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रविवार, 24 जनवरी 2021

कैंसर के खिलाफ लड़ने के लिए इम्यूनोथेरेपी के जरिए नया इलाज

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ताजा शोध से पता चला है कि कुछ ट्यूमर या कैंसर के अंदर ही प्रतिरक्षा कोशिकाओं की "फैक्ट्रियां" होती हैं. जो शरीर को कैंसर के खिलाफ लड़ने में मदद करती हैं.हाल के वर्षों में डॉक्टरों ने कैंसर के खिलाफ लड़ने के लिए इम्यूनोथेरेपी के जरिए नया इलाज खोजा है. इसमें शरीर के प्रतिरक्षा तंत्र को मजबूत कर उन्हें ट्यूमर से लड़ने लायक बनाया जाता है.यह तकनीक तृतीयक लिम्फॉइड संरचनाएं (टीएलएस) इस इलाज में कारगर साबित हुई हैं. हाल के वर्षों में, डॉक्टरों ने कैंसर, इम्यूनोथेरेपी के नए उपचार की ओर रुख किया है, जो ट्यूमर से लड़ने के लिए शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली का लाभ उठाकर काम करता है. साइंस जर्नल "नेचर" में इस उपचार से संबंधित तीन शोध प्रकाशित हुए हैं. जो दुनिया के अलग देशों के वैज्ञानिकों की ओर से आए हैं.शोध में बताया गया है कि श्वेत रक्त कोशिकाएं या टी-सेल्स ट्यूमर को मारने का काम कैसे करती हैं. कैंसर कोशिकाओं को पहचानने और उन पर हमला करने के लिए यह "प्रशिक्षित" होती हैं. हालांकि यह उपचार केवल 20 प्रतिशत रोगियों पर ही बेहतर काम कर रहा है. शोधकर्ता यह समझने की कोशिश कर रहे हैं कि क्यों कुछ ही मरीज इस इलाज में बेहतर परिणाम दे रहे हैं.वैज्ञानिकों ने बताया कि ट्यूमर या कैंसर पर बनी कुछ कोशिकीय संरचनाएं शरीर को कैंसर से लड़ने में मदद करने के लिए "कारखानों या स्कूलों" जैसे काम करती हैं. पेरिस डेकार्टी यूनिवर्सिटी मेडिकल स्कूल के कॉर्डेलिए रिसर्च सेंटर में इम्यूनोलॉजी के प्रोफेसर वुल्फ फ्रीडमैन ने समाचार एजेंसी एएफपी से बातचीत में कहा, "इन टी-कोशिकाओं को तृतीयक लिम्फॉइड संरचनाओं के 'स्कूलों' में शिक्षित करने की आवश्यकता है. जहां वे प्रभावी रूप से कैंसर कोशिकाओं को पहचाकर उन पर हमला करना सीख सकते हैं.रिसर्च का निष्कर्ष है कि केवल टी-सेल ही कैंसर से लड़ने में सक्षम नहीं हैं बल्कि ऐसे कुछ और एजेंट भी शरीर में हैं. शोधकर्ताओं ने पाया कि तृतीयक लिम्फॉइड संरचनाएं या टीएलएस, बी-सेल से भरी हुई थीं, जो भी एंटीबॉडी का उत्पादन करने वाली एक तरह की प्रतिरक्षा कोशिकाएं हैं. प्रोफेसर फ्रीडमैन ने बताया, "हम 15 साल से टी-सेल से ही कैंसर को खत्म करने के आदी बन चुके हैं. हमने यह देखने के लिए सारकोमा जैसे कैंसर का विश्लेषण किया कि उनके पास कौन से समूह हैं. जो कैंसर से लड़ सकते हैं. इसके परिणामस्वरूप हमारे पास बी-कोशिकाएं आईं.