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बुधवार, 29 जून 2022

कहानी राजा भरथरी (भर्तृहरि) की

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उज्जैन में  भरथरी  की गुफा स्थित है।  इसके संबंध में यह माना जाता है कि यहां भरथरी ने तपस्या की थी। यह गुफा शहर से बाहर एक सुनसान इलाके में है।  गुफा के पास ही शिप्रा नदी बह रही है। 


गुफा के अंदर जाने का रास्ता काफी छोटा है। जब हम इस गुफा के अंदर जाते हैं तो सांस लेने में भी कठिनाई महसूस होती है। गुफा की ऊंचाई भी काफी कम है, अत: अंदर जाते समय काफी सावधानी रखनी होती है।  यहाँ पर एक गुफा और है जो कि पहली गुफा से छोटी है। यह  गोपीचन्द कि गुफा है जो कि भरथरी का भतीजा था।


यहां प्रकाश भी काफी कम है, अंदर रोशनी के लिए बल्ब लगे हुए हैं। इसके बावजूद गुफा में अंधेरा दिखाई देता है। यदि किसी व्यक्ति को डर लगता है तो उसे गुफा के अंदर अकेले जाने में भी डर लगेगा।


 यहां की छत बड़े-बड़े पत्थरों के सहारे टिकी हुई है। गुफा के अंत में राजा भर्तृहरि की प्रतिमा है और उस प्रतिमा के पास ही एक और गुफा का रास्ता है। इस दूसरी गुफा के विषय में ऐसा माना जाता है कि यहां से चारों धामों का रास्ता है। गुफा में भर्तृहरि की प्रतिमा के सामने एक धुनी भी है, जिसकी राख हमेशा गर्म ही रहती है।


गौर से देखने पर आपको गुफा के अंत में एक गुप्त रास्ता दिखाई देगा जिसके बारे में कहा जाता है कि यहाँ से चारो धामों को रास्ता जाता है।


पत्नी के धोखे से आहत राजा भरथरी के साधू बनने कि कहानी :-


उज्जैन को उज्जयिनी के नाम से भी जाना जाता था। उज्जयिनी शहर के परम प्रतापी राजा हुए थे विक्रमादित्य। विक्रमादित्य के पिता महाराज गंधर्वसेन थे और उनकी दो पत्नियां थीं। एक पत्नी के पुत्र विक्रमादित्य और दूसरी पत्नी के पुत्र थे भर्तृहरि। 


गंधर्वसेन के बाद उज्जैन का राजपाठ भर्तृहरि को प्राप्त हुआ, क्योंकि भरथरी विक्रमादित्य से बड़े थे। राजा भर्तृहरि धर्म और नीतिशास्त्र के ज्ञाता थे। प्रचलित कथाओं के अनुसार भरथरी की दो पत्नियां थीं, लेकिन फिर भी उन्होंने तीसरा विवाह किया पिंगला से।  पिंगला बहुत सुंदर थीं और इसी वजह से भरथरी तीसरी पत्नी पर अत्यधिक मोहित हो गए थे।


कथाओं के अनुसार भरथरी अपनी तीसरी पत्नी पिंगला पर काफी मोहित थे और वे उस पर अंधा विश्वास करते थे। राजा पत्नी मोह में अपने कर्तव्यों को भी भूल गए थे। उस समय उज्जैन में एक तपस्वी गुरु गोरखनाथ का आगमन हुआ।


 गोरखनाथ राजा के दरबार में पहुंचे। भरथरी ने गोरखनाथ का उचित आदर-सत्कार किया। इससे तपस्वी गुरु अति प्रसन्न हुए। प्रसन्न होकर गोरखनाथ ने राजा एक फल दिया और कहा कि यह खाने से वह सदैव जवान बने रहेंगे, कभी बुढ़ापा नहीं आएगा, सदैव सुंदरता बनी रहेगी।


यह चमत्कारी फल देकर गोरखनाथ वहां से चले गए। राजा ने फल लेकर सोचा कि उन्हें जवानी और सुंदरता की क्या आवश्यकता है। चूंकि राजा अपनी तीसरी पत्नी पर अत्यधिक मोहित थे, अत: उन्होंने सोचा कि यदि यह फल पिंगला खा लेगी तो वह सदैव सुंदर और जवान बनी रहेगी। 


यह सोचकर राजा ने पिंगला को वह फल दे दिया। रानी पिंगला भर्तृहरि पर नहीं बल्कि उसके राज्य के कोतवाल पर मोहित थी। यह बात राजा नहीं जानते थे। जब राजा ने वह चमत्कारी फल रानी को दिया तो रानी ने सोचा कि यह फल यदि कोतवाल खाएगा तो वह लंबे समय तक उसकी इच्छाओं की पूर्ति कर सकेगा। 


रानी ने यह सोचकर चमत्कारी फल कोतवाल को दे दिया। वह कोतवाल एक वैश्या से प्रेम करता था और उसने चमत्कारी फल उसे दे दिया। ताकि वैश्या सदैव जवान और सुंदर बनी रहे। 


वैश्या ने फल पाकर सोचा कि यदि वह जवान और सुंदर बनी रहेगी तो उसे यह गंदा काम हमेशा करना पड़ेगा। नर्क समान जीवन से मुक्ति नहीं मिलेगी। इस फल की सबसे ज्यादा जरूरत हमारे राजा को है। राजा हमेशा जवान रहेगा तो लंबे समय तक प्रजा को सभी सुख-सुविधाएं देता रहेगा। यह सोचकर उसने चमत्कारी फल राजा को दे दिया। राजा वह फल देखकर हतप्रभ रह गए।


राजा ने वैश्या से पूछा कि यह फल उसे कहा से प्राप्त हुआ। वैश्या ने बताया कि यह फल उसे कोतवाल ने दिया है। भरथरी ने तुरंत कोतवाल को बुलवा लिया। सख्ती से पूछने पर कोतवाल ने बताया कि यह फल उसे रानी पिंगला ने दिया है। 


जब भरथरी को पूरी सच्चाई मालूम हुई तो वह समझ गया कि पिंगला उसे धोखा दे रही है। पत्नी के धोखे से भरथरी के मन में वैराग्य जाग गया और वे अपना संपूर्ण राज्य विक्रमादित्य को सौंपकर उज्जैन की एक गुफा में आ गए। इसी गुफा में भरथरी ने 12  वर्षों तक तपस्या की थी।


राजा भरथरी की कठोर तपस्या से देवराज इंद्र भयभीत हो गए। इंद्र ने सोचा की भरथरी वरदान पाकर स्वर्ग पर आक्रमण करेंगे। यह सोचकर इंद्र ने भरथरी पर एक विशाल पत्थर गिरा दिया। तपस्या में बैठे भरथरी ने उस पत्थर को एक हाथ से रोक लिया और तपस्या में बैठे रहे। 


इसी प्रकार कई वर्षों तक तपस्या करने से उस पत्थर पर भरथरी के पंजे का निशान बन गया। यह निशान आज भी भरथरी की गुफा में राजा की प्रतिमा के ऊपर वाले पत्थर पर दिखाई देता है। यह पंजे का निशान काफी बड़ा है, जिसे देखकर सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है कि राजा भरथरी की कद-काठी कितनी विशालकाय रही होगी।


