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मंगलवार, 20 जनवरी 2026

Budget 2026: वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण से किसानों को क्या है उम्मीद

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Budget 2026: उम्मीद है कि कृषि बजट 2025-26 के 1.37 लाख करोड़ रुपये से बढ़कर लगभग 1.5 लाख करोड़ रुपये हो जाएगा। इसमें पीएम-किसान, प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना और पीएम कृषि सिंचाई योजना के तहत सिंचाई योजनाओं के लिए अधिक धनराशि शामिल हो सकती है।

source https://www.livehindustan.com/business/budget-2026-what-are-farmers-expecting-from-finance-minister-nirmala-sitharaman-201768896854383.html

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सोमवार, 19 जनवरी 2026

Budget Expectations: क्या इस बजट में बढ़ेगी पीएम किसान सम्मान निधि की राशि

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Budget Expectations Farmers: वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण 1 फरवरी को आम बजट पेश करने वाली हैं। ऐसे में देशभर के किसानों को उनसे बड़ी उम्मीदें हैं। यह उम्मीद पीएम किसान की सहायता राशि को 6000 रुपये से बढ़कार 9000 रुपये सालाना करने को लेकर है।

source https://www.livehindustan.com/business/budget-expectations-will-the-amount-of-pm-kisan-samman-nidhi-be-increased-in-this-budget-2026-201768812016268.html

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बुधवार, 29 अक्टूबर 2025

खेत से विदेश तक: जैविक खेती ने बदली किसानों की किस्मत | FPO Success Story

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Keywords: जैविक खेती, किसान उत्पादक संगठन, FPO, जैविक भिंडी, कृषि निर्यात, देसी बीज संरक्षण, किसानों की आमदनी, जैविक खाद उत्पादन, दुबई निर्यात, भारतीय कृषि सफलता

भारत की कृषि तेजी से बदल रही है। अब किसान केवल अनाज पैदा नहीं करते, बल्कि वैश्विक बाजारों में अपनी पहचान बना रहे हैं। इसी बदलाव की शानदार मिसाल है भारत का एक FPO (किसान उत्पादक संगठन) जिसने जैविक खेती के दम पर 613 किसानों की आय को दोगुना कर दिया है और दुबई तक निर्यात कर रहा है।

FPO: किसानों के लिए मालिकाना भविष्य

यह संगठन किसानों को एक साथ जोड़कर:

• उत्पादन
• पैकेजिंग
• निर्यात
• बाज़ार मूल्य निर्धारण

सब कुछ किसानों के नाम से कर रहा है।
सबसे अच्छी बात यह कि किसानों को बाजार से दोगुना भाव मिल रहा है।

अब बिचौलिया नहीं, किसान ही मालिक!

 जैविक खेती का चमत्कार

इस एफपीओ का मुख्य फोकस है Organic Farming:

• मिट्टी की उर्वरता बढ़ाना
• रसायनों से छुटकारा
• सुरक्षित और पौष्टिक भोजन

सबसे बड़ी कामयाबी है जैविक भिंडी का निर्यात।
विशेष रूप से राधिका भिंडी की अंतरराष्ट्रीय मांग है।

दुबई में चमकी भारतीय भिंडी

जब फसल जैविक तरीके से उगाई जाती है,
तो उसका मूल्य कई गुना बढ़ जाता है।

इस एफपीओ की भिंडी दुबई के बाजार में पहुँच रही है।
विदेशी उपभोक्ता भारत की जैविक सब्जियों को
Premium Quality के रूप में पहचानते हैं।

देसी किस्मों के संरक्षण का महाअभियान

यह संगठन न केवल व्यापार कर रहा है
बल्कि भारत की धरती की विरासत को बचा रहा है।

संरक्षित की गई दुर्लभ किस्में:

• देसी अंबा अदरक
• कुसुम करेला
• राधिका भिंडी
विष्णु भोग चावल (सुंगधित और पारंपरिक किस्म)

इन्होंने PPBFR के साथ 232 देसी बीज किस्में संरक्षित की हैं
जो जैव विविधता के लिए बहुत बड़ा योगदान है।

जैविक खाद: मांग इतनी कि सप्लाई कम!

