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सोमवार, 25 जनवरी 2021

नारमन इ बोरलाग

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नारमन इ बोरलाग एक ऐसे ब्यक्ति का नाम है जो जीवन पर्यंत मानव जाती के लिए भूख से लड़ता रहा इस ऋषि को भारत सहित दुनिया के अनेक देश के लोग इन्हें हरित क्रांती का जनक कहते है २० वी सदी की इस क्रांति ने तीसरी दुनिया की करीब एक अरब कुपोषित आबादी को दो जून की रोटी उपलब्ध कराई डा बोरलाग को इस कार्य हेतु १९७० में नोबेल विश्व शांति पुरस्कार दिया गया इस वैज्ञानिक को भारत का अन्नदाता भी कहा जाता है और दुनिया इन्हें प्यार से प्रो व्हीट कहती है इनका जन्म २५ मार्च १९१४ को हुआ १९३९ इन्होने विश्विद्यालय से बी एसी करने के बाद १९४२ में पी यच डी की डिग्री प्राप्त करने के बाद १९४४ में मेक्सिको में गेहूं शोध से जुड़े उस समय गेहूं की उत्पादकता बहूत कम थी पुरे विश्व में लगभग आकाल की स्थिति थी परन्तु इस वैज्ञानिक ने हार न मानते हुए गेहूं के मोटे और छोटे ताने के विकाश के लिए १९५३ में नोरिन -१० नामक गेहूं की एक जापानी किस्म को अधिक उपजाऊ अमेरिकी किस्म बेबर -१४ से संकरण कराया इस प्रकार लगभग तीन गुना अधिक उत्पादन वाली जातीय प्राप्त हुयी जिससे भारत सहित अन्य विकाश शील देशो में खाद्य समस्या हल हुई हम इस ऋषि केआभारी रहेंगे रहेंगे

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जीवन प्रत्याशा में हर साल 3 महीने की वृद्धि हो रही है

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ब्रिटेन की एक बैग यह प्रसिद्ध वैज्ञानिक का दावा है कि जीवन का 150 वां बसंत देखने वाला आदमी तो पहले ही जन्म ले चुका है लेकिन यह तो कुछ भी नहीं अगले दशकों में ऐसे कई पहले व्यक्ति पैदा होंगे जो उम्र के 1000 में पड़ाव तक पहुंचेंगे लोग भले ही इस बात पर विश्वास ना करें लेकिन डॉक्टर डी ग्रे नामक इस वैज्ञानिक को पूरा विश्वास है कि उनके ही जीवन काल में बैठ डॉक्टरों के पास वह सभी साधन और औजार होंगे जिससे वे बुढ़ापे का इलाज करने में पूरी तरह सक्षम होंगे बायोमेडिकल जेंटो लार्जेस्ट तथा अध्यक्षता पर पिछले कई वर्षों से शोध करने वाले संस्थान के प्रमुख वैज्ञानिक डॉक्टर डि gre  का दावा है कि ऐसा संभव होगा तमाम तरह की बीमारियों को समाप्त कर ऐसा करने से जीवन को अनिश्चित काल  के लिए बढ़ाया जा सकता है तब आदमी उम्रदराज तो होगा ना है वह स्पष्ट है इस समय जीवन प्रत्याशा में हर साल 3 महीने की वृद्धि हो रही है और विशेषज्ञों का मानना है कि वर्ष 2030 में 100 वर्ष की उम्र पार करने वाले की संख्या कई लाख में होगी इस समय दुनिया में सबसे ज्यादा जीने वाला व्यक्ति कार्यकाल 122 वर्ष का है जापान में वर्ष 2010 में 44000 से ज्यादा लोग 100 वर्ष से ज्यादा उम्र के थे उनका मानना है कि विकासशील देशों में कारण बाधित हो सकती है डॉक्टर डिग्री ऐसे समय को हकीकत बनते देखते हैं जब लोग अपने डॉक्टरों के पास नियमित मेंटेनेंस के लिए जाया करेंगे 
 उस समय तक जीन थेरेपी स्टेम सेल थेरेपी इम्यून सिस्टम स्टिमुलेशन एडवांस मेडिकल तकनीक आम लोगों की पहुंच तक होगी जिससे लोग अपने को फिट एवं फाइंड रख सकेंगे डॉक्टर डिग्री मानते हैं कि बुढ़ापा कुल मिलाकर हमारे शरीर में जीवन भर संजीत होने वाला अलग अलग  किस्म का सूक्ष्म और कोशिकीय loss  है और इसे रोकना संभव है इस बात पर अभी बात हो सकती है कि भविष्य में आदमी की औसत आयु कहां तक पहुंचेगी लेकिन जो प्रवृतियां है वह स्पष्ट है इस समय जीवन की प्रत्याशा में हर साल 3 महीने की वृद्धि हो रही है