भरथरी ने वैराग्य पर वैराग्य शतक की रचना की, जो कि काफी प्रसिद्ध है। इसके साथ ही भरथरी ने श्रृंगार शतक और नीति शतक की भी रचना की। यह तीनों ही शतक आज भी उपलब्ध हैं और पढ़ने योग्य है।


उज्जैन के राजा भरथरी के पास 365 पाकशास्त्री यानि रसोइए थे, जो राजा और उसके परिवार और अतिथियों के लिए भोजन बनाने के लिए। एक रसोइए को वर्ष में केवल एक ही बार भोजन बनाने का मोका मिलता था। लेकिन इस दौरान भरथरी जब गुरु गोरखनाथ जी के चरणों में चले गये तो भिक्षा मांगकर खाने लगे  थे।


एक बार गुरु गोरखनाथजी ने अपने शिष्यों से कहा, ‘देखो, राजा होकर भी इसने काम, क्रोध, लोभ तथा अहंकार को जीत लिया है और दृढ़निश्चयी है।‘ शिष्यों ने कहा, ‘गुरुजी ! ये तो राजाधिराज हैं, इनके यहां 365 तो बावर्ची रहते थे। 


ऐसे भोग विलास के वातावरण में से आए हुए राजा और कैसे काम, क्रोध, लोभ रहित हो गए?’ 


गुरु गोरखनाथ जी ने राजा भरथरी से कहा, ‘भरथरी! जाओ, भंडारे के लिए जंगल से लकड़ियां ले आओ।’ राजा भरथरी नंगे पैर गए, जंगल से लकड़ियां एकत्रित करके सिर पर बोझ उठाकर ला रहे थे। 


गोरखनाथ जी ने दूसरे शिष्यों से कहा, ‘जाओ, उसको ऐसा धक्का मारो कि बोझ गिर जाए।‘ चेले गए और ऐसा धक्का मारा कि बोझ गिर गया और भरथरी गिर गए। भरथरी ने बोझ उठाया, लेकिन न चेहरे पर शिकन, न आंखों में आग के गोले, न होंठ फड़के। गुरु जी ने चेलों से क, ‘देखा! भरथरी ने क्रोध को जीत लिया है।’


शिष्य बोले, ‘गुरुजी! अभी तो और भी परीक्षा लेनी चाहिए।’ थोड़ा सा आगे जाते ही गुरुजी ने योगशक्ति से एक महल रच दिया। गोरखनाथ जी भरथरी को महल दिखा रहे थे। युवतियां नाना प्रकार के व्यंजन आदि से सेवक उनका आदर सत्कार करने लगे। भरथरी युवतियों को देखकर कामी भी नहीं हुए और उनके नखरों पर क्रोधित भी नहीं हुए, चलते ही गए।


गोरखनाथजी ने शिष्यों को कहा, अब तो तुम लोगों को विश्वास हो ही गया है कि भरथरी े काम, क्रोध, लोभ आदि को जीत लिया है।


 शिष्यों ने कहा, गुरुदेव एक परीक्षा और लीजिए। गोरखनाथजी ने कहा, अच्छा भरथरी  हमारा शिष्य बनने के लिए परीक्षा से गुजरना पड़ता है। जाओ, तुमको एक महीना मरुभूमि में नंगे पैर पैदल यात्रा करनी होगी।’


 भरथरी अपने  निर्दिष्ट मार्ग पर चल पड़े। पहाड़ी इलाका लांघते-लांघते राजस्थान  की मरुभूमि में पहुंचे। धधकती बालू, कड़ाके की धूप मरुभूमि में पैर रखो तो बस जल जाए। एक दिन, दो दिन यात्रा करते-करते छः दिन बीत गए।


 सातवें दिन गुरु गोरखनाथजी अदृश्य शक्ति से अपने प्रिय चेलों को भी साथ लेकर वहां पहुंचे। गोरखनाथ जी बोले, ‘देखो, यह भरथरी जा रहा है। मैं अभी योगबल से वृक्ष खड़ा कर देता हूं। वृक्ष की छाया में भी नहीं बैठेगा।’ अचानक वृक्ष खड़ा कर दिया। चलते-चलते भरथरी का पैर वृक्ष की छाया पर आ गया तो ऐसे उछल पड़े, मानो अंगारों पर पैर पड़ गया हो।


‘मरुभूमि में वृक्ष कैसे आ गया?  छायावाले वृक्ष के नीचे पैर कैसे आ गया? गुरु जी की आज्ञा थी मरुभूमि में यात्रा करने की।’ कूदकर दूर हट गए। गुरु जी प्रसन्न हो गए कि देखो! कैसे गुरु की आज्ञा मानता है। जिसने कभी पैर गलीचे से नीचे नहीं रखा, वह मरुभूमि में चलते-चलते पेड़ की छाया का स्पर्श होने से अंगारे जैसा एहसास करता है।’


 गोरखनाथ जी दिल में चेले की दृढ़ता पर बड़े खुश हुए, लेकिन और शिष्यों के मन में ईर्ष्या थी। शिष्य बोले, ‘गुरुजी! यह तो ठीक है लेकिन अभी तो परीक्षा पूरी नहीं हुई।’ गोरखनाथ जी (रूप बदल कर) भर्तृहरि से मिले और बोले, ‘जरा छाया का उपयोग कर लो।’ भरथरी बोले, ‘नहीं, मेरे गुरुजी की आज्ञा है कि नंगे पैर मरुभूमि में चलूं।’


 गोरखनाथ जी ने सोचा, ‘अच्छा! कितना चलते हो देखते हैं।’ थोड़ा आगे गए तो गोरखनाथ जी ने योगबल से कांटे पैदा कर दिए। ऐसी कंटीली झाड़ी कि कंथा (फटे-पुराने कपड़ों को जोड़कर बनाया हुआ वस्त्र) फट गया। पैरों में शूल चुभने लगे, फिर भी भरथरी ने ‘आह’ तक नहीं की।


 भरथरी तो और अंतर्मुख हो गए, ’यह सब सपना है, गुरु जी ने जो आदेश दिया है, वही तपस्या है। यह भी गुरुजी की कृपा है’।


अंतिम परीक्षा के लिए गुरु गोरखनाथ जी ने अपने योगबल से प्रबल ताप पैदा किया। प्यास के मारे भरथरी के प्राण कंठ तक आ गये। तभी गोरखनाथ जी ने उनके अत्यन्त समीप एक हरा-भरा वृक्ष खड़ा कर दिया, जिसके नीचे पानी से भरी सुराही और सोने की प्याली रखी थी।


 एक बार तो भर्तृहरि ने उसकी ओर देखा पर तुरंत ख्याल आया कि कहीं गुरु आज्ञा भंग तो नहीं हो रही है। उनका इतना सोचना ही हुआ कि सामने से गोरखनाथ आते दिखाई दिए।


 भरथरी ने दंडवत प्रणाम किया। गुरुजी बोले, ”शाबाश भरथरी, वर मांग लो। अष्टसिद्धि दे दूं, नवनिधि दे दूं। तुमने सुंदर-सुंदर व्यंजन ठुकरा दिए, युवतियां तुम्हारे चरण पखारने के लिए तैयार थीं, लेकिन तुम उनके चक्कर में नहीं आए। तुम्हें जो मांगना है, वो मांग लो। 