जैविक खेती बढ़ने के साथ Organic Manure की मांग भी आसमान छू रही है।

एफपीओ के पास ऑर्डर ज्यादा और उत्पादन कम पड़ रहा है।
यह संकेत है कि किसान अब
जहर-मुक्त खेती की ओर लौट रहे हैं।

किसानों की आय दोगुनी कैसे हुई?

आमदनी बढ़ने के तीन प्रमुख कारण:

  1. सीधे निर्यात — बिना बिचौलिया

  2. जैविक खेती — उच्च कीमत

  3. देसी किस्म — ब्रांड वैल्यू

यह मॉडल भारत के अन्य किसानों के लिए
रेडी-टू-कॉपि सफलता मंत्र साबित हो रहा है।

भारत की नई कृषि पहचान

पहलू पुरानी तस्वीर नई तस्वीर
खेती रसायनिक, लागत ज्यादा जैविक, मुनाफा ज्यादा
बिक्री बिचौलिया आधारित किसान सीधे बाजार से जुड़े
पहचान स्थानीय अंतरराष्ट्रीय

किसानों ने अब दुनिया भर के उपभोक्ताओं के साथ सीधा रिश्ता बना लिया है।

निष्कर्ष

जैविक खेती किसानों की असली उन्नति का मार्

FPO कृषि व्यापार की नई शक्ति
भारत की देसी किस्में वापस शान से लौटीं
छोटे किसान भी अब बन रहे हैं वैश्विक ब्रांड

इन 613 किसानों की कहानी यह साबित करती है कि
अगर इच्छाशक्ति और सही मॉडल मिले
तो भारतीय किसान खेत से दुनिया तक इतिहास लिख सकते 


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कानपुर के छुपे मंदिर और उनका प्राचीन इतिहास

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कानपुर को  उद्योग और शिक्षा के शहर के रूप में जाना जाता है, लेकिन इस धरती पर इतिहास के कई ऐसे रहस्य छिपे हैं जिनके बारे में बहुत कम लोग जानते हैं। यहाँ कई अति प्राचीन मंदिर मौजूद हैं, जिनका संबंध हिंदू सभ्यता के शुरुआती काल से माना जाता है 

मानसून का संदेशवाहक: कानपुर के पास स्थित चमत्कारी प्राचीन मंदिर की अनोखी कहानी

उत्तर प्रदेश के कानपुर शहर से लगभग 40 किलोमीटर दूर, घाटमपुर तहसील के पास बसा है एक छोटा-सा गांव — **बेटा**। गांव शांत है, प्रकृति से घिरा है, लेकिन इसकी पहचान बेहद असाधारण है। यहां मौजूद है एक **प्राचीन जगन्नाथ मंदिर**, जो न केवल आस्था का केंद्र है, बल्कि **मानसून की भविष्यवाणी** में भी चमत्कारी माना जाता है।

स्थानीय लोगों के अनुसार, यह मंदिर कभी झूठ नहीं बोलता। वर्षा कब आएगी, हल्की होगी या तेज, इसका संकेत मंदिर के **गुंबद पर लगे एक रहस्यमयी पत्थर** से मिलता है। लोगों का कहना है कि इस शक्ति ने कई बार वैज्ञानिकों को भी हैरान किया है।

 रहस्यमयी पत्थर जो बताता है आसमान का हाल

मंदिर के गुंबद पर जड़ा यह प्राचीन पत्थर बिल्कुल सामान्य नहीं है। इसकी विशेषता मानसून के मौसम में जीवंत हो उठती है।

कैसे करता है भविष्यवाणी?

1. समुद्र की सांस महसूस करता है
   जैसे ही समुद्र में मानसून बनना शुरू होता है, वैसे ही यह पत्थर पसीजने लगता है। अचानक टप-टप करते बूंदों का गिरना शुरू हो जाता है।

2. समय की सटीक पकड़
   कई बार अखबारों और मौसम विभाग से पहले यह मंदिर अपना संकेत दे देता है। जब-जब यह पत्थर टपका है, वर्षा ने देर नहीं लगाई।

3. बूंदों का भविष्य
   पत्थर की बूंदें सिर्फ पानी नहीं, बल्कि **संदेश** होती हैं:
   • अगर *हल्की बूंदाबांदी* हो — मौसम नरम रहेगा, बारिश हल्की होगी
   • अगर *बड़ी और तेज बूंदें* टपके — तैयार रहें, बारिश झमाझम होगी

