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गुरुवार, 25 मई 2023

Vatsyayana's Kama Sutra

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Vatsyayana, an ancient Indian scholar, is known for his work called the Kama Sutra. The Kama Sutra is an ancient Indian text that provides insights into the art of living and the pursuit of pleasure. While it is often associated with sexual positions, the Kama Sutra encompasses a broader range of topics related to relationships, love, and human behavior.


Here are some key aspects of Vatsyayana's work, the Kama Sutra:


Relationships and Love: Vatsyayana discusses the various types of relationships, including marriage, courtesans, and extramarital affairs. He emphasizes the importance of mutual respect, understanding, and emotional connection in relationships.


Sexual Pleasure: The Kama Sutra explores different sexual techniques, positions, and acts. However, it's important to note that the Kama Sutra is not merely a manual of sexual positions but also a guide to achieving pleasure and intimacy through communication, foreplay, and understanding.


Seduction and Attraction: Vatsyayana delves into the art of seduction and provides guidance on how to attract and win over a partner. He discusses the importance of physical appearance, grooming, and personal charm.


Marriage and Household Management: The Kama Sutra provides advice on choosing a suitable life partner, maintaining a happy and fulfilling marriage, and managing the affairs of a household. It discusses topics like the duties of a wife, the role of a husband, and the importance of fidelity.


Social Norms and Ethics: Vatsyayana touches upon social norms, ethics, and moral conduct. He emphasizes the importance of conducting oneself with integrity, honesty, and respect for others.


Arts and Sciences: The Kama Sutra also explores various arts and sciences, including music, dance, painting, and cooking. It acknowledges the role of aesthetics and creativity in enhancing sensual experiences.


It's worth noting that the Kama Sutra is more than just a guide to sexual practices. It offers a comprehensive view of human relationships, intimacy, and personal fulfillment. Vatsyayana's work aims to provide guidance for individuals seeking to lead a balanced and enjoyable life in both the physical and emotional realms.










Vatsyayana, an ancient Indian scholar, is known for his work called the Kama Sutra. The Kama Sutra is an ancient Indian text that provides insights into the art of living and the pursuit of pleasure. While it is often associated with sexual positions, the Kama Sutra encompasses a broader range of topics related to relationships, love, and human behavior.


Here are some key aspects of Vatsyayana's work, the Kama Sutra:


Relationships and Love: Vatsyayana discusses the various types of relationships, including marriage, courtesans, and extramarital affairs. He emphasizes the importance of mutual respect, understanding, and emotional connection in relationships.


Sexual Pleasure: The Kama Sutra explores different sexual techniques, positions, and acts. However, it's important to note that the Kama Sutra is not merely a manual of sexual positions but also a guide to achieving pleasure and intimacy through communication, foreplay, and understanding.


Seduction and Attraction: Vatsyayana delves into the art of seduction and provides guidance on how to attract and win over a partner. He discusses the importance of physical appearance, grooming, and personal charm.


Marriage and Household Management: The Kama Sutra provides advice on choosing a suitable life partner, maintaining a happy and fulfilling marriage, and managing the affairs of a household. It discusses topics like the duties of a wife, the role of a husband, and the importance of fidelity.


Social Norms and Ethics: Vatsyayana touches upon social norms, ethics, and moral conduct. He emphasizes the importance of conducting oneself with integrity, honesty, and respect for others.


Arts and Sciences: The Kama Sutra also explores various arts and sciences, including music, dance, painting, and cooking. It acknowledges the role of aesthetics and creativity in enhancing sensual experiences.


It's worth noting that the Kama Sutra is more than just a guide to sexual practices. It offers a comprehensive view of human relationships, intimacy, and personal fulfillment. Vatsyayana's work aims to provide guidance for individuals seeking to lead a balanced and enjoyable life in both the physical and emotional realms..

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शनिवार, 9 जुलाई 2022

विश्व की प्रथम वायुयान आधारित प्रेक्षणशाला 'सोफिया' द्वारा प्रथम खगोलिकी प्रेक्षण

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दूरबीन को एक 747 जम्बो जेट वायुयान के अंदर लगाया गया। दूरबीनों को पृथ्वी तथा अंतरिक्ष में स्थापित करके अनेक खगोलिकी प्रेक्षण किए जा चुके हैं। खगोलिकी की समतामंडल प्रेक्षणशाला-सोफिया (स्ट्रैटोस्फेयरिक ऑब्जर्वेटरी फॉर इंफ्रारेड एस्ट्रोनॉमी) प्रथम प्रेक्षणशाला है जिसके अंतर्गत 2.5 मीटर दर्पण व्यास वाली एक है तथा इसके द्वारा प्रथम खगोलिकी प्रेक्षण 26 मई 2010 को किया सोफिया गया । प्रेक्षणशाला अमेरिकी अंतरिक्ष संस्था 'नासा' और जर्मन एरोस्पेस सेंटर की संयुक्त परियोजना है। 'नासा' के अंतरिक्ष भौतिकी विभाग के निदेशक जॉन मोर्स के अनुसार