भर्तृहरि बोले, ‘गुरुजी! बस आप प्रसन्न हैं, मुझे सब कुछ मिल गया। शिष्य के लिए गुरु की प्रसन्नता सब कुछ है। आप मुझसे संतुष्ट हुए, मेरे करोड़ों पुण्यकर्म और यज्ञ, तप सब सफल हो गए।’ गोरखनाथ बोले, ‘नहीं भरथरी! अनादर मत करो। तुम्हें कुछ-न-कुछ तो लेना ही पड़ेगा, कुछ-न-कुछ मांगना ही पड़ेगा।’ इतने में रेती में एक चमचमाती हुई सूई दिखाई दी। उसे उठाकर भरथरी बोले, ‘गुरुजी! कंठा फट गया है, सूई में यह धागा पिरो दीजिए ताकि मैं अपना कंठा सी लूं।’


गोरखनाथ जी और खुश हुए कि ’हद हो गई! कितना निरपेक्ष है, अष्टसिद्धि-नवनिधियां कुछ नहीं चाहिए। मैंने कहा कुछ मांगो, तो बोलता है कि सूई में जरा धागा डाल दो। गुरु का वचन रख लिया। कोई अपेक्षा नहीं? भर्तृहरि तुम धन्य हो गए! कहां उज्जयिनी का सम्राट नंगे पैर मरुभूमि में। एक महीना भी नहीं होने दिया, सात-आठ दिन में ही परीक्षा से उत्तीर्ण हो गए।’

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शनिवार, 25 जून 2022

श्री होयसलेश्व मन्दिर, हलेबीदु, कर्नाटक

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 सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड जिनकी शक्ति से संचालित है उन देवाधिदेव महादेव का अद्वितीय मन्दिर,



होयसल साम्राज्य के राजा विष्णुवर्धन द्वारा एक मानव निर्मित कृत्रिम झील के किनारे होयसलेश्व मन्दिर का निर्माण १२ वीं सदी में करवाया गया था।


श्री होयसलेश्व मन्दिर भगवान शिव को समर्पित है।


श्री होयसलेश्व मन्दिर का निर्माण soapstone पत्थरों से किया गया है।


इस मन्दिर का कोई भी एक फीट स्थान कलाकृतियों से रहित नहीं है।


कितना श्रमसाध्य रहा होगा यह कार्य जिन्हें सनातनी शिल्पकारों ने अपने निपुण हाथों से सम्भव किये हैं।


इस दिव्य कला को शुक्रवारी ने कलाकारों के हाथों को काटकर और पुस्तकालयों को जलाकर लुप्त कर दिया।


जो कुछ शेष कला बचा उसे इतवारियों ने ग्रँथ चौर्य कर निर्लज्जता से अपने नाम करवा लिया।


अद्भुत सनातन धरोहर!!


जय सनातन धर्म🙏🚩


जय महाकाल🔱🚩

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शुक्रवार, 24 जून 2022

शिखा बन्धन (चोटी) रखने का महत्त्व

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 #अच्छे काम के लिए सिर्फ #सलाह दी जाती है #दबाव नहीं


#शिखा_बन्धन (#चोटी) रखने का महत्त्व

शिखा का महत्त्व विदेशी जान गए हिन्दू भूल गए।

हिन्दू धर्म का छोटे से छोटा सिध्दांत, छोटी-से-छोटी बात भी अपनी जगह पूर्ण और कल्याणकारी हैं। छोटी सी शिखा अर्थात् चोटी भी कल्याण, विकास का साधन बनकर अपनी पूर्णता व आवश्यकता को दर्शाती हैं। शिखा का त्याग करना मानो अपने कल्याणका त्याग करना हैं। जैसे घङी के छोटे पुर्जे कीजगह बडा पुर्जा काम नहीं कर सकता क्योंकि भले वह छोटा हैं परन्तु उसकी अपनी महत्ता है। 


शिखा न रखने से हम जिस लाभ से वंचित रह जाते हैं, उसकी पूर्ति अन्य किसी साधन से नहीं हो सकती।


'हरिवंश पुराण' में एक कथा आती है हैहय व तालजंघ वंश के राजाओं ने शक, यवन, काम्बोज पारद आदि राजाओं को साथ लेकर राजा बाहू का राज्य छीन लिया। राजा बाहु अपनी पत्नी के साथ वन में चला गया। वहाँ राजा की मृत्यु हो गयी। महर्षिऔर्व ने उसकी गर्भवती पत्नी की रक्षा की और उसे अपने आश्रम में ले आये। वहाँ उसने एक पुत्र को जन्म दिया, जो आगे चलकर राजा सगर के नाम से प्रसिद्ध हुआ। राजासगर ने महर्षि और्व से शस्त्र और शास्त्र विद्या सीखीं। समय पाकर राजा सगरने हैहयों को मार डाला और फिर शक, यवन, काम्बोज, पारद, आदि राजाओं को भी मारने का निश्चय किया। ये शक, यवन आदि राजा महर्षि वसिष्ठ की शरण में चले गये। महर्षि वसिष्ठ ने उन्हें कुछ शर्तों पर उन्हें अभयदान दे दिया। और सगर को आज्ञा दी कि वे उनको न मारे। राजा सगर अपनी प्रतिज्ञा भी नहीं छोङ सकते थे और महर्षि वसिष्ठ जी की आज्ञा भी नहीं टाल सकते थे। अत: उन्होंने उन राजाओं का सिर शिखा सहित मुँडवाकर उनकों छोङ दिया। 


प्राचीन काल में किसीकी शिखा काट देना मृत्युदण्ड के समान माना जाता था। बङे दुख की बात हैं कि आज हिन्दु लोग अपने हाथों से अपनी शिखा काट रहे है। यह गुलामी की पहचान हैं। 

    

शिखा हिन्दुत्व की पहचान हैं। यह आपके धर्म और संस्कृतिकी रक्षक हैं। शिखा के विशेष महत्व के कारण ही हिन्दुओं ने यवन शासन के दौरान अपनी शिखा की रक्षा के लिए सिर कटवा दिये पर शिखा नहीं कटवायी।


डा॰ हाय्वमन कहते है ''मैने कई वर्ष भारत में रहकर भारतीय संस्कृति का अध्ययन किया हैं, यहाँ के निवासी बहुत काल से चोटी रखते हैं , जिसका वर्णन वेदों में भी मिलता हैं। दक्षिण भारत में तो आधे सिर पर 'गोखुर' के समान चोटी रखते हैं । उनकी बुध्दि की विलक्षणता देखकर मैं अत्यंत प्रभावित हुआ हुँ। अवश्य ही बौध्दिक विकास में चोटी बड़ी सहायता देती हैं। सिर पर चोटी रखना बढा लाभदायक हैं। मेरा तो हिन्दु धर्म में अगाध विश्वास हैं और मैं चोटी रखने का कायल हो गया हूँ । 


"प्रसिद्ध वैज्ञानिक डा॰ आई॰ ई क्लार्क एम॰ डी ने कहा हैं " मैंने जबसे इस विज्ञान की खोज की हैं तब से मुझे विश्वास हो गया हैं कि हिन्दुओं का हर एक नियम विज्ञान से परिपूर्ण हैं। चोटी रखना हिन्दू धर्म ही नहीं, सुषुम्ना के केद्रों की रक्षा के लिये ऋषि-मुनियों की खोज का विलक्षण चमत्कार हैं।