4. **बारिश रुकते ही मौन**
   जैसे ही वर्षा का मौसम समाप्त होता है, पत्थर फिर शांत। न बूंद, न नमी… मानो उसने अपना कार्य पूरा कर लिया हो।

 विज्ञान के सामने पहेली

इस मंदिर की खास बात यह है कि समुद्र तो दूर-दूर तक नहीं है। फिर यह पत्थर कैसे मानसून की गतिविधियों को इतनी दूर से महसूस कर लेता है?

कुछ विशेषज्ञों ने माना कि इसमें **मैग्नेटिक या भू-ऊर्जा** से जुड़ी कोई क्षमता हो सकती है, जो वातावरण में होने वाले परिवर्तनों को पकड़ लेती है।

वैज्ञानिकों ने यहां शोध किया, यंत्र लगाए, लेकिन रहस्य आज भी आधा-छिपा, आधा-खुला है। शायद यही इसकी जादूभरी खूबसूरती है।

मंदिर की प्राचीन महिमा

पुजारियों और किवदंतियों के अनुसार, यह मंदिर साधारण नहीं, **इतिहास की गहराइयों** में जड़ें जमाए है। कई लोग इसे:

• लगभग **4200 ईसा पूर्व** का
• **सिंधु घाटी सभ्यता** से जुड़े प्रतीकों वाला

मानते हैं। इसकी संरचना और पत्थर उस समय के ज्ञान और ऊर्जा को दर्शाते हैं, जिसकी आज की दुनिया भी तलाश में है।

 स्थानीय लोगों की आस्था

गांव वाले कहते हैं:
“मंदिर टपका तो समझो बरसात आने ही वाली है।”

मानसून यूपी की धड़कन है। किसान इसी उम्मीद पर बीज डालते हैं, धरती मुस्कुराने को तैयार रहती है। इसलिए मंदिर का हर टपका हुआ कण उनके लिए पानी नहीं, **उम्मीद** होता है।

निष्कर्ष

यह मंदिर सिर्फ पत्थरों और दीवारों का ढांचा नहीं है।
यह **आस्था, प्रकृति और इतिहास का संगम** है।
मानव की जिज्ञासा और देवत्व के रहस्य का संयुक्त रूप है।

हो सकता है विज्ञान एक दिन इसका राज़ पूरी तरह खोल दे।
लेकिन जब तक वह होता है, यह मंदिर मानसून का पहला संदेश
आस्था की भाषा में 

बालाजी विश्वनाथ मंदिर, बिहटा बुजुर्ग, कानपुर नगर


 बालाजी विश्वनाथ मंदिर कानपुर का इतिहास

यह मंदिर कानपुर नगर के बिहटा बुजुर्ग क्षेत्र में स्थित है। स्थानीय मान्यताओं के अनुसार यह मंदिर बहुत प्राचीन है और इसका स्वरूप व स्थापत्य शैली इसे विशेष बनाते हैं।

यहाँ स्थापित बालाजी विश्वनाथ का स्वरूप साधारण मंदिरों से बिल्कुल अलग दिखाई देता है। कुछ शोधकर्ताओं का मानना है कि यह मंदिर प्राचीन भारतीय सभ्यता, संभवतः सिंधु घाटी से प्रेरित कला शैली का प्रमाण हो सकता है।


 मंदिर की मुख्य विशेषताएँ

विशेषता विवरण
स्थान बिहटा बुजुर्ग, कानपुर नगर
प्रमुख देवता बालाजी विश्वनाथ
विशेषता अद्भुत प्राचीन चिन्ह और संरचना
मान्यता प्राचीन सभ्यता से संबंध होने की संभावना

यहाँ मिले कुछ विशेष अभिलेख और चिन्ह आज भी शोधकर्ताओं के लिए आकर्षण का विषय बने हुए हैं।


 क्यों है यह मंदिर अनोखा?

