जो चंद शासकों के समांतर (parallel) अंत तक चलीं, यहाँ तक कि आज तक चली आ रही हैं

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सिंधु सभ्यता का जीवंत बालाजी विश्वनाथ मंदि

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सिंधु घाटी सभ्यता


सिंधु सभ्यता का जीवंत बालाजी विश्वनाथ मंदिर

स्थान: बिहटा बुजुर्ग, कानपुर नगर, उत्तर प्रदेश

भारत की प्राचीनता सदियों की धूल में छिपे रहस्यों से भरी है। उन्हीं रहस्यों के बीच चमकता है बिहटा बुजुर्ग का बालाजी विश्वनाथ मंदिर, जिसे कई शोधकर्ता सिंधु घाटी सभ्यता काल से जोड़ने की संभावना व्यक्त करते हैं। खास बात यह है कि यह मंदिर आज भी जीवित पूजा स्थल है, इसलिए इसे भारत का सबसे प्राचीन जीवंत मंदिर होने का दावा किया जाता है!

 यह क्यों इतना अनोखा है?

वीडियो स्रोत के अनुसार कुछ प्रमुख तर्क दिए जाते हैं—

पशुपति नाथ शैली की मूर्ति

  • शिव की मूर्ति में वैसी ही आकृति दिखाई देती है जैसी मोहनजोदड़ो की सीलों पर प्रसिद्ध “पशुपति योगी” में मिलती है

12 स्तंभों वाला प्राचीन वास्तु

  • यह शैली कई अन्य प्राचीन संरचनाओं से संबंध का संकेत देती है

  • मान्यता है कि यह स्थान प्राचीन तीर्थ मार्गों का केंद्र रहा होगा

सरस्वती नदी के बहाव के संकेत

  • शोधों में इस क्षेत्र से सरस्वती नदी की शाखाओं के प्रमाण मिलने की बात कही गई है

  • यानी यह भूमि कभी नदी संस्कृति का प्रमुख केंद्र रही होगी

अर्ध-सूर्य चिह्न और कलाकृतियाँ

  • मंदिर की दीवारों पर उकेरे गए प्रतीक इसे

    • गुप्त काल

    • कुषाण काल

    • राजा हर्षवर्धन के समय
      तक की निरंतरता से जोड़ते हैं

आक्रांताओं से चमत्कारिक बचाव

  • कहा जाता है कि यह मंदिर झाड़ियों से ढँक जाने के कारण
    मुगल काल की विनाश लीला से बच गया
    जैसे इतिहास ने स्वयं इसे संरक्षित कर लिया


 क्यों दावा किया जाता है कि यह महाभारत काल से भी प्राचीन है?

  • इसके प्रतीकों में वैदिक और सिंधुकालीन कला दोनों की झलक

  • सदियों तक पूजा परंपरा का निरंतर जीवित रहना

  • प्राचीन धर्म और सभ्यता के मिलन का अद्वितीय संगम




 निष्कर्ष

यह मंदिर सिर्फ पत्थरों का ढेर नहीं
एक अनवरत जलती लौ है
जो बताती है कि सनातन संस्कृति ने समय को हराकर
अपने अस्तित्व को जीवित रखा है!

सभ्यता बदली, राजवंश मिटते गए
पर बिहटा बुजुर्ग का बालाजी विश्वनाथ मंदिर
अब भी अपनी प्राचीनता का गीत गाता है…



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कार्तिकेयपुर राजवंश: कुमाऊँ का शौर्य और स्वर्णिम धरोहर

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कार्तिकेयपुर राजवंश: कुमाऊँ का शौर्य और स्वर्णिम धरोहर

भारत की पर्वतमाला हिमालय के मध्य भाग में फैला उत्तराखंड केवल प्राकृतिक सौंदर्य का भंडार नहीं, इतिहास के अनगिनत रत्न भी यहीं छिपे हैं। इन्हीं रत्नों में से एक है कार्तिकेयपुर राजवंश, जिसे कत्युरी राजवंश भी कहा जाता है।

यह वंश कुमाऊँ का सबसे प्राचीन और शक्तिशाली शासक वंश माना जाता है। कहा जाता है कि इस वंश का नाम भगवान शिव के पुत्र कार्तिकेय (कुमार) के नाम पर पड़ा, इसलिए यह वंश स्वयं को सूर्यवंशी और शिव-भक्त मानता था।


कालखंड और विस्तार

प्रमुख अवधि राज्य का विस्तार
लगभग 7वीं शताब्दी से 11वीं शताब्दी कुमाऊँ, कुमाऊँ से आगे नेपाल के पश्चिमी भाग तक

कत्युरी शासकों ने अपनी राजधानी बागेश्वर क्षेत्र में बसे कार्तिकेयपुर (कत्यूर घाटी) में स्थापित की।
उनका साम्राज्य आज के:

  • उत्तराखंड का कुमाऊँ क्षेत्र

  • नेपाल के कंचनपुर, डोटी, बैतड़ी आदि

  • गढ़वाल के कुछ हिस्सों
    तक फैला हुआ था।


प्रमुख राजा

राजा का नाम विशेषता
कात्युरेश्वर / शालिवाहन वंश के प्रारंभिक शक्तिशाली शासक
निहस पाल, कर्चलदेव साम्राज्य विस्तार
बृहत्पाल कला और मंदिर निर्माण का स्वर्णकाल
अभयपाल कत्युरियों का अंतिम बड़ा शासक

बाद में यह वंश अनेक छोटी शाखाओं में विभाजित हुआ और छोटी-छोटी रियासतों के रूप में जारी रहा, जैसे:

  • अस्कोट के राजवंश

  • दानपुर के राजवंश

  • डोटी के राजा (नेपाल)


कत्युरियों का स्थापत्य और संस्कृति

यह वंश मंदिर निर्माण कला का बड़ा संरक्षक रहा।
उनकी शैली को कत्युरी शैली कहा जाता है।

प्रमुख मंदिर

  • बैजनाथ मंदिर परिसर, बागेश्वर

  • कटारमल सूर्य मंदिर, अल्मोड़ा

  • बग्नाथ मंदिर, बागेश्वर

  • भुवनेश्वर महादेव, पिथौरागढ़

इन मंदिरों में पत्थर की महीन नक्काशी, शिलालेख और गरुड़ प्रतिमाएं कत्युरी स्थापत्य की पहचान हैं।


⚔️ राज्य के पतन का कारण

11वीं शताब्दी के बाद राजवंश में आंतरिक कलह बढ़ी, साम्राज्य विभाजित हुआ और समय के साथ चंद वंश मजबूत होकर कुमाऊँ का अधिपति बन गया।

यद्यपि शासन समाप्त हुआ, पर वंश की विभिन्न शाखाएँ आज भी:

  • उत्तराखंड के कुमाऊँ क्षेत्र

  • नेपाल के पश्चिमी जिलों
    में क्षत्रिय परंपरा के रूप में जानी जाती हैं।


वंशगत पहचान

कत्युरी स्वयं को

  • सूर्यवंशी क्षत्रिय

  • भगवान शिव एवं सूर्य उपासक
    के रूप में मानते रहे हैं।

गोत्र और कुलदेव विशेष शाखाओं के अनुसार बदलते हैं, क्योंकि वंश विभाजित होकर अनेक परिवारों में फैल गया।

 निष्कर्ष

कार्तिकेयपुर या कत्युरी राजवंश पर्वतीय भारत का गौरव है।
इनके द्वारा स्थापित मंदिर-संस्कृति आज भी जीवित है और हर पत्थर अपने भव्य अतीत की कहानी सुनाता है।

हिमालय की गोद में जन्मा यह वंश भले ही सत्ता से विदा हुआ, पर इतिहास ने इन्हें सदैव के लिए अमर कर दिया।


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 स्वस्ति संव्रद्धते देहः स्वक्षेमे कालप्रेरिणम्‌। विकल्पपापवृज्जंनो क्षेमायश्च [१७ क]


प्रशीदति:।। कर्म्मेण प्रवर्तमानः कलि-


. युगे समस्तसरभूपालामोलिपालश्चचरणाम्बुजस्य राज्यम्‌। | श्रीमदयद्धिष्ठिरस्यादिराज्ये। | हिमवन्तशेल्यम ध्यवर्त्तणी, महार-


न्यभूते भूमण्डले।। प्रधानश्रीभृङ्गारेश्वरः भटारिक प्रादर्भत:।। तदन गोतमादिभिः ऋषिग्नैस्तश्र प्रचरतिः।। गोत्मेश्वराद-


यो देवा प्रतिष्ठिताम्‌।। तत्रांतरे श्रीभृड्गारेशवरीभटारिका श्लेष्मान्तकःवने विहरति गोपालो बभूवः तत पश्चात्‌ मालाखातः


गोग्रामस्य आगमेन, नेपनामा गोलकस्य। बहुही नाम कपिला गावी, वाग्मतीतीरे, स्वयन्दिनप्रति गत्वा सुशीरपजाके क्षीर-

धारा, तेन ART, ASM गोपालेन दुष्टाः खनित्वा चः श्रीमत्पशुपतिभटारक [१७ ख]


प्रादर्भतः। । तत्राद्यो राजा श्रीभूमिगप्तः। वर्ष ८६।। राजा श्री-


य(ज)यगुप्त वर्ष ७३ मा ३।। राजा श्री धर्म्मगुप्त वर्ष ९१।। राजा श्री हर्षगुप्त वर्ष ६७।। राजा श्रीभीमराप्त वर्ष ३४।। राजा श्रीमनिगुप्त वर्ष ३-


७।। राजा श्रीविष्णुगप्त वर्ष ४६।। राजा श्रीजिनगप्त वर्ष ७१ एवम्मष्टा गोपालराजा भवतिः। | I । तदनु गोपालराजा निर्ज्जित्य


महिषपालनाम्‌ यथाक्रमेनः राज्यपदम्भुंजीतः।। राजा श्रीवरसिह वर्ष ४९ राजा श्रीजयसिह वर्ष ७१ मा २।। राजा श्रीभुवनांशह


वर्ष ४१।। एते त्रय महिष्रपाल राजा।। तत पश्चात्‌ गोपालमहिषपाल निर्ज्जित्य: किरातराजा प्रवर्ततः।। ।।राजा श्रीएलम् वर्ष ९०। राजा श्री



M.


x


[15 ख] १


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-


We वर्ष ८१।। राजा श्रीमेलं वर्ष ८९।। राजा श्रीचंमिं वर्ष ४२।। राजा श्रीधस्क वर्ष ३७।। राजा Maga वर्ष ३१ मा ६।। राजा श्रीहंतिं वर्ष ४० मा ८ राजा श्रीहरमा वर्ष ५०।। राजा श्रीतस्के वर्ष ४१ मा ८।। राजा श्रीप्रसफ बर्ष ३८ मा ६।। राजा श्रीपवः वर्ष ४६।। राज़ा श्रीदास्ती वर्ष ४०।।