"इसी प्रकार पाश्चात्य विद्वान मि॰ अर्ल थामस लिखते हैं की "सुषुम्ना की रक्षा हिन्दु लोग चोटी रखकर करते हैं जबकि अन्य देशों में लोग सिर पर लम्बे बाल रखकर या हैट पहनकर करते हैं। इन सब में चोटी रखना सबसे लाभकारी हैं। किसी भी प्रकार से सुषुम्ना की रक्षा करना जरुरी हैं।


"वास्तव में मानव-शरीर को प्रकृति ने इतना सबल बनाया हैं की वह बड़े से बड़े आघात को भी सहन करके रह जाता हैं परन्तु शरीर में कुछ ऐसे भी स्थान हैं जिन पर आघात होने से मनुष्य की तत्काल मृत्यु हो सकती हैं। इन्हें मर्म-स्थान कहाजाता हैं। 


शिखा के अधोभाग में भी मर्म-स्थान होता हैं, जिसके लिये सुश्रुताचार्य ने लिखा है मस्तकाभ्यन्तरोपरिष्टात् शिरासन्धि सन्निपातो।


रोमावर्तोऽधिपतिस्तत्रपि सद्यो मरणम्।

अर्थात् मस्तक के भीतर ऊपर जहाँ बालों का आवर्त(भँवर) होता हैं, वहाँ संपूर्ण नाङियों व संधियों का मेल हैं, उसे 'अधिपतिमर्म' कहा जाता हैं। यहाँ चोट लगने से तत्काल मृत्यु हो जाती हैं(सुश्रुत संहिता शारीरस्थानम् : ६.२८)


सुषुम्ना के मूल स्थान को 'मस्तुलिंग' कहते हैं। मस्तिष्क के साथ ज्ञानेन्द्रियों कान, नाक, जीभ, आँख आदि का संबंध हैं और कामेन्द्रियों - हाथ, पैर, गुदा, इन्द्रिय आदि का संबंध मस्तुलिंग से हैं मस्तिष्क व मस्तुलिंग जितने सामर्थ्यवान होते हैं उतनी ही ज्ञानेन्द्रियों और कामेन्द्रियों - की शक्ति बढती हैं। मस्तिष्क ठंडक चाहता हैं और मस्तुलिंग गर्मी मस्तिष्क को ठंडक पहुँचाने के लिये क्षौर कर्म करवाना और मस्तुलिंग को गर्मी पहुँचाने के लिये गोखुरके परिमाण के बाल रखना आवश्यक होता है।


बालकुचालक हैं, अत: चोटी के लम्बे बाल बाहर की अनावश्यक गर्मी या ठंडक से मस्तुलिंग की रक्षा करते हैं। 


#शिखा_रखने_के_अन्य_लाभ

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१ शिखा रखने तथा इसके नियमों का यथावत् पालन करने से सद्‌बुद्धि , सद्‌विचारादि की प्राप्ति होती हैं।


२ आत्मशक्ति प्रबल बनती हैं।


३ मनुष्य धार्मिक , सात्विक व संयमी बना रहता हैं।


४ लौकिक - पारलौकिक कार्यों मे सफलता मिलती हैं।


५सभी देवी देवता मनुष्य की रक्षा करते हैं।


६ सुषुम्ना रक्षा से मनुष्य स्वस्थ, बलिष्ठ, तेजस्वी और दीर्घायु होता हैं।


७ नेत्र्ज्योति सुरक्षित रहती हैं।


इस प्रकार धार्मिक, सांस्कृतिक, वैज्ञानिक सभी दृष्टियों से शिखा की महत्ता स्पष्ट होती हैं। परंतु आज हिन्दू लोग पाश्चात्योंके चक्कर में पड़कर फैशनेबल दिखने की होड़ में शिखा नहीं रखते व अपने ही हाथों अपनी संस्कृति का त्याग कर डालते हैं।


लोग हँसी उड़ाये, पागल कहे तो सब सह लो पर धर्म का त्याग मत करो। मनुष्य मात्र का कल्याण चाहने वाली अपनी हिन्दू संस्कृति नष्ट हो रही हैं। हिन्दु स्वयं ही अपनी संस्कृति का नाश करेगा तो रक्षा कौन करेगा।


वेद में भी शिखा रखने का विधान कई स्थानों पर मिलता है,देखिये।


शिखिभ्यः स्वाहा (अथर्ववेद १९-२२-१५)


अर्थ👉 चोटी धारण करने वालों का कल्याण हो।


यशसेश्रियै शिखा।-(यजु० १९-९२)

अर्थ 👉 यश और लक्ष्मी की प्राप्ति के लिए सिर पर शिखा धारण करें।


याज्ञिकैंगौर्दांणि मार्जनि गोक्षुर्वच्च शिखा। (यजुर्वेदीय कठशाखा)


अर्थात्👉  सिर पर यज्ञाधिकार प्राप्त को गौ के खुर के बराबर(गाय के जन्में बछड़े के खुर के बराबर) स्थान में चोटी रखनी चाहिये।


केशानां शेष करणं शिखास्थापनं।

केश शेष करणम् इति मंगल हेतोः ।।


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संभोग में आसनों के विभिन्न प्रकार

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 वन डे ई विल डे नामक कामशास्त्री ने अपनी पुस्तक आइडियल मैरिज में आसनों के वर्गीकरण का आधार स्त्री व पुरुष के शरीर की स्थिति को बताया है जबकि महर्षि वात्सायन नामक कामशास्त्री ने अपनी पुस्तक कामसूत्र में आसनों का उच्चतरतोपयोगी नीचरतो पयोगी के रूप में विभाजित किया है जो अधिक व्यवहारिक व वैज्ञानिक है हमारे विचार से विभिन्न आसनों का विभाजन या वर्गीकरण करने का प्रयास ना तो पूर्णता सफल है ना ही विशेष आवश्यक है वास्तव में आसनों का विभाजन करना बहुत कठिन कार्य है इंद्रधनुष में कौन सा रंग कहां से प्रारंभ होता है और कहां समाप्त कहना कठिन है तथापि स्वयं इंद्रधनुषी छटा बड़ी मनोहारी और चिता चिता कर सकती है इसी तरह से काम के आकाश में छाए मिथुन की विविध आसन होते तो फिर दाग राही और अलौकिक आनंद की वर्षा करने वाले ही हैं फिर भी सुविधा की दृष्टि से प्रमुख व्यवहारिक आसनों को निम्नलिखित वर्गों में उनके गुण और दोष देते हुए वर्गीकृत किया गया है प्रथम वर्ग उत्तान वे आसन जिसमें स्त्री पीठ के बल लेट थी और पुरुष सामने से ऊपर आकर मिथुन करता है द्वितीय वर्ग आनत वे अपन जिसमें स्त्री पेट के बल पर लेटती है और पुरुष पीस के ऊपर आकर मैथुन करता है तृतीय वर्ग बीपरी तक वे आसन जिसमें पुरुष पीठ के बल लेट का है और स्त्री सामने की ऊपर आकर संभोग करती है चतुर्थ वर्ग तिर्यक वे आसन जिनमें करवट के बल लेटकर मैथुन किया जाता है पंचम वर्ग उप  बिष्ट वह आसन बैठकर मैथुन किया जाता है षस्टम वर्ग वह आसन जिसमें खड़े होकर मिथुन किया जाता है