• मंदिर में दिखाई देने वाले चिन्ह, मूर्तियाँ व आकृतियाँ सामान्य शैली से अलग हैं
• पिछली सभ्यताओं से जुड़ाव के स्थानीय प्रमाण मिलते हैं
• कम प्रसिद्ध होने के बावजूद आस्था का प्रमुख केंद्र है

यह मंदिर भारतीय संस्कृति की अनवरत धरोहर को समझने के लिए एक महत्वपूर्ण स्थान है।


 कैसे पहुँचे?

कानपुर शहर से यहाँ पहुँचना आसान है।
नजदीकी प्रमुख स्थान:
कानपुर सेंट्रल रेलवे स्टेशन
किसी भी स्थानीय माध्यम से बिहटा बुजुर्ग पहुँच सकते हैं


 निष्कर्ष

यदि आप इतिहास, पुरातत्व और भारतीय सभ्यता के रहस्यों में रुचि रखते हैं, तो बालाजी विश्वनाथ मंदिर आपके लिए एक महत्वपूर्ण शोध और यात्रा स्थल बन सकता है।
यह मंदिर बताता है कि कानपुर सिर्फ एक शहर नहीं बल्कि आस्था और प्राचीन संस्कृति का जीवंत 

  • कानपुर के प्राचीन मंदिर

  • बालाजी विश्वनाथ मंदिर कानपुर

  • बिहटा बुजुर्ग कानपुर इतिहास

  • Kanpur Hidden Temples

  • कानपुर धार्मिक स्थल



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कत्यूरी राजवंश की कई शाखाएं केंद्रीय सत्ता के कमजोर होने के कारण उभरीं

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 उत्तराखंड के इस महत्वपूर्ण राजवंश की उत्पत्ति, राजधानियों (जैसे बैजनाथ), और अभिलेखीय साक्ष्यों (ताम्रपत्र और मूर्ति लेख) पर चर्चा है। राजवंश के भीतर मौजूद विभिन्न क्षेत्रीय शाखाओं जैसे अस्कोट, पाली पछाऊं और सिरा केवल का उल्लेख करते हुए उनके संस्थापक राजाओं और उनके शासनकाल की प्रमुख घटनाओं का वर्णन करता है। वक्ता ऐतिहासिक स्रोतों की कमी के कारण जागरणों (स्थानीय लोक कथाओं) और पुरातात्विक साक्ष्यों के बीच समानता स्थापित करने की चुनौती पर भी प्रकाश डालता है, और वीडियो में कत्यूरी स्थापत्य शैली और राजाओं के क्रूर शासन को राजवंश के पतन का कारण बताया गया है।

विभिन्न कत्यूरी शाखाओं के बीच अंतर्संबंध, स्वतंत्रता और समकालीन सत्ता संघर्ष कैसे थे?

 कत्यूरी राजवंश के पतन और बाद की सत्ता संरचना को समझने के लिए विभिन्न शाखाओं के बीच के अंतर्संबंध, स्वतंत्रता की घोषणा, और उनके समकालीन संघर्षों को जानना आवश्यक है।

आपके स्रोतों के आधार पर, विभिन्न कत्यूरी शाखाओं के बीच अंतर्संबंध, स्वतंत्रता और सत्ता संघर्ष निम्नलिखित रूप से परिभाषित किए जा सकते हैं:

I. शाखाओं का उद्भव और अंतर्संबंध (Formation and Interrelationships)

मूल रूप से, कत्यूरी राजवंश की कई शाखाएं केंद्रीय सत्ता के कमजोर होने के कारण उभरीं, जो शुरू में प्रशासनिक इकाइयाँ थीं और बाद में स्वतंत्र हो गईं।

1. मूल केंद्र और राज्यपाल: कत्यूरियों का मूल स्थान बैजनाथ (कत्यूर घाटी) था। पहले के समय में, जेष्ठाधिकार की परंपरा के कारण (जहाँ सबसे बड़ा बेटा राजा बनता था), छोटे राजकुमारों को छोटे-छोटे क्षेत्रों का राज्यपाल (गवर्नर) बना दिया जाता था।

2. केंद्रीय सत्ता की कमजोरी: जब बैजनाथ की मूल शाखा कमजोर हो गई (केंद्र कमजोर हुआ), तो इन राज्यपालों और स्थानीय शासकों ने स्वयं को स्वतंत्र कर लिया।