अमेरिका की टेक्सास यूनिवर्सिटी के एंडरसन कैंसर सेंटर में सर्जिकल ऑन्कोलॉजी विभाग की डॉक्टर बेथ हेल्मिंक कहती हैं कि इस खोज ने इम्यूनोथेरेपी में बी-कोशिकाओं से जुड़ी धारणाओं को बदल दिया है. बेथ के मुताबिक, "इन अध्ययनों के माध्यम से हमने पाया कि बी-कोशिकाएं ट्यूमर-विरोधी प्रतिरक्षा प्रतिक्रिया के लिए एक सार्थक तरीके से योगदान दे रही हैं."इस खोज में कई आश्चर्यजनक बातें सामने आई हैं. पहले कैंसर रोगियों में बी-कोशिकाओं की बहुतायत को ज्यादातर खराब रोग के रूप में देखा जाता रहा है. इसके उलट अध्ययन में पाया गया कि उनके ट्यूमर में टीएलएस के अंदर बी- कोशिकाओं के उच्च स्तर वाले रोगियों में इम्यूनोथेरेपी के लिए अच्छी प्रतिक्रिया की संभावना होती हैं.बार्ट्स एंड लंदन स्कूल ऑफ मेडिसिन एंड डेंटिस्ट्री में लेक्चरर लुईसा जेम्स कहती हैं, "अध्ययन की यह श्रृंखला रोमांचक इसलिए भी है क्योंकि यह विभिन्न प्रकार के कैंसर के उपचार में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकने में सक्षम है. हालांकि जेम्स इस अध्ययन में शामिल नहीं थीं, उन्होंने इस शोध को पढ़ने के बाद कहा, "कम समय में ही इस शोध के परिणामस्वरूप रोगियों को इम्यूनोथेरेपी से लाभ होने की संभावना के लिए नया टूल मिल जाएगा. जिससे भविष्य में बेहतर उपचार का मार्ग भी प्रशस्त हो सकता है."हालांकि अभी भी कई प्रश्न हैं जिनके उत्तर नहीं मिल पाए हैं. जैसे कि ऐसी संरचनाएं कुछ ही तरह के ट्यूमर में क्यों बनती हैं और बाकी में नहीं. यह स्पष्ट हो गया है कि इन्ही संरचनाओं के अंदर पाई जाने वाली बी-कोशिकाएं इम्यूनोथेरेपी की सफलता में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं, लेकिन ऐसा कैसे होता है इसका उत्तर अब तक वैज्ञानिकों के पास नहीं हैयह हो सकता है कि बी-कोशिकाएं कैंसर कोशिकाओं से लड़ने के लिए आगे आती हों और एंटीबॉडी का निर्माण करती हों. सभी टीएलएस समान नहीं होते. शोधकर्ताओं ने कोशिकाओं की तीन श्रेणियां पाईं लेकिन केवल एक कोशिका कैंसर को मात देने में "परिपक्व" पाई गई.विशेषज्ञों का कहना है कि इस रिसर्च ने कई आशाजनक रास्ते खोले हैं. यह शोध डॉक्टरों को उन मरीजों का इलाज करने में मदद कर सकता है जो इम्यूनोथेरेपी के लिए अच्छी प्रतिक्रियाएं देते हैं. स्वीडन के लुंथ विश्वविद्यालय में ऑन्कोलॉजी और पैथोलॉजी के प्रोफेसर गोरान जॉनसन ने इनमें से एक अध्ययन पर काम किया है. जॉनसन बताते हैं, "अगर कोई ऐसा उपचार विकसित किया जा सके जिससे टीएलएस के निर्माण को बढ़ाया जा सके, तो हम इसे आजकल की इम्यूनोथेरेपी रेजिमेंट के साथ जोड़ कर इलाज कर सकते हैं." उनका मानना है कि इससे ज्यादा से ज्यादा रोगियों में इम्यूनोथेरेपी का असर दिखेगा." sabhar : dw.de