राजा श्रीचम्व वर्ष ७१ ।। राजा श्रीकंक वर्ष ५४।। राजा श्रीस्वनन्द वर्ष ४० मा ६।। राजा श्रीफुकों वर्ष ५८।। राजा श्रीशिघु वर्ष ४९ मा ६।। राजा श्रीजलम वर्ष ७३ मा ३।। राजा श्रीलुक वर्ष ४०।। राजा श्रीथोरम् वर्ष ७१।। राजा श्रीथृको ՀՎ ८३।। राजा श्रीवर्म्म वर्ष ७३ मा ६।। राजा श्रीगुंजं व-


Վ ७२ मा ७।। War Maes वर्ष ८१।। राजा श्रीत्यपमि वर्ष ५४।। राजा श्रीमुगमम् वर्ष ५८।। राजा श्रीशसरु वर्ष ६३।। राजा श्रीगुणं वर्ष ७४।। राजा श्रीखिम्‌-

धारा, तेन ART, ASM गोपालेन दुष्टाः खनित्वा चः श्रीमत्पशुपतिभटारक [१७ ख]


प्रादर्भतः। । तत्राद्यो राजा श्रीभूमिगप्तः। वर्ष ८६।। राजा श्री-


य(ज)यगुप्त वर्ष ७३ मा ३।। राजा श्री धर्म्मगुप्त वर्ष ९१।। राजा श्री हर्षगुप्त वर्ष ६७।। राजा श्रीभीमराप्त वर्ष ३४।। राजा श्रीमनिगुप्त वर्ष ३-


७।। राजा श्रीविष्णुगप्त वर्ष ४६।। राजा श्रीजिनगप्त वर्ष ७१ एवम्मष्टा गोपालराजा भवतिः। | I । तदनु गोपालराजा निर्ज्जित्य


महिषपालनाम्‌ यथाक्रमेनः राज्यपदम्भुंजीतः।। राजा श्रीवरसिह वर्ष ४९ राजा श्रीजयसिह वर्ष ७१ मा २।। राजा श्रीभुवनांशह


वर्ष ४१।। एते त्रय महिष्रपाल राजा।। तत पश्चात्‌ गोपालमहिषपाल निर्ज्जित्य: किरातराजा प्रवर्ततः।। ।।राजा श्रीएलम् वर्ष ९०। राजा श्री


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 बृहत्तर खशान क्षेत्र (कश्मिर, हिमाचल, उत्तराखन्ड र पश्चिम नेपाल सुदुर पश्चिम र कर्णाली हुदे त्रीशुली सम्म र पुर्बी हिमालय पनि) क्षेत्र को जुम्ला -सिन्जा का खश्या राजा बलिराज रावल ले ६०० वर्षअघि यसरी सुरु गरेका थिए खश्या पर्व देउसी र भैलो


खश्या पर्ब देउसी भैलीबारे चर्चा गर्नुपूर्व खश हरु र खशान क्षेत्रबारे संक्षिप्त चर्चा गर्नु उपयुक्त होला। खश मल्ल राज्य स्थापना हुनु पूर्वको अवस्था र खश हरूको राज्य स्थापना भइसकेपछिको खशान क्षेत्रबाट बिस्तार भएको देउसी र भैलो संस्कृति  आजसम्म निरन्तर छ। यी सबै बुझ्नको लागि खशान क्षेत्रमा मानवीय बसोबास, यिनीहरुका क्रियाकलाप, भिन्न संस्कृतिबीच अन्तरसंघर्ष र त्यसबाट विकाश भएको संस्कृतिबारे चिरफार गर्नु आवश्यक हुन्छ।


खश मुल उद्गमस्थल मानसरोवर भएको कर्णाली नदीलगायत अन्य नदी, खोलानालाका खोँच र फाँटवरिपरि खश्या नस्ल का मानिसहरु बसोबास गर्ने गरेको विश्वास गरिन्छ। खश जातिको सत्वको लडाइँ पुस्तकमा उल्लेख भएअनुसार ‘... खश हरुको प्रभुत्व भएको यस क्षेत्रलाई खशान देश मानिन्थयो। पछि यिनीहरुले मानसरोवर क्षेत्रको ङारी प्रदेश र तिब्बतको गुंगेंलाई मिलाई विशाल खशान साम्राज्य  स्थापना गरेका हुन्।’ (शिवाकोटी : सन् २०१४ः १२१)


यस क्षेत्रको अझ प्राचीनतातर्फ दृष्टि दिंदा यहाँको संस्कृति निर्माणमा मानसरोवर वा कैलाश (कविलास) सभ्यताको पनि प्रशस्त प्रभाव परेको पाइन्छ। यसका साथै मध्यपूर्वबाट पहाडी भूभाग हुँदै पूर्व लागेका कविलाई हरु र पछि विभिन्न कालखण्डमा सिन्धुघाँटीलगायत दक्षिणबाट यहाँ प्रवेश गरेका विभिन्न मेदानी आर्य समूह, उप–समूह तथा खशान कै रैथाने खश्या नस्ल का जात–जातिहरूको संगमभूमि बन्न पुगी संयुक्त संस्कृति (मिश्रित खश-आर्य) संस्कृति) खशानि लोक संस्कृति बन्न पुग्यो। विभिन्न पुस्तकमा उल्लेख भएअनुसार खश हरु मानव बिकाश क्रम के बेला पूरा मध्य एसिया,साइबेरिया, र पश्चिम् तिब्बत र भारत को हिमालयी बेल्ट क्षेत्रको भुमिपुत्र-आदिवासी खश कविलाई परम्परा मान्ने समूहबाट बनेको जाति हो। 


यही भूमि कुनै बेला स्त्री राज्यका नामले परिचित थियो। आदिम समयदेखि यो भूमि खश सभ्यता का जातजाति सम्प्रदायको सङ्गमस्थल पनि थियो। यहाँका आदिबासीका रुपमा यक्ष, (तिब्बत मा यात्चे) गन्धर्व, किन्नर( हिमाचल मा खश किन्नोरी), खश, नाग आदि समुदाय रहेको पाइन्छ (जो अहिले पुर्नत खश महा जाती मा मिशृत भये) अहिलेको अवस्था मा चाहिँ इह जाती हरु खश हरु सङ मिसृत भे खश मा ने बिलिन भये।  नेपालको प्रारम्भिक इतिहासमा रुद्र, यक्ष, गन्धर्व, किन्नर, नाग, वृषभ, खश जनजाति यस भूमिमा क्रियाशिल रहेका अनेक प्रसङ्ग वेदपुराणहरुमा उल्लेखित छन्।


खसान क्षेत्र को जुम्लामा मिथकीय जालन्धर वंशपछि खश मल्लहरुले राज्य स्थापना गरे। त्यसपछि तिब्बतको ङारी गुंगे र सिंजा लामाथाडामा 2 राजधानी कायम गरी सन् ११५० मा शासनसत्ता स्थापित गरेका चाप/चल्ल वंशीय जाबेश्वर नागराज चल्ल/मल्ल ले स्थापना गरेको विशाल खश राज्य बन्यो। खश राज्यभित्र सवालाख पर्वत भएको हुँदा यसलाई ‘सपादलक्ष खश देश’ का नामले पनि चिनिने/शास्त्र पुरान हरुमा उल्लेख भयेको रत्नाकर देवकोटाले आफ्नो पुस्तक ‘वृहत जुम्ला राज्यको ऐतिहासिक विवेचना’मा उल्लेख गरेका छन्।


चाप/चल्ल/मल्ल हुदे खश मल्ल वंशका जाबेश्वर नागराजाका वंशहरुले 5०० बर्ष जति शासन गरेपछि पालवंशीय पुण्य मल्लको हातामा राजपाट आयो। यसै वंशका पृथ्वी मल्लको समयसम्म आउँदा पश्चिम् खसान कै कुमाउ गडवाल तथा डोटी, बझाङ विद्रोह तथा खारी प्रदेशको उन्मुक्ति हुँदै सिंजा खश राज्यमा बर्मा बंश को रजगज स्थापित हुन पुग्यो। पछि बाँकी रहेको खश राज्य बडेराजा मलय बर्माको समयमा विविध कारणले आफ्ना सन्ततिहरुलाई राज्य विभाजन गर्दा सिंजालगायत जुम्ला राज्यको राजपाट #वलिराज_रावल ले प्राप्त गरे।


वलिराजका सन्ततिहरूले विसं १४६१ देखि वि.सं. १८४६ (जुम्ला नेपाल राज्यमा एकीकरण नहुदासम्म) करिब ३८५ वर्ष राज्य गरेका थिए। बलिराज जुम्लाको सर्वाधिकार राजा भएपछि उनैले देउसी र भैलो खेल्ने प्रचलन चलाएको पाइन्छ। त्यसैले भैलोमा– ‘हामी त्यसै आएनौँ, वलिराजले पठाको’ भन्ने आँखर छ (जस्को मुल फट्टाउना अझे ठेट खश भाषा मा छ।


बलिराजा सनातन संस्कृति प्रती उदार, दानी थिए वा लौकिक जुम्लाका कल्याल वंशीय प्रथम राजा हुन् भन्ने बारेमा प्रश्न उठ्ने गरेको छ। कतिपयको केही विमति पनि छ। तर, यसका अध्यताहरुले लौकिक जुम्ली बलिराज भएको तथ्यहरुलाई उजागर गरेका छन्। त्यसैले भैलो नितान्त खशानी भूमि जुम्लामा सिर्जित भएको नयाँ प्रयोग हो। जो करिब ६०० वर्षभन्दा पुरानो विरासदलाई हालसम्म पनि स्वीकारेको पाइन्छ। हाल, भैलोसँगै जोडिएको देउसी प्रारम्भमा एकै साथ सुरुवात नभए पनि खश्या कविलाईहरुले प्रयोग गर्दै आइरहेको देउसी वा देउसुरे पनि भैलोसँग जोडिएको पाइन्छ।


जुम्ला राज्य र बलिराज रावल (शाही)

यमल, जमल, जुमल, जुमिला, जुमला हुँदै विसं १५०७ देखि जुम्ला नामाकरण भएको पाइन्छ। यसलाई छिनासिम र चौधान जुम्लाका नामले पनि चिनिन्छ। बलिराज रावल शाही ले जुम्लाको राजा भएपछि भैलो खेल्ने प्रचलनको सुरुवात गरेका थिए।