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रविवार, 24 जनवरी 2021

रोबोटिक इंसान

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आने वाले समय में इंसान में मशीन का कम्बीनेशन एक साथ हो सकता है कभी स्वास्थ्य कारणों से तो कभी सेना में जरूरत के लिए रोबोटिक कंकालों पर शोध होता है. बीते दशक में इंसान के शरीर की ही तरह हरकतें करने में सक्षम रोबोटिक हाथ, पैर और कई तरह के बाहरी कंकाल विकसित किए जा चुके हैं.पूरी तरह रोबोटिकआइला नाम की यह मादा रोबोट दिखाती है कि एक्सो-स्केलेटन यानि बाहरी कंकाल को कैसे काम करना चाहिए. जब किसी व्यक्ति ने इसे पहना होता है तो आइला उसे दूर से ही नियंत्रित कर सकती है. आइला को केवल उद्योग-धंधों में ही नहीं अंतरिक्ष में भी इस्तेमाल किया जा सकता है.हाथों से शुरु जर्मनी में एक्सो-स्केलेटन पर काम करने वाला डीएफकेआई नाम का आर्टिफीशियल इंटेलिजेंस रिसर्च सेंटर 2007 में शुरू हुआ. शुरुआत में यहां वैज्ञानिक रोबोटिक हाथ और उसका रिमोट कंट्रोल सिस्टम बनाने की ओर काम कर रहे थे. तस्वीर में है उसका पहला आधुनिक प्रोटोटाइप. बेहद सटीक डीएफकेआई ने 2011 से दो हाथों वाले एक्सो-स्केलेटन पर काम शुरू किया. दो साल तक चले इस प्रोजेक्ट में रिसर्चरों ने इंसानी शरीर के ऊपरी हिस्से की कई बारीक हरकतों की अच्छी नकल कर पाने में कामयाबी पाई और इसे एक्सो-स्केलेटन में भी डाल सके रूस का रिमोट कंट्रोलकेवल जर्मन ही नहीं, रूसी रिसर्चर भी रिमोट कंट्रोल सिस्टम वाले एक्सो-स्केलेटन बना चुके हैं. डीएफकेआई ब्रेमन के रिसर्चरों को 2013 में रूसी रोबोट को देखने का अवसर मिला. इसके अलावा रूसी साइंटिस्ट भी आइला रोबोट पर अपना हाथ आजमा चुके हैं.बिल्कुल असली से हाथदुनिया की दूसरी जगहों पर विकसित किए गए सिस्टम्स के मुकाबले डीएफकेआई के कृत्रिम एक्सो-स्केलेटन के सेंसर ना केवल हथेली पर लगे हैं बल्कि बाजू के ऊपरी और निचले हिस्सों पर भी. नतीजतन रोबोटिक हाथ का संचालन बेहद सटीक और असली सा लगता है. इसमें काफी जटिल इलेक्ट्रॉनिक्स इस्तेमाल होता है. भार ढोएंगे रोबोटिक पैर डीएफकेआई 2017 से रोबोटिक हाथों के साथ साथ पैरों का एक्सो-स्केलेटन भी पेश करेगा. यह इंसान की लगभग सभी शारीरिक हरकतों की नकल कर सकेगा. अब तक एक्सो-स्केलेटन को पीठ पर लादना पड़ता था, लेकिन भविष्य में रोबोट के पैर पूरा बोझ उठा सकेंगे.लकवे के मरीजों की मदद इन एक्सो-स्केलेटनों का इस्तेमाल लकवे के मरीजों की सहायता के लिए हो रहा है. ब्राजील में हुए 2014 फुटबॉल विश्व कप के उद्घाटन समारोह में वैज्ञानिकों ने इस तकनीकी उपलब्धि को पेश किया था. आगे चलकर इन एक्सो-स्केलेटन में बैटरियां लगी होंगी और इन्हें काफी हल्के पदार्थ से बनाया जाएगा. फिलहाल इन एक्सो-स्केलेटन की अंतरिक्ष में काम करने की क्षमता का परीक्षण त्रिआयामी सिमुलेशन के द्वारा किया जा रहा है. इन्हें लेकर एक महात्वाकांक्षी सपना ये है कि ऐसे रोबोटों को दूर दूर के ग्रहों पर रखा जाए और उनका नियंत्रण धरती के रिमोट से किया जा सके. भविष्य में खतरनाक मिशनों पर अंतरिक्षयात्रियों की जगह रोबोटों को भेजा जा सकता है.बिल्कुल असली से हाथ दुनिया की दूसरी जगहों पर विकसित किए गए सिस्टम्स के मुकाबले डीएफकेआई के कृत्रिम एक्सो-स्केलेटन के सेंसर ना केवल हथेली पर लगे हैं बल्कि बाजू के ऊपरी और निचले हिस्सों पर भी. नतीजतन रोबोटिक हाथ का संचालन बेहद सटीक और असली सा लगता है. इसमें काफी जटिल इलेक्ट्रॉनिक्स इस्तेमाल होता है.जर्मनी में एक्सो-स्केलेटन पर काम करने वाला डीएफकेआई नाम का आर्टिफीशियल इंटेलिजेंस रिसर्च सेंटर 2007 में शुरू हुआ. शुरुआत में यहां वैज्ञानिक रोबोटिक हाथ और उसका रिमोट कंट्रोल सिस्टम बनाने की ओर काम कर रहे थे और सफल भी रहे sabhar dW.COM

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विश्व की सबसे खतरनाक बीमारी को मात

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अमेरिका के एक ऐसे व्यक्ति ने विश्व की सबसे खतरनाक बीमारी को मात देखकर चिकित्सा जगत को समर्पित कर दिया था वह दुनिया का ऐसा पहला मरीज है जिसके शरीर में एचआईवी वायरस पूरी तरह नष्ट हो चुके हैं 45 वर्षीय तिमोथी रे ब्राउन के लिए इसे किस्मत की ही बात कहेंगे कि दरअसल व एड्स के अलावा एक और प्राण घातक बीमारी एक प्रकार का ब्लड कैंसर से पीड़ित थे के इलाज के लिए उनके शरीर में एक बार बोन मैरो ट्रांसप्लांट किया गया है उसी के बाद उनका एड्स भी ठीक होने लगा अब उनके शरीर में एचआईवी वायरस पूरी तरह नष्ट हो चुके हैं डॉक्टरों ने इस अनोखी घटना को फंग्शनल चोर का 9995 में ब्राउन के शरीर में एचआईवी वायरस के संक्रमण के बारे में पता लगा था वह ल्यूकेमिया से जूझ रहे थे तब वह जर्मनी में रहते थे बर्लिन में 2007 में हुए बोन मैरो ट्रांसप्लांटेशन ने उनकी जिंदगी बदल दी वैज्ञानिकों का मानना है कि उनके शरीर में जिसका बोन मैरो प्रस्तावित किया गया उसके अंदर रहे होंगे जो के जरिए पहुंच गए और वह काकेशियाई मूल का रहा होगा यूरोप स्थित काकेशिया पर्वत इसके आसपास रहने वाले लोग के माने जाते हैं होते हैं और उत्तर पश्चिम एशिया पाए जाते हैं 1 प्रतिसत लोगों के शरीर में प्रतिरोध पाए जाते हैं उनमें से एक रहा होगा का मानना है कि में यूरोप में लाखों लोगों की जान लेने वाले ग्रेटर प्लेग से बच जाने वाले लोगों में स्वतः ही एड्स से लड़ने की छमता बिकसित हो गयी थी उसके बाद यह जीन पीढ़ी दर पीढ़ी उनके सन्तानो में आ गयी एच आई वी वायरस की खोज में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफोर्निया के डाक्टर जे लेवि ने इसे चिक्तिसा जगत की एक उपलब्धि माना है उनका कहना है की उन एड्स प्रतिरोधी जीनो की संगरचना की पता लगाकर बड़ी सफलता हासिल की जा सकती है