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क्या एक दिन आप 3डी प्रिंटर पर बनी कार चलाएँगे

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क्या एक दिन आप 3डी प्रिंटर पर बनी कार चलाएँगे? कार टेकनोलॉजी से जुड़े ताज़ा शोध इस पूरे उद्योग में क्रांतिकारी बदलाव लाने जा रहे हैं और ये बिलकुल संभव है कि आप आने वाले समय में 3डी प्रिंटर पर बनी कार ही चलाएँ.अमरीकी ऊर्जा विभाग की प्रयोगशाला ओक रिज नेशनल ने 3डी प्रिंटर पर न केवल स्पोर्ट्स कार बनाई बल्कि 2015 के डीट्रॉयट ऑटो शो में इसे प्रदर्शित भी किया है.पहली नजर में तैयार की गई शेलबी कोबरा कार आम स्पोर्ट्स कार जैसी ही लगती है, चाहे ये प्लास्टिक से बनी है. हालांकि ये स्टील से भी बनाई जा सकती है.इसमें कहीं भी स्टील के पैनल का इस्तेमाल नहीं हुआ है. ये कार 85 मील प्रति घंटे की रफ्तार से चलाई जा सकती है थ्री-डायमेंशनल तरीके से कार प्रिंटिंग?थ्री डायमेंशनल प्रिटिंग वो नई तकनीक है जिसके इस्तेमाल में पहले कंप्यूटर में डिज़ाइन बनाया जाता है.फिर उक्त कमांड के ज़रिए 3डी प्रिंटर, या ये कहें कि इंडस्ट्रियल रोबोट उस डिज़ाइन को, सही पदार्थ (मेटीरियल) का इस्तेमाल करते हुए परत दर परत प्रिंट करता है या बनाता है.इस प्रयोग में पिघले हुए प्लास्टिक का इस्तेमाल करते हुए उसे मनचाहा आकार दिया जाता है. ऐसा मेटल से भी किया जा सकता है.इस तकनीक को अंजाम देने वाले उपकरण को थ्री-डी प्रिंटर या फिर इंडस्ट्रियल रोबोट कहा जाता है.छह सप्ताह में कार तैयारइस लैब के डॉक्टर चैड ड्यूटी नेबीबीसी फ्यूचर को बताया, "हमने इसे प्लास्टिक की परतों से बनाया है. 24 घंटे में प्लास्टिक से बॉडी को प्रिंट किया (बनाया) जा सकता है."वो बताते हैं, "बाद में इसमें इंजन और उपरी बाडी, लाइट, ब्रेक, गियर, और अन्य चीजों को असेंबल किया जाता है. कुल 6 सप्ताह में 6 लोग ऐसी कार तैयार कर लेते हैं. ख़ास बात यह है कि इसको बाद में डि-असेंबल कर पूरी तरह से अलग किया जा सकता है."दरअसल प्लास्टिक की परत दर परत प्रिंट करके कार तैयार करने का मतलब केवल ढांचा तैयार करना नहीं, बल्कि कार के अलग अलग हिस्सों को थ्री-डायमेंशनल प्रिटिंग के जरिए पहले प्रिंट करना और फिर उन्हें असेंबल करना हैज़ाहिर है ये कार फ़िलहाल बिक्री के लिए नहीं बनी है. इसे प्रयोग के दौरान तैयार किया गया है. लेकिन इसने दूसरे कार निर्माताओं को ऐसी कार तैयार करने का विकल्प तो दे ही दिया है.बेहद सस्ती होगी कारअमरीकी कार निर्माता लोकल मोटर ने प्रिंट करके कार को तैयार किया है जिसे डीट्रॉयट ऑटो शो में प्रदर्शित किया गया.लोकल मोटर्स के जे रोजर्स कहते हैं, "इस कार को बनाना आसान है और ये काफी कम खर्चे में बनाई जा सकती है. इसके रख रखाव का खर्च भी बेहद कम हो जाता है. मेरे ख्याल से यही भविष्य की कार होगी.ऐसे में जाहिर है कि ऑटोमोटिव इंडस्ट्री एक नए युग के लिए तैयारी करती दिख रही है.sabhar bbc.co.uk

