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मंगलवार, 18 फ़रवरी 2025

चयन के द्वारा उद्विकास:अल्फ्रेड रसेल का योगदान

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 हम सभी ने चार्ल्स रॉबर्ट डार्विन का नाम सुना है। उनके "प्राकृतिक चयन के द्वारा उद्विकास" के सिद्धांत को भी हम जानते हैं। हम उनकी यात्राओं के बारे में भी जानते हैं जो उन्होंने "बीगल" जहाज से की थीं।


लेकिन क्या आप अल्फ्रेड रसेल वॉलेस के बारे में जानते हैं?


उससे भी बड़ा सवाल ये है कि अल्फ्रेड वॉलेस के बारे में क्यों जानना चाहिए?


चलिए पता करते हैं।


अल्फ्रेड वॉलेस का जन्म वेल्स के मोनमथशायर में 1823 में हुआ था। बचपन से ही प्रकृति प्रेमी वॉलेस को घूमने फिरने का बहुत शौक था। बड़े होकर वह एक प्रकृति विज्ञानी बन गये और यात्राएं करने लगे। खासतौर पर अमेज़ॉन के वर्षा वनों और मलय द्वीप समूहों की उनकी यात्राएं बहुत फलदायी रहीं।


फलदायी इसलिये क्योंकि इन्हीं जगहों पर उन्होंने जीव जंतुओं व वनस्पतियों का विस्तृत अवलोकन व अध्ययन किया था।


यह 19वीं सदी के मध्य की बात है। मलय द्वीपसमूह के टापूओं में सालों तक वॉलेस जंगलों, पहाड़ों, नदी नालों की खाक छान रहे थे। तरह तरह के खतरों, जहरीले सांपों, कीड़े मकोड़ों, हिंसक जानवरों, बीमारियों का सामना करते हुए वह लगातार अपना खोज अभियान चला रहे थे। इस तरह काफ़ी वर्षों तक अपने कठिन परिश्रम के बाद वह एक नतीजे पर पहुंचे। उन्होंने एक खास पैटर्न नोट किया कि जैव प्रजातियां स्थिर और शाश्वत नहीं हैं। अलग अलग द्वीपों और परिवेशों में रहने वाली प्रजातियों में अंतर होता है।


"लेकिन ऐसा क्यों हो रहा है?", वॉलेस ने सोचा।


वॉलेस का निष्कर्ष था कि जीवित रहने का संघर्ष व संसाधनों के लिये प्रतियोगिता जैव प्रजातियों के उद्विकास की प्रेरक शक्तियाँ हैं। जिस जीव के पास उस वातावरण में रहने व प्रतियोगिता करने लायक गुण हैं, उसके जिंदा रहने की सम्भावना सबसे अधिक है। वही जीव अपने गुण आने वाली पीढ़ियों में भी भेजेगा। इस तरह से नयी प्रजातियों का विकास होता है।


इस तरह अपने अध्ययन व अनुभवों का समाहार करते हुए वॉलेस एक क्रांतिकारी नतीजे तक पहुंचे : प्राकृतिक चयन के द्वारा उद्विकास...!


लेकिन एक मिनट! यह सिद्धांत तो महान डार्विन की देन है।


तो हुआ यूँ कि 1858 में मलय द्वीप समूह में वॉलेस ने प्राकृतिक चयन के अपने इस नये सिद्धांत की रुपरेखा को एक निबंध की शक्ल में लिखा और इसे एक शख़्स के पास भेज दिया। इस शख़्स को वॉलेस अपना आदर्श मानते थे। क्योंकि यह शख़्स भी पिछले 20 साल से उद्विकास पर काम कर था। आप समझ गये होंगे कि यह शख़्स कौन था? बिलकुल सही। यह शख़्स थे चार्ल्स डार्विन।


डार्विन ने जब वॉलेस का पत्र पढ़ा तो वह हैरान रह गये। बिलकुल इन्हीं नतीजों पर तो डार्विन भी अपने बीस साल के अनुभवों के बाद पहुंचे थे। वॉलेस भी स्वतंत्र रूप से उसी निष्कर्ष तक पहुँच गये थे।


इस पत्र ने डार्विन को प्रेरित किया कि यह बिलकुल सही समय है अपनी थियरी को दुनिया के सामने लाने का। डार्विन के एक साथी वैज्ञानिक थे चार्ल्स लियेल। डार्विन और लियेल ने डार्विन के अभी तक अप्रकाशित लेखन के साथ ही वॉलेस के निबंध को भी पूरे क्रेडिट के साथ लंदन की लिनियन सोसाइटी के आगे प्रस्तुत किया। इस घटना को "Joint Reading" या फिर "लिनियन सोसाइटी की 1858 की मीटिंग" के नाम से जाना जाता है।


इस जॉइंट प्रेजेंटेशन के बाद 1859 में डार्विन ने अपनी सबसे प्रसिद्ध किताब "On the Origin of Species" प्रकाशित करवायी। इस किताब में प्राकृतिक चयन के द्वारा उद्विकास के सिद्धांत को विस्तार से समझाया गया है।


इसके बाद वॉलेस भी कुछ हद तक प्रसिद्ध तो हुए लेकिन उतने नहीं जितने डार्विन थे। हालांकि दोनों एक दूसरे का सम्मान जीवन पर्यन्त करते रहे और पत्राचार के माध्यम से एक दूसरे से जुड़े रहे थे।


डार्विन और वॉलेस की यह खोज युगांतरकारी थी। हम डार्विन के बारे में तो जानते हैं लेकिन वॉलेस के बारे में अधिकतर को नहीं पता। जहाँ डार्विन ने उद्विकास के सिद्धांत को भौतिकवादी आधार प्रदान किया और इसे लोकप्रिय बनाया, वहीं वॉलेस भाववादी और आध्यात्मिक सोच से बाहर नहीं निकल पाये थे। वॉलेस मृत्यु के बाद की दुनिया व आत्माओं में भी विश्वास करते थे। उनका मानना था कि जीवन का उदय व उद्विकास किसी उच्चतर शक्ति की प्रेरणा से हुआ है। उनका मानना था कि चेतना पूरे ब्रह्माण्ड की आधारभूत इकाई है।


डार्विन और वॉलेस दोनों का समय वह था जब पूरी दुनिया क्रांतियों के तूफान में फंसी हुई थी। खासतौर पर यूरोप। बदलाव व उथल पुथल से भरी इन घटनाओं ने विज्ञान व वैज्ञानिक सिद्धांतों को भी प्रभावित करना ही था। जाहिर है क्रांतियों के इस युग में डार्विन के भौतिकवादी विचारों को ही ज्यादा मान्यता मिलनी थी क्योंकि वही सही थे।


इस सबके बावजूद वॉलेस के योगदान को नकारा नहीं जाता। डार्विन और वॉलेस दोनों अलग अलग पृष्ठभूमियों से आते थे, दोनों ने अलग अलग स्थानों पर जैव प्रजातियों का अवलोकन व निरीक्षण किया। लेकिन दोनों एक ही जैसे नतीजे पर पहुंचे। आज इनके दिये हुए इस सिद्धांत को "डार्विन-वॉलेस का प्राकृतिक चयन द्वारा उद्विकास का सिद्धांत" कहा जाता है।


तो डार्विन और वॉलेस व उनके युगान्तरकारी सिद्धांत की यह कहानी आपको कैसी लगी? कमेंट सेक्शन में बताइयेगा।


Navmeet Nav ji साभार फेसबुक


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