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शुक्रवार, 24 जून 2022

शिखा बन्धन (चोटी) रखने का महत्त्व

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 #अच्छे काम के लिए सिर्फ #सलाह दी जाती है #दबाव नहीं


#शिखा_बन्धन (#चोटी) रखने का महत्त्व

शिखा का महत्त्व विदेशी जान गए हिन्दू भूल गए।

हिन्दू धर्म का छोटे से छोटा सिध्दांत, छोटी-से-छोटी बात भी अपनी जगह पूर्ण और कल्याणकारी हैं। छोटी सी शिखा अर्थात् चोटी भी कल्याण, विकास का साधन बनकर अपनी पूर्णता व आवश्यकता को दर्शाती हैं। शिखा का त्याग करना मानो अपने कल्याणका त्याग करना हैं। जैसे घङी के छोटे पुर्जे कीजगह बडा पुर्जा काम नहीं कर सकता क्योंकि भले वह छोटा हैं परन्तु उसकी अपनी महत्ता है। 


शिखा न रखने से हम जिस लाभ से वंचित रह जाते हैं, उसकी पूर्ति अन्य किसी साधन से नहीं हो सकती।


'हरिवंश पुराण' में एक कथा आती है हैहय व तालजंघ वंश के राजाओं ने शक, यवन, काम्बोज पारद आदि राजाओं को साथ लेकर राजा बाहू का राज्य छीन लिया। राजा बाहु अपनी पत्नी के साथ वन में चला गया। वहाँ राजा की मृत्यु हो गयी। महर्षिऔर्व ने उसकी गर्भवती पत्नी की रक्षा की और उसे अपने आश्रम में ले आये। वहाँ उसने एक पुत्र को जन्म दिया, जो आगे चलकर राजा सगर के नाम से प्रसिद्ध हुआ। राजासगर ने महर्षि और्व से शस्त्र और शास्त्र विद्या सीखीं। समय पाकर राजा सगरने हैहयों को मार डाला और फिर शक, यवन, काम्बोज, पारद, आदि राजाओं को भी मारने का निश्चय किया। ये शक, यवन आदि राजा महर्षि वसिष्ठ की शरण में चले गये। महर्षि वसिष्ठ ने उन्हें कुछ शर्तों पर उन्हें अभयदान दे दिया। और सगर को आज्ञा दी कि वे उनको न मारे। राजा सगर अपनी प्रतिज्ञा भी नहीं छोङ सकते थे और महर्षि वसिष्ठ जी की आज्ञा भी नहीं टाल सकते थे। अत: उन्होंने उन राजाओं का सिर शिखा सहित मुँडवाकर उनकों छोङ दिया। 


प्राचीन काल में किसीकी शिखा काट देना मृत्युदण्ड के समान माना जाता था। बङे दुख की बात हैं कि आज हिन्दु लोग अपने हाथों से अपनी शिखा काट रहे है। यह गुलामी की पहचान हैं। 

    

शिखा हिन्दुत्व की पहचान हैं। यह आपके धर्म और संस्कृतिकी रक्षक हैं। शिखा के विशेष महत्व के कारण ही हिन्दुओं ने यवन शासन के दौरान अपनी शिखा की रक्षा के लिए सिर कटवा दिये पर शिखा नहीं कटवायी।


डा॰ हाय्वमन कहते है ''मैने कई वर्ष भारत में रहकर भारतीय संस्कृति का अध्ययन किया हैं, यहाँ के निवासी बहुत काल से चोटी रखते हैं , जिसका वर्णन वेदों में भी मिलता हैं। दक्षिण भारत में तो आधे सिर पर 'गोखुर' के समान चोटी रखते हैं । उनकी बुध्दि की विलक्षणता देखकर मैं अत्यंत प्रभावित हुआ हुँ। अवश्य ही बौध्दिक विकास में चोटी बड़ी सहायता देती हैं। सिर पर चोटी रखना बढा लाभदायक हैं। मेरा तो हिन्दु धर्म में अगाध विश्वास हैं और मैं चोटी रखने का कायल हो गया हूँ । 


"प्रसिद्ध वैज्ञानिक डा॰ आई॰ ई क्लार्क एम॰ डी ने कहा हैं " मैंने जबसे इस विज्ञान की खोज की हैं तब से मुझे विश्वास हो गया हैं कि हिन्दुओं का हर एक नियम विज्ञान से परिपूर्ण हैं। चोटी रखना हिन्दू धर्म ही नहीं, सुषुम्ना के केद्रों की रक्षा के लिये ऋषि-मुनियों की खोज का विलक्षण चमत्कार हैं।


"इसी प्रकार पाश्चात्य विद्वान मि॰ अर्ल थामस लिखते हैं की "सुषुम्ना की रक्षा हिन्दु लोग चोटी रखकर करते हैं जबकि अन्य देशों में लोग सिर पर लम्बे बाल रखकर या हैट पहनकर करते हैं। इन सब में चोटी रखना सबसे लाभकारी हैं। किसी भी प्रकार से सुषुम्ना की रक्षा करना जरुरी हैं।


"वास्तव में मानव-शरीर को प्रकृति ने इतना सबल बनाया हैं की वह बड़े से बड़े आघात को भी सहन करके रह जाता हैं परन्तु शरीर में कुछ ऐसे भी स्थान हैं जिन पर आघात होने से मनुष्य की तत्काल मृत्यु हो सकती हैं। इन्हें मर्म-स्थान कहाजाता हैं। 


शिखा के अधोभाग में भी मर्म-स्थान होता हैं, जिसके लिये सुश्रुताचार्य ने लिखा है मस्तकाभ्यन्तरोपरिष्टात् शिरासन्धि सन्निपातो।