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गुरुवार, 23 जून 2022

क्या स्वप्नदोष एक रोग है

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स्वप्न मैं श्वेत तरल के स्खलित होने को स्वप्नदोष कहा जाता है अत्यधिक हस्तमैथुन अत्यधिक संभोग से यह रोग हो जाता है हमेशा यही समझा जाता है कि इस कारण धात रोग जाने का रोग हो जाता है साधारण सा लोग यह समझते हैं कि श्वेत सरल उस समय जो स्खलित होता है वह वीर्य होता है प्रयोग द्वारा सिद्ध हो गई है कभी-कभार को छोड़कर स्वप्नदोष में वीर्य का स्खलन नहीं होता बल्कि वह अधिकतर प्रोस्टेट या काऊपर ग्रंथों का स्त्राव होता है इस बात का प्रयोग हर कोई सफलतापूर्वक कर सकता है कि रोगी का का स्वप्नदोष स्खलित कौन सा तरल स्खलित हुआ है यदि वीर्य होगा तो उस पर में वीर्य अवश्य होंगे यदि प्रोस्टेट ग्रंथि का तरल होगा उसमें एक प्रकार की कलमें ऐसी होंगी एक अति उत्तम श्रेणी का सूक्ष्मदर्शी लेकर उसकी जांच की जा सकती है अत्यधिक पंपोष का वार्षिक कार्य है कि हस्तमैथुन आपसे प्रोस्टेट ग्रंथि बिगड़ जाती है उसमें इतनी शक्ति नहीं रहती है कि थोड़ी सोते जरा को सॉफ्ट कर सके इसलिए स्वप्न में कोई गंदा विचार आते ही सरल साबित हो जाता है युवकों को स्वप्नदोष प्रायर 13 से 14 वर्ष की आयु में प्रारंभ होता है यह एक स्वाभाविक प्रक्रिया है दिमाग में तीन से चार बार ऐसा हो जाए तो कोई रोग नहीं समझा जाना चाहिए जब की संख्या इतनी बढ़ जाए दुर्बलता अनुभव होने लगे तो इसे रोक समझ गई थी चिकित्सा करनी चाहिए स्मरण रहे या कोई भयानक य असाध्य रोग नहीं है इस रोग वीर्य की अधिकता अत्यधिक मैथुन या संभोग कारण इस प्रकार से होते हैं मादक पदार्थ जैसे मदिरा अत्यधिक भोजन करके या दूध पीकर सोना वर्षों तक संभोग की इच्छा को दबाए रखना या अविवाहित होना गंदे विचार खट्टे गर्म और मसालेदार वस्तुओं का अत्यधिक प्रयोग गुदामैथुन की प्रवृत्ति पेट के कीड़े शारीरिक दुर्बलता प्रोस्टेट ग्लैंड या मूत्राशय की खराब अश्लील साहित्य पढ़ना गंदे चित्र देखना मन में हर समय रतिक्रिया के विचार रखना स्त्रियों के सर्किल में अधिक रहनाा भय चिंता इन सभी कारणों को रोककर स्वप्नदोष से बचा जा सकता है

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शनिवार, 7 अगस्त 2021

रानी रामपाल- कप्तान

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रानी रामपाल- कप्तान
 “मैं अपने जीवन से भागना चाहटी थी  बिजली की कमी से, सोते समय हमारे कानों में भिनभिनाने वाले मच्छरों तक, बमुश्किल दो वक्त का खाना खाने से लेकर बारिश होने पर हमारे घर में पानी भरते हुए देखने तक।  मेरे माता-पिता ने पूरी कोशिश की, लेकिन वे इतना ही कर सकते थे - पापा गाड़ी चलाने वाले थे और माँ नौकरानी के रूप में काम करती थीं।
 मेरे घर के पास एक हॉकी अकादमी थी, इसलिए मैं घंटों खिलाड़ियों को अभ्यास करते हुए देखता थी- मैं वास्तव में खेलना चाहता थी।  पापा प्रतिदिन 80 रुपये कमाते थे और मेरे लिए एक छड़ी नहीं खरीद सकते थे।  हर दिन, मैं कोच से मुझे भी सिखाने के लिए कहता थी।  उसने मुझे अस्वीकार कर दिया क्योंकि मैं कुपोषित था।  वह कहते थे, 'आप अभ्यास सत्र के माध्यम से खींचने के लिए पर्याप्त मजबूत नहीं हैं।'
 इसलिए, मुझे मैदान पर एक टूटी हुई हॉकी स्टिक मिली और उसी के साथ अभ्यास करना शुरू किया- मेरे पास प्रशिक्षण के कपड़े नहीं थे, इसलिए मैं सलवार कमीज में इधर-उधर भाग रही थी।  लेकिन मैंने खुद को साबित करने की ठान ली थी।  मैंने कोच से एक मौका मांगा - मैंने आखिरकार उसे बड़ी मुश्किल से मना लिया!
 लेकिन जब मैंने अपने परिवार को बताया, तो उन्होंने कहा, 'लड़किया घर का काम ही करता है,' और 'हम तुम्हारे स्कर्ट पहनने नहीं देंगे।' मैं उनसे यह कहते हुए विनती करूं गि, 'कृपया मुझे बताएं।  अगर मैं असफल होटी हूं, तो आप जो चाहें करेंगे। 'मेरे परिवार ने अनिच्छा से हार मान ली।
 प्रशिक्षण सुबह से शुरू होगा।  हमारे पास घड़ी भी नहीं थी, इसलिए माँ उठती थीं और आसमान की ओर देखती थीं कि क्या यह मुझे जगाने का सही समय है।
 अकादमी में प्रत्येक खिलाड़ी के लिए 500 मिलीलीटर दूध लाना अनिवार्य था।  मेरा परिवार केवल २०० मिली का दूध ही खरीद सकता था;  बिना किसी को बताए मैं दूध में पानी मिलाकर पी लेटी थी क्योंकि मैं खेलना चाहता थी
 मेरे कोच ने मोटे और पतले के माध्यम से मेरा समर्थन किया;  वह मुझे हॉकी किट और जूते खरीदता था।  उन्होंने मुझे अपने परिवार के साथ रहने दिया और मेरी आहार संबंधी जरूरतों का भी ध्यान रखा।  मैं कड़ी मेहनत करटी और अभ्यास का एक भी दिन नहीं छोड़टी।
 मुझे अपनी पहली तनख्वाह याद है;  मैंने एक टूर्नामेंट जीतकर 500 रुपये जीते और पापा को पैसे दिए।  इतना पैसा उसके हाथ में पहले कभी नहीं था।  मैंने अपने परिवार से वादा किया था, 'एक दिन, हमारा अपना घर होगा';  मैंने उस दिशा में काम करने के लिए अपनी शक्ति में सब कुछ किया।
 अपने राज्य का प्रतिनिधित्व करने और कई चैंपियनशिप में खेलने के बाद, मुझे आखिरकार 15 साल की उम्र में एक राष्ट्रीय कॉल मिला!  फिर भी, मेरे रिश्तेदार मुझसे केवल तभी पूछते थे जब मैं शादी करने की योजना बना रहा था।  लेकिन पापा ने मुझसे कहा, 'अपने दिल की संतुष्टि तक खेलो।' अपने परिवार के समर्थन से, मैंने भारत के लिए अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करने पर ध्यान केंद्रित किया और आखिरकार, मैं भारतीय हॉकी टीम का कप्तान बन गई!
 इसके तुरंत बाद, जब मैं घर पर थी, एक दोस्त पापा हमारे साथ काम करते थे।  वह अपनी पोती को साथ ले आया और मुझसे कहा, 'वह तुमसे प्रेरित है और हॉकी खिलाड़ी बनना चाहती है!' मैं बहुत खुश थी;  मैं बस रोने ल गी।
 और फिर 2017 में, मैंने आखिरकार अपने परिवार से किए गए वादे को पूरा किया और उनके लिए एक घर खरीदा।  हम एक साथ रोए और एक दूसरे को कसकर पकड़ लिया!  और मैंने अभी तक नहीं किया है;  इस साल, मैं उन्हें और कोच को कुछ ऐसा चुकाने के लिए दृढ़ संकल्पित हूं जिसका उन्होंने हमेशा सपना देखा है- टोक्यो से उम्मीद” #ladwahandballfoundation #olympics2020 #Olympics #RingKeBaazigar #जय_हिंद #Cheer4India #proud #challenge sabhar ladawa handball foundation Facebook wall

