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गौतम क्षत्रिय राजपूत वंश (The clan of Gautam Budha)
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गौतम क्षत्रिय राजपूत वंश (The clan of Gautam Budha)
गौतम क्षत्रिय राजपूत वंश का सम्पूर्ण विवरण--
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गौतम राजपूत वंश का गौत्रोच्चार--
वंश--सूर्यवंश,इच्छवाकु,शाक्य
गोत्र- गौतम
प्रचर पाँच - गौतम , आग्डिरस , अप्सार,बार्हस्पत्य, ध्रुव
कुलदेवी- चामुण्ङा माता,बन्दी माता,दुर्गा माता
देवता - महादेव योगेश्वर,श्रीरामचन्द्र जी
वेद - यजुर्वेद
शाखा- वाजसनेयी
प्रसिद्ध महापुरुष--गौतम बुद्ध
सुत्र- पारस्करगृहासूत्र
गौतम वंश का महामंत्र--
रेणुका: सूकरह काशी काल बटेश्वर:।
कालिंजर महाकाय अश्वबलांगनव मुक्तद:॥
प्राचीन राज्य--कपिलवस्तु, अर्गल, मेहनगर, कोरांव,बारां(उन्नाव),लशकरपुर ओईया(बदायूं)
निवास---अवध,रुहेलखण्ड,पूर्वांचल,बिहार,मध्य प्रदेश
शाखाएं--कंडवार, गौनिहां, रावत,अंटैया,गौतमिया आदि
प्राचीन शाखाएं--मोरी(मौर्य),परमार(सम्भवत,शोध जारी)
अनुमानित जनसंख्या--1891 की जनगणना में यूपी में कुल 51970 गौतम राजपूत थे अब करीब दो से ढाई लाख होंगे,इसमें बिहार और मध्य प्रदेश के गौतम राजपूतो की संख्या भी जोड़ ले तो करीब 350000 गौतम राजपूतो की संख्या देश भर में होगी।।
गौतम सूर्यंवंशी राजपूत हैं ये अयोधया के सूर्यवंश से अलग हुई शाखा है इन्हें पहले शाक्य वंश भी कहा जाता है।
Note-- Alexander Cunningham (1871:349) relates the Sakya to the modern Gautam Rajputs, who were residing in the contemporary Indian districts Nagar & Amoddha of U.P.
गौतम ऋषि द्वारा दीक्षित होने के कारण इनका ऋषि गोत्र गौतम हुआ जिसके बाद ये गौतम क्षत्रिय कहलाए जाने लगे।
वंश भास्कर के अनुसार---भगवान राम के किसी वंशज ने प्राचीन काल मे अपना राज्य नेपाल मे स्थापित किया ।
इसी वंश मे महाराणा शाक्य सिंह हुए जिनके नाम से यह शाक्य वंश कहा जाने लगा। इसकी राजधानी कपिलवस्तु ( गोरखपुर ) थी। इसी वंश में आगे चलकर शुध्दोधन हुये जिनकी बडी रानी से सिद्धार्थ उत्पन्न हुये जो " गौतम " नाम से सुविख्यात हुये । जो संसार से विरक्त होकर प्रभु भक्ति में लीन हो गये । संसार से विरक्त होने से पहले इनकी रानी यशोधरा को पुत्र (राहुल ) उत्पन्न हो चुका था। इन्हीं गौतम बुद्ध के वंशज " गौतम " राजपूत कहलाते हैं । इस वंश में राव, रावत, राणा, राजा आदि पदवी प्राप्त घराने हैं ।
अश्वघोष के अनुसार-----गौतम गोत्री कपिल नामक तपस्वी मुनि अपने माहात्म्य के कारण दीर्घतपस के समान और अपनी बुद्धि के कारण काव्य (शुक्र) तथा अंगिरस के समान था| उसका आश्रम हिमालय के पार्श्व में था| कई इक्ष्वाकु-वंशी राजपुत्र मातृद्वेष के कारण और अपने पिता के सत्य की रक्षा के निमित्त राजलक्ष्मी का परित्याग कर उस आश्रम में जा रहे| कपिल उनका उपाध्याय (गुरु) हुआ, जिससे वे राजकुमार, जो पहले कौत्स-गोत्री थे, अब अपने गुरु के गोत्र के अनुसार गौतम-गोत्री कहलाये| एक ही पिता के पुत्र भिन्न-भिन्न गुरुओं के कारण भिन्न भिन्न गोत्र के हो जाते है, जैसे कि राम (बलराम) का गोत्र "गाग्र्य" और वासुभद्र (कृष्ण) का "गौतम" हुआ। जिस आश्रम में उन राजपुत्रों ने निवास किया, वह "शाक" नामक वृक्षों से आच्छादित होने के कारण वे इक्ष्वाकुवंशी "शाक्य" नाम से प्रसिद्ध हुये। गौतम गोत्री कपिल ने अपने वंश की प्रथा के अनुसार उन राजपुत्रों के संस्कार किये और उक्त मुनि तथा उन क्षत्रिय-पुंगव राजपुत्रों के कारण उस आश्रम ने एक साथ "ब्रह्मक्षत्र" की शोभा धारण की)।
एक अन्य मत के अनुसार श्रृंगी ऋषि का विवाह कन्नौज के गहरवार राजा की पुत्री से हुआ,उसके
दो पुत्र हुए,एक ने अर्गल के गौतम वंश की नीव रखी और दुसरे पदम से सेंगर वंश चला,इस मत के अविष्कारक ने लिखा कि 135 पीढ़ियों तक सेंगर वंश पहले सीलोन (लंका) फिर मालवा होते हुए ग्यारहवी सदी में जालौन में कनार में स्थापित हुए. किन्तु यह मत बिलकुल गलत है,क्योंकि पहले तो अर्गल का गौतम वंश,सूर्यवंशी क्षत्रिय गौतम बुध का वंशज है और दूसरी बात कि कन्नौज में गहरवार वंश का शासन ही दसवी सदी के बाद शुरू हुआ तो उससे 135 पीढ़ी पहले वहां के गहरवार राजा की पुत्री से श्रृंगी ऋषि का विवाह होना असम्भव है.