रोमावर्तोऽधिपतिस्तत्रपि सद्यो मरणम्।

अर्थात् मस्तक के भीतर ऊपर जहाँ बालों का आवर्त(भँवर) होता हैं, वहाँ संपूर्ण नाङियों व संधियों का मेल हैं, उसे 'अधिपतिमर्म' कहा जाता हैं। यहाँ चोट लगने से तत्काल मृत्यु हो जाती हैं(सुश्रुत संहिता शारीरस्थानम् : ६.२८)


सुषुम्ना के मूल स्थान को 'मस्तुलिंग' कहते हैं। मस्तिष्क के साथ ज्ञानेन्द्रियों कान, नाक, जीभ, आँख आदि का संबंध हैं और कामेन्द्रियों - हाथ, पैर, गुदा, इन्द्रिय आदि का संबंध मस्तुलिंग से हैं मस्तिष्क व मस्तुलिंग जितने सामर्थ्यवान होते हैं उतनी ही ज्ञानेन्द्रियों और कामेन्द्रियों - की शक्ति बढती हैं। मस्तिष्क ठंडक चाहता हैं और मस्तुलिंग गर्मी मस्तिष्क को ठंडक पहुँचाने के लिये क्षौर कर्म करवाना और मस्तुलिंग को गर्मी पहुँचाने के लिये गोखुरके परिमाण के बाल रखना आवश्यक होता है।


बालकुचालक हैं, अत: चोटी के लम्बे बाल बाहर की अनावश्यक गर्मी या ठंडक से मस्तुलिंग की रक्षा करते हैं। 


#शिखा_रखने_के_अन्य_लाभ

🔸🔸🔸🔸🔸🔸🔸🔸🔸

१ शिखा रखने तथा इसके नियमों का यथावत् पालन करने से सद्‌बुद्धि , सद्‌विचारादि की प्राप्ति होती हैं।


२ आत्मशक्ति प्रबल बनती हैं।


३ मनुष्य धार्मिक , सात्विक व संयमी बना रहता हैं।


४ लौकिक - पारलौकिक कार्यों मे सफलता मिलती हैं।


५सभी देवी देवता मनुष्य की रक्षा करते हैं।


६ सुषुम्ना रक्षा से मनुष्य स्वस्थ, बलिष्ठ, तेजस्वी और दीर्घायु होता हैं।


७ नेत्र्ज्योति सुरक्षित रहती हैं।


इस प्रकार धार्मिक, सांस्कृतिक, वैज्ञानिक सभी दृष्टियों से शिखा की महत्ता स्पष्ट होती हैं। परंतु आज हिन्दू लोग पाश्चात्योंके चक्कर में पड़कर फैशनेबल दिखने की होड़ में शिखा नहीं रखते व अपने ही हाथों अपनी संस्कृति का त्याग कर डालते हैं।


लोग हँसी उड़ाये, पागल कहे तो सब सह लो पर धर्म का त्याग मत करो। मनुष्य मात्र का कल्याण चाहने वाली अपनी हिन्दू संस्कृति नष्ट हो रही हैं। हिन्दु स्वयं ही अपनी संस्कृति का नाश करेगा तो रक्षा कौन करेगा।


वेद में भी शिखा रखने का विधान कई स्थानों पर मिलता है,देखिये।


शिखिभ्यः स्वाहा (अथर्ववेद १९-२२-१५)


अर्थ👉 चोटी धारण करने वालों का कल्याण हो।


यशसेश्रियै शिखा।-(यजु० १९-९२)

अर्थ 👉 यश और लक्ष्मी की प्राप्ति के लिए सिर पर शिखा धारण करें।


याज्ञिकैंगौर्दांणि मार्जनि गोक्षुर्वच्च शिखा। (यजुर्वेदीय कठशाखा)


अर्थात्👉  सिर पर यज्ञाधिकार प्राप्त को गौ के खुर के बराबर(गाय के जन्में बछड़े के खुर के बराबर) स्थान में चोटी रखनी चाहिये।


केशानां शेष करणं शिखास्थापनं।

केश शेष करणम् इति मंगल हेतोः ।।


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संभोग में आसनों के विभिन्न प्रकार

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 वन डे ई विल डे नामक कामशास्त्री ने अपनी पुस्तक आइडियल मैरिज में आसनों के वर्गीकरण का आधार स्त्री व पुरुष के शरीर की स्थिति को बताया है जबकि महर्षि वात्सायन नामक कामशास्त्री ने अपनी पुस्तक कामसूत्र में आसनों का उच्चतरतोपयोगी नीचरतो पयोगी के रूप में विभाजित किया है जो अधिक व्यवहारिक व वैज्ञानिक है हमारे विचार से विभिन्न आसनों का विभाजन या वर्गीकरण करने का प्रयास ना तो पूर्णता सफल है ना ही विशेष आवश्यक है वास्तव में आसनों का विभाजन करना बहुत कठिन कार्य है इंद्रधनुष में कौन सा रंग कहां से प्रारंभ होता है और कहां समाप्त कहना कठिन है तथापि स्वयं इंद्रधनुषी छटा बड़ी मनोहारी और चिता चिता कर सकती है इसी तरह से काम के आकाश में छाए मिथुन की विविध आसन होते तो फिर दाग राही और अलौकिक आनंद की वर्षा करने वाले ही हैं फिर भी सुविधा की दृष्टि से प्रमुख व्यवहारिक आसनों को निम्नलिखित वर्गों में उनके गुण और दोष देते हुए वर्गीकृत किया गया है प्रथम वर्ग उत्तान वे आसन जिसमें स्त्री पीठ के बल लेट थी और पुरुष सामने से ऊपर आकर मिथुन करता है द्वितीय वर्ग आनत वे अपन जिसमें स्त्री पेट के बल पर लेटती है और पुरुष पीस के ऊपर आकर मैथुन करता है तृतीय वर्ग बीपरी तक वे आसन जिसमें पुरुष पीठ के बल लेट का है और स्त्री सामने की ऊपर आकर संभोग करती है चतुर्थ वर्ग तिर्यक वे आसन जिनमें करवट के बल लेटकर मैथुन किया जाता है पंचम वर्ग उप  बिष्ट वह आसन बैठकर मैथुन किया जाता है षस्टम वर्ग वह आसन जिसमें खड़े होकर मिथुन किया जाता है