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शुक्रवार, 30 जुलाई 2021

स्वामी विवेकानंद – एक क्रांतिकारी सन्यासी

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स्वमी विवेकानंद को रामकृष्ण परमहंस ने पहली बार समाधि का अनुभव कराया था। जानते हैं कि गुरु रामकृष्ण परमहंस के साथ रहकर उनमें क्या बदलाव आए और क्या अनुभव हुए...


 

सौ साल से अधिक समय गुजर जाने के बाद भी आज भी विवेकानंद युवाओं के प्रिय हैं। आखिर कैसे? कैसा था उनका जीवन? क्या खास किया था उन्होंने ?


स्वामी विवेकानंद का जन्म 12 जनवरी 1863 को कोलकाता में विश्वनाथ दत्ता और भुवनेश्वरी देवी के घर नरेंद्र नाथ दत्त के रूप में हुआ था। 4 जुलाई, 1902 को बेलूर मठ में उनका देहांत हुआ। अपने देहांत तक उन्होंने एक ऐसी क्रांति ला दी थी, जिसकी गूंज आज तक दुनिया भर में है। अपने गुरु के संदेश वाहक के रूप में, वह एक शताब्दी से दुनिया भर के युवाओं के लिए एक प्रेरणास्रोत रहे हैं।

इस लेख में, सद्गुरु स्वामी विवेकानंद के जीवन की कुछ घटनाओं के बारे में बता रहे हैं जिनसे यह पता चलता है कि अपने गुरु के साथ उनका क्या रिश्ता था और वह उनका कौन सा संदेश लोगों में फैलाना चाहते थे।

रामकृष्ण परमहंस को दिव्यज्ञान प्राप्त होने के बाद, उनके बहुत सारे शिष्य बन गए। उनके एक शिष्य थे, स्वामी विवेकानंद। विवेकानंद अमेरिका जाने वाले पहले योगी थे। वह 1893 में दुनिया के धर्मों की संसद में शामिल होने शिकागो गए थे। वहां जाने के बाद उन्होंने एक आध्यात्मिक लहर चला दी। जिस समय किसी नई चीज को लेकर लोगों में बहुत आशंकाएं होती थीं, उस समय आकर उन्होंने कुछ हद तक लोगों के लिए द्वार खोले।


स्वामी विवेकानंद को रामकृष्ण ने भेजा काली मंदिर में


रामकृष्ण का विवेकानंद से बहुत अलग तरह का जुड़ाव था क्योंकि वह विवेकानंद को अपना संदेश दुनिया तक पहुंचाने का एक जरिया मानते थे। रामकृष्ण यह काम खुद नहीं कर सकते थे, इसलिए वह विवेकानंद को अपने संदेशवाहक के रूप में देखते थे।

रामकृष्ण के आस-पास के लोग समझ नहीं पाते थे कि वह विवेकानंद को लेकर इतने पागल क्यों थे। अगर एक भी दिन विवेकानंद उनसे मिलने नहीं आते, तो रामकृष्ण उनकी खोज में निकल जाते क्योंकि वह जानते थे कि इस लड़के में संप्रेषण की जरूरी समझ है। विवेकानंद भी रामकृष्ण परमहंस के लिए उतने ही पागल थे। उन्होंने कोई नौकरी नहीं ढूंढी, उन्होंने कोई ऐसा काम नहीं किया, जो उनकी उम्र के लोग आम तौर पर करते हैं। वह बस हर समय रामकृष्ण का अनुसरण करते थे।

विवेकानंद के जीवन में एक बहुत अद्भुत घटना घटी। एक दिन, उनकी मां बहुत बीमार थीं और मृत्युशैय्या पर थीं। अचानक विवेकानंद के दिमाग में आया कि उनके पास बिल्कुल भी पैसा नहीं है और वह अपनी मां के लिए दवा या खाना नहीं ला सकते। यह सोचकर उन्हें बहुत गुस्सा आया कि वह अपनी बीमार मां का ध्यान नहीं रख सकते। जब विवेकानंद जैसे इंसान को गुस्सा आता है, तो वह गुस्सा वाकई भयानक होता है। वह रामकृष्ण के पास गए। वह कहीं और नहीं जा सकते थे, गुस्से में भी वह यहीं जाते थे।

उन्होंने रामकृष्ण से कहा, ‘इन सारी फालतू चीजों, इस आध्यात्मिकता से मुझे क्या लाभ है। अगर मेरे पास कोई नौकरी होती और मैं अपनी उम्र के लोगों वाले काम करता तो आज मैं अपनी मां का ख्याल रख सकता था। मैं उसे भोजन दे सकता था, उसके लिए दवा ला सकता था, उसे आराम पहुंचा सकता था। इस आध्यात्मिकता से मुझे क्या फायदा हुआ?’

रामकृष्ण काली के उपासक थे। उनके घर में काली का मंदिर था। वह बोले, ‘क्या तुम्हारी मां को दवा और भोजन की जरूरत है? जो भी तुम्हें चाहिए, वह तुम मां से क्यों नहीं मांगते?’ विवेकानंद को यह सुझाव पसंद आया और वह मंदिर में गए।

एक घंटे बाद जब वह बाहर आए तो रामकृष्ण ने पूछा, ‘क्या तुमने मां से अपनी मां के लिए भोजन, पैसा और बाकी चीजें मांगीं?’

विवेकानंद ने जवाब दिया, ‘नहीं, मैं भूल गया।’ रामकृष्ण बोले, ‘फिर से अंदर जाओ और मांगो।’

विवेकानंद फिर से मंदिर में गए और और चार घंटे बाद वापस लौटे। रामकृष्ण ने उनसे पूछा, ‘क्या तुमने मां से मांगा?’ विवेकानंद बोले, ‘नहीं, मैं भूल गया।’

रामकृष्ण फिर से बोले, ‘फिर अंदर जाओ और इस बार मांगना मत भूलना।’ विवेकानंद अंदर गए और लगभग आठ घंटे बाद बाहर आए। रामकृष्ण ने फिर से उनसे पूछा, ‘क्या तुमने मां से वे चीजें मांगीं?’