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अवचेतन मन और विज्ञान

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टैलीपैथी;क्या है हमारे पुराणों में वर्णित है की देवता लोग ;आपस में बातचीत ;बिना कुछ ;कर लेते थे | और सोचते थे दूसरे ;लोगो ;के पास;सन्देश ;जाता था धर्म और विज्ञान ने दुनिया के कई तरह के रहस्यों से पर्दा उठाया है। विज्ञान और टेक्नोलॉजी के इस युग में अब सब कुछ संभव होने लगा है। मानव का ज्ञान पहले की अपेक्षा बढ़ा है। लेकिन इस ज्ञान के बावजूद व्यक्ति की सोच अभी भी मध्ययुगीन ही है। वह इतना ज्ञान होने के बावजूद भी मूर्ख, क्रूर, हिंसक और मूढ़ बना हुआ है।खैर, आज हम विज्ञान की मदद से हजारों किलोमीटर दूर बैठे किसी व्यक्ति से मोबाइल, इंटरनेट या वीडियो कालिंग के माध्यम से संपर्क कर सकते हैं, लेकिन प्राचीन काल में ऐसा संभव नहीं था तो वे कैसे एक दूसरे से संपर्क पर पाते थे? मान लीजिये आप समुद्र, जंगल या रेगिस्तान में भटक गए हैं और आपके पास सेटेलाइट फोन है भी तो उसकी बैटरी डिस्चार्च हो गई है ऐसे में आप कैसे लोगों से संपर्क कर सकते हैं?दरअसल, बगैर किसी उपकरण की मदद से लोगों से संपर्क करने की कला को ही टेलीपैथी कहते हैं। जरूरी नहीं कि हम किसी से संपर्क करें। हम दूरस्थ बैठे किसी भी व्यक्ति की वार्ता को सुन सकते हैं, देख सकते हैं और उसकी स्थिति को जान सकते हैं। इसीलिये टेलीपैथी को हिन्दी में दूरानुभूति कहते हैं। टेलीपैथी शब्द का सबसे पहले इस्तेमाल 1882 में फैड्रिक डब्लू एच मायर्स ने किया था। कहते हैं कि जिस व्यक्ति में यह छठी ज्ञानेंद्रिय होती है वह जान लेता है कि दूसरों के मन में क्या चल रहा है। यह परामनोविज्ञान का विषय है जिसमें टेलीपैथी के कई प्रकार बताए जाते हैं।टेली' शब्द से ही टेलीफोन, टेलीविजन आदि शब्द बने हैं। ये सभी दूर के संदेश और चित्र को पकड़ने वाले यंत्र हैं। आदमी के मस्तिष्क में भी इस तरह की क्षमता होती है। कोई व्यक्ति जब किसी के मन की बात जान ले या दूर घट रही घटना को पकड़कर उसका वर्णन कर दे तो उसे पारेंद्रिय ज्ञान से संपन्न व्यक्ति कहा जाता है। महाभारतकाल में संजय के पास यह क्षमता थी। उन्होंने दूर चल रहे युद्ध का वर्णन धृतराष्ट्र को कह सुनाया था।भविष्य का आभास कर लेना भी टेलीपैथिक विद्या के अंतर्गत ही आता है। किसी को देखकर उसके मन की बात भांप लेने की शक्ति हासिल करना तो बहुत ही आसान है। चित्त को स्थित कर ध्यान से देखने और सुनने की क्षमता बढ़ाएंगे तो सामने वाले के मन की आवाज भी सुनाई देगी। इसके लिए नियमित अभ्यास की आवश्यकता है।दरअसल टेलीपैथी दो व्यक्तियों के बीच विचारों और भावनाओं के आदान-प्रदान को भी कहते हैं। इस विद्या में हमारी पांच ज्ञानेंद्रियों का इस्तेमाल नहीं होता, यानी इसमें देखने, सुनने, सूंघने, छूने और चखने की शक्ति का इस्तेमाल नहीं किया जाता। यह हमारे मन और मस्तिष्क की शक्ति होती है टेलीपैथी सिखने के सामान्यत: तीन तरीके है ध्यान द्वारा योग द्वारा तीसरा आधुनिक तकनीक ध्यान द्वारा लगातार ध्यान करते रहने से चित्त स्थिर होने लगता है। चित्त के स्थिर और शांति होने से साक्षीभाव घटित होता है। यह संवेदनशिल अवस्था टेलीपैथी के लिये जरूरी होती है। ध्यानसंपन्न व्यक्ति किसी के भी मन की बात समझ सकता है। कितने ही दूर बैठे व्यक्ति की स्थिति और वार्तालाप का वर्णन कर सकता है।योग में मन: शक्ति योग के द्वारा इस शक्ति हो हासिल किया जा सकता है। ज्ञान की स्थिति में संयम होने पर दूसरे के चित्त का ज्ञान होता है। यदि चित्त शांत है तो दूसरे के मन का हाल जानने की शक्ति हासिल हो जाएगी। योग में त्राटक विद्या, प्राण विद्या के माध्यम से भी आप यह विद्या सिख सकते हैं।