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शनिवार, 23 जनवरी 2021

समुद्री शैवाल के दानों ग्रेनल का इस्तेमाल अधिक नमक खाने में प्रयोग

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आप अगर आप को नमक का सेवन करना है तो आप उसकी जगह समुद्री शैवाल का इस्तेमाल कर सकते हैं वैज्ञानिकों का कहना है कि समुद्री शैवाल के दानों ग्रेनल का इस्तेमाल अधिक नमक खाने से होने वाली परेशानियों को दूर कर सकता है ब्रिटेन के से फील्ड हां लायन विश्वविद्यालय के अनुसंधानकर्ताओं ने पाया कि समुद्री शैवाल के दानों को खाने में मिलाने से अच्छा स्वाद आता है और उसमें नमक की मात्रा कम होती है दूसरी तरफ अधिक नमक के इस्तेमाल से प्रत्येक वर्ष दुनिया में हजारों लोगों के असमय मौत हो जाती है वैज्ञानिकों का दावा है कि ब्रेड और प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थों में नमक की जगह इसका इस्तेमाल करने से उच्च रक्तचाप हृदयाघात और मृत्यु के खतरे से बचा जा सकता है शैवाल का नमक के विकल्प के रूप में इस्तेमाल तो बहुत इसका एकमात्र पहलू है सवाल में बहुत गुण है इसमें समुद्री सेवा में बड़ी मात्रा में पोषक तत्व होते हैं जिससे पेट भरा हुआ महसूस होता है इसलिए मोटापा घटाने में भी सहायक है इसलिए यह मोटापा घटाने में भी सहायक है जिन वैज्ञानिकों ने इस परियोजना पर शोध किया उन्होंने पाया कि सहवाग के दानों में सोडियम का स्तर मात्र तीन 3.5 था जैविक खाद उद्योगों द्वारा प्रयोग किए जाने वाले मन में यह 40% था वैज्ञानिकों का मानना है कि सवाल जो कि लंबे समय से चीन और जापान के भोजन में शामिल है बढ़ती जनसंख्या को नया भोजन स्रोत उपलब्ध कराने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है वैज्ञानिक आर्कटिक में पाए जाने वाले शैवाल के ग्रैनुअल के लिए व्यवसायिक आपूर्तिकर्ता से बातचीत कर रहे हैं और ब्रिटेन के पांच प्रमुख सुपर मार्केट में से दो इसका इस्तेमाल ब्रेड में करने का विचार कर रहे हैं विशेषज्ञों का कहना है कि 11 वर्ष और उससे अधिक उम्र के लोगों को 1 दिन में 6 ग्राम से अधिक नमक का इस्तेमाल नहीं करना चाहिए

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भूमिगत नदी

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 वैज्ञानिकों ने हाल में ही एक ऐसी भूमिगत नदी का पता लगाया है जो विशाल अमेजन के मिलो नीचे बहती है वैज्ञानिकों ने ब्राजील के आयल कंपनी पेट्रोब्रास द्वारा 1970 एवं 1980 के दशक में अमेजन क्षेत्र में खुदाई किए गए तेल कुआं के आंकड़े के विश्लेषण के आधार पर इसकी खोज की है उन्होंने इस नदी को ब्राजील के नेशनल ऑब्जर्वेटरी के वैज्ञानिक वालिया हमजा के नाम पर हम जा रखा कंप्यूटर विश्लेषकों के द्वारा यह बताया गया कि यह नदी अमेजन कि भारत ही पश्चिम से पूर्व तक पृथ्वी तल से 13000 फीट नीचे बहती है वैज्ञानिकों ने अभी बताया कि पृथ्वी से लगभग 2000 फीट की गहराई पर या नदी ऊर्ध्वाधर रूप में बहती है यह नदी लगभग अमेजॉन जितनी लंबी है लेकिन इसमें अमेजन के कुल जल प्रवाह का एक बटे 33 वां भाग ही जल प्रभावित होता है हमजा की चौड़ाई 125 से 250 मील के बीच है जबकि अमेजन की चौड़ाई 0.6 मील से 7 मील के बीच है वैज्ञानिकों के इस दल ने अपने इस विश्लेषण के आधार पर निष्कर्ष निकाला कि पृथ्वी के अन्य भागों में भी हमजा जैसे भूगर्भीय नदियां हो सकती हैं वैज्ञानिकों ने कहा उल्लेखनीय है कि वालिया हमजा तथा एलिजाबेथ तेरस के नेतृत्व में वैज्ञानिकों के एक दल ने 2 वर्ष के गहन अध्ययन के बाद यह रिपोर्ट तैयार की  जिसे कांग्रेश ऑफ द ब्राजीलियन सोसाइटी ऑफ जियोफिजिक्स में प्रस्तुत किया जिले में प्रस्तुत किया गया