विवेकानंद बोले, ‘नहीं, अब मैं नहीं मांगूंगा। मुझे मांगने की जरूरत नहीं है।’

रामकृष्ण ने जवाब दिया, ‘यह अच्छी बात है। अगर आज तुमने मंदिर में कुछ मांग लिया होता, तो यह तुम्हारे और मेरे रिश्ते का आखिरी दिन होता। मैं तुम्हारा चेहरा फिर कभी नहीं देखता क्योंकि कुछ मांगने वाला मूर्ख यह नहीं जानता कि जीवन क्या है। मांगने वाला मूर्ख जीवन के मूल सिद्धांतों को नहीं समझता।’

प्रार्थना एक तरह का गुण है। अगर आप प्रार्थनापूर्ण बन जाते हैं, अगर आप आराधनामय हो जाते हैं, तो यह होने का एक शानदार तरीका है। लेकिन यदि आप इस उम्मीद से प्रार्थना कर रहे हैं कि इसके बदले आपको कुछ मिलेगा, तो यह आपके लिए कारगर नहीं होगा।


स्वामी विवेकानंद को हुआ समाधि का अनुभव


विवेकानंद जब सिर्फ 19 साल के थे, तो वह बहुत तर्कसम्मत और बुद्धिमान थे। साथ ही, वह जोश से भरे हुए थे। वह हर चीज का जवाब चाहते थे। उन्होंने आकर रामकृष्ण से कहा, ‘आप हर समय बस भगवान, भगवान करते रहते हैं। इसका क्या प्रमाण है कि भगवान हैं? मुझे सुबूत दीजिए।’ रामकृष्ण बहुत साधारण इंसान थे। वह पढ़े-लिखे नहीं थे। वह विद्वान नहीं, आध्यात्मिक पुरुष थे। तो उन्होंने कहा, ‘मैं ही प्रमाण हूं।’

रामकृष्ण बोले, ‘मैं इस बात का प्रमाण हूं, कि ईश्वर है।’

विवेकानंद को समझ नहीं आया कि वह क्या करें क्योंकि यह तो बस पागलपन था। वह किसी बौद्धिक जवाब की उम्मीद कर रहे थे कि ‘बीज का अंकुरण और पृथ्वी का घूमना ईश्वर के होने का प्रमाण है।’ मगर रामकृष्ण बोले, ‘मैं इसका प्रमाण हूं कि ईश्वर का अस्तित्व है।’ रामकृष्ण के कहने का मतलब यह था कि ‘मैं जैसा हूं, यह प्रमाण है।’ विवेकानंद को समझ नहीं आया कि वह क्या कहें और वह चले गए।

तीन दिन बाद, उन्होंने वापस आकर पूछा, ‘ठीक है, क्या आप मुझे ईश्वर के दर्शन करा सकते हैं?’ रामकृष्ण ने पूछा, ‘तुम्हारे पास उन्हें देखने की हिम्मत है?’ उस साहसी लड़के ने कहा, ‘हां’ क्योंकि यह बात उसे परेशान कर रही थी। रामकृष्ण ने विवेकानंद की छाती पर अपने पैर रख दिए और विवेकानंद समाधि की अवस्था में चले गए, जहां वह मन की सीमाओं से परे चले गए। वह लगभग 12 घंटे बाद समाधि से बाहर आए और जब आए, तो वह पूरी तरह बदल चुके थे। उसके बाद उन्होंने अपने जीवन में कभी कोई प्रश्न नहीं पूछा।


विवेकानंद को मां शारदा का आशीर्वाद


जब तक आप भक्त नहीं हैं, जीवन को आपके लिए उन्मुक्त नहीं होना चाहिए क्योंकि यदि वह उन्मुक्त होता है, तो आप खुद को और बाकी हर किसी को नुकसान ही पहुंचाएंगे। भारत में कभी किसी ऐसे इंसान को ज्ञान नहीं सौंपा जाता था, जिसमें भक्ति की कमी हो।

विवेकानंद के जीवन में एक खूबसूरत घटना हुई। रामकृष्ण परमहंस का देहांत हो चुका था, विवेकानंद ने देश भर में घूम-घूम कर युवकों का एक समूह इकट्ठा किया। वह देश को बनाने और देश की सूरत को बदलने की कोशिश कर रहे थे। तभी किसी ने उन्हें बताया कि अमेरिका के शिकागो में धर्म संसद आयोजित हो रही है। लोगों ने विवेकानंद को वहां जाने की सलाह दी क्योंकि यहां कोई उनकी बात नहीं सुन रहा था। कोई भी नहीं! एक युवक जगह-जगह जाकर बड़ी-बड़ी बातें कर रहा था, जो धर्मग्रंथों में लिखी हुई नहीं हैं। कौन उसे सुनना चाहता? उन्होंने कहा, ‘तुम वहां जाकर उन्हें झकझोरो। अगर तुम वहां उन्हें झकझोरोगे, तो यहां हर किसी का ध्यान तुम्हारी ओर जाएगा।’

पश्चिम के लिए निकलने से पहले वह रामकृष्ण की पत्नी शारदा का आशीर्वाद लेने गए। वह पहली बार रामकृष्ण का संदेश लेकर अमेरिका जा रहे थे।

जब विवेकानंद पहुंचे, उस समय शारदा खाना बना रही थीं। वह कोई धुन गुनगुना रही थीं। भारतीय महिलाओं में यह बहुत आम बात है, खास तौर पर खाना बनाते समय वे गुनगुनाती हैं। अब ऐसा नहीं होता क्योंकि बहुत से लोग अब आई-पैड बजाते हैं मगर पहले के समय में खूब प्यार से खाना बनाना और उसे परोसना सबसे महत्वपूर्ण कामों में माना जाता था। किसी को अच्छी तरह खाते देखकर उन्हें गहरी संतुष्टि होती थी। खाना बनाना बहुत ही आनंददायक प्रक्रिया थी। 20-30 मिनट का भोजन बनाने में, वे कम से कम तीन से चार घंटे लगाती थीं और हमेशा खाना बनाते समय गाती रहती थीं। कम से कम मेरी मां हर समय गाती थीं।

जब विवेकानंद ने आकर कहा, ‘मैं अपने गुरु का संदेश पूरी दुनिया तक पहुंचाने के लिए अमेरिका जाना चाहता हूं,’ तो शारदा ने जवाब नहीं दिया। फिर वह अचानक बोलीं, ‘नरेन, वह चाकू मुझे देना।’ विवेकानंद ने उन्हें चाकू पकड़ाया और एक खास तरीके से उसे दिया। फिर मां शारदा बोलीं, ‘तुम जा सकते हो, मैं तुम्हें आशीर्वाद देती हूं।’ विवेकानंद ने पूछा, ‘आपने मुझे इतनी देर बाद आशीर्वाद क्यों दिया और सबसे पहले तो आपने मुझसे चाकू क्यों मांगा? आप तो सब्जियां काट चुकी थीं?’ वह बोलीं, ‘मैं सिर्फ यह देखना चाहती थी कि अपने गुरु के जाने के बाद तुम्हारे अंदर क्या बदलाव आया है? जिस तरह से तुमने मुझे चाकू पकड़ाया, उससे मुझे पता चल गया कि तुम वहां जाने के लिए बिल्कुल सही इंसान हो, तुम अपने गुरु का संदेश लेकर जाने के लिए बिल्कुल उपयुक्त हो।’


स्वामी विवेकानंद और रामकृष्ण का संदेश


आपने देखा होगा कि ज्यादातर गुरु अपने आप प्रसिद्ध नहीं होते। उन्हें एक अच्छे शिष्य की जरूरत होती है जो उनका संदेश फैला सके क्योंकि हो सकता है कि गुरु खुद दुनिया के तौर-तरीकों से बहुत परिचित नहीं हो। आज, हर कोई रामकृष्ण परमहंस के बारे में बात करता है। रामकृष्ण की चेतनता बहुत ठोस थी। वह एक अद्भुत चीज थी। मगर उसके साथ ही, सांसारिक स्तर पर वह पूरी तरह अनजान थे। अगर विवेकानंद उनसे न मिलते, तो वह अपने आप में, एक भूला-बिसरा फूल बनकर रह जाते। फूल तो बहुत सारे खिलते हैं, मगर कितने फूलों को पहचान मिल पाती है?