गौतम बुद्ध का जन्म भी इसी वंश में हुआ था।
शाक्य राज्य पर कोशल नरेश विभग्ग द्वारा आक्रमण कर इसे नष्ट कर दिया गया था जिसके बाद बचे हुए शाक्य गौतम क्षत्रियों द्वारा अमृतोदन के पुत्र पाण्डु के नेतृत्व में अर्गल राज्य की स्थापना की गयी।अर्गल आज के पूर्वांचल के फतेहपुर जिले में स्थित है।
प्रसिद्ध गौतम राजा अंगददेव ने अपने नाम का रिन्द नदी के किनारे "अर्गल" नाम की आबादी को आबाद करवाया और गौतम के खानदान की राजधानी स्थापित किया राजा अंगददेव. की लडकी अंगारमती राजा कर्णदेव को ब्याही थी राजा अंगददेव ने अर्गल से ३मील दक्षिण की तरफ एक किला बनवाया और इस किले का नाम "सीकरी कोट" यह किला गए में ध्वंसावशेष के रूप में आज भी विद्यमान है।
१- राजा अंगददेव
२- बलिभद्रदेव
३- राजा श्रीमानदेव
४- राजा ध्वजमान देव
५- राजा शिवमान देव :-
राजा शिवमान देव ने अर्गल से १मील दक्षिण रिन्द नदी के किनारे अर्गलेश्वर महादेव का मन्दिर बनवाया यहाँ आज भी शिवव्रत का मेला लगता है।
अर्गल राजा कलिंग देव ने रिन्द नदी के किनारे कोडे (कोरा) का किला बनवाया।
13वीं शताब्दी में भरो द्वारा अर्गल का हिस्सा दबा लिया था।उस समय अर्गल राज्य में अवध क्षेत्र के कन्नौज के रायबरेली फतेहपुर बांदा के कुछ क्षेत्र आते थे।
1320 के पास अर्गल के गौतम राजा नचिकेत सिंह व बैस ठाकुर अभय सिंह व निर्भय सिंह का जिक्र आता है। उस समय बैसवारा में सम्राट हर्षवर्धन के वंशज बैस ठाकुरों का उदय हो रहा था। उनके नाम पर ही इस क्षेत्र को बैसवारा क्षेत्र कहा गया। एक युद्ध में नचिकेत सिंह और उनकी पत्नी को गंगा स्नान के समय विरोधी मुस्लिम सेना ने घेर लिया तो निर्भय व अभय सिंह ने उन्हें बचाया था। इसमें निर्भय सिंह को वीर गति प्राप्त हुई थी। राजा ने अभय सिंह की बहादुरी से खुश होकर उन्हें अपनी पुत्री ब्याह दी और दहेज में उसे डौडिया खेड़ा का क्षेत्र सहित रायबरेली के 24 परगना (उस समय यह रायबरेली में आता था) और
फतेहपुर का आशा खेड़ा का राजा बनाया था। 1323 ईसवी में अभय सिंह बैस यहां के राजा हुए थे। यह पूरा क्षेत्र भरों से खाली कराने में अभय सिंह की दो पीढिया लगीं। इसके बाद आगे की पीढ़ी में मर्दन सिंह का जिक्र आता है।
अर्गल के गौतम राजा द्वारा चौसा के युद्ध में हुमायूँ को हराया गया जिससे शेरशाह सूरी को मुगलो को अपदस्थ कर भारत का सम्राट बनने में सहायता मिली।
जब मुगलों का भारत में दुबारा अधिपत्य हुआ तो उन्होंने बदले की भावना से अर्गल राज्य पर हमला किया और यह राज्य नष्ट हो गया।
फिर भी बस्ती गोरखपुर क्षेत्र में गौतम राजपूतो की प्रभुसत्ता बनी रही और ब्रिटिश काल तक गौतम राजपूतो के एक जमीदार परिवार शिवराम सिंह "लाला" को अर्गल नरेश की उपाधि बनी रही।
अर्गल के गौतम राजपूतो की एक शाखा पूर्वांचल गयी वहां मेहनगर के राजा विक्रमजीत गौतम ने किसी मुस्लिम स्त्री से विवाह कर लिया जिससे उन्हें राजपूत समाज से बाहर कर दिया गया।
विक्रमजीत की मुस्लिम पत्नी के पुत्र ने इस्लाम धर्म ग्रहण कर लिया जिसका नाम आजम खान रखा गया।
इसी आजम खान ने आजमगढ़ राज्य की नीव रखी।
बस्ती जिले में नगर के गौतम राजा प्रताप नारायण सिंह ने 1857 के स्वतन्त्रता संग्राम में अंग्रेजो के विरुद्ध क्रांति में बढ़ चढ़कर भाग लिया तथा अंग्रेजो को कई बार मात दी।