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व्यापक ब्रह्मांड

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विज्ञान का सफर आदि काल से शुरू हो गया था | जब मनुष्य कृषि और पत्थर के औंजारो का प्रयोग किया विज्ञान ने जहा हमे तकनीको के द्वार खोल कर जीवन को सरल एवं सुगम्य बनाया है परंतु अध्यात्म के विना जीवन मे शांती नहीं मिल सकती कही ना कही विज्ञान और अध्यात्म एक हो जाते है आगे देखे कैसे तकनीक ने हमारा जीवन आसान कर दिया है विज्ञान और आत्मा इस सिद्धांत के अनुसार हमारी आत्मा का मूल स्थान मस्तिष्क की कोशिकाओं के अंदर बने ढांचों में होता है जिसे माइक्रोटयूबुल्स कहते हैं। दोनों वैज्ञानिकों का तर्क है कि इन माइक्रोटयूबुल्स पर पड़ने वाले क्वांटम गुरुत्वाकर्षण प्रभाव के परिणामस्वरूप हमें चेतनता का अनुभव होता है। वैज्ञानिकों ने इस सिद्धांत को आर्वेक्स्ट्रेड ऑब्जेक्टिव रिडक्शन (आर्च-ओर) का नाम दिया है। इस सिद्धांत के अनुसार हमारी आत्मा मस्तिष्क में न्यूरॉन के बीच होने वाले संबंध से कहीं व्यापक है। दरअसल, इसका निर्माण उन्हीं तंतुओं से हुआ जिससे ब्रह्मांड बना था। यह आत्मा काल के जन्म से ही व्याप्त थी। अखबार के अनुसार यह परिकल्पना बौद्ध एवं हिन्दुओं की इस मान्यता से काफी कुछ मिलती-जुलती है कि चेतनता ब्रह्मांड का अभिन्न अंग है। इन परिकल्पना के साथ हेमराफ कहते हैं कि मृत्यु जैसे अनुभव में माइक्रोटयूबुल्स अपनी क्वांटम अवस्था गंवा देते हैं, लेकिन इसके अंदर के अनुभव नष्ट नहीं होते। आत्मा केवल शरीर छोड़ती है और ब्रह्मांड में विलीन हो जाती है। हेमराफ का कहना है कि हम कह सकते हैं कि दिल धड़कना बंद हो जाता है, रक्त का प्रवाह रुक जाता है, माइक्रोटयूबुल्स अपनी क्वांटम अवस्था गंवा देते हैं, माइक्रोटयूबुल्स में क्वांटम सूचनाएं नष्ट नहीं होतीं। ये नष्ट नहीं हो सकतीं। यह महज व्यापक ब्रह्मांड में वितरित एवं विलीन हो जाती हैं। उन्होंने कहा कि यदि रोगी बच जाता है तो यह क्वांटम सूचना माइक्रोटयूबुल्स में वापस चली जाती है तथा रोगी कहता है कि उसे मृत्यु जैसा अनुभव हुआ है। हेमराफ यह भी कहते हैं कि यदि रोगी ठीक नहीं हो पाता और उसकी मृत्यु हो जाती है तो यह संभव है कि यह क्वांटम सूचना शरीर के बाहर व्याप्त है। हमारे पौराणिक एवं धार्मिक पुस्तको मे अनन्त सृष्टि की कल्पना की गयी है | ईश्वर को अनन्त माना गया है , और उसकी लीलाओ को अनन्त कहा गया है | धर्म के अनुसार ईश्वर का वास हर कण मे है और उसकी माया अनन्त है विज्ञान भी अब एक से ज्यादे विश्‍व को मानने लगा है | राजर पेनरोज़ जो की गणितग्य है लेकिन खगौल विज्ञान मे उनका महत्वा पूर्ण योगदान है | उन्होने अपनी पिछली पुस्तक “द एम्पर्स न्यू माएंड ” मस्तिष्क और चेतना को लेकर थी , जी बहूत चर्चित हुई थी |उनकी नयी किताब ” साएकल्स आफ टाईम : एन एक्सट्रा आर्डनरी न्यू आफ द यूनिवर्स ” मे नयी अवधारणा के मुताबिक ब्रमांड अनन्त है वह कभी नष्ट नहीं होता उसमे उसमे अनन्त कल्पो के चक्र एक के बाद आते रहते है |आम तौर पर विज्ञान मे प्रचलित है की सृष्टि का आरंभ एक विग बैक या बड़े विस्फोट से हुई है , इसके बाद ब्रमांड फैलता गया जो अब भी फैल रहा है एक समय के बाद ब्रमांड के फैलने की उर्जा समाप्त हो जायेगी और ब्रमांड पुनः छोटे से बिन्दु पे आ जायेगी | पेनरोज़ की अवधारणा इससे विल्कुल अलग है वह समय के चक्र की अवधारणा सामने रखते है उनका कहना है की एक ‘एओन ‘ या कल्प की समाप्ति ब्रमांड की ऊर्जा खत्म होने के साथ होती है पर ब्रमांड सिकुड़ कर खत्म नहीं हो जाता ऊर्जा खत्म होने से ब्रमांड की मास या द्रब्यमान समाप्त हो जाता है, द्रब्यमान समाप्त होने से समय काल मे कोई भेद नहीं रह जाता |जब मास ही नहीं होता तो भूत भविष्य , छोटा बड़ा ये सारी अवधारणाये खत्म हो जाती है एक अर्थ मे ब्रमांड की अपनी विशालता की स्मृति खत्म हो जाती है , तब यह अंत अगले बिग बैंक की शुरूआत होती है |और यह अनन्त काल तक जारी रहता है इसके लिये उन्होने कयी प्रमाण दिये है हालांकि वो कहते है की इसमे अभी और काम करने की आवश्कता है क़्वाण्टम मेकेनिक्स से भी से भी अनेक सृष्टि की अवधारणा मिलती है | भौतिक के स्ट्रिंग सिधांत के अनुसार चार आयाम के अलावा भी कई आयाम है ये सारे आयाम हमारी दुनिया मे कयी दुनिया बनाते है और इन दुनियाओ का आपस मे सम्बंध गुरुत्वा कर्षण के कारण होता है | जो तमाम स्तरों पर एक ही होता है तो क्या वैज्ञानिक कही ना कही ईश्वर की अवधारणा को स्वीकार तो नहीं कर रहे स्वय विचार करे