टेलीपैथी का आधुनिक तरीका तरीके भले ही आधुनिक हो लेकिन इसके सर्वप्रथम आपको ध्यान का अभ्यास तो करना ही होगा तभी यह तरीका कारगर सिद्ध होगा। टेलीपैथी उस प्रक्रिया को कहा जाता है जिसके जरिए बिना किसी भौतिक माध्यम की सहायता के एक इंसान दूसरे व्यक्ति के मस्तिष्क को पढ़ने अथवा उसे अपने विचारों से अवगत कराने में कामयाब होता हैआधुनिक तरीके के अनुसार ध्यान से देखने और सुनने की क्षमता बढ़ाएंगे तो सामने वाले के मन की आवाज भी सुनाई देगी। इसके लिए नियमित अभ्यास की आवश्यकता है। इस विद्या में सम्मोहन का भी सहरा लिया जाता है। सम्मोहन के माध्यम से हम अपने चेतन मन को सुलाकर अवचेतन मन को जाग्रत करते हैं और फिर इस अवचेतन मन के माध्यम से हम दूसरे व्यक्ति के मन बात, विचार आदि पढ़ लेते हैं और यदि वह हजारों किलोमीटर भी बैठा है तो इस मन के माध्यम से व्यक्ति को वह उसके सामने ही नजर आता है। क्या होता है अवचेतन मन...चेतन मन और अचेतन मन : हमारे मन की मुख्यतः दो अवस्थाएं (कई स्तर) होती हैं-चेतन मन और 2. अवचेतन मन (आदिम आत्मचेतन मन):सम्मोहन के दौरान अवचेतन मन को जाग्रत किया जाता है। ऐसी अवस्था में व्यक्ति की शक्ति बढ़ जाती है लेकिन उसका उसे आभास नहीं होता, क्योंकि उस वक्त वह सम्मोहनकर्ता के निर्देशों का ही पालन कर रहा होता है।. चेतन मन :इसे जाग्रत मन भी मान सकते हैं। चेतन मन में रहकर ही हम दैनिक कार्यों को निपटाते हैं अर्थात खुली आंखों से हम कार्य करते हैं। विज्ञान के अनुसार मस्तिष्क का वह भाग जिसमें होने वाली क्रियाओं की जानकारी हमें होती है। यह वस्तुनिष्ठ एवं तर्क पर आधारित होता है।. अवचेतन मन: जो मन सपने देख रहा है वह अवचेतन मन है। इसे अर्धचेतन मन भी कहते हैं। गहरी सुसुप्ति अवस्था में भी यह मन जाग्रत रहता है। विज्ञान के अनुसार जाग्रत मस्तिष्क के परे मस्तिष्क का हिस्सा अवचेतन मन होता है। हमें इसकी जानकारी नहीं होती। अवचेतन मन की शक्ति क्या है...अवचेतन मन की शक्ति हमारा अवचेतन मन चेतन मन की अपेक्षा अधिक याद रखता है एवं सुझावों को ग्रहण करता है। आदिम आत्मचेतन मन न तो विचार करता है और न ही निर्णय लेता है। उक्त मन का संबंध हमारे सूक्ष्म शरीर से होता है।यह मन हमें आने वाले खतरे या उक्त खतरों से बचने के तरीके बताता है। इसे आप छठी इंद्री भी कह सकते हैं। यह मन लगातार हमारी रक्षा करता रहता है। हमें होने वाली बीमारी की यह मन 6 माह पूर्व ही सूचना दे देता है और यदि हम बीमार हैं तो यह हमें स्वस्थ रखने का प्रयास भी करता है। बौद्धिकता और अहंकार के चलते हम उक्त मन की सुनी-अनसुनी कर देते हैं। उक्त मन को साधना ही सम्मोहन है अवचेतन को साधने का असर : सम्मोहन द्वारा मन की एकाग्रता, वाणी का प्रभाव व दृष्टि मात्र से उपासक अपने संकल्प को पूर्ण कर लेता है। इससे विचारों का संप्रेषण (टेलीपैथिक), दूसरे के मनोभावों को ज्ञात करना, अदृश्य वस्तु या आत्मा को देखना और दूरस्थ दृश्यों को जाना जा सकता है। इसके सधने से व्यक्ति को बीमारी या रोग के होने का पूर्वाभास हो जाता है।कैसे साधें इस अवचेतन मन को, जानिये तरीका..कैसे साधें इस मन को ;वैसे इस मन को साधने के बहुत से तरीके या विधियां हैं, लेकिन सीधा रास्ता है कि प्राणायाम से सीधे प्रत्याहार और प्रत्याहार से धारणा को साधें। जब आपका मन स्थिर चित्त हो, एक ही दिशा में गमन करे और इसका अभ्यास गहराने लगे तब आप अपनी इंद्रियों में ऐसी शक्ति का अनुभव करने लगेंगे जिसको आम इंसान अनुभव नहीं कर सकता। इसको साधने के लिए त्राटक भी कर सकते हैं। त्राटक भी कई प्रकार से किया जाता है। ध्यान, प्राणायाम और नेत्र त्राटक द्वारा आत्म सम्मोहन की शक्ति को जगाया जा सकता है।शवासन में लेट जाएं और आंखें बंद कर ध्यान करें। लगातार इसका अभ्यास करें और योग निद्रा में जाने का प्रयास करें। योग निद्रा अर्थात शरीर और चेतन मन इस अवस्था में सो जाता है लेकिन अवचेतन मन जाग्रत रहता है। समझाने के लिए कहना होगा कि शरीर और मन सो जाता है लेकिन आप जागे रहते हैं। यह जाग्रत अवस्था जब गहराने लगती है तो आप ईथर माध्‍यम से जुड़ जाते हैं और फिर खुद को निर्देश देकर कुछ भी करने की क्षमता रखते है कुछ लोग अंगूठे को आंखों की सीध में रखकर, तो कुछ लोग स्पाइरल (सम्मोहन चक्र), कुछ लोग घड़ी के पेंडुलम को हिलाते हुए, कुछ लोग लाल बल्ब को एकटक देखते हुए और कुछ लोग मोमबत्ती को एकटक देखते हुए भी उक्त साधना को करते हैं, लेकिन यह कितना सही है यह हम नहीं जानते।