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सोमवार, 23 सितंबर 2024

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रविवार, 22 सितंबर 2024

मकई की रोटी स्वास्थ्यवर्धक

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आमतौर पर बिहार में बनने वाली मकई की रोटी दो वैरायटी की होती है उत्तर बिहार में मकई की जो रोटी बनाई जाती है दरअसल वह भुने हुए मकई के आटा से तैयार किया जाता है। इस कारण से उसकी रोटी हाथ पर ही ठोक कर तैयार की जाती है जो काफी मोटी होती है पकाने के बाद उसका कलर पीला हो जाता है खाने में वह मोटी रोटी की जैसी लगती है पर थोड़ा सा सोंधा टाइप का जिसे उत्तर बिहार में लोग लाल मिर्च की अचार या फिर दही के साथ खाना पसंद करते हैं लेकिन मध्य बिहार में मकई की रोटी कच्ची मकई के आटे से तैयार की जाती है या रोटी की तरह ही बेलकर तवे पर पकाई जाती है इस कारण से इसका कलर उजला होता है और दूर से देखने पर आपको लगेगा कि आप गेहूं की रोटी खा रहे हैं कच्चे मकई के आटे से तैयार इस रोटी को पकाने के बाद घी का जबरदस्त इस्तेमाल किया जाता है जिस कारण से यह पूरी तरह से पक्के तैयार होता है और टेस्ट भी ज्यादा होता है यहां पर लोग इसे साग के साथ ही खाना पसंद करते हैं खासकर मकई के रोटी का कंबीनेशन पूरी तरह से सरसों के साथ के साथ बना हुआ है पर अब परियों और शादियों में भी मकई की रोटी नजर आने लगी है लोगों के खाने का टेस्ट बदला है लिट्टी चोखा के बाद अब शादी समारोह से लेकर छोटे-मोटे आयोजनों में भी मकई की रोटी और सरसों की साग का स्टाल आपको देखने को मिल जाएगा पर यह मकई की रोटी उत्तर बिहार वाली मोटी पीली मकई की रोटी नहीं होती बल्कि छोटी-छोटी रोटी के शॉप में कच्चे मकई के आटे का बना हुआ रोटी होता है दोनों रोटी का टेस्ट अलग-अलग होता है। बिहार में मकई का उत्पादन पहले चारों तरफ हुआ करता था पर यह अब उत्पादन मुख्ता समस्तीपुर से लेकर बेगूसराय खगड़िया मधेपुरा सहरसा अररिया सुपौल तक में सिमट कर रह गया है शिवहर मोतिहारी के बाद ग्रस्त इलाकों में भी मकई की फसल होती है पर उत्तर बिहार के अधिकांश जिलों में जंगली सूअर और नीलगाईयों ने मकई के खेत पर घोषित ब्रेक लगा दिया है।

साभार 🙏

#everyonefollowers #villagelife #gaaw @highlight

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आज की आवश्यकता मोटा अनाज

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एक समय था जब सांवा,कोदो, ज्वार ,मड़ुआ,जौ,जई , मकुनी,बाजरा इत्यादि अनाज ही खाए जाते थे। 

  बुजुर्ग कहते थे कि "मोटा मेही (अनाज) खाओ ,डॉक्टर दूर भगाओ "

 हमारे बुजुर्ग यही खाते थे और निरोगित शरीर सहित सौ साल तक जीते थे। 

 अब जैसे जैसे खान पान बदला लोगों के शरीर को मानो घुन लग गया हो ,तमाम बीमारियाँ जकड़ रहीं हैं आयु आधी होती जा रही है।  बुढ़ाकर अपनी आयु पूरी करके तो किसी की मृत्यु ही नहीं होती है बल्कि हार्ट अटैक, कैंसर, ब्रेन हैमरेज, सुगर जैसी बीमारियों से अकाल मृत्यु हो रही है। 

 पहले हम लोगों के घर पर बारिश के समय में जब बरसीम ,चरी,बाजरा ज्वार जैसे हरे चारे खत्म हो जाते थे उस समय पशुओं के लिए सांवा ज्वार बोया जाता था।  जो पशुओं का हरा चारा बनता था और जब उसमें बालियां लगती थीं तब पक्षियों को भोजन भी मिल जाता था।  

मां कुछ सांवा बचा लेती थी ताकि अगले वर्ष बीज के काम आए और कभी कभी जब ज्यादा बीज से अधिक हो जाता था तब उसका चावल बनाती थी। कच्चे चावल को दूध में भिगोकर खाते थे बहुत मीठा और स्वादिष्ट लगता था। 

 मेरी माँ बताती थी कि कोदो की दो प्रजाति होती थी एक अच्छी होती थी और एक में नशा होता था ।

   मड़ुआ जिसे अब सब रागी कहते हैं। इसकी रोटी बनती थी।  पहाड़ो में अब भी इसकी रोटी खाई जाती है ,वहां इसे झंगोरा कहते हैं।  गेहूं आटे संग मिलाकर बनाते हैं तो उसे राली रोटी कहते हैं।  जिस प्रकार पहाड़ो में मड़ुआ की रोटी खाई जाती है  इस तरह पंजाब में मक्की की रोटी खाई जाती है तो हरियाणा में बाजरे की रोटी खाई जाती है और भी क्षेत्रों में हम लोगों के उत्तर प्रदेश मध्यप्रदेश बिहार में भी कमोबेश यह सब खाया जाता है। 