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गुरुवार, 23 जून 2022

क्या स्वप्नदोष एक रोग है

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स्वप्न मैं श्वेत तरल के स्खलित होने को स्वप्नदोष कहा जाता है अत्यधिक हस्तमैथुन अत्यधिक संभोग से यह रोग हो जाता है हमेशा यही समझा जाता है कि इस कारण धात रोग जाने का रोग हो जाता है साधारण सा लोग यह समझते हैं कि श्वेत सरल उस समय जो स्खलित होता है वह वीर्य होता है प्रयोग द्वारा सिद्ध हो गई है कभी-कभार को छोड़कर स्वप्नदोष में वीर्य का स्खलन नहीं होता बल्कि वह अधिकतर प्रोस्टेट या काऊपर ग्रंथों का स्त्राव होता है इस बात का प्रयोग हर कोई सफलतापूर्वक कर सकता है कि रोगी का का स्वप्नदोष स्खलित कौन सा तरल स्खलित हुआ है यदि वीर्य होगा तो उस पर में वीर्य अवश्य होंगे यदि प्रोस्टेट ग्रंथि का तरल होगा उसमें एक प्रकार की कलमें ऐसी होंगी एक अति उत्तम श्रेणी का सूक्ष्मदर्शी लेकर उसकी जांच की जा सकती है अत्यधिक पंपोष का वार्षिक कार्य है कि हस्तमैथुन आपसे प्रोस्टेट ग्रंथि बिगड़ जाती है उसमें इतनी शक्ति नहीं रहती है कि थोड़ी सोते जरा को सॉफ्ट कर सके इसलिए स्वप्न में कोई गंदा विचार आते ही सरल साबित हो जाता है युवकों को स्वप्नदोष प्रायर 13 से 14 वर्ष की आयु में प्रारंभ होता है यह एक स्वाभाविक प्रक्रिया है दिमाग में तीन से चार बार ऐसा हो जाए तो कोई रोग नहीं समझा जाना चाहिए जब की संख्या इतनी बढ़ जाए दुर्बलता अनुभव होने लगे तो इसे रोक समझ गई थी चिकित्सा करनी चाहिए स्मरण रहे या कोई भयानक य असाध्य रोग नहीं है इस रोग वीर्य की अधिकता अत्यधिक मैथुन या संभोग कारण इस प्रकार से होते हैं मादक पदार्थ जैसे मदिरा अत्यधिक भोजन करके या दूध पीकर सोना वर्षों तक संभोग की इच्छा को दबाए रखना या अविवाहित होना गंदे विचार खट्टे गर्म और मसालेदार वस्तुओं का अत्यधिक प्रयोग गुदामैथुन की प्रवृत्ति पेट के कीड़े शारीरिक दुर्बलता प्रोस्टेट ग्लैंड या मूत्राशय की खराब अश्लील साहित्य पढ़ना गंदे चित्र देखना मन में हर समय रतिक्रिया के विचार रखना स्त्रियों के सर्किल में अधिक रहनाा भय चिंता इन सभी कारणों को रोककर स्वप्नदोष से बचा जा सकता है