प्रोसेसिंग कर रहे हैं। इस उड़ान के साथ सोफिया को 20 वर्ष की खगोलिकी यात्रा प्रारंभ हती है जिसके अंतर्गत यह उन दुर्लभ ३ खगोलिकी प्रेक्षणों को संपन्न करनी जो मू और अंतरिक्ष आधारित दूरबीनों के द्वारा संभव नहीं हैं। वैज्ञानिक सोफिया द्वारा प्राप्त प्रथम खगोलिकी डेटा के आधार पर इसका नाम दिया गया है sabhar aviskar  # latest #aajtak.in #amarujala # space #American science 

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शुक्रवार, 8 जुलाई 2022

ब्रह्मांड विज्ञान

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 ब्रह्मांड विज्ञान अभी नहीं जानता कि 23 प्रतिशत पदार्थ का रंग रूप क्या है और शेष 73 प्रतिशत किस प्रकार की ऊर्जा है, अर्थात् विज्ञान अभी ब्रह्मांड का निर्माण करने वाले पदार्थ तथा अपदार्थ (ऊर्जा) का मात्र 4 प्रतिशत ही जानता है। इस घोर अज्ञान के लिए 'विज्ञान' को कोई खेद प्रकट करने की आवश्यकता नहीं है। क्योंकि इस ‘अज्ञान' का जानना भी एक बहुत बड़ी उपलब्धि है।


ब्रह्मांड विज्ञान ने हमें ज्ञान दिया है कि ब्रह्मांड का उद्भव 13.7 अरब वर्ष पहले हुआ था, कि उसका विकास किस तरह हुआ, अर्थात् किस तरह ग्रह, तारे, मंदाकिनियां, मंदाकिनियों के समूह और किस तरह इन समूहों की चादरें निर्मित हुई; कि ब्रह्मांड में पदार्थ इतनी दूर-दूर क्यों हैं; कि पदार्थ और प्रति पदार्थ का निर्माण हुआ था किंतु अब हमारे देखने में केवल पदार्थ ही है; कि दिक और काल निरपेक्ष नहीं वरन् वेग के सापेक्ष हैं कि वे चार आयामों में गुंथे हुए हैं; कि दिक का वेग के साथ संकुचन होता है और काल का विस्फारण; कि ब्रह्मांड की दशा स्थाई नहीं है वरन् उसका प्रसार हो रहा है और वह भी त्वरण के साथ; कि एक और 'जगत' है जो हमें दिखता नहीं है *


जिसका यहां छोटा सा प्रतिनिधित्व करने वाला नमूना दिया है (इसमें भी काफी कुछ छूट गया है)। इतना जानने के बाद ही तो पदार्थ और ऊर्जा के अदृश्य होने का बोध हमें हुआ है और भी बहुत बड़े-बड़े प्रश्न हमारे सामने हैं। जैसे पदार्थ में द्रव्यमान कैसे आता है?; प्रति-पदार्थ का क्या हुआ?; क्या दिक के तीन से अधिक आयाम हैं?; ब्रह्मांड का भविष्य क्या है? आदि-आदि ।


यदि हम गौर करें तब यह बड़े या गंभीर प्रश्न ही तो आने वाली क्रांति की सूचना देते हैं । विज्ञान में तो अज्ञान का स्वागत होता है। यदि एक रूपक में कहूं तब ज्ञान विज्ञान की प्रगति के लिए दो पैर आवश्यक हैं, एक अज्ञान का पैर तथा दूसरा ज्ञान का पैर । विद्युत चुंबकीय तरंगों के अस्तित्व की भविष्यवाणी करने वाले जेम्स मैक्स्वैल ने कहा था : "सोचा विचारा अज्ञान विज्ञान में अदभुत विकास के लिए जमीन तैयार करता है।"


- अदृश्य पदार्थ क्या केवल कल्पना है या इसके कुछ ठोस प्रमाण भी है? अदृश्य पदार्थ की संकल्पना का जन्म मंदाकिनी समूहों के बीच गुरुत्वाकर्षण बल तथा अपकेंद्री बल के असंतुलन का संतुलन करने के लिए


की गुरुत्वाकर्षण निकट नहीं कर नियत कक्षा में प जो अपकेंद्री बल से उत्पन्न होता का संतुलन कर परिक्रमा हमारा सेकंड के वेग अपनी मंदाकिनीचारों ओर लगान पिंड अपनी कक्ष अर्थात् उन पर तथा उनके अप यदि ऐसा संतुलन तो आएगी। इस समाधान हेतु अ की गई है।


