विक्रमादित्य ने संपूर्ण भारत को जीता सबसे प्रथम चरण में विक्रमादित्य ने मालवा के शकों को पराजित किया शक मालवा से गुजरात भाग गए तो फिर विक्रमादित्य ने शकों को गुजरात में पराजित किया यहां से शक सिंध भाग गए तो विक्रमादित्य ने सिंध में शकों को पराजित किया और शकों को भारत से बड़ी दूर खदेड़ दिया द्वितीय चरण में राजा विक्रमादित्य ने मध्य भारत का मध्य देश का अभियान किया और मालवा से आगे बढ़कर के मत्स्य देश को जीता जो कि राजस्थान में था यहां से कुरु जनपद को जीता जो कि हरियाणा और दिल्ली के आसपास था वहां से पांचाल जनपद को जीता जो कि उत्तर प्रदेश में था यहां से मथुरा को जीता जो कि उत्तर प्रदेश में था और आगे बढ़कर के प्रयाग तक अपने साम्राज्य का विस्तार किया प्रयाग जीतने के उपरांत राजा विक्रमादित्य पूर्वी भारत की ओर आगे बढ़े और इन्होंने पूर्व दिग को जीता पूर्व दिग यानी पूरे उत्तर प्रदेश को जीत लिया फिर अंग को जीता यानि बिहार को जीता गोंड को जीता अर्थात आज के बंगाल को जीता बंग को जीता अर्थात आज के बांग्लादेश को जीता और कलिंग को जीता अर्थात आज के उड़ीसा को जीता फिर उन्होंने दक्षिण भारत का अभियान किया और दक्षिण भारत के क्रम में उज्जैन से उन्होंने अपरांत को जीता अपरांत अर्थात कोकण वाला क्षेत्र अपरांत को जीतने के उपरांत उन्होंने विदर्भ को जीता नागपुर के आसपास का क्षेत्र विदर्भ को जीतने के उपरांत उन्होंने आंध्र को जीता आंध्र प्रदेश का क्षेत्र और फिर उन्होंने कुंतल को जीता कुंतल अर्थात आज का कर्नाटक का प्रदेश इसके बाद राजा विक्रमादित्य ने सिंहलद्वीप को जीता सिंहलद्वीप यानी श्रीलंका का क्षेत्र और सिंहलद्वीप को जीतने के उपरांत उन्होंने हिंद महासागर के कई द्वीपों को जीता और फिर उन्होंने भारत के पश्चिमोत्तर क्षेत्र पर आक्रमण किया और यहां रहने वाले विदेशियों को भारत से पूरी तरीके से उखाड़ फेंका पश्चिमोत्तर भारत की विजय में राजा विक्रमादित्य ने कश्मीर जीता कौवेरी और काष्ठा जीता कौवेरी और काष्ठा का क्षेत्र माना गया है हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड में रहा होगा फिर उन्होंने मलेच्छों को पराजित किया अर्थात शकों को पराजित किया मलेच्छों को पराजित करने के उपरांत उन्होंने यवनों को पराजित किया और यवनों को पराजित करने के उपरांत उन्होंने तुषारों को पराजित किया तुषार अर्थात कुषाणों को पराजित किया तुषारों को पराजित करने के उपरांत वह ईरान की सीमा तक पहुंच गए और वहां उन्होंने पार्थियन अर्थात पहलवों को पराजित किया तो ये सारी बातें काल्पनिक नहीं ये जानकारी हमें प्राप्त होती है सोमदेव की पुस्तक कथा सरित सागर से और छेेंद्र की पुस्तक बृहत कथा मंजरी से अब यह दुर्भाग्य है कि हरिसेन की प्रयाग प्रशस्ति में यदि यह कहा गया है कि समुद्रगुप्त ने पूरे भारत को कई चरणों में जीता था तो हरिसेन ने जो कुछ भी लिखा है उसे इतिहास में सत्य मान लिया गया है और कथा सरित सागर और छेेंद्र की पुस्तक बृहत कथा मंजरी में राजा विक्रमादित्य के विजय अभियान के विषय में जो लिखा गया उसे लंबे समय तक ऐतिहासिक तथ्य नहीं माना गया मैंने आपको यह भी बताया था कि तुर्की की राजधानी इस्तांबुल की एक राजकीय लाइब्रेरी में जिसका नाम है मकतब ए- सुल्तानिया वहां आठवीं शताब्दी ईसवी में अरबी भाषा में लिखा गया एक ग्रंथ है ग्रंथ का नाम है से अरुल ओकुल उस ग्रंथ की रचना आठवीं शताब्दी ईवी में अरबी भाषा में अबू उमर अब्दुल्ला असमई के द्वारा की गई थी और उसमें अरबी में कई कविताएं हैं उनमें से एक कविता का हिंदी में अर्थ यह है कि अरब के लोग राजा विक्रमादित्य को धन्यवाद दे रहे हैं कि धन्य है राजा विक्रमादित्य जिन्होंने हमारे देश को जो अंधकार में डूब चुका था यहां उन्होंने भारतीय धर्म ज्ञान और संस्कृति का प्रचार प्रसार करने के लिए विद्वानों को भेजा और जिसके कारण हमारे देश का अंधकार दूर हुआ और हम एक नए ज्ञान नई संस्कृति और नई विधा से परिचित हुए जिससे हमारे देश का उत्थान हुआ तो सोचो इससे यह हमें समझ में आता है कि राजा विक्रमादित्य का प्रभाव क्षेत्र अरब तक रहा होगा साभार akar IAS

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