3. प्रमुख शाखाएँ: ज्ञात शाखाओं में बैजनत्था, अस्कोट, ड्यूटी, दानपुर, पाली पछाऊं (द्वाराहाट), बारामंडल और शिरा शामिल थीं। अस्कोट शाखा भी बैजनाथ की मूल शाखा के अधीन ही थी, क्योंकि उन्हें पूजा आदि के लिए हमेशा बैजनाथ जाना पड़ता था।

4. समांतर सत्ता: महत्वपूर्ण बात यह है कि सभी कत्यूरी शासक एक ही क्रम में समाप्त नहीं हुए। कुछ कत्यूरी शाखाएं ऐसी भी थीं जो चंद शासकों के समांतर (parallel) अंत तक चलीं, यहाँ तक कि आज तक चली आ रही हैं

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सिंधु सभ्यता का जीवंत बालाजी विश्वनाथ मंदि

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सिंधु घाटी सभ्यता


सिंधु सभ्यता का जीवंत बालाजी विश्वनाथ मंदिर

स्थान: बिहटा बुजुर्ग, कानपुर नगर, उत्तर प्रदेश

भारत की प्राचीनता सदियों की धूल में छिपे रहस्यों से भरी है। उन्हीं रहस्यों के बीच चमकता है बिहटा बुजुर्ग का बालाजी विश्वनाथ मंदिर, जिसे कई शोधकर्ता सिंधु घाटी सभ्यता काल से जोड़ने की संभावना व्यक्त करते हैं। खास बात यह है कि यह मंदिर आज भी जीवित पूजा स्थल है, इसलिए इसे भारत का सबसे प्राचीन जीवंत मंदिर होने का दावा किया जाता है!

 यह क्यों इतना अनोखा है?

वीडियो स्रोत के अनुसार कुछ प्रमुख तर्क दिए जाते हैं—

पशुपति नाथ शैली की मूर्ति

  • शिव की मूर्ति में वैसी ही आकृति दिखाई देती है जैसी मोहनजोदड़ो की सीलों पर प्रसिद्ध “पशुपति योगी” में मिलती है

12 स्तंभों वाला प्राचीन वास्तु

  • यह शैली कई अन्य प्राचीन संरचनाओं से संबंध का संकेत देती है

  • मान्यता है कि यह स्थान प्राचीन तीर्थ मार्गों का केंद्र रहा होगा

सरस्वती नदी के बहाव के संकेत

  • शोधों में इस क्षेत्र से सरस्वती नदी की शाखाओं के प्रमाण मिलने की बात कही गई है

  • यानी यह भूमि कभी नदी संस्कृति का प्रमुख केंद्र रही होगी

अर्ध-सूर्य चिह्न और कलाकृतियाँ

  • मंदिर की दीवारों पर उकेरे गए प्रतीक इसे

    • गुप्त काल

    • कुषाण काल

    • राजा हर्षवर्धन के समय
      तक की निरंतरता से जोड़ते हैं

आक्रांताओं से चमत्कारिक बचाव

  • कहा जाता है कि यह मंदिर झाड़ियों से ढँक जाने के कारण
    मुगल काल की विनाश लीला से बच गया
    जैसे इतिहास ने स्वयं इसे संरक्षित कर लिया


 क्यों दावा किया जाता है कि यह महाभारत काल से भी प्राचीन है?

  • इसके प्रतीकों में वैदिक और सिंधुकालीन कला दोनों की झलक

  • सदियों तक पूजा परंपरा का निरंतर जीवित रहना

  • प्राचीन धर्म और सभ्यता के मिलन का अद्वितीय संगम




 निष्कर्ष

यह मंदिर सिर्फ पत्थरों का ढेर नहीं
एक अनवरत जलती लौ है
जो बताती है कि सनातन संस्कृति ने समय को हराकर
अपने अस्तित्व को जीवित रखा है!