बलिराज रावल शाही ले जुम्लामा किन भैलो प्रचलन चलाए यस सम्बन्धमा त्यति खोज अनुसन्धान हुन सकेको छैन। यिनी जुम्लामा सर्वाधिकार राजा हुनुपूर्व तिव्रीकोट (हाल्को डोल्पा, र मुगुमा आफ्नो अधिकार जमाई बसेका थिए। यस्तै मलय बर्माको राज्य खण्डीकरण हुनुअघि मुसलमानहरुले खश राज्यसम्म आक्रमण गरेका थिए। मुसलमानी आक्रमणको संभावना टरेको थिएन। राज्यलाई मजबुत बनाउन छिमेकी राज्यसँग यिनको सम्बन्ध राम्रो थियो। विषम परिस्थितिमा राज्य युद्धमा होमिँदा अन्न कम हुने स्थानमा अन्नपात र रकम सङ्कलन गर्नको लागि भैलो प्रचलन चलाएको अनुमान गर्न सकिन्छ।


खश जाति र खश राज्यको खोज अनुसन्धान गरेका प्रा. इमान सिङ चेन्जोङ  ले उल्लेख गरेअनुसार– खशानमा मुसलमान (तिमुर) सँग लड्नको लागि संकलन गरिएको नगद जिन्सी चन्दालाई भैलोमार्फत सङ्कलन गरेको आशंका छ। जो पछि निरन्तर रुपमा चल्दै गयो र विभिन्न रुपमा प्रचलनमा आइराख्यो।


प्रारम्भमा भैलो वर्तमानको जस्तो यमपञ्चकमा नभएर मार्ग शुक्ल पूर्णिमाको रातमा एक दिन र पौष शुक्ल प्रतिपदादेखि पञ्चमीसम्म खेलिन्थ्यो। केही स्थानमा पुष महिनाभरि खेलिन्थ्यो। कुनै बेला खशान क्षेत्रभित्रै पर्ने हालको बैतडीका केही स्थानमा दशैँको टीकाको दिनदेखि यमपञ्चकको अन्तिम दिन भाइटीकाको रातिसम्म भैलो खेल्ने प्रचलन छ।


बलिराज रावल शाहि जुम्लाको राजा हुनुपूर्व उनको प्रभुत्व रहेको टिव्रीकोट (हाल डोल्पा) र जुम्लाको केही स्थानमा पौष शुक्ल द्वितीयाका दिन आमाले छोरालाई टीका लगाई दिने र सोही दिन भैलो खेल्ने गरिन्छ। यहाँका कतिपय स्थानमा मंसिर पूर्णिमालाई भैलो पूर्णिमा र खसानका केही स्थानमा बालो भैलो र बुढो भैलोको नामले पनि पुकारिन्छ। यस क्षेत्रमा देउसीको प्रचलन भने धेरैपछि भएको हो।


प्रारम्भमा देउसी खेलिँदैनथ्यो। खशानको दक्षिण क्षेत्र जहाँ त्यस क्षेत्रमा प्रचलनमा आएको भैलो र देउसीको संयुक्त गायनलाई लोक संस्कृतिको स्थानान्तरणबाट उताको यता यताको उता प्रचलनमा आएको अनुमान गरिन्छ। प्रारम्भमा जुन उद्देश्य र कारणबाट भैलोको प्रचलन चले पनि भैलोबाट सङ्कलित चामल र नगदको पाटाभात खाने चलन छ। जुम्लातिर पौष महिनाभित्रै पाटा भात खाइन्छ भने खशानका अन्य स्थानमा भैलीको भातका नामले मंसिर, पौषमा खाने प्रचलन छ। केही स्थानमा भैलीको भात खाँदा, भात पाक्दै गर्दा उक्त स्थानमा भैली खेल्ने गरिन्छ।


प्रारम्भमा बेग्लै उद्देश्यले प्रचलित भैलो मंसिर पुसमा नखेलेर अब भने तिहारका पाँच दिन खेल्ने प्रचलन छ। अन्य हिन्दु हरुले मनाउने तिहारमा नेपालबाहेक अन्य देशका हिन्दूहरुले देउसी र भैलो खेल्ने प्रचलन नभएको हुँदा यो विशुद्ध खश्या संस्कृति हो भन्ने बुजिन्छ। यसको उत्पत्तिस्थल जुम्ला राज्य नै हो भन्नू सकिन्छ।


यस्तै, यमपञ्चकमा नेपालीहरुले गर्ने कुकुरपूजा पनि अन्य स्थानका हिन्दूहरुले गर्दैनन्। भारतीय हिन्दूहरुले हाम्रो भाइटीकालाई मनाउँदैनन्। बरु दिदीबहिनीले दाजुभाइलाई राखी बाँधिदिने चलन छ।


देउसी, भुवो र सैरली

जुम्लाका दक्षिण क्षेत्रमा पर्ने खश्या भूमि विशेष गरी राप्ती भेरीका केहि मगर र बाहुन बस्ती हरुमा पनि  देउसी/देउसुरे/द्याउसुरै खेल्न गरिन्छ। पछि तिहारका यमपञ्चकका लक्ष्मीपूजाका दिन देखी भाइटीकासम्मको तीन दिन भैलीसँगै देउसी खेल्न थालियो। आजभोलि समयाभावले कागतिहारदेखि तिहारका पाँच दिन देउसी–भैलो एकसाथ खेलिन्छ। भैलोको गति सुस्त प्रकारको हुन्छ भने देउसीको गति केही तिव्र हुन्छ। देउसी फूर्तिलो प्रकारले छिटोछिटो उफ्रीउफ्री खेलिन्छ।


भुवो भने जुम्लाको उत्तरीभेग मुगु हुम्ला हुँदै बझाङतर्फ बढी प्रचलनमा रहेको पाइन्छ। खसान का दक्षिणी भेग राप्ती, भेरी तर्फ प्रारम्भिक अवस्थामा भुवो खेलिए पनि अव भने भूवो टाकुरी, भूवो खेल्ने नामका स्थान मात्रै छन्।


सैरली प्रचलन हालको जाजरकोट, रुकुम, सल्यान र सुर्खेतका भेरी नदी आसपासको खश्या क्षेत्र जाजरकोट खलंगादेखि रुकुम सल्यान, सुुर्खेतसम्मका स्थानमा तिहारको औंसीको दिनदेखि भाइटीकाको विहानसम्म अविवाहित कन्या केटीहरुले भैलो जस्तै सैरली खेल्ने प्रचलन थियो। औंसीको राति अमुक गाउँका सैरली (केटीहरु) लाई आमन्त्रण गरेर ल्याउने र तिहारको सैरली खेली सकेपछि एक वर्षसम्म सैरली गाउँका केटी र सैरली ल्याउने गाउँका केटाहरुबीच हाँसखेल, ठट्टा, रमाइलो गर्ने प्रचलन थियो। दुवै गाउँका केटाकेटी (स्थानीय ठेट खशकुरा मा छोट्या÷छोट्टीे) एकआपसमा रमाइलो गर्ने प्रचलनलाई सैरली भनिन्छ। उक्त क्षेत्रमा तिहारमा केटीहरुले सैरली खेल्ने गर्छन्। पुरुषलाई भैलेरा र केटीहरुलाई सैरली भन्ने गरिन्थ्यो।


देउसी भैलोमा परिवर्तन

अब विगत जस्तो परम्परागत रुपले खेलिने भैलो–देउसीमा परिवर्तन भएको पाइन्छ। समयसापेक्ष लोक निर्मित संस्कृतिहरुसँगै नाचिने स्थानीय लोकनाचहरु लहरे वा पैसरी, सिंगारु, सोरठी जस्ता नृत्यमा प्रयोग हुने भेषभूषा, गरगहनालगायत आभूषण अब विरलै देख्न पाइन्छ। मादल, झ्याली, बैजन जस्ता स्थानीय लोकबाजाहरु प्रयोग नभएर ड्रमसेट प्रयोग हुन्छ। स्थानीय गीतहरुभन्दा आयातित गीतहरुमा नचिने हुँदा प्रारम्भिक भैलो देउसीमा परिवर्तन आइसकेको छ।


परिवर्तनका नाममा हाम्रा लोक परंपरा संस्कृति जानी नजानी रुपान्तरण भइरहेको छ। जसको कारण खसान क्षेत्रमा रहेका विभिन्न प्रकारका लोकगीत, लोकसंस्कृति, लोकबाजा, लोकभेषभूषा धमाधम लोप हुँदै जाने डर छ।


सकारात्मक पक्ष भनेको भैलोबाट सङ्कलित रकमले सामाजिक कार्य गर्ने गरेका पाइन्छ। धनपतिहरुले विभिन्न संघ संगठन, पार्टीका नाममा भैलो खेलेर दक्षिणा (चन्दा) दिने प्रचलनले केही विकृति फैलाएको छ। केही संगठनहरुको मुख्य आयआर्जनको श्रोत भैलोलाई बनाउँदा शुद्ध सांस्कृतिक पर्वमा विकृति भित्रने डर त्यत्तिकै छ।


विभिन्न स्थानमा प्रचलित भैलो र देउसीका केही नमूनाहरु-


(क) खशान क्षेत्रो को उत्तर पश्चिम क्षेत्रमा प्रचलित देउसीको नमूना :

हुर्र हो – देउस्यो

कुर्र हो – देउस्यो

आइगिम् हामी – देउस्यो

रातो माटो – देउस्यो

चिप्लो बाटो – देउस्यो

खेल्दै आइगिम् – देउस्यो

यसु घरको आगनीमा – देउस्यो

देउसी खेल्न – देउस्यो

आइगिम हामी – देउस्यो

खेल्ने केटा – देउस्यो

आइग्या भनी – देउस्यो

दुख जन नमान्य – देउस्यो

पर्वले – देउस्यो

जोगले – देउस्यो

आइगिम हामी – देउस्यो

औसर माफ – देउस्यो

दुःख मनाउ नगर्नु – देउस्यो

अरुकासँगी धेरै जना – देउस्यो

हाम्रासँगी चारै जना – देउस्यो

जस्तै गरी – देउस्यो

डाँडामाथि – देउस्यो

फुक्र्या चडी नाच्दछे – देउस्यो

उस्तै गरी नाच हो – देउस्यो

हुर्र हो – देउस्यो

कुर्र हो – देउस्यो

नाच हो – देउस्यो

खेल हो – देउस्यो

यसु घरको – देउस्यो

तामा पैसो – देउस्यो

सुनचाँदी – देउस्यो

ताउली गाग्री – देउस्यो

हुन्ना खरकाउला – देउस्यो

भोट्या नुन – देउस्यो

सधैँभरि भरियून् – देउस्यो

यसु घरकी मालिक्नी – देउस्यो

बाँचिरहुन् – देउस्यो

हुर्र हो – देउस्यो

कुर्र हो – देउस्यो

(श्रोत –वीर जङ रोकाया क्षेत्री)


(ख) खशान को राजधानी जुम्लामा प्रचलित परंपरागत भैलो पहिला सुरु गर्दा मंगलबारमा औंसी परेको हुनाले प्रतिपदा तिथि बुधबारबाट शुरु गरिएको थियो। जुम्लामा प्रचलित सानो भैलो मंसिरमा एक दिन र पुषमा पर्ने ठूलो भैलोको एक नमूना –