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रविवार, 3 जुलाई 2022

रोनाल्डो हेनरी निक्सनकृष्ण को छोटा भाई कहते थे

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 एक थे रोनाल्डो हेनरी निक्सन. इंग्लैंड निवासी अंग्रेज थे और मात्र 18 वर्ष की उम्र में प्रथम जर्मनी युद्ध में उन्होंने बड़े अफसर के रूप में भाग लिया था. नरसंहार से इतने व्यथित हुए कि सेना छोड़ दी. घूमते हुए एक दिन कैंब्रिज विश्वविद्यालय में पहुंच गये, यहाँ उन्हें सनातन, वेदांत, ईश्वर और महात्मा बुद्ध के बारे में जानकारी मिली तो, भारत आ गए. भारत में टहलते हुए ब्रज आ गये और फिर यहाँ आकर कृष्ण के दिवाने हो गये. कृष्ण को छोटा भाई कहते थे



एक दिन उन्होंने हलवा बनाकर भोग लगाया. पर्दा हटा कर देखा तो, कटोरी में छोटी-छोटी अँगुलियों के निशान थे, जिन्हें देख कर वे आश्चर्य चकित हो कर  रोने लगे कि उन्हें शायद इतना प्रेम करते हैं कि भोग खाने बाल स्वरूप में ही स्वयं आते हैं..


निक्सन कृष्ण को प्रतिदिन भोजन करा कर और सुला कर ही स्वयं सोते थे. कहते हैं कि सर्दियों के मौसम में निक्सन कुटिया के बाहर सो रहे थे तभी, मध्य रात्रि को उन्हें लगा कोई आवाज दे रहा है  .. हो दादा ... हो दादा ... वे उठकर अंदर गये. देखा तो, कोई नहीं दिखा. भ्रम समझ कर पलटे तभी, फिर आवाज सुनाई दी ..ईस बार साफ थी . हो दादा ... हो दादा ... पर्दा हटा कर देखा तो, कृष्ण को रजाई ओढ़ाना भूल गए थे उस दिन. वे कृष्ण के पास बैठ गए और बड़े प्यार से बोले आपको भी सर्दी लगती है क्या? निक्सन का इतना कहना था कि कृष्ण की प्रतिमा की आँखों से आंसुओं की धारा बहती  महसूस हुई. फिर उनके साथ निक्सन भी फफक-फफक कर रोने लगे और रोते-रोते अचेत हो गये. शून्य में विलीन हो गये. पंचतत्व में मिल गये. 


जिसने ब्रज में आकर ही कृष्ण का नाम सुना था, वह कृष्ण का हो गया और कृष्ण उसके हो गये.


 हम कृष्ण के साथ पैदा होते हैं, उनके साथ जीते हैं पर, उनके लिए मरते नहीं. अपने स्वार्थ में लिपट कर मर जाते हैं. 


हम क्यों आये थे, यह पता ही नहीं चल पाता ...


जय श्री कृष्ण...


साभार... soniya Singh Facebook wall

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बुधवार, 29 जून 2022

कहानी राजा भरथरी (भर्तृहरि) की

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उज्जैन में  भरथरी  की गुफा स्थित है।  इसके संबंध में यह माना जाता है कि यहां भरथरी ने तपस्या की थी। यह गुफा शहर से बाहर एक सुनसान इलाके में है।  गुफा के पास ही शिप्रा नदी बह रही है। 


गुफा के अंदर जाने का रास्ता काफी छोटा है। जब हम इस गुफा के अंदर जाते हैं तो सांस लेने में भी कठिनाई महसूस होती है। गुफा की ऊंचाई भी काफी कम है, अत: अंदर जाते समय काफी सावधानी रखनी होती है।  यहाँ पर एक गुफा और है जो कि पहली गुफा से छोटी है। यह  गोपीचन्द कि गुफा है जो कि भरथरी का भतीजा था।


यहां प्रकाश भी काफी कम है, अंदर रोशनी के लिए बल्ब लगे हुए हैं। इसके बावजूद गुफा में अंधेरा दिखाई देता है। यदि किसी व्यक्ति को डर लगता है तो उसे गुफा के अंदर अकेले जाने में भी डर लगेगा।


 यहां की छत बड़े-बड़े पत्थरों के सहारे टिकी हुई है। गुफा के अंत में राजा भर्तृहरि की प्रतिमा है और उस प्रतिमा के पास ही एक और गुफा का रास्ता है। इस दूसरी गुफा के विषय में ऐसा माना जाता है कि यहां से चारों धामों का रास्ता है। गुफा में भर्तृहरि की प्रतिमा के सामने एक धुनी भी है, जिसकी राख हमेशा गर्म ही रहती है।


गौर से देखने पर आपको गुफा के अंत में एक गुप्त रास्ता दिखाई देगा जिसके बारे में कहा जाता है कि यहाँ से चारो धामों को रास्ता जाता है।


पत्नी के धोखे से आहत राजा भरथरी के साधू बनने कि कहानी :-


उज्जैन को उज्जयिनी के नाम से भी जाना जाता था। उज्जयिनी शहर के परम प्रतापी राजा हुए थे विक्रमादित्य। विक्रमादित्य के पिता महाराज गंधर्वसेन थे और उनकी दो पत्नियां थीं। एक पत्नी के पुत्र विक्रमादित्य और दूसरी पत्नी के पुत्र थे भर्तृहरि। 