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शनिवार, 7 अगस्त 2021

रानी रामपाल- कप्तान

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रानी रामपाल- कप्तान
 “मैं अपने जीवन से भागना चाहटी थी  बिजली की कमी से, सोते समय हमारे कानों में भिनभिनाने वाले मच्छरों तक, बमुश्किल दो वक्त का खाना खाने से लेकर बारिश होने पर हमारे घर में पानी भरते हुए देखने तक।  मेरे माता-पिता ने पूरी कोशिश की, लेकिन वे इतना ही कर सकते थे - पापा गाड़ी चलाने वाले थे और माँ नौकरानी के रूप में काम करती थीं।
 मेरे घर के पास एक हॉकी अकादमी थी, इसलिए मैं घंटों खिलाड़ियों को अभ्यास करते हुए देखता थी- मैं वास्तव में खेलना चाहता थी।  पापा प्रतिदिन 80 रुपये कमाते थे और मेरे लिए एक छड़ी नहीं खरीद सकते थे।  हर दिन, मैं कोच से मुझे भी सिखाने के लिए कहता थी।  उसने मुझे अस्वीकार कर दिया क्योंकि मैं कुपोषित था।  वह कहते थे, 'आप अभ्यास सत्र के माध्यम से खींचने के लिए पर्याप्त मजबूत नहीं हैं।'
 इसलिए, मुझे मैदान पर एक टूटी हुई हॉकी स्टिक मिली और उसी के साथ अभ्यास करना शुरू किया- मेरे पास प्रशिक्षण के कपड़े नहीं थे, इसलिए मैं सलवार कमीज में इधर-उधर भाग रही थी।  लेकिन मैंने खुद को साबित करने की ठान ली थी।  मैंने कोच से एक मौका मांगा - मैंने आखिरकार उसे बड़ी मुश्किल से मना लिया!
 लेकिन जब मैंने अपने परिवार को बताया, तो उन्होंने कहा, 'लड़किया घर का काम ही करता है,' और 'हम तुम्हारे स्कर्ट पहनने नहीं देंगे।' मैं उनसे यह कहते हुए विनती करूं गि, 'कृपया मुझे बताएं।  अगर मैं असफल होटी हूं, तो आप जो चाहें करेंगे। 'मेरे परिवार ने अनिच्छा से हार मान ली।
 प्रशिक्षण सुबह से शुरू होगा।  हमारे पास घड़ी भी नहीं थी, इसलिए माँ उठती थीं और आसमान की ओर देखती थीं कि क्या यह मुझे जगाने का सही समय है।
 अकादमी में प्रत्येक खिलाड़ी के लिए 500 मिलीलीटर दूध लाना अनिवार्य था।  मेरा परिवार केवल २०० मिली का दूध ही खरीद सकता था;  बिना किसी को बताए मैं दूध में पानी मिलाकर पी लेटी थी क्योंकि मैं खेलना चाहता थी
 मेरे कोच ने मोटे और पतले के माध्यम से मेरा समर्थन किया;  वह मुझे हॉकी किट और जूते खरीदता था।  उन्होंने मुझे अपने परिवार के साथ रहने दिया और मेरी आहार संबंधी जरूरतों का भी ध्यान रखा।  मैं कड़ी मेहनत करटी और अभ्यास का एक भी दिन नहीं छोड़टी।
 मुझे अपनी पहली तनख्वाह याद है;  मैंने एक टूर्नामेंट जीतकर 500 रुपये जीते और पापा को पैसे दिए।  इतना पैसा उसके हाथ में पहले कभी नहीं था।  मैंने अपने परिवार से वादा किया था, 'एक दिन, हमारा अपना घर होगा';  मैंने उस दिशा में काम करने के लिए अपनी शक्ति में सब कुछ किया।
 अपने राज्य का प्रतिनिधित्व करने और कई चैंपियनशिप में खेलने के बाद, मुझे आखिरकार 15 साल की उम्र में एक राष्ट्रीय कॉल मिला!  फिर भी, मेरे रिश्तेदार मुझसे केवल तभी पूछते थे जब मैं शादी करने की योजना बना रहा था।  लेकिन पापा ने मुझसे कहा, 'अपने दिल की संतुष्टि तक खेलो।' अपने परिवार के समर्थन से, मैंने भारत के लिए अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करने पर ध्यान केंद्रित किया और आखिरकार, मैं भारतीय हॉकी टीम का कप्तान बन गई!
 इसके तुरंत बाद, जब मैं घर पर थी, एक दोस्त पापा हमारे साथ काम करते थे।  वह अपनी पोती को साथ ले आया और मुझसे कहा, 'वह तुमसे प्रेरित है और हॉकी खिलाड़ी बनना चाहती है!' मैं बहुत खुश थी;  मैं बस रोने ल गी।
 और फिर 2017 में, मैंने आखिरकार अपने परिवार से किए गए वादे को पूरा किया और उनके लिए एक घर खरीदा।  हम एक साथ रोए और एक दूसरे को कसकर पकड़ लिया!  और मैंने अभी तक नहीं किया है;  इस साल, मैं उन्हें और कोच को कुछ ऐसा चुकाने के लिए दृढ़ संकल्पित हूं जिसका उन्होंने हमेशा सपना देखा है- टोक्यो से उम्मीद” #ladwahandballfoundation #olympics2020 #Olympics #RingKeBaazigar #जय_हिंद #Cheer4India #proud #challenge sabhar ladawa handball foundation Facebook wall

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शुक्रवार, 30 जुलाई 2021

स्वामी विवेकानंद – एक क्रांतिकारी सन्यासी

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स्वमी विवेकानंद को रामकृष्ण परमहंस ने पहली बार समाधि का अनुभव कराया था। जानते हैं कि गुरु रामकृष्ण परमहंस के साथ रहकर उनमें क्या बदलाव आए और क्या अनुभव हुए...


 

सौ साल से अधिक समय गुजर जाने के बाद भी आज भी विवेकानंद युवाओं के प्रिय हैं। आखिर कैसे? कैसा था उनका जीवन? क्या खास किया था उन्होंने ?


स्वामी विवेकानंद का जन्म 12 जनवरी 1863 को कोलकाता में विश्वनाथ दत्ता और भुवनेश्वरी देवी के घर नरेंद्र नाथ दत्त के रूप में हुआ था। 4 जुलाई, 1902 को बेलूर मठ में उनका देहांत हुआ। अपने देहांत तक उन्होंने एक ऐसी क्रांति ला दी थी, जिसकी गूंज आज तक दुनिया भर में है। अपने गुरु के संदेश वाहक के रूप में, वह एक शताब्दी से दुनिया भर के युवाओं के लिए एक प्रेरणास्रोत रहे हैं।

इस लेख में, सद्गुरु स्वामी विवेकानंद के जीवन की कुछ घटनाओं के बारे में बता रहे हैं जिनसे यह पता चलता है कि अपने गुरु के साथ उनका क्या रिश्ता था और वह उनका कौन सा संदेश लोगों में फैलाना चाहते थे।

रामकृष्ण परमहंस को दिव्यज्ञान प्राप्त होने के बाद, उनके बहुत सारे शिष्य बन गए। उनके एक शिष्य थे, स्वामी विवेकानंद। विवेकानंद अमेरिका जाने वाले पहले योगी थे। वह 1893 में दुनिया के धर्मों की संसद में शामिल होने शिकागो गए थे। वहां जाने के बाद उन्होंने एक आध्यात्मिक लहर चला दी। जिस समय किसी नई चीज को लेकर लोगों में बहुत आशंकाएं होती थीं, उस समय आकर उन्होंने कुछ हद तक लोगों के लिए द्वार खोले।


स्वामी विवेकानंद को रामकृष्ण ने भेजा काली मंदिर में


रामकृष्ण का विवेकानंद से बहुत अलग तरह का जुड़ाव था क्योंकि वह विवेकानंद को अपना संदेश दुनिया तक पहुंचाने का एक जरिया मानते थे। रामकृष्ण यह काम खुद नहीं कर सकते थे, इसलिए वह विवेकानंद को अपने संदेशवाहक के रूप में देखते थे।

रामकृष्ण के आस-पास के लोग समझ नहीं पाते थे कि वह विवेकानंद को लेकर इतने पागल क्यों थे। अगर एक भी दिन विवेकानंद उनसे मिलने नहीं आते, तो रामकृष्ण उनकी खोज में निकल जाते क्योंकि वह जानते थे कि इस लड़के में संप्रेषण की जरूरी समझ है। विवेकानंद भी रामकृष्ण परमहंस के लिए उतने ही पागल थे। उन्होंने कोई नौकरी नहीं ढूंढी, उन्होंने कोई ऐसा काम नहीं किया, जो उनकी उम्र के लोग आम तौर पर करते हैं। वह बस हर समय रामकृष्ण का अनुसरण करते थे।