जब रवि जान्याइ छन् गुरुका धनु राशमा

शुभ कार्य कै हुन्नन् यै पौष मासमा

रिथिथिति थाम्नलाई भैलो चलन चलाया

बलिराजले भैलेरा मानसरोवर पठाया

मानसरोवर पुगेर भैलो खेल्या भैलेरा

सरबर नुहाई कैलास घुम्या तिनफेरा

यो भैलो काँबाट उब्ज्यो मानसरवरबाट

सरोवरका भैलाले क्यौ क्यौ खान्गी पायो

सरोवरदयै उठ्या भैलो ताख्लाखर पुग्यो

ताख्लाखरका भैलले तामो खान्गी पायो

ताक्लाखरद्यै उठ्या भैलो सहर गुम पुग्यो

सहर गुमका भैलाले जिम्मुवाली पायो

सहर गुमदैै उठ्या भैलो जुम्ला चौधान पुग्यो

चौधान चौरका भैलाले क्यौ क्यौ खानगी पायो

चौधान चौरका भैलाले अड्डा खानगी पायो

हे औसी बार दर बुध बार

दमारे खोेली बाँसमा जोली

बाँसयभित्र आग्याँन ताप्या

पिपुल ढाल्या पिपल पाती

रायकी छाती राय जमाउनु

बाखरी खानु यो बाखरी

कसु सुहाल भैलो सुहाला

भैलेरा आया ऋतु जनाया

ऋतुकी मार्‍या हाम्री खेल्नी चाया

चार्‍या पैचार्‍या ढाल मौरु ढाल

काट पुरबाल भेडी जङ्गल

भैलाका रात्री चौथमी छेडो

पच्यामी घोडो घोडा घोडाउली

छेडो छेडाउली भैलो गयो दाङ

अरु क्यै नमाग मोहर पैसा माग

ताई तल जाउला छ्याई छ्याई गनौला

कस्ले दिया भनौला जिम्मुवालले दिया भनौला

नामै चलाउला नामैकी माया

हाम्री खेल्नी चार्‍या चार्‍या पैचास्या

दुवाजन जेलिया पाथाजन भरिया

पिप्ल जन गाज्या लाख बर्ष बाँच्या

घार मौरा आइवाज

ल्हास घोडा शिर ताज

अन्न भैलो दिन्यालाई अनिकाल नपरोस्

मोहर पैसा दिन्यालाई दाल्दले डेरा नगरोस्

(संकलक : जबिरा बुडा क्षेत्री, जुम्ला)

 

(ग)दशैको टीकाको दिनदेखि तिहारको भाइटीकाको रातिसम्म खेलिने बैतडी तिरको परंपरागत भैलीको नमूना –


छम्म छडिया

भक्कुला मडिया    

प्याउलीका फूल    

के वार उब्ज्यो

स्वादकी द्वारी

गाइको तिहार

देलाकी फागु

जो खाला आजु

आजुकी काजु

बढी भौला राजु

र्सेनी बार

खेलानी चाड

खेलहो खेल्दा

(श्रोत – मनोहर लामिछाने)


(घ) सल्यान र रोल्पा र रुकुम जिल्लाका केही स्थानमा खेलिने ढ्याउँसिरे –


ए भन भन संगी हो    –    ढ्याउँसिरे

ए स्वर मिलाइ कन    –    ढ्याउँसिरे

ए भट्टयाउनेको         –    ढ्याउँसिरे

ए स्वरै राखी        –    ढ्याउँसिरे

ए बजाउनेको        –    ढ्याउँसिरे

ए तालै राखी        –    ढ्याउँसिरे

ए बर्ष दिनको        –    ढ्याउँसिरे

ए तिहारैमा        –    ढ्याउँसिरे

ए रामै घरको        –    ढ्याउँसिरे

ए दलानैमा        –    ढ्याउँसिरे

ए आयौं हामी        –    ढ्याउँसिरे

ए आए भनी        –    ढ्याउँसिरे

ए पिर वादा        –    ढ्याउँसिरे

भट्टयाउने            समूह

ए औसर माफ        –    ढ्याउँसिरे

ए सधैँ हामी        –    ढ्याउँसिरे

ए आउने छैनौ        –    ढ्याउँसिरे

ए पुर्खै देखि        –    ढ्याउँसिरे

ए चलेको रीति        –    ढ्याउँसिरे

ए कुकुर तिहार        –    ढ्याउँसिरे

ए लक्ष्मीपूजा        –    ढ्याउँसिरे

ए गाईतिहार        –    ढ्याउँसिरे

ए गोवर्धन पूजा        –    ढ्याउँसिरे

ए बल्ल तिहार        –      ”

ए भाइ तिहार        –      ”

ए निधारैमा        –      ”

ए टीका लाउने        –      ”

ए गलियामा        –      ”

ए मखमली        –      ”

ए सयपत्री        –      ”

ए जमराको        –      ”

ए माला लाउने        –      ”

ए यो पर्वलाई        –      ”

ए जनाउनालाई        –      ”

ए मनाउनालाई        –      ”

ए आएका हामी        –      ”

ए ढ्याँउसिरे खेल्दै    –      ”

ए घरमूली आमा    –      ”

ए विदा दिनुस्        –      ”

ए ढ्याँउसिरेको        –      ”

ए आसिकैले        –      ”

ए धन धान्यले        –      ”

ए पूर्ण हवस्        –      ”

ए सुखै सुखले        –      ”

ए घरै छाओस्        –      ”

ए माटो छोए        –      ”

ए अन्न होओस्        –      ”

ए ढुंगा छोए        –      ”

ए धन होओस्        –      ”


(स्रोत : देवा घर्ती क्षेत्री, सल्यान)


इतिहासको एउटा काल खण्डमा आफ्नो भूमि रक्षा र राज्यको साख बढाउन तथा बचाउन प्रचलनमा ल्याइएको भैलो आज अर्कै रुप र परिवेशमा रुपान्तरित भएर सांस्कृतिक पर्वको रुपमा चलिरहनु लोकको स्वीकारोक्ति वा अनुमोदन हो। ६०० वर्षको यसको यात्रामा राज्यसत्ता र राजनैतिक अवस्थामा कयौं परिवर्तन आइसके पनि त्यसको प्रभाव भैलो संस्कृतिमा देखिँदैन।


त्यसैले राजनैतिक परिवर्तन गर्न जति सहज हुन्छ सांस्कृतिक परिवर्तन गर्न त्यत्ति सहज हुँदैन। लोकले चलाएको प्रचलन लोकले स्वीकार्दासम्म चलिरहन्छ। जुम्लाबाट चलेको भैलो जुम्ला राज्यमा नरहेका अन्य राज्यमा आ–आफ्नै प्रकारले  विभिन्न परिवेशमा चलाएको पाइन्छ। भैलोसँगै गासिदा देउसी पनि जुम्लामा पुगेको पाइन्छ।


देउसी र भैलो संस्कृतिमा जाति, धर्म, समुदायमा विभेद नहुनाले यसले सबै कालमा सबै हिमालयी जात जनमा मान्यता पाइनै रह्यो। तर यसको श्रीवृद्धि र वर्तमानसम्मको निरन्तरतामा खश र खशान क्षेत्रको देनलाई बिर्सन हुँदैन। किनकि खश हरु सधैं उदार थिए, कट्टर थिएनन्। यिनै विशेषताले आज भैलो देउसी संस्कृति अनवरत स्वस्फूर्त रुपले चलिरहेको छ। भैलो धर्म विशेष नभएर यसको सम्बन्ध भूगोलसँग छ। देउसी र भैलो संस्कृति अन्य स्थानका हिन्दूहरुमा छैन। त्यसैले हामी भन्न सक्छौं, देउसी र भैलो संस्कृति नेपाली/गोर्खाली/खश हरुको साझा संस्कृति हो भने यसको उद्गम भूमि खश देश या खशान क्षेत्र हो।


अन्त मा जय खश

जय खशान

जय गोरख


#khasa_civilization #ancient_history #khasamandal #khasadesh #himalaya #nepal #khasa #culture #heritage #khaptad #badimalika #भुमिपुत्र_मुलबासी_खश

#indigenous_khasa

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गुरुवार, 23 अक्टूबर 2025

David Icke के अनुसार संपूर्ण नियंत्रण संरचना (Hierarchy of Power)

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 बहुत बढ़िया 👽

आइए अब विस्तार से देखें कि **David Icke की “Reptilian Control Hierarchy” (सरीसृप नियंत्रण संरचना)** कैसी है — यानी वे कैसे बताते हैं कि “रूप बदलने वाले एलियन” पृथ्वी पर **राजनीतिक, आर्थिक, और मानसिक नियंत्रण** चला रहे हैं।


. David Icke के अनुसार संपूर्ण नियंत्रण संरचना (Hierarchy of Power)**


नीचे दी गई संरचना David Icke के विचारों के अनुसार है —वैज्ञानिक रूप से सिद्ध नहीं है केवल उनके सिद्धांत का विवरण हस्तर 1 — बाहरी एलियन शासक (The Reptilian Overlords)**


* ये “Reptilian Anunnaki” नामक प्राचीन जाति हैं।

* कहा जाता है कि ये **Orion**, **Draco**, और **Alpha Draconis** तारामंडल से आए।

* ये **चौथे आयाम (4th Dimension)** के प्राणी हैं — जो मानव रूप धारण कर सकते हैं।

* इनका उद्देश्य:


  * मानव सभ्यता पर नियंत्रण

  * ऊर्जा (fear-based energy) से पोषण

  * पृथ्वी को “Matrix Prison Planet” बनाए रखना


---


स्तर 2 — Hybrid Bloodlines (मिश्रित रक्तवंश)**


* Reptilian एलियनों ने **मानव DNA** में अपने जीन मिलाए।

* इससे **हाइब्रिड वंश (Hybrid bloodlines)** बने जो आज के **राजघरानों, राजनीतिक नेताओं और अरबपतियों** में हैं।