गंधर्वसेन के बाद उज्जैन का राजपाठ भर्तृहरि को प्राप्त हुआ, क्योंकि भरथरी विक्रमादित्य से बड़े थे। राजा भर्तृहरि धर्म और नीतिशास्त्र के ज्ञाता थे। प्रचलित कथाओं के अनुसार भरथरी की दो पत्नियां थीं, लेकिन फिर भी उन्होंने तीसरा विवाह किया पिंगला से।  पिंगला बहुत सुंदर थीं और इसी वजह से भरथरी तीसरी पत्नी पर अत्यधिक मोहित हो गए थे।


कथाओं के अनुसार भरथरी अपनी तीसरी पत्नी पिंगला पर काफी मोहित थे और वे उस पर अंधा विश्वास करते थे। राजा पत्नी मोह में अपने कर्तव्यों को भी भूल गए थे। उस समय उज्जैन में एक तपस्वी गुरु गोरखनाथ का आगमन हुआ।


 गोरखनाथ राजा के दरबार में पहुंचे। भरथरी ने गोरखनाथ का उचित आदर-सत्कार किया। इससे तपस्वी गुरु अति प्रसन्न हुए। प्रसन्न होकर गोरखनाथ ने राजा एक फल दिया और कहा कि यह खाने से वह सदैव जवान बने रहेंगे, कभी बुढ़ापा नहीं आएगा, सदैव सुंदरता बनी रहेगी।


यह चमत्कारी फल देकर गोरखनाथ वहां से चले गए। राजा ने फल लेकर सोचा कि उन्हें जवानी और सुंदरता की क्या आवश्यकता है। चूंकि राजा अपनी तीसरी पत्नी पर अत्यधिक मोहित थे, अत: उन्होंने सोचा कि यदि यह फल पिंगला खा लेगी तो वह सदैव सुंदर और जवान बनी रहेगी। 


यह सोचकर राजा ने पिंगला को वह फल दे दिया। रानी पिंगला भर्तृहरि पर नहीं बल्कि उसके राज्य के कोतवाल पर मोहित थी। यह बात राजा नहीं जानते थे। जब राजा ने वह चमत्कारी फल रानी को दिया तो रानी ने सोचा कि यह फल यदि कोतवाल खाएगा तो वह लंबे समय तक उसकी इच्छाओं की पूर्ति कर सकेगा। 


रानी ने यह सोचकर चमत्कारी फल कोतवाल को दे दिया। वह कोतवाल एक वैश्या से प्रेम करता था और उसने चमत्कारी फल उसे दे दिया। ताकि वैश्या सदैव जवान और सुंदर बनी रहे। 


वैश्या ने फल पाकर सोचा कि यदि वह जवान और सुंदर बनी रहेगी तो उसे यह गंदा काम हमेशा करना पड़ेगा। नर्क समान जीवन से मुक्ति नहीं मिलेगी। इस फल की सबसे ज्यादा जरूरत हमारे राजा को है। राजा हमेशा जवान रहेगा तो लंबे समय तक प्रजा को सभी सुख-सुविधाएं देता रहेगा। यह सोचकर उसने चमत्कारी फल राजा को दे दिया। राजा वह फल देखकर हतप्रभ रह गए।


राजा ने वैश्या से पूछा कि यह फल उसे कहा से प्राप्त हुआ। वैश्या ने बताया कि यह फल उसे कोतवाल ने दिया है। भरथरी ने तुरंत कोतवाल को बुलवा लिया। सख्ती से पूछने पर कोतवाल ने बताया कि यह फल उसे रानी पिंगला ने दिया है। 


जब भरथरी को पूरी सच्चाई मालूम हुई तो वह समझ गया कि पिंगला उसे धोखा दे रही है। पत्नी के धोखे से भरथरी के मन में वैराग्य जाग गया और वे अपना संपूर्ण राज्य विक्रमादित्य को सौंपकर उज्जैन की एक गुफा में आ गए। इसी गुफा में भरथरी ने 12  वर्षों तक तपस्या की थी।


राजा भरथरी की कठोर तपस्या से देवराज इंद्र भयभीत हो गए। इंद्र ने सोचा की भरथरी वरदान पाकर स्वर्ग पर आक्रमण करेंगे। यह सोचकर इंद्र ने भरथरी पर एक विशाल पत्थर गिरा दिया। तपस्या में बैठे भरथरी ने उस पत्थर को एक हाथ से रोक लिया और तपस्या में बैठे रहे। 


इसी प्रकार कई वर्षों तक तपस्या करने से उस पत्थर पर भरथरी के पंजे का निशान बन गया। यह निशान आज भी भरथरी की गुफा में राजा की प्रतिमा के ऊपर वाले पत्थर पर दिखाई देता है। यह पंजे का निशान काफी बड़ा है, जिसे देखकर सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है कि राजा भरथरी की कद-काठी कितनी विशालकाय रही होगी।