लेकिन उनके कुछ दुष्ट सहयोगियों द्वारा विश्वासघात करने के कारण वो पकड़े गए तथा उन्हें अंग्रेजो द्वारा मृत्युदण्ड की सजा दी गयी।
इस क्षेत्र के गौतम राजपूतों ने ओरंगजेब का भी मुकाबला किया था।
उत्तराधिकार संघर्ष में शाह शुजा भागकर फतेहपुर आया था जिसे गौतम राजपूतो ने शरण दी थी।जिसके बाद ओरंगजेब की 90000 सेना ने हमला किया जिसका 2 हजार गौतम राजपूतो द्वारा वीरता से मुकाबला किया गया।इसमें हिन्दू राजपूतो के साथ मुस्लिम गौतम ठाकुरों ने भी कन्धे से कन्धा मिलाकर जंग लड़ी।बाद में यहाँ के गौतम राजपूतो ने अंग्रेजो का भी जमकर मुकाबला किया और बगावत के कारण एक इमली के पेड़ पर 52 गौतम राजपूतो को अंग्रेजो द्वारा फांसी की सजा दी गयी।
आज गौतम राजपूत गाजीपुर, फतेहपुर , मुरादाबाद , बदायुं, कानपुर , बलिया , आजमगढ़ , फैजाबाद , बांदा, प्रतापगढ, फर्रूखाबाद, शाहाबाद, गोरखपुर , बनारस , बहराइच, जिले(उत्तर प्रदेश )
आरा, छपरा, दरभंगा(बिहार )
चन्द्रपुरा, नारायण गढ( मंदसौर), रायपुर (मध्यप्रदेश ) आदि जिलों में बसे हैं ।
"कण्ङवार" - दूधेला, पहाड़ी चक जिला छपरा बिहार में बहुसंख्या में बसे हैं ।
चन्द्रपुरा, नारायण गढ( मंदसौर) में उत्तर प्रदेश के फतेहपुर से आकर गौतम राजपूत बसे हैं ।
कुछ गौतम राजपूत पंजाब के पटियाला और हिमाचल प्रदेश के बिलासपुर हमीरपुर कांगड़ा चम्बा में भी मिलते हैं
गौतम राजपूतों की एक शाखा.. गाज़ीपुर के जमानियां. करंडा बेल्ट में भी है। विधायक राजकुमार सिंह गौतम करंडा क्षेत्र के मैनपुर गांव के ही निवासी हैं जो गौतम ठाकुरों का काफी दबंग गांव है।.. बाकि गौतमों की एक पट्टी आजमगढ़ के मेंहनगर लालगंज बेल्ट में भी है।
गौतम क्षत्रिय की खापें निम्नलिखित हैं।
(१) गौतमिया गौतम :--
उत्तर प्रदेश के आजमगढ़ और गोरखपुर जिलों में हैं।
(२)गोनिहा गौतम :--
बलिया,शाहबाद (बिहार) आदि जिलों में हैं।
(३) कण्डवार गौतम :--
कण्डावेनघाट
के पास रहने वाले गौतम क्षत्रिय कण्डवार गौतम कहे जाने लगे। ये बिहार के छपरा आदि जिलों में हैं।
(४)अण्टैया गौतम :--
इन्होंने अपनी जागीर अंटसंट (व्यर्थ) में खो दी।इसीलिए अण्टैया गौतम कहलाते हैं।ये सरयू नदी के किनारे चकिया, श्रीनगर,जमालपुर,नारायणगढ़ आदि गांवों में बताये गए हैं।
(५) मौर्य गौतम:--
इस वंश के क्षत्रिय उत्तर प्रदेश के मथुरा,फतेहपुर सीकरी,मध्य प्रदेश के उज्जैन,इन्दौर,तथा निमाड़ बिहार के आरा जिलों में पाए जाते हैं।
(६) रावत क्षत्रिय -
गौत्र - भारद्वाज। प्रवर - तीन - भारद्वाज, वृहस्पति, अंगीरस। वेद -यजुर्वेद। देवी -चण्डी। गौतम वंश की उपशाखा है। इन क्षत्रियों का निवास उन्नाव तथा फ़तेहपुर जिलों में हैं।
उन्नाव जिले में बारा की स्टेट गौतम राजपूतो की है इसके महिपाल सिंह जमिदार थे।।
कोरांव (कड़ा) का दुर्ग भी गौतम राजपूतो द्वारा ही बनवाया गया था।
बौद्ध ग्रंथ महायान के अनुसार मौर्य क्षत्रिय भी शाक्य गौतम क्षत्रियों की एक शाखा है.
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ईस्ट यूपी, बदायूं के आसपास,बिहार व् मध्य प्रदेश के कुछ हिस्सों में गौतम राजपूत बड़ी संख्या में मिलते हैं..