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चमकदार मशरूम की खोज

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ब्राजील के वर्षा वनों में वैज्ञानिकों को फिर से वह मशरूम मिल गई है जो 1840 के बाद से नहीं देखी गई थी इस चमकदार मशरूम की खोज सन फ्रांसिस्को स्टेट यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिक डेनिस डेस जार्डिन और उनक टीम द्वारा की गई है या मशरूम अंधेरे में इतनी तेजी से चमकती है कि उसके प्रकाश में अखबार पढ़ा जा सकता है शोधकर्ताओं को उम्मीद है कि इसकी खोज के बाद वे इस बात का पता लगाने में सफल होंगे कि क्यों कुछ फंगस में चमकने की क्षमता होती है वैज्ञानिकों ने इस मशरूम को फिर से नियमों को पाना गार्डनर के नाम से वर्गीकृत किया है न्यू नोट ओपनस गार्डनर को आखरी बार 1840 में ब्रिटिश वनस्पति विज्ञानी जॉर्ज गार्डनर ने तब देखा था जब कुछ बच्चे इस प्रकार चमकदार मशरूम से खेल रहे थे इस मशरूम के हरे प्रकाश का पता लगाने के लिए डॉ डेस जारटिन और उनके सहयोगियों को कई सप्ताह तक अंधेरी रातों में ब्राजील के जंगलों में भटकना पड़ा तथा डिजिटल कैमरों की मदद से वे रात में चमक रहे इस मशरूम की फोटो कैमरे में उतारने में सफल रहे जेलीफिश और जुगनू ऐसे ही कुछ जंतु है जो चमक पैदा करते हैं बैटरी ओं से संगी संगी और मछली से की रासायनिक प्रक्रिया के द्वारा इस तरह चमक पैदा करते हैं लेकिन खोजे के मसलों को लेकर अभी यह स्पष्ट नहीं है या किस प्रकार अंधेरे में चमक पैदा करता है