   मड़ुआ का हमने तो बचपन में सिर्फ लपसी खाई थी जो बहुत स्वादिष्ट होती है। 

  अब जब सबने नए अनाज, हाईब्रिड अनाज खा कर अपना  नुकसान देख लिया तो फिर से वापस मोटे अनाज, जैविक सब्जी की तरफ लौटने लगे हैं। 

जो जौ के नाम पर नाक सिकोड़ते थे अब ओटस खाकर आधुनिक बनते हैं।  मड़ुआ के काले रंग से दूर भागने वाले शौक से रागी खाते हैं। 

  आज भी अनाज वही हैं बस नाम अँग्रेजी हो गया है और प्रयोग आधुनिक हो गया है। साभार फेसबुक

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चीना(चीणा एक स्वस्थ वर्धक फसल

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 🍁चीना(चीणा


) शायद अब ये फसल विलुप्त हो चुकी है या बहुत कम मात्रा में उगाई जा रही है, कई वर्षों से देखा नही इस फसल को❣️

🌾चीना का भात खाने का जिसे भी सौभाग्य मिला है वह जानता है कि यह कितना टेस्टी होता है। पहले यह चावल का विकल्प था। इसको खाने में सबसे बड़ी सावधानियां है कि अगर आप इसे दाल या दही के साथ खा रहे हैं तो अपनी अपने साथ रखिए। चीना भारत में उगाई जाने वाली महत्वपूर्ण लघु फसल है। फसल जल्दी पकने के कारण सूखे से बचने में सक्षम है। अपेक्षाकृत कम पानी की आवश्यकता वाली कम अवधि की फसल (60 -90 दिन) होने के कारण, यह सूखे की अवधि से बच जाती है और इसलिए शुष्क भूमि क्षेत्रों में गहन खेती के लिए बेहतर संभावनाएं प्रदान करती है। असिंचित परिस्थितियों में, बाजरा आमतौर पर खरीफ मौसम के दौरान उगाया जाता है, लेकिन जिन क्षेत्रों में सिंचाई की सुविधा उपलब्ध है, वहां उच्च तीव्रता वाले चक्रों में ग्रीष्म फसल के रूप में इसे लाभप्रद रूप से उगाया जाता है।यह एक सीधा शाकीय वार्षिक पौधा होता है जो प्रचुर मात्रा में उगता है। इसका पौधा 45-100 सेंटीमीटर की ऊंचाई तक बढ़ता है। तना स्पष्ट रूप से सूजे हुए गांठों के साथ पतला होता है। जड़ें रेशेदार और उथली होती हैं। पत्तियाँ रेखीय, पतली होती हैं और पत्ती आवरण पूरे इंटर्नोड को घेरता है।चीना की पौष्टिकता प्रमुख अनाज की फसलों से बेहतर है। यह कैल्शियम, फास्फोरस, पोटेशियम, सोडियम, मैग्नीशियम, मैंगनीज, आयरन और जस्ता जैसे खनिजों का एक अच्छा स्त्रोत है। इसमें सभी आवश्यक अमीनो एसिड पाए जाते हैं। इसका आवश्यक अमीनो एसिड इंडेक्स 51 प्रतिशत है जो गेहूं की तुलना में अधिक है।

🌾 चीना का सेवन ब्लडप्रेशर और मधुमेह के मरीजों के लिए रामबाण होता है. चीना भिंगोकर, सुखाकर और भूनकर खा सकते हैं. इसे भात, खीर, रोटी आदि बनाकर खाया जाता है. पोषक तत्वों और फाइबर से भरपूर है. प्रति 100 ग्राम चीना में 13.11 ग्राम प्रोटीन और 11.18 ग्राम फाइबर के अतिरिक्त बड़ी मात्रा में आयरन और कार्बोहाइड्रेट पाये जाते हैं. इसलिए इसे पोषक तत्व फसल कहते हैं। इसका भात दही के साथ गजब का स्वाद देता है और भूनकर गुड मिलाकर खाने में भी मज़ेदार होता है ।

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कैसे कैलेंडुला उगाए

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 कैलेंडुला


(Calendula) को अभी बीज से उगाने का बेस्ट टाइम चल रहा हैं। इसे उगाने के लिए एक भाग मिट्टी, एक भाग वर्मीकम्पोस्ट और एक भाग कोकोपीट/ रेत लेंगे। फिर किसी गमले या सीडलिंग ट्रे में इस पोटिंग मिक्स को भर लेंगे और उसके ऊपर कैलेंडुला के बीजों को चारों तरफ बिखेर देंगे। फिर इसी पोटिंग मिक्स की एक पतली सी लेयर से बीजों को कवर कर देंगे। इसके बाद पानी डालकर गमले/ सीडलिंग ट्रे को सेमी-शेड वाली जगह पर रख देंगे, जहां हल्की इनडायरेक्ट सनलाइट आती हो। 5 से 6 दिनों के बाद बीज अंकुरित हो जायेगें। जब पौधे थोड़े बड़े हो जाए तो उन्हें किसी दूसरे गमले में ट्रांसप्लांट कर दें। अभी इसके बीज लगा लेंगे तो पूरी सर्दियाँ आपका गार्डन फूलों से भरा रहेगा। ऐसे ही गार्डनिंग टिप्स के लिए पोस्ट को Like करके इस पेज को Follow जरूर करें, धन्यवाद 


#calendula #winterflower #plantcare #gardening #gardeningtips

साभार देवेंद्र प्रताप सिंह देव फेस बुक वॉल 

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