;कल्पना करें कि आप कोई बात किसी व्यक्ति को कहने के लिए सोचें और उस तक वह बात पहुंच जाए। बार बार कल्पना करें और अपनी बात को दोहराएं। दोहराने का यह अभ्यास जब गहराएगा तो उस व्यक्ति तक आपके मस्तिष्क की तरंगे पहुंचने लगेगी। यदि आप उसे यहां बुलाना चाहते हैं तो कल्पना में उसका चित्र देखकर उसके बुलाने का संदेश भेजें। धीरे धीरे जब यह प्रयोग कामयाब होने लगेगा तो आपका विश्वास भी बढ़ता जाएगा।इसी तरह आप किसी भी व्यक्ति के होने की स्थिति की पहले कल्पना करते हैं जब वह कल्पना प्रगाड़ होने लगती है तब सही सूचना देने लगती है। कुछ भी बोलने से पहले दिमाग में कुछ तरंगें बनती हैं। जापानी वैज्ञानिकों का कहना है कि उन्होंने इसे डीकोड करना जान लिया है और उनके परिणाम 90 प्रतिशत तक सफल हैं। वैसे, उनका यह प्रयोग सिर्फ जापानी भाषा तक ही सीमित है। लेकिन आश्चर्य नहीं कि इस टेक्नोलॉजी का उपयोग दूसरी भाषाओं में भी संभव होगा।ब्रेन कंप्यूटर विशेषज्ञ प्रो. यामाजाकी तोषिमासा के नेतृत्व में एक टीम ने इलेक्ट्रॉनिक्स, सूचना और संचार इंजीनियर इंस्टीट्यूट द्वारा आयोजित वर्कशॉप में इसका लाइव प्रदर्शन भी किया। उन्होंने साबित किया कि बोले जाने से दो सेकेंड पहले उनकी मशीन उस बात को समझ लेती है जो बोली जाने वाली है। यह टीम दिमाग के एक खास हिस्से की गतिविधियों पर काम कर रही है जिसे चिकित्सा विज्ञान की भाषा में ब्रोका कहते हैं। यह हिस्सा भाषा प्रक्रिया और बोलने से संबंधित है।विचारों से बनता भविष्य भगवान बुद्ध कहते हैं कि आज आप जो भी हैं, वह आपके पिछले विचारों का परिणाम है। विचार ही वस्तु बन जाते हैं। इसका सीधा-सा मतलब यह है कि हम जैसा सोचते हैं, वैसा ही भविष्य का निर्माण करते हैं। यही बात 'दि सीक्रेट' में भी कही गई है और यही बात धम्मपद, गीता, जिनसूत्र और योगसूत्र में कही गई है। इसे आज का विज्ञान आकर्षण का नियम कहता है।संसार को हम पांचों इंद्रियों से ही जानते हैं और कोई दूसरा रास्ता नहीं। जो भी ग्रहण किया गया है, उसका मन और मस्तिष्क पर गहरा प्रभाव पड़ता है। उस प्रभाव से ही 'चित्त' निर्मित होता है और निरंतर परिवर्तित होने वाला होता है। इस चित्त को समझने से ही आपके जीवन का खेल आपको समझ में आने लगेगा। अधिकतर लोग अब इसे समझकर अच्‍छे स्थान, माहौल और लोगों के बीच रहने लगे हैं। वे अपनी सोच को बदलने के लिए ध्यान या पॉजिटिव मोटिवेशन की क्लासेस भी जाने लगे हैं।वैज्ञानिक कहते हैं कि मानव मस्तिष्क में 24 घंटे में लगभग 60 हजार विचार आते हैं। उनमें से ज्यादातर नकारात्मक होते हैं। नकारात्मक विचारों का पलड़ा भारी है तो फिर भविष्य भी वैसा ही होगा और यदि मिश्रित विचार हैं तो मिश्रित भविष्य होगा। अधिकतर लोग नकारात्मक फिल्में, सीरियल और गाने देखते रहते हैं इससे उनका मन और मस्तिष्क वैसा ही निर्मित हो जाता है। वे गंदे या जासूसी उपन्यास पढ़कर भी वैसा ही सोचने लगते हैं। आजकल तो इंटरनेट हैं, जहां हर तरह की नकारात्मक चीजें ढूंढी जा सकती हैं। न्यूज चैनल दिनभर नकारात्मक खबरें ही दिखाते रहते हैं जिन्हें देखकर सामूहिक रूप से समाज का मन और मस्तिष्क खराब होता रहता है। अवस्थाएं हैं- जाग्रत, स्वप्न और सुषुप्ति। उक्त 3 तरह की अवस्थाओं के अलावा हमने और किसी प्रकार की अवस्था को नहीं जाना है। जगत 3 स्तरों वाला है- एक स्थूल जगत जिसकी अनुभूति जाग्रत अवस्था में होती है। दूसरा, सूक्ष्म जगत जिसका स्वप्न में अनुभव करते हैं तथा तीसरा, कारण जगत जिसकी अनुभूति सुषुप्ति में होती है।उक्त तीनों अवस्थाओं में विचार और भाव निरंतर चलते रहते हैं। जो विचार धीरे-धीरे जाने-अनजाने दृढ़ होने लगते हैं वे धारणा का रूप धर लेते हैं। चित्त के लिए अभी कोई वैज्ञानिक शब्द नहीं है लेकिन मान लीजिए कि आपका मन ही आपके लिए जिन्न बन जाता है और वह आपके बस में नहीं है, तब आप क्या करेंगे? धारणा बन गए विचार ही आपके स्वप्न का हिस्सा बन जाते हैं। आप जानते ही हैं कि स्वप्न तो स्वप्न ही होते हैं उनका हकीकत से कोई वास्ता नहीं फिर भी आप वहां उस काल्पनिक दुनिया में उपस्थित होते हैं।