विवेकानंद के जीवन में एक बहुत अद्भुत घटना घटी। एक दिन, उनकी मां बहुत बीमार थीं और मृत्युशैय्या पर थीं। अचानक विवेकानंद के दिमाग में आया कि उनके पास बिल्कुल भी पैसा नहीं है और वह अपनी मां के लिए दवा या खाना नहीं ला सकते। यह सोचकर उन्हें बहुत गुस्सा आया कि वह अपनी बीमार मां का ध्यान नहीं रख सकते। जब विवेकानंद जैसे इंसान को गुस्सा आता है, तो वह गुस्सा वाकई भयानक होता है। वह रामकृष्ण के पास गए। वह कहीं और नहीं जा सकते थे, गुस्से में भी वह यहीं जाते थे।

उन्होंने रामकृष्ण से कहा, ‘इन सारी फालतू चीजों, इस आध्यात्मिकता से मुझे क्या लाभ है। अगर मेरे पास कोई नौकरी होती और मैं अपनी उम्र के लोगों वाले काम करता तो आज मैं अपनी मां का ख्याल रख सकता था। मैं उसे भोजन दे सकता था, उसके लिए दवा ला सकता था, उसे आराम पहुंचा सकता था। इस आध्यात्मिकता से मुझे क्या फायदा हुआ?’

रामकृष्ण काली के उपासक थे। उनके घर में काली का मंदिर था। वह बोले, ‘क्या तुम्हारी मां को दवा और भोजन की जरूरत है? जो भी तुम्हें चाहिए, वह तुम मां से क्यों नहीं मांगते?’ विवेकानंद को यह सुझाव पसंद आया और वह मंदिर में गए।

एक घंटे बाद जब वह बाहर आए तो रामकृष्ण ने पूछा, ‘क्या तुमने मां से अपनी मां के लिए भोजन, पैसा और बाकी चीजें मांगीं?’

विवेकानंद ने जवाब दिया, ‘नहीं, मैं भूल गया।’ रामकृष्ण बोले, ‘फिर से अंदर जाओ और मांगो।’

विवेकानंद फिर से मंदिर में गए और और चार घंटे बाद वापस लौटे। रामकृष्ण ने उनसे पूछा, ‘क्या तुमने मां से मांगा?’ विवेकानंद बोले, ‘नहीं, मैं भूल गया।’

रामकृष्ण फिर से बोले, ‘फिर अंदर जाओ और इस बार मांगना मत भूलना।’ विवेकानंद अंदर गए और लगभग आठ घंटे बाद बाहर आए। रामकृष्ण ने फिर से उनसे पूछा, ‘क्या तुमने मां से वे चीजें मांगीं?’

विवेकानंद बोले, ‘नहीं, अब मैं नहीं मांगूंगा। मुझे मांगने की जरूरत नहीं है।’

रामकृष्ण ने जवाब दिया, ‘यह अच्छी बात है। अगर आज तुमने मंदिर में कुछ मांग लिया होता, तो यह तुम्हारे और मेरे रिश्ते का आखिरी दिन होता। मैं तुम्हारा चेहरा फिर कभी नहीं देखता क्योंकि कुछ मांगने वाला मूर्ख यह नहीं जानता कि जीवन क्या है। मांगने वाला मूर्ख जीवन के मूल सिद्धांतों को नहीं समझता।’

प्रार्थना एक तरह का गुण है। अगर आप प्रार्थनापूर्ण बन जाते हैं, अगर आप आराधनामय हो जाते हैं, तो यह होने का एक शानदार तरीका है। लेकिन यदि आप इस उम्मीद से प्रार्थना कर रहे हैं कि इसके बदले आपको कुछ मिलेगा, तो यह आपके लिए कारगर नहीं होगा।


स्वामी विवेकानंद को हुआ समाधि का अनुभव


विवेकानंद जब सिर्फ 19 साल के थे, तो वह बहुत तर्कसम्मत और बुद्धिमान थे। साथ ही, वह जोश से भरे हुए थे। वह हर चीज का जवाब चाहते थे। उन्होंने आकर रामकृष्ण से कहा, ‘आप हर समय बस भगवान, भगवान करते रहते हैं। इसका क्या प्रमाण है कि भगवान हैं? मुझे सुबूत दीजिए।’ रामकृष्ण बहुत साधारण इंसान थे। वह पढ़े-लिखे नहीं थे। वह विद्वान नहीं, आध्यात्मिक पुरुष थे। तो उन्होंने कहा, ‘मैं ही प्रमाण हूं।’

रामकृष्ण बोले, ‘मैं इस बात का प्रमाण हूं, कि ईश्वर है।’

विवेकानंद को समझ नहीं आया कि वह क्या करें क्योंकि यह तो बस पागलपन था। वह किसी बौद्धिक जवाब की उम्मीद कर रहे थे कि ‘बीज का अंकुरण और पृथ्वी का घूमना ईश्वर के होने का प्रमाण है।’ मगर रामकृष्ण बोले, ‘मैं इसका प्रमाण हूं कि ईश्वर का अस्तित्व है।’ रामकृष्ण के कहने का मतलब यह था कि ‘मैं जैसा हूं, यह प्रमाण है।’ विवेकानंद को समझ नहीं आया कि वह क्या कहें और वह चले गए।