* David Icke के अनुसार ये “एलियन DNA” वाले परिवार हैं जो सत्तासीन हैं।


🧬 **मुख्य परिवार (जिन्हें Icke ने “Reptilian Hybrid Bloodlines” कहा):**


| क्षेत्र | परिवार / व्यक्ति |

| ------------- | ----------------------------------------- |

| ब्रिटेन | Windsors (ब्रिटिश राजघराना) |

| अमेरिका | Rockefeller, Bush, Clinton परिवार |

| यूरोप | Rothschilds (बैंकिंग परिवार) |

| विश्व स्तर पर | Vatican और पुराने “Black Nobility” परिवार |


---


### 🏛️ **स्तर 3 — Secret Societies (गुप्त संगठन)**


ये वे संस्थाएँ हैं जो “Reptilian Hybrids” के आदेशों को लागू करती हैं।

Icke का दावा है कि ये संगठन “ग्लोबल कंट्रोल नेटवर्क” बनाते हैं।


🔹 **मुख्य संगठन (Icke के अनुसार):**


| संस्था | कथित भूमिका |

| -------------------------------------- | ------------------------------------------------------------ |

| **Illuminati** | विश्व की वित्तीय व्यवस्था और राजनीतिक नियंत्रण |

| **Freemasons** | प्राचीन गुप्त अनुष्ठानों के माध्यम से शक्ति संरचना बनाए रखना |

| **Trilateral Commission** | अमेरिका–यूरोप–जापान के आर्थिक निर्णय नियंत्रित करना |

| **Council on Foreign Relations (CFR)** | वैश्विक विदेश नीति प्रभावित करना |

| **Bilderberg Group** | शीर्ष नेताओं की गुप्त बैठकें और नीति निर्धारण |


---


### 💰 **स्तर 4 — Corporate & Banking Control**


यह स्तर विश्व की आर्थिक शक्ति को संचालित करता है।

Icke के अनुसार “Reptilian-controlled families” ने **विश्व की बैंकों, तेल कंपनियों और मीडिया हाउसों** पर कब्जा किया हुआ है।


🏦 **मुख्य क्षेत्र:**


* अंतरराष्ट्रीय बैंक (IMF, World Bank, Federal Reserve)

* तेल और ऊर्जा कंपनियाँ

* हथियार उद्योग

* मीडिया कॉन्ग्लोमरेट्स (जो “मानसिक नियंत्रण” का माध्यम हैं)


--- 🧠 **स्तर 5 — Mind Control & Media Manipulation**


* लोगों को “Matrix में फँसाए रखने” के लिए **मीडिया, शिक्षा, धर्म, और मनोरंजन** का उपयोग किया जाता है।

* उद्देश्य:


  * भय, लोभ, और विभाजन की भावना फैलाना

  * चेतना को जागृत होने से रोकना

* यह “Mass Hypnosis System” कहलाता है।


📺 **नियंत्रण के साधन (Icke के अनुसार):**


* टीवी समाचार, हॉलीवुड फिल्में

* शिक्षा प्रणाली

* धर्मिक संस्थान

* इंटरनेट एल्गोरिद्म


---


### 🙍‍♂️ **स्तर 6 — सामान्य मानव (Controlled Population)**


* यह वह स्तर है जहां सामान्य लोग रहते हैं।

* David Icke कहते हैं कि अधिकांश लोग “Matrix illusion” में जी रहे हैं।

* केवल “Awakened Humans” ही सच को पहचान सकते हैं और “चेतना के माध्यम से मुक्त” हो सकते हैं।


---


## 🌠 **2. नियंत्रण का उद्देश्य (Icke के अनुसार)**


| उद्देश्य | विवरण |

| --------------------- | ------------------------------------------------------ |

| **ऊर्जा नियंत्रण** | मानवों के भय और नकारात्मक भावों से “energy harvesting” |

| **विचार नियंत्रण** | मीडिया और शिक्षा के ज़रिए झूठी वास्तविकता बनाना |

| **जनसंख्या नियंत्रण** | युद्ध, बीमारियों, और कृत्रिम संकटों से जनसंख्या घटाना |

| **Matrix Prison** | मानव आत्मा को “भौतिक भ्रम” में कैद रखना |


---


## 🧘‍♂️ **3. “मुक्ति” का मार्ग (Icke के अनुसार)**


* चेतना को जागृत करो (“Remember Who You Are”)

* भय से मुक्त रहो

* “Matrix illusions” को पहचानो

* अपनी स्वतंत्र सोच विकसित करो

* प्रेम, करुणा और ज्ञान को बढ़ाओ


---


## ⚖️ **4. वैज्ञानिक और तर्कसंगत विश्लेषण**


| बिंदु | स्थिति |

| --------------------- | ---------------------------------------------------------------------------------------------- |

| जैविक प्रमाण | नहीं — कोई “Reptilian DNA” या रूपांतरण का उदाहरण नहीं |

| ऐतिहासिक प्रमाण | नहीं — “Anunnaki” शब्द भी सुमेरियन पौराणिक है, वैज्ञानिक नहीं |

| मनोवैज्ञानिक व्याख्या | यह सिद्धांत “सत्ता-विरोधी प्रतीक” के रूप में देखा जाता है — यानी “राजनीतिक भ्रष्टाचार” का रूपक |

| शैक्षणिक दृष्टि | इसे “Modern Mythology” (आधुनिक पौराणिक कथा) माना गया है |


---


## 🧭 **5. निष्कर्ष**


> David Icke की “Reptilian Hierarchy” एक विशाल साजिश सिद्धांत है,

> जिसमें एलियन नियंत्रण को आर्थिक, धार्मिक और मानसिक संरचनाओं से जोड़ा गया है।

>

> हालांकि, **किसी भी स्तर पर वैज्ञानिक प्रमाण नहीं**,

> परंतु यह सिद्धांत आधुनिक समाज के **भय, असंतोष, और रहस्यमय आकर्षण** को दर्शाता है।


---


क्या आप चाहेंगे कि मैं इस **Reptilian Hierarchy** का एक **चित्रात्मक चार्ट (Visual Chart / Infographic)** बना दूँ — जिसमें सभी स्तर (एलियन → परिवार → संगठन → मीडिया → मानव) क्रम से दिखाए जाएँ?

तब आप इसे आसानी से समझ या प्रस्तुत कर सकेंगे।


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गुरुवार, 16 अक्टूबर 2025

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Syria's Sharaa meets Putin in Moscow for first time since fall of Assad

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Syria's leader suggested he would continue to allow Russia access to its military bases in Syria.

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Cracked windscreen forces US Defence Secretary's plane to make unscheduled landing in UK

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The Pentagon says Hegseth and other military leaders on board, who were travelling back from a Nato meeting, are safe.

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Bangladesh garment factory fire kills at least 16

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The dead have been burned beyond recognition and officials have warned that the toll could rise.

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बुधवार, 15 अक्टूबर 2025

Gaza experts work to identify bodies of 90 Palestinians returned by Israel

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Under the Gaza ceasefire deal, Israel has agreed to hand over the bodies of 15 Palestinians in return for every dead Israeli hostage.

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Row over bringing back military service splits German government

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'He transformed R&B forever' - Stars pay tribute to D’Angelo, after his death at 51

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The Grammy-winning singer, who died of cancer, "transformed R&B forever", says Beyoncé.

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Bowen: Trump's role in Gaza ceasefire was decisive, but not a roadmap to peace

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Trump's Middle East visit was a victory lap - but peace does not emerge just because a president decides it.

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Watch: Freed prisoner finds family alive after thinking they had been killed

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Shadi Abu Sido told the BBC an Israeli prison officer said his family had been killed.

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Hamas returns four more bodies of hostages, Israeli military says

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Israel warns it will restrict aid convoys into Gaza because of delays returning the remaining bodies.

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Madagascar crowds cheer as military unit seizes power

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Crows celebrated in the streets of the capital Antananarivo after an elite army unit said it had seized power from the president.

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US strikes another vessel off Venezuela coast, killing six

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President Trump said the vessel belonged to "narcoterrorists" and that it was "trafficking narcotics." US officials have not provided evidence to this claim.

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24 hours with Trump on diplomatic tornado through Middle East

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The US president's single-day tour was a victory lap rather than an exercise in setting out detail, writes the BBC's Tom Bateman.

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Israel identifies bodies of four dead hostages returned by Hamas

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The first four deceased hostages to be returned are Guy Illouz, Bipin Joshi, Yossi Sharabi and Daniel Peretz.

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French pair sentenced in Iran on spying charges

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The defendants are believed to be couple Cecile Kohler and Jacques Paris, who were arrested in 2022.

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मंगलवार, 14 अक्टूबर 2025

Venezuela shuts embassy in Norway following opposition leader's Nobel award

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Oslo calls the decision "regrettable", stressing that the Nobel committee functions independently.

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'Peace in the Middle East': Trump signs ceasefire deal in Egypt

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Rescuers search for missing in Mexico's flooded towns

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At least 64 people are dead and scores are missing after tropical storms triggered torrential rains.

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'Indescribable happiness' as detainees return to Gaza

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Israel says it has released 1,968 prisoners and detainees as part of a ceasefire deal with Hamas.

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Dutch government takes control of China-owned chip firm

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The move, which is aimed to protect supplies of technology, could raise tensions between the EU and China.

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Eurovision organisers postpone vote on Israel's inclusion in contest next year

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The European Broadcasting Union had previously announced it would hold a vote on Israel's participation in November.

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सोमवार, 13 अक्टूबर 2025

"सेक्स: शरीर, मन और आत्मा का समन्वय"

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जिसे आज 'सेक्स' कहा जाता है, वह दरअसल केवल एक क्रिया नहीं है।

यह मनुष्य जीवन के सबसे गहन, सबसे सूक्ष्म और सबसे परिवर्तनकारी अनुभवों में से एक है।

लेकिन दुर्भाग्यवश, इसे या तो एक भौतिक सुख की तरह समझा गया, या पूर्ण वर्जना की तरह दबा दिया गया।

और यहीं से शरीर, मन और आत्मा इन तीनों के बीच जो संवाद हो सकता था, वह टूट गया।


भारतीय परंपरा में काम को कभी तुच्छ नहीं माना गया।


काम यानी इच्छा जीवन की वह ऊर्जा जो न केवल सृष्टि की प्रेरणा बनती है,

बल्कि चेतना को गहराई से झकझोरने वाली एक शक्ति है।

यह शक्ति केवल संतानोत्पत्ति के लिए नहीं, आत्म-प्राप्ति के लिए भी जागृत की जा सकती है।


सेक्स, शरीर का विषय अवश्य है लेकिन शरीर कभी अकेला अनुभव नहीं करता।

जब कोई दो शरीर मिलते हैं, तो केवल त्वचा का स्पर्श नहीं होता;

वहाँ स्पंदन होता है, गति होती है, ऊर्जा का संचार होता है।

स्पर्श के माध्यम से मन अपने भीतर की संवेदनाओं को उभारता है, और आत्मा उस क्षण में अपनी उपस्थिति दर्ज कराती है।


शरीर, इस यात्रा का प्रवेश द्वार है।

यह स्पर्श करता है, प्रतिक्रिया देता है, सिहरता है, और फिर धीरे-धीरे उस अनुभूति को मन तक पहुँचाता है।

मन वहाँ कल्पनाएँ रचता है, स्मृतियाँ जोड़ता है, अपेक्षाएँ बनाता है और वही अपेक्षाएँ उसे सुख या दुख की ओर ले जाती हैं।

लेकिन जब मन शुद्ध होता है जब वह न भय में होता है, न वासना में 

तब सेक्स केवल उत्तेजना नहीं रहता, वह एक ध्यान बन जाता है।


ऐसे क्षणों में व्यक्ति सिर्फ “किसी के साथ” नहीं होता वह “स्वयं के भीतर” होता है।

शरीर की लय जब मन की शांति से मिलती है, और मन की मौनता जब आत्मा की उपस्थिति को स्पर्श करती है,