इसी तरह बचपन में यदि यह सीखा है कि आत्मा मरने के बाद स्वर्ग या नर्क जाती है और आज भी आप यही मानते हैं तो आप निश्‍चित ही एक काल्पनिक स्वर्ग या नर्क में पहुंच जाएंगे। यदि आपके मन में यह धारणा बैठ गई है कि मरने के बाद व्यक्ति कब्र में ही लेटा रहता है तो आपके साथ वैसा ही होगा। हर धर्म आपको एक अलग धारणा से ग्रसित कर देता है। हालांकि यह तो एक उदाहरण भर है। धर्म आपके चित्त को एक जगह बांधने के लिए निरंतर कुछ पढ़ने या प्रार्थना करने के लिए कहता है।वैज्ञानिकों ने आपके मस्तिष्क की सोच, कल्पना और आपके स्वप्न पर कई तरह के प्रयोग करके जाना है कि आप हजारों तरह की झूठी धारणाओं, भय, आशंकाओं आदि से ग्रसित रहते हैं, जो कि आपके जीवन के लिए जहर की तरह कार्य करते हैं। वैज्ञानिक कहते हैं कि भय के कारण नकारात्मक विचार बहुत तेजी से मस्तिष्क में घर बना लेते हैं और फिर इनको निकालना बहुत ही मुश्किल होता है सम्मोहन अर्धचेतनावस्था में लाया जा सकता है जो समाधि, या स्वप्नावस्था, से मिलती-जुलती होती है, किंतु सम्मोहित अवस्था में मनुष्य की कुछ या सब इंद्रियाँ उसके वश में रहती हैं। वह बोल, चल और लिख सकता है; हिसाब लगा सकता है तथा जाग्रतावस्था में उसके लिए जो कुछ संभव है, वह सब कुछ कर सकता है, किंतु यह सब कार्य वह सम्मोहनकर्ता के सुझाव पर करता है।कभी कभी यह सम्मोहन बिना किसी सुझाव के भी काम करता है और केवल लिखाई और पढ़ाई में भी काम करता है जैसे के फलाने मर्ज की दवा यहाँ मिलती है इस प्रकार के हिप्नोसिस का प्रयोग भारत में ज्यादा होता है सम्मोहन ;विद्या जाता है; दरअसल यौगिक क्रियाओं का उद्देश्य मन को पूर्ण रूप से एकाग्र करके समाधि में लीन कर देना है और इस लीन करने की शक्ति का जो अंश प्राप्त होता है, उसी को सम्मोहन कहते हैं। सम्मोहन की शक्ति प्राप्त करने के.अनेक तरीके इस्तेमाल किए जाते हैं। सम्मोहन का अर्थ आमतौर पर वशीकरण से लगाया जाता है। वशीकरण अर्थात किसी को वश में करने की विद्या, ‍ज‍बकि यह सम्मोहन की प्रतिष्ठा को गिराने वाली बात है। मन के कई स्तर होते हैं। उनमें से एक है आदिम आत्म..चेतन मन। आदिम आत्म चेतन मन न तो विचार करता है और न ही निर्णय लेता है। उक्त मन का संबंध हमारे सूक्ष्म शरीर से होता है। यह मन हमें आने वाले खतरे या उक्त खतरों से बचने के तरीके बताता है। इसे आप छटी...यह मन लगातार हमारी रक्षा करता रहता है। हमें होने वाली बीमारी की यह मन छह माह पूर्व ही सूचना दे देता है और यदि हम बीमार हैं तो यह हमें स्वस्थ रखने का प्रयास करता है। बौद्धिकता और अहंकार के चलते हम उक्त..क्या होगा इस मन को साधने से यह मन आपकी हर तरह की मदद करने के लिए तैयार है, बशर्ते आप इसके प्रति समर्पित हों। यह किसी के भी अतीत और भविष्य को जानने की क्षमता रखता है। आपके साथ घटने वाली घटनाओं;को टालने के उपाय खोज लेंगे। आप स्वयं की ही नहीं दूसरों की बीमारी दूर करने की क्षमता भी हासिल कर सकते हैं। ;सम्मोहन द्वारा मन की एकाग्रता, वाणी का प्रभाव व दृष्टि मात्र से उपासक अपने संकल्प को पूर्ण कर लेता है। इससे विचारों का संप्रेषण (टेलीपैथिक), दूसरे के मनोभावों को ज्ञात करना, अदृश्य वस्तु या आत्मा को.कैसे साधें इस मन को प्राणायम से साधे प्रत्याहार को और प्रत्याहार से धारणा को। जब आपका मन स्थिर चित्त हो, एक ही दिशा में गमन करे और इसका अभ्यास गहराने लगे तब आप अपनी इंद्रियों में ऐसी शक्ति का अनुभव..;ध्यान, प्राणायाम और नेत्र त्राटक द्वारा सम्मोहन की शक्ति को जगाया जा सकता है। त्राटक उपासना को हठयोग में दिव्य साधना से संबोधित किया गया है। आप उक्त साधना के बारे में जानकारी प्राप्त कर किसी योग्य नियमित सूर्य नमस्कार, प्राणायाम और योगनिंद्रा करते हुए ध्यान करें। ध्यान में विपश्यना और नादब्रह्म का उपयोग करें। प्रत्याहार का पालन करते हुए धारणा को साधने का प्रयास करें। संकल्प के प्रबल होने से..धारणा को साधने में आसानी होगी है। संकल्प सधता है अभ्यास के महत्व को समझने से। इसके संबंध में ज्यादा जानकारी के लिए मिलें किसी योग्य योग शिक्षक या सम्मोहनविद से। sabhar : webduniya