अब बहुत से नीची जाति के लोग भी खुद को बौद्ध धर्मावलम्बी बताकर गौतम सरनेम लगाते हैं जिससे इन इलाको के बाहर के लोग किसी गौतम नामधारी को राजपूत नही बल्कि नीची जाति का समझने की भूल करते हैं
जबकि गौतम टाइटल राजपूत भूमिहार ब्राह्मण तीनो जातियो में मिलते है
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1-बदायूं के गौतम राजपूत अलवर में निकुम्भ राजपूतो के सामन्त थे जो 5 वी सदी के बाद बदायूं क्षेत्र में आए और हूणों को हराकर सत्ता स्थापित की।।।
ये हूण नामक विदेशी हमलावर आज गुज्जर जाती में मिलते हैं मेरठ जिले में 12 गांव हूँण गूजरों के आज भी आबाद हैं....
बदायूं क्षेत्र के गौतम राजपूतों पर स्थानीय पत्रकार श्री बीपी गौतम जी ने रोचक जानकारी दी है, इनके अनुसार
होली से जुड़ी है गौतम राजपूतों की शौर्य गाथा
कण-कण में इतिहास समाया है, पर बदले समय के कारण इतिहास में दर्ज सैकड़ों गौरव गाथाओं पर धूल जम चुकी है। इतिहास के पन्नों पर जमा धूल को साफ कर अतीत में झांका जाये, तो पूर्वजों की शौर्य गाथाओं को जान कर आज भी सीना चौड़ा हो जाता है। गौतम राजपूतों की ऐसी ही एक गौरव गाथा इतिहास के पन्नों में स्वर्ण अक्षरों की तरह चमक रही है, जो होली के अवसर पर अनायास ही याद आ जाती है।
चौथी या पांचवी ईसवी से पहले बदायूं जनपद में गौतम राजपूत नहीं थे। कहा जाता है कि उस दौरान यहां हूणों का शासन था। उस समय राजस्थान में स्थित अलवर के राजा भवानी सिंह जी अपने परिवार के साथ भारत यात्रा पर निकले हुए थे। बताया जाता है कि उस समय के न्योधना व आज के कस्बा इस्लामनगर के पास उस दौरान विशाल वन था। इस वन से राजा भवानी सिंह जी का काफिला निकल रहा था, तभी उनके रथ का पहिया मिट्टी में धंस गया। सेवकों ने रथ निकाला, तब तक शाम हो गयी। इस लिए राजा भवानी सिंह जी ने वन में ही पड़ाव डालने के साथ काफिले को आराम करने का आदेश दे दिया। रात में बीच वन में चहल-पहल और रोशनी देख कर आसपास के क्षेत्र की जनता उत्सुकता के चलते वन में देखने पहुंच गयी, तो जनता को पता चला कि यहां राजा का डेरा पड़ा है।
क्षेत्रीय जनता ने राजा भवानी सिंह जी को अवगत बताया कि इस क्षेत्र में हूणों का शासन है, जो बहुत अत्याचार करते हैं। जनता ने अत्याचार की दास्तां राजा को विस्तार पूर्वक बताई, तो जनता की परेशानी सुनकर राजा ने यात्रा पर आगे जाने का इरादा त्याग दिया और हूणों की शक्ति का आंकलन करने के लिए अपने गुप्तचर क्षेत्र में दौड़ा दिये। राजा भवानी सिंह जी ने रणनीति बना कर होली के अवसर पर रंग वाले दिन आक्रमण कर दिया। हूणों का इस्लामनगर (न्योधना) में किला था, जहां से उनका शासन संचालित होता था, उस भवन में आज पुलिस थाना चल रहा है। कहा जाता है कि कुछ सैनिकों के साथ उनकी पुत्री पड़ाव वाले स्थान पर ही रही और अलग-अलग दिशाओं में राजा ने सेना की टुकडिय़ों के साथ पांच पुत्रों को आक्रमण करने लिये भेजा, साथ ही उन्होंने स्वयं सैनिकों के साथ इस्लामनगर (न्योधना) पर आक्रमण किया।
हूणों के साथ भयंकर युद्ध हुआ और अंत में इस्लामनगर (न्योधना) क्षेत्र में गौतम राजपूतों का राज कायम हो गया, लेकिन एक दु:खद घटना भी घटी। राजा भवानी सिंह जी और उनके बेटे युद्ध कर रहे थे, तभी कुछ हूणों ने डेरे पर हमला बोल दिया, लेकिन मौके पर मौजूद सैनिकों के साथ राजकुमारी ने हूणों के साथ जमकर युद्ध किया और सभी हूणों को मार दिया। कहा जाता है युद्ध में राजकुमारी गंभीर रूप से घायल हो गयीं, जिससे उन्हें बचाया नहीं जा सका। गांव भवानी पुर में राजकुमारी की याद में मंदिर बना हुआ है, जिसे आज सती माता के मंदिर के नाम से जाना जाता है।