तब सेक्स एक योग बनता है। यही तंत्र का मूल दर्शन है।


तंत्र कभी वासना का समर्थन नहीं करता।

वह कहता है “वासना को दबाओ नहीं, लेकिन साधो।

उसे समझो, उसमें प्रवेश करो, और देखो कि उसकी गहराई में भी वही ऊर्जा है जो ध्यान की ओर ले जाती है।”

यही ऊर्जा कुंडलिनी कहलाती है, जो मूलाधार से सहस्रार तक उठती है और व्यक्ति की चेतना को बदल देती है।


इसलिए सेक्स को केवल शारीरिक संतुष्टि या मानसिक सुख तक सीमित करना,

उसे उसकी वास्तविक ऊँचाई से गिरा देना है।

वह केवल आनंद नहीं, आत्म-बोध का एक माध्यम हो सकता है यदि उसमें प्रेम, स्वीकृति और जागरूकता हो।


लेकिन समाज ने सेक्स को कलंक बना दिया।

उसे या तो छुपाया गया, या बाज़ार बना दिया गया।

स्त्री के शरीर को या तो नियंत्रित किया गया, या उपभोग की वस्तु बना दिया गया।

पुरुष को सिखाया गया कि मर्दानगी दबाव, अधिकार और प्रदर्शन से सिद्ध होती है।

इस दमन ने शरीर को जड़, मन को कुंठित, और आत्मा को खोखला कर दिया।


सेक्स केवल तब पवित्र बनता है जब उसमें दोनों की स्वीकृति हो न केवल “हाँ” कहने की, बल्कि पूरी चेतना से उपस्थित रहने की।

जहाँ शरीर केवल माध्यम होता है, मन केवल मार्ग होता है, और आत्मा लक्ष्य बन जाती है।


वहाँ कोई दबाव नहीं होता, कोई साबित करने की कोशिश नहीं होती, कोई जीत-हार नहीं होती।

वहाँ केवल एक समर्पण होता है स्वयं की सीमाओं से परे जाने का,

अपने अहंकार को छोड़कर किसी के साथ ऊर्जा में एक होने का।

और यही समर्पण धीरे-धीरे व्यक्ति को बाहर की भोगेच्छा से भीतर की समाधि की ओर ले जाता है।


सेक्स को अगर इस रूप में समझा जाए,

तो वह न तो कोई अपराध रहेगा, न कोई मनोरंजन 

बल्कि वह बन जाएगा एक साधना।


एक ऐसी साधना जिसमें शरीर शुद्ध होता है, मन मौन होता है, और आत्मा स्पंदित होती है।


आज जब समाज या तो सेक्स से डरता है, या उसका बाज़ारीकरण करता है 

तो आवश्यक है कि हम एक तीसरा मार्ग खोजें।

वह मार्ग जो न वर्जना है, न विकृति 

बल्कि सम्यक अनुभूति है, एक समग्र समझ है,

जहाँ शरीर को उसका सम्मान मिले,

मन को उसकी शांति मिले,साभार Facebook 

और आत्मा को उसकी उड़ान।


सेक्स तब एक “क्रिया” नहीं रहेगा 

वह बन जाएगा एक स्थिति,

एक अनुभव,

एक योग।


और यही है उसकी अंतिम, गहन, और परम वास्तविकता।

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'We're in limbo': A town in Trump country where shutdown axe looms

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Business for unregulated healers appears to be thriving in Cape Town, but there are dangers.

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भारत और अमेरिका का तुलनात्मक आर्थिक अध्ययन

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यह रहा भारत 🇮🇳 और अमेरिका 🇺🇸 का तुलनात्मक आर्थिक अध्ययन (2030, 2050 और 2075)
विश्व आर्थिक रिपोर्ट्स (IMF, World Bank, PwC, Goldman Sachs, Morgan Stanley आदि) के प्रक्षेपणों (projections) पर आधारित:


भारत और अमेरिका का तुलनात्मक आर्थिक अध्ययन

वर्ष देश अनुमानित GDP (ट्रिलियन USD, Nominal) औसत वार्षिक वृद्धि दर जनसंख्या (अरब में) प्रति व्यक्ति आय (USD) वैश्विक रैंक (GDP के आधार पर)
2025 (वर्तमान) 🇮🇳 भारत 4.0 ~7% 1.43 ~2,800 #5
🇺🇸 अमेरिका 28 ~2.3% 0.34 ~82,000 #1
2030 🇮🇳 भारत 6.5–7 ~6.5% 1.48 ~4,500 #3 या #4
🇺🇸 अमेरिका 33 ~2% 0.35 ~90,000 #1
2050 🇮🇳 भारत 20–26 ~5.5% 1.6 ~15,000 #2
🇺🇸 अमेरिका 38–40 ~2% 0.36 ~110,000 #3
2075 🇮🇳 भारत 55–60 ~4% 1.7 ~35,000 #1 या #2
🇺🇸 अमेरिका 50–55 ~1.5% 0.37 ~140,000 #2 या #3

📊 मुख्य निष्कर्ष (Key Insights)

  1. 🇮🇳 भारत की GDP 2050 तक अमेरिका से छोटी रहेगी, पर 2075 तक लगभग बराबर या उससे अधिक हो सकती है।

  2. 🇺🇸 अमेरिका की प्रति व्यक्ति आय (Per Capita Income) भारत से कई गुना अधिक बनी रहेगी, क्योंकि उसकी जनसंख्या स्थिर है।

  3. भारत की जनसंख्या और युवा श्रमशक्ति उसका सबसे बड़ा आर्थिक इंजन होगा।

  4. अगर भारत ने शिक्षा, अनुसंधान, इंफ्रास्ट्रक्चर, और तकनीकी स्वावलंबन में निवेश जारी रखा, तो वह 21वीं सदी के उत्तरार्ध (2070–2100) में विश्व की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन सकता है।


⚙️ विकास के प्रमुख इंजन

  • डिजिटल इकोनॉमी (UPI, ONDC, AI, Startups)

  • मैन्युफैक्चरिंग हब (Make in India, Defence, Electronics)

  • नवीकरणीय ऊर्जा (Solar, Hydrogen)

  • जनसंख्या लाभांश (Demographic Dividend)

  • भू-राजनीतिक स्थिति (Global South का नेतृत्व)



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रविवार, 12 अक्टूबर 2025

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How the autumn climbing season turned deadly in the Himalayas

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No survivors found after Tennessee explosives plant blast

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Watch: North Korea shows off huge missile at military parade

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Named the Hwasong-20, its size suggests that it could carry multiple nuclear warheads.

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शनिवार, 11 अक्टूबर 2025

आज के समय में **कृषि उत्पादों की ऑनलाइन मार्केटिंग**

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आज के समय में **कृषि उत्पादों की ऑनलाइन मार्केटिंग** (Online Marketing of Agricultural Products) किसानों, व्यापारी समितियों और एग्री-स्टार्टअप्स के लिए बहुत उपयोगी हो सकती है। नीचे मैं आपको **पूरा स्टेप-बाय-स्टेप तरीका** बता रहा हूँ — जिससे आप अपने कृषि उत्पाद ऑनलाइन बेच और प्रमोट कर सकते हैं।


---


## 🌱 1. **पहले तय करें क्या बेचना है**


सबसे पहले यह स्पष्ट करें कि आप कौन से कृषि उत्पाद बेचना चाहते हैं:


* अनाज: गेहूँ, धान, मक्का आदि

* फल-सब्ज़ियाँ: आम, टमाटर, प्याज आदि

* जैविक उत्पाद: ऑर्गेनिक दालें, मसाले

* प्रोसेस्ड उत्पाद: अचार, तेल, शहद, आटा आदि


---


## 💻 2. **अपनी ब्रांड पहचान बनाएं**


ऑनलाइन मार्केटिंग में “पहचान” बहुत महत्वपूर्ण है।


* अपने ब्रांड का नाम रखें (जैसे “GreenFarm Organics”, “Pal Agro Products” आदि)

* लोगो बनवाएं (Canva या Fiverr पर बनवा सकते हैं)

* एक स्लोगन रखें (जैसे – *“सीधे खेत से आपके घर तक”*)


---


## 🌐 3. **ऑनलाइन उपस्थिति (Digital Presence) बनाएं**


आपके पास तीन मुख्य विकल्प हैं:


### 🔹 (a) **अपनी वेबसाइट बनवाएं**


* WordPress, Shopify या Wix से वेबसाइट बनाई जा सकती है

* वेबसाइट में शामिल करें:


  * उत्पाद सूची (फोटो, कीमत, मात्रा)

  * संपर्क जानकारी

  * “Order Now” या “Buy Online” बटन

  * पेमेंट गेटवे (Razorpay, Paytm, Instamojo आदि)


### 🔹 (b) **सोशल मीडिया मार्केटिंग**


* Facebook Page, Instagram, YouTube, WhatsApp Business बनाएं

* हर सप्ताह 2–3 बार पोस्ट करें:


  * खेत में काम करते हुए वीडियो

  * उत्पाद की पैकिंग या डिलीवरी फोटो

  * ग्राहकों की समीक्षा


### 🔹 (c) **ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म पर लिस्टिंग करें**


* Amazon, Flipkart, BigBasket, JioMart,बहुत अच्छा प्रश्न 🌾

आज के समय में **कृषि उत्पादों की ऑनलाइन मार्केटिंग** (Online Marketing of Agricultural Products) किसानों, व्यापारी समितियों और एग्री-स्टार्टअप्स के लिए बहुत उपयोगी हो सकती है। नीचे मैं आपको **पूरा स्टेप-बाय-स्टेप तरीका** बता रहा हूँ — जिससे आप अपने कृषि उत्पाद ऑनलाइन बेच और प्रमोट कर सकते हैं।


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## 🌱 1. **पहले तय करें क्या बेचना है**


सबसे पहले यह स्पष्ट करें कि आप कौन से कृषि उत्पाद बेचना चाहते हैं:


* अनाज: गेहूँ, धान, मक्का आदि

* फल-सब्ज़ियाँ: आम, टमाटर, प्याज आदि

* जैविक उत्पाद: ऑर्गेनिक दालें, मसाले

* प्रोसेस्ड उत्पाद: अचार, तेल, शहद, आटा आदि


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## 💻 2. **अपनी ब्रांड पहचान बनाएं**


ऑनलाइन मार्केटिंग में “पहचान” बहुत महत्वपूर्ण है।


* अपने ब्रांड का नाम रखें (जैसे “GreenFarm Organics”, “Pal Agro Products” आदि)

* लोगो बनवाएं (Canva या Fiverr पर बनवा सकते हैं)