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कैंसर के खिलाफ लड़ने के लिए इम्यूनोथेरेपी के जरिए नया इलाज

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ताजा शोध से पता चला है कि कुछ ट्यूमर या कैंसर के अंदर ही प्रतिरक्षा कोशिकाओं की "फैक्ट्रियां" होती हैं. जो शरीर को कैंसर के खिलाफ लड़ने में मदद करती हैं.हाल के वर्षों में डॉक्टरों ने कैंसर के खिलाफ लड़ने के लिए इम्यूनोथेरेपी के जरिए नया इलाज खोजा है. इसमें शरीर के प्रतिरक्षा तंत्र को मजबूत कर उन्हें ट्यूमर से लड़ने लायक बनाया जाता है.यह तकनीक तृतीयक लिम्फॉइड संरचनाएं (टीएलएस) इस इलाज में कारगर साबित हुई हैं. हाल के वर्षों में, डॉक्टरों ने कैंसर, इम्यूनोथेरेपी के नए उपचार की ओर रुख किया है, जो ट्यूमर से लड़ने के लिए शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली का लाभ उठाकर काम करता है. साइंस जर्नल "नेचर" में इस उपचार से संबंधित तीन शोध प्रकाशित हुए हैं. जो दुनिया के अलग देशों के वैज्ञानिकों की ओर से आए हैं.शोध में बताया गया है कि श्वेत रक्त कोशिकाएं या टी-सेल्स ट्यूमर को मारने का काम कैसे करती हैं. कैंसर कोशिकाओं को पहचानने और उन पर हमला करने के लिए यह "प्रशिक्षित" होती हैं. हालांकि यह उपचार केवल 20 प्रतिशत रोगियों पर ही बेहतर काम कर रहा है. शोधकर्ता यह समझने की कोशिश कर रहे हैं कि क्यों कुछ ही मरीज इस इलाज में बेहतर परिणाम दे रहे हैं.वैज्ञानिकों ने बताया कि ट्यूमर या कैंसर पर बनी कुछ कोशिकीय संरचनाएं शरीर को कैंसर से लड़ने में मदद करने के लिए "कारखानों या स्कूलों" जैसे काम करती हैं. पेरिस डेकार्टी यूनिवर्सिटी मेडिकल स्कूल के कॉर्डेलिए रिसर्च सेंटर में इम्यूनोलॉजी के प्रोफेसर वुल्फ फ्रीडमैन ने समाचार एजेंसी एएफपी से बातचीत में कहा, "इन टी-कोशिकाओं को तृतीयक लिम्फॉइड संरचनाओं के 'स्कूलों' में शिक्षित करने की आवश्यकता है. जहां वे प्रभावी रूप से कैंसर कोशिकाओं को पहचाकर उन पर हमला करना सीख सकते हैं.रिसर्च का निष्कर्ष है कि केवल टी-सेल ही कैंसर से लड़ने में सक्षम नहीं हैं बल्कि ऐसे कुछ और एजेंट भी शरीर में हैं. शोधकर्ताओं ने पाया कि तृतीयक लिम्फॉइड संरचनाएं या टीएलएस, बी-सेल से भरी हुई थीं, जो भी एंटीबॉडी का उत्पादन करने वाली एक तरह की प्रतिरक्षा कोशिकाएं हैं. प्रोफेसर फ्रीडमैन ने बताया, "हम 15 साल से टी-सेल से ही कैंसर को खत्म करने के आदी बन चुके हैं. हमने यह देखने के लिए सारकोमा जैसे कैंसर का विश्लेषण किया कि उनके पास कौन से समूह हैं. जो कैंसर से लड़ सकते हैं. इसके परिणामस्वरूप हमारे पास बी-कोशिकाएं आईं.अमेरिका की टेक्सास यूनिवर्सिटी के एंडरसन कैंसर सेंटर में सर्जिकल ऑन्कोलॉजी विभाग की डॉक्टर बेथ हेल्मिंक कहती हैं कि इस खोज ने इम्यूनोथेरेपी में बी-कोशिकाओं से जुड़ी धारणाओं को बदल दिया है. बेथ के मुताबिक, "इन अध्ययनों के माध्यम से हमने पाया कि बी-कोशिकाएं ट्यूमर-विरोधी प्रतिरक्षा प्रतिक्रिया के लिए एक सार्थक तरीके से योगदान दे रही हैं."इस खोज में कई आश्चर्यजनक बातें सामने आई हैं. पहले कैंसर रोगियों में बी-कोशिकाओं की बहुतायत को ज्यादातर खराब रोग के रूप में देखा जाता रहा है. इसके उलट अध्ययन में पाया गया कि उनके ट्यूमर में टीएलएस के अंदर बी- कोशिकाओं के उच्च स्तर वाले रोगियों में इम्यूनोथेरेपी के लिए अच्छी प्रतिक्रिया की संभावना होती हैं.बार्ट्स एंड लंदन स्कूल ऑफ मेडिसिन एंड डेंटिस्ट्री में लेक्चरर लुईसा जेम्स कहती हैं, "अध्ययन की यह श्रृंखला रोमांचक इसलिए भी है क्योंकि यह विभिन्न प्रकार के कैंसर के उपचार में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकने में सक्षम है. हालांकि जेम्स इस अध्ययन में शामिल नहीं थीं, उन्होंने इस शोध को पढ़ने के बाद कहा, "कम समय में ही इस शोध के परिणामस्वरूप रोगियों को इम्यूनोथेरेपी से लाभ होने की संभावना के लिए नया टूल मिल जाएगा. जिससे भविष्य में बेहतर उपचार का मार्ग भी प्रशस्त हो सकता है."हालांकि अभी भी कई प्रश्न हैं जिनके उत्तर नहीं मिल पाए हैं. जैसे कि ऐसी संरचनाएं कुछ ही तरह के ट्यूमर में क्यों बनती हैं और बाकी में नहीं. यह स्पष्ट हो गया है कि इन्ही संरचनाओं के अंदर पाई जाने वाली बी-कोशिकाएं इम्यूनोथेरेपी की सफलता में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं, लेकिन ऐसा कैसे होता है इसका उत्तर अब तक वैज्ञानिकों के पास नहीं हैयह हो सकता है कि बी-कोशिकाएं कैंसर कोशिकाओं से लड़ने के लिए आगे आती हों और एंटीबॉडी का निर्माण करती हों. सभी टीएलएस समान नहीं होते. शोधकर्ताओं ने कोशिकाओं की तीन श्रेणियां पाईं लेकिन केवल एक कोशिका कैंसर को मात देने में "परिपक्व" पाई गई.विशेषज्ञों का कहना है कि इस रिसर्च ने कई आशाजनक रास्ते खोले हैं. यह शोध डॉक्टरों को उन मरीजों का इलाज करने में मदद कर सकता है जो इम्यूनोथेरेपी के लिए अच्छी प्रतिक्रियाएं देते हैं. स्वीडन के लुंथ विश्वविद्यालय में ऑन्कोलॉजी और पैथोलॉजी के प्रोफेसर गोरान जॉनसन ने इनमें से एक अध्ययन पर काम किया है. जॉनसन बताते हैं, "अगर कोई ऐसा उपचार विकसित किया जा सके जिससे टीएलएस के निर्माण को बढ़ाया जा सके, तो हम इसे आजकल की इम्यूनोथेरेपी रेजिमेंट के साथ जोड़ कर इलाज कर सकते हैं." उनका मानना है कि इससे ज्यादा से ज्यादा रोगियों में इम्यूनोथेरेपी का असर दिखेगा." sabhar : dw.de