गौतम राजपूतों का शासन स्थापित हो जाने के बाद शासक परिवर्तित होते रहे और बाद में गुलामी के बाद प्रजातंत्र तक का सफर तय हुआ, लेकिन इस क्षेत्र में गौतम राजपूतों का दब-दबा आज तक कायम है। इस्लामनगर क्षेत्र में राजनीति की जमीन आज भी गौतम राजपूतों के इशारे पर ही तैयार होती है। इस ब्लाक क्षेत्र में आजादी से अब तक अधिकतम समय गौतम वंशीय ही प्रमुख रहा है,
लश्करपुर ओइया रियासत और शहीद ठाकुर मोती सिंह-----------
बदायूं क्षेत्र में लश्करपुर ओइया गौतम राजपूतो की रियासत थी।
म वंशीय राजपूतों के साथ पूरे क्षेत्र की जनता के बीच स्वर्गीय ठाकुर मोती सिंह का नाम आज भी वंदनीय है, क्योंकि इन्होंने अपने जीवन काल में अंग्रेजों को क्षेत्र में घुसने भी नहीं दिया, पर षड्यंत्र के तहत खत्री वंश के एक स्वयं-भू राजा ने अंग्रेजों से मिल कर फांसी लगवा दी। लश्करपुर ओईया में आज भी उनकी समाधि बनी हुई है, जहां प्रतिदिन सैकड़ों लोग पूजा-अर्चना करते हैं। मुरादाबाद लोकसभा क्षेत्र से सांसद रह चुके चन्द्रविजय सिंह की जड़ें उसी खत्री परिवार से जुड़ी हुई हैं।
कहा जाता है कि लश्करपुर ओईया के राजा के संतान नहीं थी, जिससे उन्होंने खत्री जाति के एक बच्चे को गोद ले लिया था, लेकिन उस खत्री जाति के बच्चे को किसी ने राजा वाला सम्मान नहीं दिया, जिससे वह स्वयं को अपमानित महसूस करता था, तभी ठा. मोती सिंह से ईष्या करता था। खत्री परिवार के गोद लिये हुए स्वयं-भू राजा प्रद्युम्र के भी एक मात्र इन्द्रमोहनी नाम की पुत्री ही जन्मी, जिसका विवाह मुरादाबाद जनपद के राजा का सहसपुर कस्बे में हुआ। इन्द्रमोहनी प्रदेश सरकार में विद्युत मंत्री रह चुकी हैं और चन्द्रविजय सिंह की मां हैं। स्वयं-भू राजा प्रद्युम्र के निधन के बाद लश्करपुर ओईया की संपत्ति इन्द्रामोहनी को ही मिली, लेकिन क्षेत्र में सम्मान न मिलने के कारण लश्करपुर ओईया की समस्त संपत्ति बेच दी, जिससे अब कुछ अवशेष ही बचे हैं।
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सोर्स
लेखक--टीम राजपुताना सोच
गुरुवार, 25 सितंबर 2025
बुधवार, 24 सितंबर 2025
उत्तराखंड की हिमालयी चोटियों से लेकर उत्तर प्रदेश के मैदानी क्षेत्रों तक फैला कत्यूरी राजवंश
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उत्तराखंड की हिमालयी चोटियों से लेकर उत्तर प्रदेश के मैदानी क्षेत्रों तक फैला कत्यूरी राजवंश भारतीय सभ्यता की एक अमूल्य धरोहर है। यह राजवंश, जो लगभग 2500 वर्ष पूर्व से 700 ईस्वी तक सिक्किम से काबुल तक अपने विशाल साम्राज्य का परचम लहराता रहा, अपनी सैन्य शक्ति, प्रशासनिक कुशलता, और सांस्कृतिक योगदान के लिए प्रसिद्ध है। ऐतिहासिक दस्तावेजों, ताम्रपत्रों, और वंशावलियों के आधार पर यह लेख कत्यूरी वंश की गौरवशाली गाथा को प्रस्तुत करता है, जिसमें महुली, हरिहरपुर, अस्कोट, और अन्य शाखाओं का विशेष उल्लेख है। मैं, अखिलेश बहादुर पाल, महसों-हरिहरपुर इस्टेट से, अपने पूर्वजों की इस महान विरासत को आपके सामने ला रहा हूँ।
कत्यूरी राजवंश की उत्पत्ति प्राचीन भारत के सूर्यवंशी क्षत्रियों से मानी जाती है। इतिहासकारों के अनुसार, इस वंश की नींव सम्राट शालिवाहन ने लगभग 3000 वर्ष पूर्व अयोध्या से रखी थी। उनकी प्रारंभिक राजधानी जोशीमठ के निकट थी, जो बाद में कार्तिकेयपुर स्थानांतरित हुई। उस समय उनका साम्राज्य सिक्किम से काबुल तक, जिसमें दिल्ली, रोहिलखंड, और अन्य प्रांत शामिल थे, विस्तृत था। इतिहासकार अलेक्जेंडर कनिंघम ने अपनी पुस्तक में इस विशाल साम्राज्य का उल्लेख किया है।
महाभारत में कत्यूरी क्षेत्र का उल्लेख मिलता है, जहां युधिष्ठिर के राजसूय यज्ञ के दौरान उनके भाइयों—भीम, अर्जुन, नकुल, और सहदेव—ने इस क्षेत्र के क्षत्रियों से युद्ध कर नजराना प्राप्त किया। फारसी इतिहासकार फरिश्ता के अनुसार, कुमाऊँ के राजा पुरु ने दिल्ली पर चढ़ाई कर राजा दिल्लू को हराया और उसे रोहतास किले में बंदी बनाया। कनिंघम के अनुसार, कत्यूरी की राजधानी लखनपुर या ब्रह्मपुर थी, जो रामगंगा नदी के किनारे स्थित थी।