सभ्यता बदली, राजवंश मिटते गए
पर बिहटा बुजुर्ग का बालाजी विश्वनाथ मंदिर
अब भी अपनी प्राचीनता का गीत गाता है…



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कार्तिकेयपुर राजवंश: कुमाऊँ का शौर्य और स्वर्णिम धरोहर

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कार्तिकेयपुर राजवंश: कुमाऊँ का शौर्य और स्वर्णिम धरोहर

भारत की पर्वतमाला हिमालय के मध्य भाग में फैला उत्तराखंड केवल प्राकृतिक सौंदर्य का भंडार नहीं, इतिहास के अनगिनत रत्न भी यहीं छिपे हैं। इन्हीं रत्नों में से एक है कार्तिकेयपुर राजवंश, जिसे कत्युरी राजवंश भी कहा जाता है।

यह वंश कुमाऊँ का सबसे प्राचीन और शक्तिशाली शासक वंश माना जाता है। कहा जाता है कि इस वंश का नाम भगवान शिव के पुत्र कार्तिकेय (कुमार) के नाम पर पड़ा, इसलिए यह वंश स्वयं को सूर्यवंशी और शिव-भक्त मानता था।


कालखंड और विस्तार

प्रमुख अवधि राज्य का विस्तार
लगभग 7वीं शताब्दी से 11वीं शताब्दी कुमाऊँ, कुमाऊँ से आगे नेपाल के पश्चिमी भाग तक

कत्युरी शासकों ने अपनी राजधानी बागेश्वर क्षेत्र में बसे कार्तिकेयपुर (कत्यूर घाटी) में स्थापित की।
उनका साम्राज्य आज के:

  • उत्तराखंड का कुमाऊँ क्षेत्र

  • नेपाल के कंचनपुर, डोटी, बैतड़ी आदि

  • गढ़वाल के कुछ हिस्सों
    तक फैला हुआ था।


प्रमुख राजा

राजा का नाम विशेषता
कात्युरेश्वर / शालिवाहन वंश के प्रारंभिक शक्तिशाली शासक
निहस पाल, कर्चलदेव साम्राज्य विस्तार
बृहत्पाल कला और मंदिर निर्माण का स्वर्णकाल
अभयपाल कत्युरियों का अंतिम बड़ा शासक

बाद में यह वंश अनेक छोटी शाखाओं में विभाजित हुआ और छोटी-छोटी रियासतों के रूप में जारी रहा, जैसे:

  • अस्कोट के राजवंश

  • दानपुर के राजवंश

  • डोटी के राजा (नेपाल)


कत्युरियों का स्थापत्य और संस्कृति

यह वंश मंदिर निर्माण कला का बड़ा संरक्षक रहा।
उनकी शैली को कत्युरी शैली कहा जाता है।

प्रमुख मंदिर

  • बैजनाथ मंदिर परिसर, बागेश्वर

  • कटारमल सूर्य मंदिर, अल्मोड़ा

  • बग्नाथ मंदिर, बागेश्वर

  • भुवनेश्वर महादेव, पिथौरागढ़

इन मंदिरों में पत्थर की महीन नक्काशी, शिलालेख और गरुड़ प्रतिमाएं कत्युरी स्थापत्य की पहचान हैं।


⚔️ राज्य के पतन का कारण

11वीं शताब्दी के बाद राजवंश में आंतरिक कलह बढ़ी, साम्राज्य विभाजित हुआ और समय के साथ चंद वंश मजबूत होकर कुमाऊँ का अधिपति बन गया।

यद्यपि शासन समाप्त हुआ, पर वंश की विभिन्न शाखाएँ आज भी:

  • उत्तराखंड के कुमाऊँ क्षेत्र

  • नेपाल के पश्चिमी जिलों
    में क्षत्रिय परंपरा के रूप में जानी जाती हैं।


वंशगत पहचान

कत्युरी स्वयं को

  • सूर्यवंशी क्षत्रिय

  • भगवान शिव एवं सूर्य उपासक
    के रूप में मानते रहे हैं।

गोत्र और कुलदेव विशेष शाखाओं के अनुसार बदलते हैं, क्योंकि वंश विभाजित होकर अनेक परिवारों में फैल गया।

 निष्कर्ष

कार्तिकेयपुर या कत्युरी राजवंश पर्वतीय भारत का गौरव है।
इनके द्वारा स्थापित मंदिर-संस्कृति आज भी जीवित है और हर पत्थर अपने भव्य अतीत की कहानी सुनाता है।

हिमालय की गोद में जन्मा यह वंश भले ही सत्ता से विदा हुआ, पर इतिहास ने इन्हें सदैव के लिए अमर कर दिया।


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