भरथरी ने वैराग्य पर वैराग्य शतक की रचना की, जो कि काफी प्रसिद्ध है। इसके साथ ही भरथरी ने श्रृंगार शतक और नीति शतक की भी रचना की। यह तीनों ही शतक आज भी उपलब्ध हैं और पढ़ने योग्य है।


उज्जैन के राजा भरथरी के पास 365 पाकशास्त्री यानि रसोइए थे, जो राजा और उसके परिवार और अतिथियों के लिए भोजन बनाने के लिए। एक रसोइए को वर्ष में केवल एक ही बार भोजन बनाने का मोका मिलता था। लेकिन इस दौरान भरथरी जब गुरु गोरखनाथ जी के चरणों में चले गये तो भिक्षा मांगकर खाने लगे  थे।


एक बार गुरु गोरखनाथजी ने अपने शिष्यों से कहा, ‘देखो, राजा होकर भी इसने काम, क्रोध, लोभ तथा अहंकार को जीत लिया है और दृढ़निश्चयी है।‘ शिष्यों ने कहा, ‘गुरुजी ! ये तो राजाधिराज हैं, इनके यहां 365 तो बावर्ची रहते थे। 


ऐसे भोग विलास के वातावरण में से आए हुए राजा और कैसे काम, क्रोध, लोभ रहित हो गए?’ 


गुरु गोरखनाथ जी ने राजा भरथरी से कहा, ‘भरथरी! जाओ, भंडारे के लिए जंगल से लकड़ियां ले आओ।’ राजा भरथरी नंगे पैर गए, जंगल से लकड़ियां एकत्रित करके सिर पर बोझ उठाकर ला रहे थे। 


गोरखनाथ जी ने दूसरे शिष्यों से कहा, ‘जाओ, उसको ऐसा धक्का मारो कि बोझ गिर जाए।‘ चेले गए और ऐसा धक्का मारा कि बोझ गिर गया और भरथरी गिर गए। भरथरी ने बोझ उठाया, लेकिन न चेहरे पर शिकन, न आंखों में आग के गोले, न होंठ फड़के। गुरु जी ने चेलों से क, ‘देखा! भरथरी ने क्रोध को जीत लिया है।’


शिष्य बोले, ‘गुरुजी! अभी तो और भी परीक्षा लेनी चाहिए।’ थोड़ा सा आगे जाते ही गुरुजी ने योगशक्ति से एक महल रच दिया। गोरखनाथ जी भरथरी को महल दिखा रहे थे। युवतियां नाना प्रकार के व्यंजन आदि से सेवक उनका आदर सत्कार करने लगे। भरथरी युवतियों को देखकर कामी भी नहीं हुए और उनके नखरों पर क्रोधित भी नहीं हुए, चलते ही गए।


गोरखनाथजी ने शिष्यों को कहा, अब तो तुम लोगों को विश्वास हो ही गया है कि भरथरी े काम, क्रोध, लोभ आदि को जीत लिया है।


 शिष्यों ने कहा, गुरुदेव एक परीक्षा और लीजिए। गोरखनाथजी ने कहा, अच्छा भरथरी  हमारा शिष्य बनने के लिए परीक्षा से गुजरना पड़ता है। जाओ, तुमको एक महीना मरुभूमि में नंगे पैर पैदल यात्रा करनी होगी।’


 भरथरी अपने  निर्दिष्ट मार्ग पर चल पड़े। पहाड़ी इलाका लांघते-लांघते राजस्थान  की मरुभूमि में पहुंचे। धधकती बालू, कड़ाके की धूप मरुभूमि में पैर रखो तो बस जल जाए। एक दिन, दो दिन यात्रा करते-करते छः दिन बीत गए।


 सातवें दिन गुरु गोरखनाथजी अदृश्य शक्ति से अपने प्रिय चेलों को भी साथ लेकर वहां पहुंचे। गोरखनाथ जी बोले, ‘देखो, यह भरथरी जा रहा है। मैं अभी योगबल से वृक्ष खड़ा कर देता हूं। वृक्ष की छाया में भी नहीं बैठेगा।’ अचानक वृक्ष खड़ा कर दिया। चलते-चलते भरथरी का पैर वृक्ष की छाया पर आ गया तो ऐसे उछल पड़े, मानो अंगारों पर पैर पड़ गया हो।


‘मरुभूमि में वृक्ष कैसे आ गया?  छायावाले वृक्ष के नीचे पैर कैसे आ गया? गुरु जी की आज्ञा थी मरुभूमि में यात्रा करने की।’ कूदकर दूर हट गए। गुरु जी प्रसन्न हो गए कि देखो! कैसे गुरु की आज्ञा मानता है। जिसने कभी पैर गलीचे से नीचे नहीं रखा, वह मरुभूमि में चलते-चलते पेड़ की छाया का स्पर्श होने से अंगारे जैसा एहसास करता है।’