7वीं शताब्दी में चीनी यात्री ह्वेनसांग ने अपनी यात्रा में ब्रह्मपुर और लखनपुर का वर्णन किया, जहां बौद्ध और सनातनी समुदाय सह-अस्तित्व में थे। कत्यूरी शासकों ने अपनी राजधानी जोशीमठ से कार्तिकेयपुर स्थानांतरित की। ह्वेनसांग के अनुसार, गोविषाण (वर्तमान काशीपुर) और ब्रह्मपुर में बौद्ध धर्म का प्रचार था। हालांकि, 8वीं शताब्दी में आदि शंकराचार्य के धार्मिक दिग्विजय ने बौद्ध धर्म के प्रभाव को कम कर सनातन धर्म का पुनरुत्थान किया। शंकराचार्य ने बद्रीनारायण, केदारनाथ, और जागेश्वर मंदिरों में दक्षिण भारत से सनातनी पंडितों को नियुक्त किया।
जोशीमठ का वासुदेव मंदिर, जिसे कत्यूरी सम्राट वासुदेव ने बनवाया, इस वंश की प्राचीनता का प्रमाण है। मंदिर में सम्राट का नाम “श्री वासुदेव गिरिराज चक्र चूड़ामणि” अंकित है, जो उनकी शाही उपाधि को दर्शाता है।
कत्यूरी साम्राज्य का विखंडन
कत्यूरी साम्राज्य अपने चरम पर सिक्किम से काबुल और दक्षिण में बिजनौर, दिल्ली, रोहिलखंड तक फैला था। लेकिन पारिवारिक विवादों और बाहरी आक्रमणों के कारण इसका विखंडन हुआ। इस वंश की शाखाएँ विभिन्न क्षेत्रों में स्थापित हुईं:
अस्कोट (पिथौरागढ़): ब्रह्मदेव के पौत्र अभय पाल ने स्थापित किया।
दोती (नेपाल): कत्यूरी पाल दोती रैंका शाखा।
सुई (काली कुमाऊँ): ब्रह्मदेव की शाखा, जिसके नाम पर ब्रह्मदेव मंडी पड़ा।
बारामंडल, बैजनाथ, द्वाराहाट, और लखनपुर: विभिन्न कत्यूरी घरानों ने यहाँ अपनी संप्रभुता बनाए रखी।
सल्यान और गजोल (नेपाल): निरंजन देव के पुत्र रितु मल देव और उनके वंशजों ने शासन किया।
महुली और हरिहरपुर का उदय
1305 ई. में कुमाऊँ के अस्कोट राजवंश के दो राजकुमार, अलख देव और तिलक देव, एक बड़ी सूर्यवंशी सेना के साथ बस्ती जनपद के महुली आए। अलख देव ने महुली में अपना राज्य स्थापित कर एक दुर्ग बनवाया, जबकि तिलक देव अस्कोट लौट गए। महुली के साथ-साथ अमोढ़ा भी सूर्यवंशी शाखा के रूप में विकसित हुआ, जहां तिलक देव के वंशज कान्हदेव ने कायस्थ जमींदारों को पराजित कर शासन स्थापित किया।
महुली के प्रमुख शासक:
महाराजा अलख देव (1305-1342): महुली के संस्थापक।
राजा तपतेजपाल (1342-1359): दिल्ली सुल्तान फिरोज शाह तुगलक के बंगाल अभियान में सहयोग के बदले ‘राजा’ और ‘पाल’ उपनाम प्राप्त किया।
राजा खान पाल उर्फ ज्ञान पाल (1359-1372)।
राजा कुँवर पाल (1372-1404)।
राजा तेजपाल (1404-1421)।
राजा सततपाल (1421-1441)।
राजा मानपाल (1441-1480): उनके तीन पुत्रों—परशुराम पाल (महसों), जगतबली पाल (जसवल), और संसार पाल (सिकतार)—में राज्य विभाजित हुआ।
राजा परशुराम पाल (1480-1535)।
राजा दीप पाल (1535-1585): उनके दो पुत्र—मर्दन पाल (महसों) और करण पाल (हरिहरपुर)।1607 ई. में उत्तराधिकार विवाद के कारण महुली का विभाजन हुआ। मर्दन पाल को महसों और राजा की उपाधि मिली, जबकि करण पाल को 75 गांवों वाला स्वतंत्र हरिहरपुर राज्य और ‘कुँवर’ व ‘बाबू’ की उपाधियाँ प्राप्त हुईं। 1609 में हरिहरपुर को पूर्ण स्वतंत्र राज्य का दर्जा मिला, जो बाद में 12 कोटों (बेलदुहा, बेलवन, सींकरी, मैनसिर, भक्ता, कोहना आदि) में बँट गया।
हरिहरपुर की वंशावली
हरिहरपुर की स्थापना कुंवर करण पाल देव ने की। उनके वंशजों में प्रमुख नाम:
कुंवर राय कन्हैया बक्स पाल बहादुर: उनके तीन पुत्र—जगत बहादुर पाल, शक्त बहादुर पाल (1857 की क्रांति में शहीद), और नरेंद्र बहादुर पाल।
जगत बहादुर पाल: उनके पुत्र दान बहादुर पाल का विवाह प्रतापगढ़ (बेला स्टेट) से हुआ, जहाँ दहेज में सगरा सुंदरपुर रियासत मिली।