तीन दिन बाद, उन्होंने वापस आकर पूछा, ‘ठीक है, क्या आप मुझे ईश्वर के दर्शन करा सकते हैं?’ रामकृष्ण ने पूछा, ‘तुम्हारे पास उन्हें देखने की हिम्मत है?’ उस साहसी लड़के ने कहा, ‘हां’ क्योंकि यह बात उसे परेशान कर रही थी। रामकृष्ण ने विवेकानंद की छाती पर अपने पैर रख दिए और विवेकानंद समाधि की अवस्था में चले गए, जहां वह मन की सीमाओं से परे चले गए। वह लगभग 12 घंटे बाद समाधि से बाहर आए और जब आए, तो वह पूरी तरह बदल चुके थे। उसके बाद उन्होंने अपने जीवन में कभी कोई प्रश्न नहीं पूछा।


विवेकानंद को मां शारदा का आशीर्वाद


जब तक आप भक्त नहीं हैं, जीवन को आपके लिए उन्मुक्त नहीं होना चाहिए क्योंकि यदि वह उन्मुक्त होता है, तो आप खुद को और बाकी हर किसी को नुकसान ही पहुंचाएंगे। भारत में कभी किसी ऐसे इंसान को ज्ञान नहीं सौंपा जाता था, जिसमें भक्ति की कमी हो।

विवेकानंद के जीवन में एक खूबसूरत घटना हुई। रामकृष्ण परमहंस का देहांत हो चुका था, विवेकानंद ने देश भर में घूम-घूम कर युवकों का एक समूह इकट्ठा किया। वह देश को बनाने और देश की सूरत को बदलने की कोशिश कर रहे थे। तभी किसी ने उन्हें बताया कि अमेरिका के शिकागो में धर्म संसद आयोजित हो रही है। लोगों ने विवेकानंद को वहां जाने की सलाह दी क्योंकि यहां कोई उनकी बात नहीं सुन रहा था। कोई भी नहीं! एक युवक जगह-जगह जाकर बड़ी-बड़ी बातें कर रहा था, जो धर्मग्रंथों में लिखी हुई नहीं हैं। कौन उसे सुनना चाहता? उन्होंने कहा, ‘तुम वहां जाकर उन्हें झकझोरो। अगर तुम वहां उन्हें झकझोरोगे, तो यहां हर किसी का ध्यान तुम्हारी ओर जाएगा।’

पश्चिम के लिए निकलने से पहले वह रामकृष्ण की पत्नी शारदा का आशीर्वाद लेने गए। वह पहली बार रामकृष्ण का संदेश लेकर अमेरिका जा रहे थे।

जब विवेकानंद पहुंचे, उस समय शारदा खाना बना रही थीं। वह कोई धुन गुनगुना रही थीं। भारतीय महिलाओं में यह बहुत आम बात है, खास तौर पर खाना बनाते समय वे गुनगुनाती हैं। अब ऐसा नहीं होता क्योंकि बहुत से लोग अब आई-पैड बजाते हैं मगर पहले के समय में खूब प्यार से खाना बनाना और उसे परोसना सबसे महत्वपूर्ण कामों में माना जाता था। किसी को अच्छी तरह खाते देखकर उन्हें गहरी संतुष्टि होती थी। खाना बनाना बहुत ही आनंददायक प्रक्रिया थी। 20-30 मिनट का भोजन बनाने में, वे कम से कम तीन से चार घंटे लगाती थीं और हमेशा खाना बनाते समय गाती रहती थीं। कम से कम मेरी मां हर समय गाती थीं।

जब विवेकानंद ने आकर कहा, ‘मैं अपने गुरु का संदेश पूरी दुनिया तक पहुंचाने के लिए अमेरिका जाना चाहता हूं,’ तो शारदा ने जवाब नहीं दिया। फिर वह अचानक बोलीं, ‘नरेन, वह चाकू मुझे देना।’ विवेकानंद ने उन्हें चाकू पकड़ाया और एक खास तरीके से उसे दिया। फिर मां शारदा बोलीं, ‘तुम जा सकते हो, मैं तुम्हें आशीर्वाद देती हूं।’ विवेकानंद ने पूछा, ‘आपने मुझे इतनी देर बाद आशीर्वाद क्यों दिया और सबसे पहले तो आपने मुझसे चाकू क्यों मांगा? आप तो सब्जियां काट चुकी थीं?’ वह बोलीं, ‘मैं सिर्फ यह देखना चाहती थी कि अपने गुरु के जाने के बाद तुम्हारे अंदर क्या बदलाव आया है? जिस तरह से तुमने मुझे चाकू पकड़ाया, उससे मुझे पता चल गया कि तुम वहां जाने के लिए बिल्कुल सही इंसान हो, तुम अपने गुरु का संदेश लेकर जाने के लिए बिल्कुल उपयुक्त हो।’


स्वामी विवेकानंद और रामकृष्ण का संदेश


आपने देखा होगा कि ज्यादातर गुरु अपने आप प्रसिद्ध नहीं होते। उन्हें एक अच्छे शिष्य की जरूरत होती है जो उनका संदेश फैला सके क्योंकि हो सकता है कि गुरु खुद दुनिया के तौर-तरीकों से बहुत परिचित नहीं हो। आज, हर कोई रामकृष्ण परमहंस के बारे में बात करता है। रामकृष्ण की चेतनता बहुत ठोस थी। वह एक अद्भुत चीज थी। मगर उसके साथ ही, सांसारिक स्तर पर वह पूरी तरह अनजान थे। अगर विवेकानंद उनसे न मिलते, तो वह अपने आप में, एक भूला-बिसरा फूल बनकर रह जाते। फूल तो बहुत सारे खिलते हैं, मगर कितने फूलों को पहचान मिल पाती है?