 गोरखनाथ जी दिल में चेले की दृढ़ता पर बड़े खुश हुए, लेकिन और शिष्यों के मन में ईर्ष्या थी। शिष्य बोले, ‘गुरुजी! यह तो ठीक है लेकिन अभी तो परीक्षा पूरी नहीं हुई।’ गोरखनाथ जी (रूप बदल कर) भर्तृहरि से मिले और बोले, ‘जरा छाया का उपयोग कर लो।’ भरथरी बोले, ‘नहीं, मेरे गुरुजी की आज्ञा है कि नंगे पैर मरुभूमि में चलूं।’


 गोरखनाथ जी ने सोचा, ‘अच्छा! कितना चलते हो देखते हैं।’ थोड़ा आगे गए तो गोरखनाथ जी ने योगबल से कांटे पैदा कर दिए। ऐसी कंटीली झाड़ी कि कंथा (फटे-पुराने कपड़ों को जोड़कर बनाया हुआ वस्त्र) फट गया। पैरों में शूल चुभने लगे, फिर भी भरथरी ने ‘आह’ तक नहीं की।


 भरथरी तो और अंतर्मुख हो गए, ’यह सब सपना है, गुरु जी ने जो आदेश दिया है, वही तपस्या है। यह भी गुरुजी की कृपा है’।


अंतिम परीक्षा के लिए गुरु गोरखनाथ जी ने अपने योगबल से प्रबल ताप पैदा किया। प्यास के मारे भरथरी के प्राण कंठ तक आ गये। तभी गोरखनाथ जी ने उनके अत्यन्त समीप एक हरा-भरा वृक्ष खड़ा कर दिया, जिसके नीचे पानी से भरी सुराही और सोने की प्याली रखी थी।


 एक बार तो भर्तृहरि ने उसकी ओर देखा पर तुरंत ख्याल आया कि कहीं गुरु आज्ञा भंग तो नहीं हो रही है। उनका इतना सोचना ही हुआ कि सामने से गोरखनाथ आते दिखाई दिए।


 भरथरी ने दंडवत प्रणाम किया। गुरुजी बोले, ”शाबाश भरथरी, वर मांग लो। अष्टसिद्धि दे दूं, नवनिधि दे दूं। तुमने सुंदर-सुंदर व्यंजन ठुकरा दिए, युवतियां तुम्हारे चरण पखारने के लिए तैयार थीं, लेकिन तुम उनके चक्कर में नहीं आए। तुम्हें जो मांगना है, वो मांग लो। 


भर्तृहरि बोले, ‘गुरुजी! बस आप प्रसन्न हैं, मुझे सब कुछ मिल गया। शिष्य के लिए गुरु की प्रसन्नता सब कुछ है। आप मुझसे संतुष्ट हुए, मेरे करोड़ों पुण्यकर्म और यज्ञ, तप सब सफल हो गए।’ गोरखनाथ बोले, ‘नहीं भरथरी! अनादर मत करो। तुम्हें कुछ-न-कुछ तो लेना ही पड़ेगा, कुछ-न-कुछ मांगना ही पड़ेगा।’ इतने में रेती में एक चमचमाती हुई सूई दिखाई दी। उसे उठाकर भरथरी बोले, ‘गुरुजी! कंठा फट गया है, सूई में यह धागा पिरो दीजिए ताकि मैं अपना कंठा सी लूं।’


गोरखनाथ जी और खुश हुए कि ’हद हो गई! कितना निरपेक्ष है, अष्टसिद्धि-नवनिधियां कुछ नहीं चाहिए। मैंने कहा कुछ मांगो, तो बोलता है कि सूई में जरा धागा डाल दो। गुरु का वचन रख लिया। कोई अपेक्षा नहीं? भर्तृहरि तुम धन्य हो गए! कहां उज्जयिनी का सम्राट नंगे पैर मरुभूमि में। एक महीना भी नहीं होने दिया, सात-आठ दिन में ही परीक्षा से उत्तीर्ण हो गए।’

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शनिवार, 25 जून 2022

श्री होयसलेश्व मन्दिर, हलेबीदु, कर्नाटक

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 सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड जिनकी शक्ति से संचालित है उन देवाधिदेव महादेव का अद्वितीय मन्दिर,



होयसल साम्राज्य के राजा विष्णुवर्धन द्वारा एक मानव निर्मित कृत्रिम झील के किनारे होयसलेश्व मन्दिर का निर्माण १२ वीं सदी में करवाया गया था।


श्री होयसलेश्व मन्दिर भगवान शिव को समर्पित है।


श्री होयसलेश्व मन्दिर का निर्माण soapstone पत्थरों से किया गया है।


इस मन्दिर का कोई भी एक फीट स्थान कलाकृतियों से रहित नहीं है।


कितना श्रमसाध्य रहा होगा यह कार्य जिन्हें सनातनी शिल्पकारों ने अपने निपुण हाथों से सम्भव किये हैं।


इस दिव्य कला को शुक्रवारी ने कलाकारों के हाथों को काटकर और पुस्तकालयों को जलाकर लुप्त कर दिया।


जो कुछ शेष कला बचा उसे इतवारियों ने ग्रँथ चौर्य कर निर्लज्जता से अपने नाम करवा लिया।


अद्भुत सनातन धरोहर!!