प्रार्थना के बारे में स्वामी विवेकानंद के विचार


स्वामी विवेकानंद ने एक बार कहा, ‘फुटबॉल खेलना आपको प्रार्थना से कहीं ज्यादा ईश्वर के करीब ले जा सकता है।’ यह सच है क्योंकि आप पूरी तरह डूबे बिना फुटबॉल नहीं खेल सकते। इसमें कोई व्यक्तिगत मकसद नहीं होता, बस पूर्ण भागीदारी होती है। आप क्या कर सकते हैं और क्या नहीं कर सकते, यह सब पहले से तय होता है और आप कई सालों से इसके लिए तैयार होते हैं। अब यह सिर्फ भागीदारी का सवाल रह जाता है, इसमें कोई मकसद नहीं होता।

प्रार्थना में ऐसा होता है कि कुछ समय बाद आप बहुत सारी दूसरी चीजें करते हुए प्रार्थना करने लगते हैं, आप अपनी मर्जी की चीजें करने लगते हैं। भारत में, प्रार्थना को, पूजा-पाठ को, बहुत जटिल बना दिया गया। वह सिर्फ मौखिक नहीं रह गई। इसका उद्देश्य यह था कि आप पूरी तरह खुद को उसमें डुबो दें। क्योंकि उन्होंने हजारों सालों से देखा था कि ‘प्रार्थना करने’ के नाम पर क्या-क्या होता था। उन्हें पता था कि लोग क्या करेंगे, इसलिए उन्होंने प्रार्थना को बहुत जटिल बना दिया। ताकि आपको एक पूरी प्रक्रिया याद रखनी पड़े और उसके मुताबिक सही तरह से उसे करना पड़े, वरना पूजा अपवित्र हो जाएगी। जब इस हद तक जटिलता होती है, तो आप प्रार्थना करते समय कुछ और नहीं कर सकते। इस रूप में फुटबॉल का खेल आपके अंदर उस स्तर की भागीदारी ले आता है, जहां आप कुछ और कर ही नहीं सकते। कुछ और करना संभव नहीं होता क्योंकि इसमें इतनी भागीदारी की जरूरत होती है कि आप कुछ और कर ही नहीं सकते।

फुटबॉल के खेल में, आपको अपने पैरों को किसी सर्जन के औजारों की तरह इस्तेमाल करना सीखना पड़ता है। यह एक ऐसा खेल है, जिसमें एक खास भागीदारी की जरूरत पड़ती है क्योंकि आप जिन पैरों से गेंद को संभालते हैं, उन्हीं पैरों से खुद को पूरी गति से इधर से उधर भगाते हैं। साथ ही, आपको उसी समय दस और लोगों से बचना होता है, जो आपसे उलझने की पूरी कोशिश करते हैं। आपको लोगों को चकमा देना होता है, गेंद लेनी होता है, पूरी गति से दौड़ना होता है इसलिए आपके पैरों को किसी सर्जन के औजारों की तरह दक्ष होना चाहिए। उस गति में, सक्रियता के उस स्तर पर, गेंद को किसी दिशा की ओर धकेलने में बहुत दक्षता लगती है। इसमें उस हद तक भागीदारी की जरूरत होती है, जहां आपका मन लगभग काम करना बंद कर देता है।

जब आप पूरी भागीदारी के साथ कोई काम करते हैं तो उसमें सिर्फ सक्रियता होती है, मन कहीं और होता है। इसलिए फुटबॉल के खेल में खिलाड़ी अक्सर उस अवस्था में होते हैं क्योंकि एक ही चीज में मन लगा होता है। इसी वजह से जब पूरी तीव्रता से खेल होता है, तो आधी दुनिया बैठकर उसे देखती है। इसमें एक तरह से लोग परे चले जाते हैं, यह आध्यात्मिक रूप से परे जाना नहीं है मगर निश्चित रूप से इसमें लोग अपनी सीमाओं से परे चले जाते हैं। यही बात हर किसी को जोश से भर देती है।


स्त्रियों के बारे में स्वामी विवेकानंद के विचार


एक बार एक समाज सुधारक विवेकानंद के पास गया और बोला, ‘यह बहुत अच्छी बात है कि आप स्त्रियों की भी बेहतरी चाहते हैं। मुझे क्या करना चाहिए? मैं उनकी हालत सुधारना चाहता हूं। मैं इसमें मदद करना चाहता हूं।’ तो विवेकानंद ने कहा, ‘उनसे दूर रहो। तुम्हें उनके लिए कुछ करने की जरूरत नहीं है। बस उन्हें अकेला छोड़ दो। उन्हें जो करना होगा, वे कर लेंगी।’ बस यही जरूरी है। किसी पुरुष को स्त्री की स्थिति सुधारने की जरूरत नहीं है। अगर वह सिर्फ उसे मौका दे, तो वह अपने लिए जरूरी चीजें कर लेगी।

जब मैं बारह-तेरह साल का था, तो मुझे कुछ किताबें पढ़ने को मिलीं, जिनमें स्वामी विवेकानंद ने कहा था, ‘मुझे सौ पूरी तरह समर्पित लोग दीजिए और मैं इस देश की सूरत बदल कर रख दूंगा।’ उस समय इस देश में 23 करोड़ लोग रहे होंगे, मगर उन्हें पूरी तरह समर्पित सौ लोग भी नहीं मिले। मैंने सोचा, ‘क्या विडंबना है। विवेकानंद जैसा इंसान एक अद्भुत चीज है। ऐसे इंसान रोज-रोज नहीं होते। ऐसे लोग जब दुनिया में आए, तो हम इस विशाल देश में उन्हें सौ लोग भी नहीं दे पाए।’ मुझे यह इस संस्कृति और इस देश के लिए एक महान त्रासदी लगी।

एक इंसान के पास इतनी जबर्दस्त दूरदझर्शिता थी और उसकी दूरदर्शिता के कारण बहुत सी चीजें हुईं। आज भी, उनके नाम पर मानव कल्याण के बहुत से काम हो रहे हैं। उनकी दूरदर्शिता के कारण काफी विकास हुआ। उस समय जो बाकी लोग थे, वे कहां हैं? मगर उनकी दृष्टि अब भी किसी न किसी रूप में काम कर रही है। उसकी वजह से काफी खुशहाली आई।

अगर हजारों लोगों में यही दूरदर्शिता होती, तो हालात और भी बेहतर होते। एक गौतम बुद्ध या एक विवेकानंद की दूरदर्शिता काफी नहीं है। जब अधिकांश लोगों में वह दूरदर्शिता होती है, तभी समाज में वाकई खूबसूरत चीजें होंगी।


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