प्रार्थना के बारे में स्वामी विवेकानंद के विचार


स्वामी विवेकानंद ने एक बार कहा, ‘फुटबॉल खेलना आपको प्रार्थना से कहीं ज्यादा ईश्वर के करीब ले जा सकता है।’ यह सच है क्योंकि आप पूरी तरह डूबे बिना फुटबॉल नहीं खेल सकते। इसमें कोई व्यक्तिगत मकसद नहीं होता, बस पूर्ण भागीदारी होती है। आप क्या कर सकते हैं और क्या नहीं कर सकते, यह सब पहले से तय होता है और आप कई सालों से इसके लिए तैयार होते हैं। अब यह सिर्फ भागीदारी का सवाल रह जाता है, इसमें कोई मकसद नहीं होता।

प्रार्थना में ऐसा होता है कि कुछ समय बाद आप बहुत सारी दूसरी चीजें करते हुए प्रार्थना करने लगते हैं, आप अपनी मर्जी की चीजें करने लगते हैं। भारत में, प्रार्थना को, पूजा-पाठ को, बहुत जटिल बना दिया गया। वह सिर्फ मौखिक नहीं रह गई। इसका उद्देश्य यह था कि आप पूरी तरह खुद को उसमें डुबो दें। क्योंकि उन्होंने हजारों सालों से देखा था कि ‘प्रार्थना करने’ के नाम पर क्या-क्या होता था। उन्हें पता था कि लोग क्या करेंगे, इसलिए उन्होंने प्रार्थना को बहुत जटिल बना दिया। ताकि आपको एक पूरी प्रक्रिया याद रखनी पड़े और उसके मुताबिक सही तरह से उसे करना पड़े, वरना पूजा अपवित्र हो जाएगी। जब इस हद तक जटिलता होती है, तो आप प्रार्थना करते समय कुछ और नहीं कर सकते। इस रूप में फुटबॉल का खेल आपके अंदर उस स्तर की भागीदारी ले आता है, जहां आप कुछ और कर ही नहीं सकते। कुछ और करना संभव नहीं होता क्योंकि इसमें इतनी भागीदारी की जरूरत होती है कि आप कुछ और कर ही नहीं सकते।

फुटबॉल के खेल में, आपको अपने पैरों को किसी सर्जन के औजारों की तरह इस्तेमाल करना सीखना पड़ता है। यह एक ऐसा खेल है, जिसमें एक खास भागीदारी की जरूरत पड़ती है क्योंकि आप जिन पैरों से गेंद को संभालते हैं, उन्हीं पैरों से खुद को पूरी गति से इधर से उधर भगाते हैं। साथ ही, आपको उसी समय दस और लोगों से बचना होता है, जो आपसे उलझने की पूरी कोशिश करते हैं। आपको लोगों को चकमा देना होता है, गेंद लेनी होता है, पूरी गति से दौड़ना होता है इसलिए आपके पैरों को किसी सर्जन के औजारों की तरह दक्ष होना चाहिए। उस गति में, सक्रियता के उस स्तर पर, गेंद को किसी दिशा की ओर धकेलने में बहुत दक्षता लगती है। इसमें उस हद तक भागीदारी की जरूरत होती है, जहां आपका मन लगभग काम करना बंद कर देता है।

जब आप पूरी भागीदारी के साथ कोई काम करते हैं तो उसमें सिर्फ सक्रियता होती है, मन कहीं और होता है। इसलिए फुटबॉल के खेल में खिलाड़ी अक्सर उस अवस्था में होते हैं क्योंकि एक ही चीज में मन लगा होता है। इसी वजह से जब पूरी तीव्रता से खेल होता है, तो आधी दुनिया बैठकर उसे देखती है। इसमें एक तरह से लोग परे चले जाते हैं, यह आध्यात्मिक रूप से परे जाना नहीं है मगर निश्चित रूप से इसमें लोग अपनी सीमाओं से परे चले जाते हैं। यही बात हर किसी को जोश से भर देती है।


स्त्रियों के बारे में स्वामी विवेकानंद के विचार


एक बार एक समाज सुधारक विवेकानंद के पास गया और बोला, ‘यह बहुत अच्छी बात है कि आप स्त्रियों की भी बेहतरी चाहते हैं। मुझे क्या करना चाहिए? मैं उनकी हालत सुधारना चाहता हूं। मैं इसमें मदद करना चाहता हूं।’ तो विवेकानंद ने कहा, ‘उनसे दूर रहो। तुम्हें उनके लिए कुछ करने की जरूरत नहीं है। बस उन्हें अकेला छोड़ दो। उन्हें जो करना होगा, वे कर लेंगी।’ बस यही जरूरी है। किसी पुरुष को स्त्री की स्थिति सुधारने की जरूरत नहीं है। अगर वह सिर्फ उसे मौका दे, तो वह अपने लिए जरूरी चीजें कर लेगी।

जब मैं बारह-तेरह साल का था, तो मुझे कुछ किताबें पढ़ने को मिलीं, जिनमें स्वामी विवेकानंद ने कहा था, ‘मुझे सौ पूरी तरह समर्पित लोग दीजिए और मैं इस देश की सूरत बदल कर रख दूंगा।’ उस समय इस देश में 23 करोड़ लोग रहे होंगे, मगर उन्हें पूरी तरह समर्पित सौ लोग भी नहीं मिले। मैंने सोचा, ‘क्या विडंबना है। विवेकानंद जैसा इंसान एक अद्भुत चीज है। ऐसे इंसान रोज-रोज नहीं होते। ऐसे लोग जब दुनिया में आए, तो हम इस विशाल देश में उन्हें सौ लोग भी नहीं दे पाए।’ मुझे यह इस संस्कृति और इस देश के लिए एक महान त्रासदी लगी।

एक इंसान के पास इतनी जबर्दस्त दूरदझर्शिता थी और उसकी दूरदर्शिता के कारण बहुत सी चीजें हुईं। आज भी, उनके नाम पर मानव कल्याण के बहुत से काम हो रहे हैं। उनकी दूरदर्शिता के कारण काफी विकास हुआ। उस समय जो बाकी लोग थे, वे कहां हैं? मगर उनकी दृष्टि अब भी किसी न किसी रूप में काम कर रही है। उसकी वजह से काफी खुशहाली आई।

अगर हजारों लोगों में यही दूरदर्शिता होती, तो हालात और भी बेहतर होते। एक गौतम बुद्ध या एक विवेकानंद की दूरदर्शिता काफी नहीं है। जब अधिकांश लोगों में वह दूरदर्शिता होती है, तभी समाज में वाकई खूबसूरत चीजें होंगी।