जय सनातन धर्म🙏🚩


जय महाकाल🔱🚩

#प्रेमझा. Sabhar soniya Singh Facebook wall


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शुक्रवार, 24 जून 2022

शिखा बन्धन (चोटी) रखने का महत्त्व

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 #अच्छे काम के लिए सिर्फ #सलाह दी जाती है #दबाव नहीं


#शिखा_बन्धन (#चोटी) रखने का महत्त्व

शिखा का महत्त्व विदेशी जान गए हिन्दू भूल गए।

हिन्दू धर्म का छोटे से छोटा सिध्दांत, छोटी-से-छोटी बात भी अपनी जगह पूर्ण और कल्याणकारी हैं। छोटी सी शिखा अर्थात् चोटी भी कल्याण, विकास का साधन बनकर अपनी पूर्णता व आवश्यकता को दर्शाती हैं। शिखा का त्याग करना मानो अपने कल्याणका त्याग करना हैं। जैसे घङी के छोटे पुर्जे कीजगह बडा पुर्जा काम नहीं कर सकता क्योंकि भले वह छोटा हैं परन्तु उसकी अपनी महत्ता है। 


शिखा न रखने से हम जिस लाभ से वंचित रह जाते हैं, उसकी पूर्ति अन्य किसी साधन से नहीं हो सकती।


'हरिवंश पुराण' में एक कथा आती है हैहय व तालजंघ वंश के राजाओं ने शक, यवन, काम्बोज पारद आदि राजाओं को साथ लेकर राजा बाहू का राज्य छीन लिया। राजा बाहु अपनी पत्नी के साथ वन में चला गया। वहाँ राजा की मृत्यु हो गयी। महर्षिऔर्व ने उसकी गर्भवती पत्नी की रक्षा की और उसे अपने आश्रम में ले आये। वहाँ उसने एक पुत्र को जन्म दिया, जो आगे चलकर राजा सगर के नाम से प्रसिद्ध हुआ। राजासगर ने महर्षि और्व से शस्त्र और शास्त्र विद्या सीखीं। समय पाकर राजा सगरने हैहयों को मार डाला और फिर शक, यवन, काम्बोज, पारद, आदि राजाओं को भी मारने का निश्चय किया। ये शक, यवन आदि राजा महर्षि वसिष्ठ की शरण में चले गये। महर्षि वसिष्ठ ने उन्हें कुछ शर्तों पर उन्हें अभयदान दे दिया। और सगर को आज्ञा दी कि वे उनको न मारे। राजा सगर अपनी प्रतिज्ञा भी नहीं छोङ सकते थे और महर्षि वसिष्ठ जी की आज्ञा भी नहीं टाल सकते थे। अत: उन्होंने उन राजाओं का सिर शिखा सहित मुँडवाकर उनकों छोङ दिया। 


प्राचीन काल में किसीकी शिखा काट देना मृत्युदण्ड के समान माना जाता था। बङे दुख की बात हैं कि आज हिन्दु लोग अपने हाथों से अपनी शिखा काट रहे है। यह गुलामी की पहचान हैं। 

    

शिखा हिन्दुत्व की पहचान हैं। यह आपके धर्म और संस्कृतिकी रक्षक हैं। शिखा के विशेष महत्व के कारण ही हिन्दुओं ने यवन शासन के दौरान अपनी शिखा की रक्षा के लिए सिर कटवा दिये पर शिखा नहीं कटवायी।


डा॰ हाय्वमन कहते है ''मैने कई वर्ष भारत में रहकर भारतीय संस्कृति का अध्ययन किया हैं, यहाँ के निवासी बहुत काल से चोटी रखते हैं , जिसका वर्णन वेदों में भी मिलता हैं। दक्षिण भारत में तो आधे सिर पर 'गोखुर' के समान चोटी रखते हैं । उनकी बुध्दि की विलक्षणता देखकर मैं अत्यंत प्रभावित हुआ हुँ। अवश्य ही बौध्दिक विकास में चोटी बड़ी सहायता देती हैं। सिर पर चोटी रखना बढा लाभदायक हैं। मेरा तो हिन्दु धर्म में अगाध विश्वास हैं और मैं चोटी रखने का कायल हो गया हूँ । 


"प्रसिद्ध वैज्ञानिक डा॰ आई॰ ई क्लार्क एम॰ डी ने कहा हैं " मैंने जबसे इस विज्ञान की खोज की हैं तब से मुझे विश्वास हो गया हैं कि हिन्दुओं का हर एक नियम विज्ञान से परिपूर्ण हैं। चोटी रखना हिन्दू धर्म ही नहीं, सुषुम्ना के केद्रों की रक्षा के लिये ऋषि-मुनियों की खोज का विलक्षण चमत्कार हैं।