दान बहादुर पाल के वंशज: उनके कोई पुत्र नहीं थे, उनके भाइयों के वंशज—महादेव पाल, हरिहर प्रसाद पाल, भागवत पाल, और बांके पाल।
हरिहर प्रसाद पाल: उनके पुत्र—ज्ञान बहादुर पाल, शीतला बक्स पाल, और चंद्रिका प्रसाद पाल।
ज्ञान बहादुर पाल: उनके पुत्र गजपति प्रसाद पाल, जिनके पुत्र—गगनेंद्र पाल, गर्वमर्दन पाल, योगेंद्र पाल, और धीरेंद्र पाल।
चंद्रिका प्रसाद पाल: उनके पुत्र—राजेंद्र बहादुर पाल (वर्तमान में सक्रिय) और वीरेंद्र बहादुर पाल।
राजेंद्र बहादुर पाल के पुत्र: रवि उदय पाल, अखिलेश बहादुर पाल (लेखक), और अखंड बहादुर पाल।
अन्य शाखाएँ: मैनसिर-सीकरी में रामशंकर पाल, पन्ना पाल; भक्ता-कोहना में भद्रसेन पाल, इंद्रसेन पाल, रंग नारायण पाल (ब्रज भाषा के कवि), सत्यशरण पाल, बृजेश पाल, अदित पाल, गिरजेश पाल, बिमल पाल, विजय पाल, विनय पाल, और राजू पाल।
महसों-महुली के अंतिम राजा काशीनाथ बहादुर पाल थे, जिनके पौत्र कुंवर अंशुमान पाल वर्तमान में राज परिवार में सक्रिय हैं। बाद में बनपुर, अहरा, भितहा, और बुडावल जैसे राज्य गुजारेदारी जमींदारी में परिवर्तित हो गए। हरिहरपुर में राजा की उपाधि नहीं थी; यहाँ प्रशासन कत्यूरी परंपरा के अनुसार कमेटी आधारित था, जिसमें वरिष्ठतम व्यक्ति को अध्यक्ष बनाया जाता था। वर्तमान में कुंवर राजेंद्र बहादुर पाल हरिहरपुर के सबसे वरिष्ठ पाल वंशज हैं।
राजा मानपाल (1674-1710): महसों के तेरहवें राजा मानपाल का जन्म 1641 में और मृत्यु 1710 में हुई। उनके द्वितीय पुत्र लाल जोरावर पाल ने बनपुर में 70 गांव, महुली पश्चिम में रु. 8827 मालगुजारी वाली संपत्ति प्राप्त की, जो पहले राय कन्हैया बक्स पाल बहादुर के पास थी।
अस्कोट शाखा: सूर्यवंशी पाल वंश
1279 ई. में महाराज त्रिलोकपाल देव ने अपने छोटे पुत्र अभय पाल को अस्कोट भेजा, जहाँ उन्होंने पाल सूर्यवंशी स्टेट की स्थापना की। अभय पाल ने ‘देव’ उपनाम हटाकर ‘पाल’ अपनाया, जो उनके वंशज आज भी उपयोग करते हैं। उनके तीन पुत्र—निर्भय पाल, अलख देव, और तिलक देव—थे। अलख देव और तिलक देव 1305 में महुली आए और वहाँ राज्य स्थापित किया। अस्कोट में निर्भय पाल के वंशज आज भी निवास करते हैं, जिनमें डॉ. महेंद्र पाल, उनके भाई जंग बहादुर पाल, अधिवक्ता बहादुर पाल, और गजेंद्र पाल शामिल हैं।
हाल ही में अस्कोट के राजा भानु पाल की पुत्री गायत्री की शादी जोधपुर के महाराज गज सिंह के पुत्र शिवराज सिंह से हुई। अन्य वैवाहिक संबंधों में गजराज सिंह की पत्नी किरन सिंह (कश्मीर के राजा कर्ण सिंह की बहन) और डॉ. पाल की पत्नी मीनू (लखीमपुर खीरी के संघाई स्टेट) शामिल हैं। वर्तमान में अस्कोट के 108वें राजा भानुराज सिंह पाल हैं।
कत्यूरी वंश का सांस्कृतिक और सामाजिक योगदान
कत्यूरी वंश ने शासन के साथ-साथ संस्कृति और धर्म में भी महत्वपूर्ण योगदान दिया। इस वंश के शासक भगवान शिव और विष्णु के उपासक थे। जोशीमठ का वासुदेव मंदिर, ताम्रपत्रों और अभिलेखों में उल्लिखित अन्य मंदिर, और विभिन्न धार्मिक स्थल इस वंश की धार्मिक निष्ठा को दर्शाते हैं। कत्यूरी शासन में द्वैध शासन प्रणाली थी, जिसमें सैन्य और प्रशासनिक शक्तियाँ संतुलित थीं। 1857 की क्रांति में पाल सूर्यवंशियों की भूमिका उल्लेखनीय थी। उत्तर प्रदेश में इन्हें क्षत्रियों में सर्वोच्च वर्ण माना जाता है।
वर्तमान संदर्भ और चुनौतियाँ
आज कत्यूरी पाल वंश के वंशज उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, और नेपाल में फैले हुए हैं, लेकिन वे अपनी सांस्कृतिक और ऐतिहासिक विरासत को संरक्षित रखे हुए हैं। महसों में अमिताभ पाल, हरिहरपुर में कुंवर राजेंद्र बहादुर पाल, और अस्कोट में भानुराज सिंह पाल इस वंश की परंपराओं को जीवित रखे हुए हैं। यद्यपि कत्यूरी साम्राज्य का विस्तार अफगानिस्तान से तिब्बत तक बताया जाता है, लेकिन साक्ष्यों और शोध के अभाव में इसका पूर्ण अध्ययन अभी बाकी है। वंश के लोग ‘पाल’, ‘देव’, ‘मल्ल’, ‘शाह’, और ‘शाही’ जैसे उपनामों का उपयोग करते हैं और पूरे भारत में फैले हैं।