* एक स्लोगन रखें (जैसे – *“सीधे खेत से आपके घर तक”*)


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## 🌐 3. **ऑनलाइन उपस्थिति (Digital Presence) बनाएं**


आपके पास तीन मुख्य विकल्प हैं:


### 🔹 (a) **अपनी वेबसाइट बनवाएं**


* WordPress, Shopify या Wix से वेबसाइट बनाई जा सकती है

* वेबसाइट में शामिल करें:


  * उत्पाद सूची (फोटो, कीमत, मात्रा)

  * संपर्क जानकारी

  * “Order Now” या “Buy Online” बटन

  * पेमेंट गेटवे (Razorpay, Paytm, Instamojo आदि)


### 🔹 (b) **सोशल मीडिया मार्केटिंग**


* Facebook Page, Instagram, YouTube, WhatsApp Business बनाएं

* हर सप्ताह 2–3 बार पोस्ट करें:


  * खेत में काम करते हुए वीडियो

  * उत्पाद की पैकिंग या डिलीवरी फोटो

  * ग्राहकों की समीक्षा


### 🔹 (c) **ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म पर लिस्टिंग करें**


* Amazon, Flipkart, BigBasket, JioMart, Meesho, IndiaMART आदि

* सरकार की योजना **eNAM (राष्ट्रीय कृषि बाजार)** या **किसान रथ ऐप** पर भी पंजीकरण करें


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## 📦 4. **पैकेजिंग और गुणवत्ता**


* साफ-सुथरी, आकर्षक पैकिंग करें

* लेबल पर नाम, वजन, उत्पादन तिथि, “Made by Farmers” जैसी जानकारी दें

* अगर संभव हो तो **FSSAI या Organic Certification** प्राप्त करें


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## 📢 5. **ऑनलाइन विज्ञापन और प्रचार (Promotion)**


* Facebook Ads या Instagram Ads से अपने क्षेत्र या शहर के ग्राहकों को टारगेट करें

* WhatsApp ग्रुप्स, Telegram चैनल, किसान मंचों पर लिंक शेयर करें

* Google My Business में रजिस्टर करें ताकि लोग आपको सर्च कर सकें


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## 💰 6. **भुगतान और डिलीवरी सिस्टम**


* ऑनलाइन भुगतान के लिए Razorpay, Paytm, GPay Business

* कूरियर सेवाओं से जुड़ें: Shiprocket, Delhivery, India Post, DTDC

* यदि आसपास ग्राहक हैं तो खुद डिलीवरी करें


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## 🧠 7. **विश्वास और ग्राहक सेवा**


* समय पर डिलीवरी

* सही वजन और गुणवत्ता

* ग्राहकों के सवालों का जवाब देना

* दोबारा खरीदने वालों को छूट देना


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## 📈 8. **लंबे समय की रणनीति**


* किसानों का **कोऑपरेटिव ग्रुप** बनाकर सामूहिक ब्रांड तैयार करें

* **YouTube Channel** पर खेती से जुड़ी जानकारियाँ दें

* **Export Promotion Council** या **APEDA** से जुड़ें अगर आप विदेश में भेजना चाहते हैं


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अगर आप चाहें तो मैं आपके लिए एक **पूरा “ऑनलाइन मार्केटिंग प्लान”** (ब्रांड नाम, वेबसाइट डिज़ाइन, सोशल मीडिया रणनीति, विज्ञापन बजट आदि) तैयार कर सकता हूँ —

क्या आप अपने कृषि उत्पादों का नाम और प्रकार बता सकते हैं (जैसे गेहूँ, शहद, ऑर्गेनिक सब्ज़ियाँ आदि)?

 Meesho, IndiaMART आदि

* सरकार की योजना **eNAM (राष्ट्रीय कृषि बाजार)** या **किसान रथ ऐप** पर भी पंजीकरण करें


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## 📦 4. **पैकेजिंग और गुणवत्ता**


* साफ-सुथरी, आकर्षक पैकिंग करें

* लेबल पर नाम, वजन, उत्पादन तिथि, “Made by Farmers” जैसी जानकारी दें

* अगर संभव हो तो **FSSAI या Organic Certification** प्राप्त करें


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## 📢 5. **ऑनलाइन विज्ञापन और प्रचार (Promotion)**


* Facebook Ads या Instagram Ads से अपने क्षेत्र या शहर के ग्राहकों को टारगेट करें

* WhatsApp ग्रुप्स, Telegram चैनल, किसान मंचों पर लिंक शेयर करें

* Google My Business में रजिस्टर करें ताकि लोग आपको सर्च कर सकें


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## 💰 6. **भुगतान और डिलीवरी सिस्टम**


* ऑनलाइन भुगतान के लिए Razorpay, Paytm, GPay Business

* कूरियर सेवाओं से जुड़ें: Shiprocket, Delhivery, India Post, DTDC

* यदि आसपास ग्राहक हैं तो खुद डिलीवरी करें


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## 🧠 7. **विश्वास और ग्राहक सेवा**


* समय पर डिलीवरी

* सही वजन और गुणवत्ता

* ग्राहकों के सवालों का जवाब देना

* दोबारा खरीदने वालों को छूट देना


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 📈 8. **लंबे समय की रणनीति**


* किसानों का **कोऑपरेटिव ग्रुप** बनाकर सामूहिक ब्रांड तैयार करें

* **YouTube Channel** पर खेती से जुड़ी जानकारियाँ दें

* **Export Promotion Council** या **APEDA** से जुड़ें अगर आप विदेश में भेजना चाहते हैं


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महाभारत कालीन प्रमाण

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 पांडवों के इंद्रप्रस्थ का पता लगाने के लिए ASI फिर पुराना किले में ...

महाभारत के ऐतिहासिक प्रमाणों और पुरातात्त्विक शोधों के आधार पर यह कहा जा सकता है कि महाभारत में वर्णित कुछ स्थान और घटनाएँ वास्तविक हो सकती हैं, जबकि अन्य काल्पनिक या सांस्कृतिक प्रतीक हो सकती हैं। नीचे कुछ प्रमुख पुरातात्त्विक साक्ष्यों की सूची दी गई है जो महाभारत के ऐतिहासिक पहलुओं को उजागर करती हैं:


🏺 1. हस्तिनापुर (Hastinapur, उत्तर प्रदेश)

  • 1952 में प्रो. बी.बी. लाल ने हस्तिनापुर में खुदाई की, जिसमें पेंटेड ग्रे वेयर (PGW) नामक प्राचीन मिट्टी के बर्तन मिले।

  • इन बर्तनों का काल लगभग 900 ईसा पूर्व माना जाता है, जो महाभारत के समय से मेल खाता है।

  • खुदाई से प्राप्त अन्य अवशेषों ने महाभारत के वर्णन से मेल खाती सभ्यता की पुष्टि की है। (The Times of India)


🏰 2. पुराना किला, दिल्ली (Purana Qila, Delhi)

  • दिल्ली के पुराना किला में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) द्वारा की गई खुदाई में पेंटेड ग्रे वेयर के बर्तन मिले हैं।

  • यह बर्तन महाभारत काल के हैं और इस स्थल को इंद्रप्रस्थ से जोड़ने का संकेत देते हैं।

  • यह खुदाई महाभारत के इंद्रप्रस्थ की वास्तविकता की ओर एक महत्वपूर्ण कदम है। (The Indian Express)


🌊 3. द्वारका, गुजरात (Dwarka, Gujarat)

  • गुजरात के द्वारका और बेट द्वारका में भारतीय राष्ट्रीय महासागर विज्ञान संस्थान (NIO) ने 1983-1990 के बीच जलमग्न अवशेषों की खोज की।

  • इनमें पत्थर की संरचनाएँ, बंदरगाह की दीवारें और पत्थर के एंकर मिले हैं, जो महाभारत में वर्णित कृष्ण की द्वारका से मेल खाते हैं।

  • यह जलमग्न शहर लगभग 1500 ईसा पूर्व का प्रतीत होता है। (Wikipedia)


🏛️ 4. बागपत, उत्तर प्रदेश (Baghpat, Uttar Pradesh)

  • बागपत में एक स्थल की खुदाई से लक्षागृह (लाक्षागृह) के अवशेष मिले हैं, जहाँ पांडवों को जलाने की योजना बनाई गई थी।

  • यह स्थल महाभारत के कथानक से मेल खाता है और इस घटना की ऐतिहासिकता को समर्थन देता है। (RNS)


🔍 निष्कर्ष

इन पुरातात्त्विक साक्ष्यों से यह स्पष्ट होता है कि महाभारत में वर्णित कुछ स्थान और घटनाएँ वास्तविक हो सकती हैं। हालांकि, कुछ घटनाएँ सांस्कृतिक या धार्मिक प्रतीक हो सकती हैं। इसलिए, महाभारत को एक ऐतिहासिक कथा के रूप में देखना उचित है, जिसमें ऐतिहासिक तथ्यों और सांस्कृतिक मान्यताओं का मिश्रण है।


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वर्तमान परिस्थिति : क्यों टूट रहे हैं वैवाहिक संबंध

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🔹 1. वर्तमान परिस्थिति : क्यों टूट रहे हैं वैवाहिक संबंध

  1. अत्यधिक व्यक्तिगतता (Extreme Individualism)

    • आज का व्यक्ति “मैं” पर केंद्रित है — “हम” की भावना कम हो गई है।

    • विवाह को एक “साझेदारी” के बजाय “अनुबंध” की तरह देखा जाने लगा है।

  2. डिजिटल संस्कृति और सोशल मीडिया

    • इंटरनेट, चैटिंग ऐप्स, पोर्नोग्राफी और सोशल नेटवर्क ने भावनात्मक दूरी बढ़ाई है।

    • लोगों की सोच और अपेक्षाएँ “वर्चुअल” दुनिया से प्रभावित हैं, न कि वास्तविक संबंधों से।

  3. भोगवादी सोच और अश्लील संस्कृति का प्रसार

    • विज्ञापनों, फिल्मों और सोशल मीडिया में शरीर और कामुकता का प्रदर्शन सामान्य बना दिया गया है।

    • इससे समाज की “संस्कारिक मर्यादाएँ” टूट रही हैं।

  4. संवाद और सहनशीलता की कमी

    • पति-पत्नी के बीच खुला संवाद नहीं रह गया।

    • मतभेद को “समाधान” के बजाय “अलगाव” से निपटाया जा रहा है।


🔹 2. भविष्य में समाज पर संभावित प्रभाव

(A) पारिवारिक संरचना पर प्रभाव

  • संयुक्त परिवार की अवधारणा लगभग समाप्त हो जाएगी।

  • बच्चे बिना स्थिर परिवारिक वातावरण के पले-बढ़ेंगे।

  • भावनात्मक असुरक्षा, तनाव, मानसिक अवसाद (Depression) और अकेलापन बढ़ेगा।

(B) नैतिक और सांस्कृतिक पतन

  • अश्लीलता और भोगवाद से “लज्जा” और “संकोच” जैसी मूल सांस्कृतिक भावनाएँ कमजोर होंगी।