"इसी प्रकार पाश्चात्य विद्वान मि॰ अर्ल थामस लिखते हैं की "सुषुम्ना की रक्षा हिन्दु लोग चोटी रखकर करते हैं जबकि अन्य देशों में लोग सिर पर लम्बे बाल रखकर या हैट पहनकर करते हैं। इन सब में चोटी रखना सबसे लाभकारी हैं। किसी भी प्रकार से सुषुम्ना की रक्षा करना जरुरी हैं।


"वास्तव में मानव-शरीर को प्रकृति ने इतना सबल बनाया हैं की वह बड़े से बड़े आघात को भी सहन करके रह जाता हैं परन्तु शरीर में कुछ ऐसे भी स्थान हैं जिन पर आघात होने से मनुष्य की तत्काल मृत्यु हो सकती हैं। इन्हें मर्म-स्थान कहाजाता हैं। 


शिखा के अधोभाग में भी मर्म-स्थान होता हैं, जिसके लिये सुश्रुताचार्य ने लिखा है मस्तकाभ्यन्तरोपरिष्टात् शिरासन्धि सन्निपातो।


रोमावर्तोऽधिपतिस्तत्रपि सद्यो मरणम्।

अर्थात् मस्तक के भीतर ऊपर जहाँ बालों का आवर्त(भँवर) होता हैं, वहाँ संपूर्ण नाङियों व संधियों का मेल हैं, उसे 'अधिपतिमर्म' कहा जाता हैं। यहाँ चोट लगने से तत्काल मृत्यु हो जाती हैं(सुश्रुत संहिता शारीरस्थानम् : ६.२८)


सुषुम्ना के मूल स्थान को 'मस्तुलिंग' कहते हैं। मस्तिष्क के साथ ज्ञानेन्द्रियों कान, नाक, जीभ, आँख आदि का संबंध हैं और कामेन्द्रियों - हाथ, पैर, गुदा, इन्द्रिय आदि का संबंध मस्तुलिंग से हैं मस्तिष्क व मस्तुलिंग जितने सामर्थ्यवान होते हैं उतनी ही ज्ञानेन्द्रियों और कामेन्द्रियों - की शक्ति बढती हैं। मस्तिष्क ठंडक चाहता हैं और मस्तुलिंग गर्मी मस्तिष्क को ठंडक पहुँचाने के लिये क्षौर कर्म करवाना और मस्तुलिंग को गर्मी पहुँचाने के लिये गोखुरके परिमाण के बाल रखना आवश्यक होता है।


बालकुचालक हैं, अत: चोटी के लम्बे बाल बाहर की अनावश्यक गर्मी या ठंडक से मस्तुलिंग की रक्षा करते हैं। 


#शिखा_रखने_के_अन्य_लाभ

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१ शिखा रखने तथा इसके नियमों का यथावत् पालन करने से सद्‌बुद्धि , सद्‌विचारादि की प्राप्ति होती हैं।


२ आत्मशक्ति प्रबल बनती हैं।


३ मनुष्य धार्मिक , सात्विक व संयमी बना रहता हैं।


४ लौकिक - पारलौकिक कार्यों मे सफलता मिलती हैं।


५सभी देवी देवता मनुष्य की रक्षा करते हैं।


६ सुषुम्ना रक्षा से मनुष्य स्वस्थ, बलिष्ठ, तेजस्वी और दीर्घायु होता हैं।


७ नेत्र्ज्योति सुरक्षित रहती हैं।


इस प्रकार धार्मिक, सांस्कृतिक, वैज्ञानिक सभी दृष्टियों से शिखा की महत्ता स्पष्ट होती हैं। परंतु आज हिन्दू लोग पाश्चात्योंके चक्कर में पड़कर फैशनेबल दिखने की होड़ में शिखा नहीं रखते व अपने ही हाथों अपनी संस्कृति का त्याग कर डालते हैं।


लोग हँसी उड़ाये, पागल कहे तो सब सह लो पर धर्म का त्याग मत करो। मनुष्य मात्र का कल्याण चाहने वाली अपनी हिन्दू संस्कृति नष्ट हो रही हैं। हिन्दु स्वयं ही अपनी संस्कृति का नाश करेगा तो रक्षा कौन करेगा।


वेद में भी शिखा रखने का विधान कई स्थानों पर मिलता है,देखिये।


शिखिभ्यः स्वाहा (अथर्ववेद १९-२२-१५)


अर्थ👉 चोटी धारण करने वालों का कल्याण हो।


यशसेश्रियै शिखा।-(यजु० १९-९२)

अर्थ 👉 यश और लक्ष्मी की प्राप्ति के लिए सिर पर शिखा धारण करें।


याज्ञिकैंगौर्दांणि मार्जनि गोक्षुर्वच्च शिखा। (यजुर्वेदीय कठशाखा)


अर्थात्👉  सिर पर यज्ञाधिकार प्राप्त को गौ के खुर के बराबर(गाय के जन्में बछड़े के खुर के बराबर) स्थान में चोटी रखनी चाहिये।


केशानां शेष करणं शिखास्थापनं।

केश शेष करणम् इति मंगल हेतोः ।।


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