यह लेख कत्यूरी पाल वंश की गौरवशाली गाथा को सामने लाता है और नई पीढ़ी को अपनी जड़ों से जोड़ने की प्रेरणा देता है। यदि आप इस वंश से संबंधित हैं या अधिक जानना चाहते हैं, तो हिमालयन गजेटियर, ताम्रपत्र, और स्थानीय अभिलेखागार आपके लिए उपयोगी होंगे।
मंगलवार, 23 सितंबर 2025
सोमवार, 22 सितंबर 2025
पुरुष की उत्सुकता किसी भी स्त्री में भी,,तभी तक होती है, जब तक वह उसे जीत नहीं लेता
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किसी भी #पुरुष का एक #स्त्री के प्रति #यौ*न आकर्षण,, केवल तब तक #चरम पर रहता है, जब तक वो उसे बिस्तर पर लेटा नहीं देता,, औरत की ठुकाई होने के बाद,, मर्द का लगाव खत्म हो जाता है,,,दुसरी ओर पुरुष की उत्सुकता किसी भी स्त्री में भी,,तभी तक होती है, जब तक वह उसे जीत नहीं लेती,,,जीतने के बाद ही उसकी उत्सुकता समाप्त हो जाती है। स्त्री को जीतते ही फिर कोई रस नहीं रह जाता। नीत्शे ने कहा है कि पुरुष का गहरे से गहरा रस एक मात्र विजय है। कामवासना भी उतनी गहरी विजय नहीं है। कामवासना सिर्फ़ विजय का एक क्षेत्र है। बस इसलिए पत्नी में उत्सुकता समाप्त हो जाती है। क्योंकि वह जीती जा चुकी होती है। उसने कोई अब जीतने को बाकी कुछ भी नहीं रहा है। इसलिए जो बुद्धिमान पत्नियां है, वे सदा इस भांति जीएंगी की पति के साथ जीतने को कुछ बाकी बना रहे है। नहीं तो पुरुष का कोई रस सीधे स्त्री में नहीं है। अगर कुछ अभी जीतने को बाकी है तो उसका रस होगा। अगर सब जीता जा चुका है तो उसका रस खो जाएगा। तब कभी कभी ऐसा भी घटित होता है कि अपनी सुंदर पत्नी को छोड़कर वह एक साधारण सी स्त्री में भी उत्सुक् हो सकता है। और तब लोगो को बड़ी हैरानी होती है कि यह उत्सुकता सिर्फ पागलपन की है। इतनी सुंदर उसकी पत्नी है और फिर भी वह नौकरानी के पीछे दीवाना है, पर आप इस स्थिति को समझ नहीं पा रहे है। क्योंकि नौकरानी अभी जीती जा सकती है , पत्नी जीती जा चुकी है। सुंदर और असुंदर बहुत मौलिक नहीं है। स्त्री की सुंदरता का पुरुष कुछ समय तक ही वशीभूत रहता है यह कह सकते है कि पुरुष स्त्री के समीप रहते रहते सुंदरता को भूल जाता है और अन्य स्त्री की तरफ मोहित हो जाता है। इसलिए पुरुष का मानना है कि जितनी कठिनाई होगी जीत में, उतना पुरुष का रस गहन, लालाहित और इच्छापूर्ति योग्य होगा। जबकि स्त्री की स्थिति बिल्कुल और ( विपरीत ) है। जितना पुरुष मिला हुआ हो, जितना उसे अपना मालूम पड़े, पर जितनी दूरी कम हो गई हो, उतनी ही वह ज्यादा लीन हो सकेगी। स्त्री इसलिए पत्नी होने में उत्सुक होती है, प्रेयसी होने में उत्सुक नहीं होती। पुरुष प्रेमी होने में उत्सुक होता है , पति होना उसकी मजबूरी सी है। स्त्री का यह जो संतुलित भाव है_विजय की आकांक्षा नहीं है_ यह ज्यादा मौलिक स्थिति है। क्योंकि असुंतलन हमेशा संतुलन के बाद की स्थिति है। संतुलन प्रकृति का स्वभाव है। इसलिए हमने पुरुषों को पुरुष कहा है। और स्त्री को प्रकृति कहा है।
प्रकृति का मतलब है कि जैसी स्थिति होनी चाहिए स्वभावत
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रविवार, 21 सितंबर 2025
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बुधवार, 10 सितंबर 2025
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सोमवार, 8 सितंबर 2025
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मंगलवार, 2 सितंबर 2025
सोमवार, 1 सितंबर 2025
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