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क्या एक दिन आप 3डी प्रिंटर पर बनी कार चलाएँगे

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क्या एक दिन आप 3डी प्रिंटर पर बनी कार चलाएँगे? कार टेकनोलॉजी से जुड़े ताज़ा शोध इस पूरे उद्योग में क्रांतिकारी बदलाव लाने जा रहे हैं और ये बिलकुल संभव है कि आप आने वाले समय में 3डी प्रिंटर पर बनी कार ही चलाएँ.अमरीकी ऊर्जा विभाग की प्रयोगशाला ओक रिज नेशनल ने 3डी प्रिंटर पर न केवल स्पोर्ट्स कार बनाई बल्कि 2015 के डीट्रॉयट ऑटो शो में इसे प्रदर्शित भी किया है.पहली नजर में तैयार की गई शेलबी कोबरा कार आम स्पोर्ट्स कार जैसी ही लगती है, चाहे ये प्लास्टिक से बनी है. हालांकि ये स्टील से भी बनाई जा सकती है.इसमें कहीं भी स्टील के पैनल का इस्तेमाल नहीं हुआ है. ये कार 85 मील प्रति घंटे की रफ्तार से चलाई जा सकती है थ्री-डायमेंशनल तरीके से कार प्रिंटिंग?थ्री डायमेंशनल प्रिटिंग वो नई तकनीक है जिसके इस्तेमाल में पहले कंप्यूटर में डिज़ाइन बनाया जाता है.फिर उक्त कमांड के ज़रिए 3डी प्रिंटर, या ये कहें कि इंडस्ट्रियल रोबोट उस डिज़ाइन को, सही पदार्थ (मेटीरियल) का इस्तेमाल करते हुए परत दर परत प्रिंट करता है या बनाता है.इस प्रयोग में पिघले हुए प्लास्टिक का इस्तेमाल करते हुए उसे मनचाहा आकार दिया जाता है. ऐसा मेटल से भी किया जा सकता है.इस तकनीक को अंजाम देने वाले उपकरण को थ्री-डी प्रिंटर या फिर इंडस्ट्रियल रोबोट कहा जाता है.छह सप्ताह में कार तैयारइस लैब के डॉक्टर चैड ड्यूटी नेबीबीसी फ्यूचर को बताया, "हमने इसे प्लास्टिक की परतों से बनाया है. 24 घंटे में प्लास्टिक से बॉडी को प्रिंट किया (बनाया) जा सकता है."वो बताते हैं, "बाद में इसमें इंजन और उपरी बाडी, लाइट, ब्रेक, गियर, और अन्य चीजों को असेंबल किया जाता है. कुल 6 सप्ताह में 6 लोग ऐसी कार तैयार कर लेते हैं. ख़ास बात यह है कि इसको बाद में डि-असेंबल कर पूरी तरह से अलग किया जा सकता है."दरअसल प्लास्टिक की परत दर परत प्रिंट करके कार तैयार करने का मतलब केवल ढांचा तैयार करना नहीं, बल्कि कार के अलग अलग हिस्सों को थ्री-डायमेंशनल प्रिटिंग के जरिए पहले प्रिंट करना और फिर उन्हें असेंबल करना हैज़ाहिर है ये कार फ़िलहाल बिक्री के लिए नहीं बनी है. इसे प्रयोग के दौरान तैयार किया गया है. लेकिन इसने दूसरे कार निर्माताओं को ऐसी कार तैयार करने का विकल्प तो दे ही दिया है.बेहद सस्ती होगी कारअमरीकी कार निर्माता लोकल मोटर ने प्रिंट करके कार को तैयार किया है जिसे डीट्रॉयट ऑटो शो में प्रदर्शित किया गया.लोकल मोटर्स के जे रोजर्स कहते हैं, "इस कार को बनाना आसान है और ये काफी कम खर्चे में बनाई जा सकती है. इसके रख रखाव का खर्च भी बेहद कम हो जाता है. मेरे ख्याल से यही भविष्य की कार होगी.ऐसे में जाहिर है कि ऑटोमोटिव इंडस्ट्री एक नए युग के लिए तैयारी करती दिख रही है.sabhar bbc.co.uk

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