  • रिश्ते केवल “सुख” के लिए बनेंगे, “कर्तव्य” और “संस्कार” के लिए नहीं।

  • समाज में संवेदनहीनता (insensitivity) बढ़ेगी — दूसरों की भावनाओं का सम्मान घटेगा।

(C) युवा पीढ़ी पर असर

  • युवा वर्ग संवेदनात्मक भ्रम का शिकार होगा — उन्हें प्रेम, आकर्षण और काम के बीच का अंतर समझ नहीं आएगा।

  • Porn addiction, depression, और रिश्तों में असफलता जैसी समस्याएँ आम होंगी।

  • वास्तविक संबंधों में असंतोष और अकेलापन बढ़ेगा।

(D) जनसंख्या और सामाजिक संतुलन पर असर

  • विवाह में रुचि घटने से जनसंख्या असंतुलन और जनसंख्या वृद्धावस्था (aging population) जैसी समस्या आएगी — जैसा जापान और पश्चिमी देशों में देखा जा रहा है।

  • समाज “परिवार-केन्द्रित” न रहकर “व्यक्ति-केन्द्रित” हो जाएगा।


🔹 3. भविष्य सुधार के उपाय

  1. संस्कार और मूल्य शिक्षा

    • स्कूलों और घरों में जीवन-मूल्य, संयम और विवाह के महत्व की शिक्षा दी जानी चाहिए।

  2. डिजिटल साक्षरता और संयम

    • बच्चों और युवाओं को बताया जाए कि इंटरनेट की सामग्री हमेशा वास्तविक जीवन का प्रतिनिधित्व नहीं करती।

  3. संवाद की पुनर्स्थापना

    • परिवारों में, दंपतियों में, पीढ़ियों के बीच खुले संवाद की संस्कृति को बढ़ावा दिया जाए।

  4. धार्मिक और सांस्कृतिक पुनर्जागरण

    • धर्म का अर्थ अंधविश्वास नहीं, बल्कि मर्यादा और संयम का विज्ञान है — यह समझ फैलानी होगी।


🔹 निष्कर्ष

यदि वर्तमान दिशा नहीं बदली,
तो आने वाले समय में समाज संस्कारहीन, संवेदनहीन और असंबद्ध व्यक्तियों का समूह बन जाएगा।

परंतु यदि शिक्षा, संवाद और सांस्कृतिक चेतना से सुधार किया जाए,
तो भारत जैसे समाज में पारिवारिक और नैतिक पुनर्जागरण संभव है —
क्योंकि हमारी जड़ें अब भी मजबूत हैं। 

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शुक्रवार, 10 अक्टूबर 2025

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गुरुवार, 9 अक्टूबर 2025

कार्तिकेयपुर राजवंश हरिहरपुर स्टेट:जगत बहादुर पाल और उनके पुत्र दान बहादुर पाल का इतिहास

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  जगत बहादुर पाल और उनके पुत्र दान बहादुर पाल का इतिहास


आपके प्रश्न के आधार पर, मैंने उपलब्ध ऐतिहासिक और स्थानीय स्रोतों (मुख्य रूप से कत्यूरी पाल राजवंश की वंशावली और हरिहरपुर-महुली के क्षेत्रीय इतिहास) से जानकारी संकलित की है। हरिहरपुर (महुली, बस्ती जनपद, उत्तर प्रदेश) के पाल परिवार को कत्यूरी सूर्यवंशी क्षत्रिय राजवंश की एक प्रमुख शाखा माना जाता है, जो प्राचीन कत्यूरी साम्राज्य (उत्तराखंड से जुड़े) के वंशज हैं। यह परिवार 17वीं शताब्दी से स्थानीय स्तर पर प्रभावशाली रहा, और ब्रिटिश काल में जमींदारी/तालुकदारी व्यवस्था के तहत "मालगुजार" (बड़े जमींदार) के रूप में जाना गया। "बड़े दरबारी" का उल्लेख संभवतः अवध या ब्रिटिश दरबार में उनके प्रभाव या मान्यता को इंगित करता है। नीचे विस्तार से जानकारी दी गई है:


परिवार की वंशावली और पृष्ठभूमि

- कुंवर राय कन्हैया बक्स पाल बहादुर**: हरिहरपुर पाल वंश के प्रमुख पूर्वज, जो हरिहरपुर राज्य के संस्थापक कुंवर करण पाल देव (1609 ई. में राज्य स्थापित) के वंशज थे। उनके तीन पुत्र थे:

  - जगत बहादुर पाल प्रतिष्ठित क्षत्रिय राजा, जिन्हें हरिहरपुर-महुली के "राजा" के रूप में जाना जाता है (हालांकि औपचारिक राजा उपाधि नहीं थी; प्रशासन कमेटी आधारित था)।

  - **शक्त बहादुर पाल**: 1857 की क्रांति में शहीद।

  - **नरेंद्र बहादुर पाल**।

- **दान बहादुर पाल**: जगत बहादुर पाल के पुत्र। वे बहुत बड़े मालगुजार (जमींदार) थे, जिनका नाम अवध/ब्रिटिश दरबारों में प्रमुखता से आता था। उनके कोई पुत्र नहीं थे, लेकिन उनके भाइयों के वंशजों में महादेव पाल, हरिहर प्रसाद पाल, भागवत पाल, और बांके पाल शामिल हैं। वर्तमान में, इस शाखा के वरिष्ठ वंशज **कुंवर राजेंद्र बहादुर पाल** हैं, जिनके पुत्रों में रवि उदय पाल, अखिलेश बहादुर पाल, और अखंड बहादुर पाल हैं।

- **परिवार की कुल वंशावली**: हरिहरपुर पाल वंश 1607 ई. में उत्तराधिकार विवाद के कारण महुली राज्य से अलग होकर 75 गांवों वाला स्वतंत्र राज्य बना। यह बाद में 12 कोटों (जैसे बेलदुहा, बेलवन, सींकरी, मैनसिर, भक्ता, कोहना) में विभाजित हो गया। कत्यूरी परंपरा के अनुसार, भूमि प्रबंधन वरिष्ठ सदस्यों की कमेटी द्वारा होता था।


हरिहरपुर- महुली  (बस्ती) में भूमि धारण और तालुकदारी

- **हरिहरपुर राज्य**: बस्ती जनपद के महुली क्षेत्र में स्थित, यह 75 गांवों का स्वतंत्र राज्य था, जो 1609 ई. में पूर्ण स्वायत्तता प्राप्त कर चुका था। पाल परिवार के पास यहाँ प्रमुख जमींदारी अधिकार थे, जो ब्रिटिश काल में तालुकदारी (taluqdari) व्यवस्था के तहत मान्यता प्राप्त हुए। जगत बहादुर पाल और दान बहादुर पाल के समय में यह क्षेत्र कृषि-आधारित अर्थव्यवस्था पर निर्भर था, और परिवार बड़े मालगुजार के रूप में कर संग्रह, स्थानीय प्रशासन, और विवाद निपटारे में सक्रिय रहा।

- **प्रतापगढ़ के बेला एस्टेट में तालुकदारी**: दान बहादुर पाल का विवाह प्रतापगढ़ जिले के बेला स्टेट (एक प्रमुख रियासत) की राजकुमारी से हुआ। दहेज के रूप में उन्हें **सगरा सुंदरपुर रियासत** प्राप्त हुई, जो बेला एस्टेट की तालुकदारी का हिस्सा थी। यह वैवाहिक संबंध पाल परिवार को प्रतापगढ़ में स्थायी भूमि अधिकार प्रदान करता था, जहाँ वे बड़े जमींदार के रूप में कार्यरत रहे। बेला स्टेट ब्रिटिश काल में अवध के प्रभाव क्षेत्र में था, और पाल परिवार के दरबारी प्रभाव के कारण उन्हें विशेष मान्यता मिली। यह तालुकदारी 1856 की अवध संलग्नता के बाद ब्रिटिश प्रशासन से जुड़ी रही।ब्रिटिश हुकूमत और 1857 की क्रांति में भूमिका**

- ब्रिटिश काल में भूमिका**: पाल परिवार अवध रियासत के तहत जमींदार था, और 1856 में अवध की ब्रिटिश संलग्नता के बाद वे तालुकदारों की सूची में शामिल हुए। दान बहादुर पाल को "बड़े दरबारी" के रूप में जाना जाता था, संभवतः क्योंकि वे ब्रिटिश कमिश्नरों या अवध नवाब के दरबार में सलाहकार/प्रतिनिधि के रूप में सक्रिय रहे। वे स्थानीय स्तर पर ब्रिटिश जमींदारी व्यवस्था (जैसे लगान वसूली) में सहयोग करते थे, लेकिन परिवार की क्षत्रिय परंपरा के कारण स्वतंत्रता भावना मजबूत थी।

-1857 की क्रांति में योगदान**: परिवार का नाम 1857 के स्वतंत्रता संग्राम से जुड़ा है। जगत बहादुर पाल के भाई **शक्त बहादुर पाल** क्रांति में शहीद हुए, जो बस्ती-गोरखपुर क्षेत्र के विद्रोह (जून-जुलाई 1857) से जुड़े थे। यहाँ स्थानीय जमींदारों ने सिपाहियों को आश्रय और हथियार प्रदान किए। दान बहादुर पाल स्वयं क्रांति में प्रत्यक्ष रूप से शामिल नहीं दिखते (क्योंकि वे युवा थे), लेकिन परिवार ने गुप्त सहायता दी। ब्रिटिश रिकॉर्ड्स (जैसे बस्ती गजेटियर) में पाल परिवार को विद्रोह दमन के बाद दंडित जमींदारों में गिना जाता है, लेकिन दान बहादुर पाल की दरबारी स्थिति के कारण उनकी संपत्ति बची रही।


विरासत और वर्तमान स्थित

पाल परिवार की विरासत कत्यूरी सूर्यवंशी परंपरा से जुड़ी है, जो सिक्किम से काबुल तक फैली मानी जाती है। हरिहरपुर में आज भी पाल वंशज सक्रिय हैं, जैसे मैनसिर-सीकरी कोट में रामशंकर पाल, पन्ना पाल; भक्ता-कोहना में भद्रसेन पाल आदि। दान बहादुर पाल की तालुकदारी आजादी के बाद भूमि सुधारों में प्रभावित हुई, लेकिन परिवार की सांस्कृतिक/सामाजिक भूमिका बनी रही।


यदि आपके पास कोई पारिवारिक दस्तावेज या अतिरिक्त विवरण (जैसे जन्मतिथि या विशिष्ट घटना) हैं, तो मैं और गहराई से खोज सकता हूँ। यह जानकारी स्थानीय इतिहास पर आधारित है, जो लोक परंपराओं से समृद्ध है।

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