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रविवार, 16 फ़रवरी 2014

स्वास्थ्य के लिए चमत्कारी स्टेम सेल

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रूसी डाक्टरों ने निराशाजनक स्थिति में पहुँच चुके कैंसर रोगियों को पुनः पैरों पर खडा करने की तरकीब ढूंढ निकाली है| पश्चिमी साइबेरिया के एक छोटे नगर युगरा के डाक्टर स्टेम सेल की मदद से रक्त कैंसर का सफलतापूर्वक इलाज कर रहे हैं| इन जादुई स्टेम सेलों से किसी भी प्रकार के यानी लीवर, हड्डी या रक्त आदि के सेल बनाए जा सकते हैं| दिमित्री कुदाश्किन पहले ऐसे रोगी थे, जिनकी कोशिकाओं का प्रत्यार्पण कर युगरा में पहली बार तीन साल पहले ऐसा इलाज किया गया था| 32 वर्ष की उम्र में दिमित्री मल्टीप्ल मिएलोमा रोग के शिकार पाए गए थे| मल्टीप्ल मिएलोमा रक्त की सबसे घातक बीमारियों में से एक है| उनके बचने की लगभग कोई उम्मीद नहीं रह गयी थी|उनके सेल प्रत्यार्पण आपरेशन के बाद अब तक तीन साल बीत चुके हैं| इस दौरान युगरा के डाक्टर 34 और सफल सेल प्रत्यार्पण आपरेशन कर चुके हैं| वर्तमान में सभी रोगी खुद को स्वस्थ बता रहे हैं, लेकिन डाक्टर इस बात से इनकार नहीं करते कि जोखिम अभी भी बने हुए हैं| युगरा स्वास्थ्य विभाग के उप-निदेशक सेर्गेई शूकिन बताते हैं कि उन रोगियों की संख्या निरंतर बढ़ती ही जा रही है, जिन्हें सेल प्रत्यार्पण की आवश्यकता है| वह आगे कहते हैं:इस बीमारी का इलाज स्टेम सेल प्रत्यार्पण विधि से करना वर्तमान में न केवल रूस में बल्कि समस्त दुनिया में एकमात्र सफल तरीका माना जा रहा है| इस इलाज में लगभग चार लाख बीस हज़ार डालर लगते हैं| लेकिन हमारे यहाँ युगरा में यह इलाज हम मुफ्त में करते हैं| स्थानीय राजकीय कोष से इसके लिए फंड आबंटित किया जाता है|स्टेम सेल प्रत्येक शरीर में पाए जाते हैं| मनुष्य जब सोता है तब यह सेल क्षतिग्रस्त टिशू और अंगों की बहाली का काम करते हैं| लेकिन उम्र के साथ साथ शरीर में यह सेल घटते जाते हैं| जन्म के समय गर्भनाल रक्त में प्रत्येक दस हज़ार दूसरी कोशिकाओं में एक स्टेम सेल होता है, सोलह साल की उम्र में पांच लाख दूसरी कोशिकाओं के बीच एक तथा पचास वर्ष की आयु में दस लाख दूसरी कोशिकाओं के बीच एक स्टेम सेल पाया जाता है| युगरा के डाक्टर स्टेम सेल पर चार साल से अधिक से काम कर रहे हैं| युगरा के पड़ोसी नगर खांती-मान्सीस्किए में एक निम्नताप भंडारण बनाया गया है| वहां पर स्टेम सेल को तरल नाइट्रोजन में -196 डिग्री सेंटीग्रेड के तापमान पर रखा जाता है| ज़रुरत पड़ने पर भंडारण में रखे स्टेम सेल का इस्तेमाल दस वर्ष बाद भी किया जा सकता है- ऐसा युगरा सेल टेक्नोलॉजी विज्ञान एवं शोध संस्थान के उप-निदेशक सेर्गेई पनामार्योव का कहना है| वह बताते हैं:हमारे यहाँ गर्भनाल रक्त के लगभग 150 नमूने संरक्षित हैं| यह नमूने स्वस्थ गर्भवती महिलाओं के हैं| शिशु जन्म के समय इन महिलाओं की स्वीकृति से यह नमूने हमारे बैंक में संग्रहित किये गए ताकि उनका भविष्य में इस्तेमाल किया जा सकेस्टेम कोशिकाओं को त्वचा, चर्बी या बालों से प्राप्त करना एक बहुत ही मुश्किल और महंगा काम है| इसलिए मनुष्य को गर्भनाल रक्त के रूप में प्रकृति से प्राप्त खजाने को संरक्षित रखने की आवश्यकता है| गर्भनाल रक्त स्टेम सेल प्राप्ति का उत्तम साधन होने के बावजूद भी दुर्भाग्यवश अवशेष की तरह नष्ट कर दिया जाता है| इन कोशिकाओं का प्रत्यार्पण अस्वस्थ मनुष्य के रक्त में करना ही पर्याप्त होता है, बाद में वह खुद ही तकलीफदायक जगह को ढूंढ निकालने में सक्षम हैं| यह इलाज उनके लिए शत प्रतिशत सफल सिद्ध होता है, जिनके जन्म के समय स्टेम सेल को संग्रहित किया गया होता है साथ ही उनके सगे भाईयों और बहनों के लिए भी यह उतने ही सफल परिणाम देता है| sabhar :http://hindi.ruvr.ru

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