Isha Foundation

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बुधवार, 28 जुलाई 2021

परब्रह्म का स्वरुप

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परब्रह्म की श्रेष्ठता चार बातो से सिद्ध होती है १- वह सबको धारण करने वाला है २- वह सबसे बडा है ३- वह समस्त प्रकृतियों का स्वामी, शासक एवं संचालक है तथा प्रकृतियाँ इससे संचालित है ४- वह इस प्रकृतियों से भिन्न भी है इस प्रकार परब्रह्म सबसे श्रेष्ठ एवं विलक्षण है ।
जब वह परब्रह्म अपनी कारण अवस्था मे रहता है तो उसकी परा, एवं अपरा प्रकृति रूप दोनो शक्तियाँ सृष्टि से पूर्व उसमे अभिन्न रूप से विधमान रहती हुई अप्रकट रहती है यही उसकका निराकार स्वरूप उसकी कारण अवस्था है जब वह किसी कार्य रूप मे स्थित होता है तो उसकी विभिन्न शक्तियाँ भिन्न भिन्न नाम रूपों मे प्रकट होती है यही साकार रूप उसकी कार्य अवस्था है ।
जिस प्रकार प्रकाश और सुर्य तेज दृष्टि से अभिन्न है वैसे ही परब्रह्म और उसकी शक्ति अभिन्न होते हुए भी उनका अलग अलग वर्णन किया गया है।
सगुणब्रह्म ( कार्य ब्रह्म) तथा निर्गुण ब्रह्म (परब्रह्म) ब्रह्म के भिन्न भिन्न दो स्वरूप नही है बल्कि वही इन दोने लक्षणों से युक्त है दो रूपो वाला नही है जिस प्रकार विधुत अप्रकट रूप है तथा अग्नि उसका प्रकट रूप है अप्रकट ही प्रकट होता है तथा प्रकट का आधार अप्रकट ही है इसलिए विधुत और अग्नि जयोति के दो रूप नही है
वह परब्रह्म अपनी जड़ चेतन रूप दोनो प्रकृतियों अपरा तथा परा से सर्वथा विलक्षण है प्रकृतियों को क्षर और अक्षर क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ प्रकृति औक पुरूष कहा गया है। जिनका विस्तार ही यह दृश्य जगत् है ।
परमात्मा ही कर्मफल दाता है अन्य कोई नही यह प्रकृति उस परब्रह्म की ही शक्ति है जो उससे अभिन्न है सांख्य मत की भांति इसकी स्वतन्त्र सत्ता नही है इस परब्रह्म की ही परा, प्रकृति, चेतन समुदाय है तथा अपरा प्रकृति ही जड़ समुदिय है दोनो उस परब्रह्म की ही शक्तियाँ है।
यह परब्रह्म सत् चित एवं आनन्द स्वरूप है वह नित्य एवं शाश्वत है प्रकृति अनित्य है शाश्वत नही है वह सत् के ज्ञान के अभाव में नितमय जैसी प्रतीत हेती है। यही भ्रम है जो बन्धन का कारण है सत् का ज्ञान होने पर प्रकृति ( जीवात्मा) तथा अपरा प्रकृति (जड़ प्रकृति) दोनो पर शासन करने वाला है प्रकृति स्वतन्त्र नही है 

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मंगलवार, 27 जुलाई 2021

पूंजीवाद का एक पहलू यह भी है

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छोटे से बॉक्‍स में किचन, टॉयलेट और बेड! 'कॉफिन होम' में कैसे रहती है Hong Kong की एक बड़ी आबादी?


होन्ग-कोन्ग. वो देश, जहां पर दुनियाभर की चकाचौंध मौजूद है. वह देश जिसकी अर्थव्यवस्था बहुत तेज़ी से आगे बढ़ रही है और जहां एक से बढ़कर एक ऊंची और चमकती इमारते हैं. ऐसे देश को देखकर कोई भी सोचेगा कि भला यहां के लोगों की जिंदगी क्या ही बुरी हो सकती है. हालांकि, सब सुविधाओं से भरे पड़े होन्ग-कोन्ग में भी एक हिस्सा ऐसा है जहां लोग बद से बद्दतर जिंदगी गुजारते हैं. 
यहां के लोग जिस तरह के घर में रहते हैं वो किसी ‘कॉफिन’ यानी ताबूद जैसा है जिसमें किसी लाश की तरह इन्हें पड़े रहना पड़ता है. तो चलिए आज जानते हैं कि आखिर कैसी होती है इन लोगों की जिंदगी कॉफिन होम में.

हांगकांग में क्यों नरक की जिंदगी जीने को मजबूर है लोग?

अगर हम बात करें दुनिया के सबसे महंगे शहरों की तो उनमें से एक होन्ग-कोन्ग भी है. यहाँ पर जीवन बिताना बहुत ही खर्चीला काम है. इस मॉडर्न ज़माने की हर सुविधा आपको यहाँ मिलेगी मगर उन सुविधाओं का दाम भी देना पड़ता है. यह तो स्वाभाविक है कि हर कोई इतना धनी नहीं है कि इतना खर्चा कर सकें. होन्ग-कोन्ग की महंगाई में लोग रोटी और कपड़ा तो जुटा लेते हैं, मगर घर का इंतज़ाम करना बहुत मुश्किल होता है.

यही वह मूल वजह है जिसके चलते होन्ग-कोन्ग के कई लोग आज कॉफिन होम में रहने को मजबूर हैं. अगर सरकारी आंकड़ों पर एक नज़र डाली जाए तो पता चलता है कि होन्ग-कोन्ग के इन कॉफिन होम में रहने वालों की संख्या बहुत ज्यादा है. अमूमन 2,00,000 से ज्यादा लोग इस समय इन घरों में रह रहे हैं. करीब 75 लाख की जनसंख्या वाले इस देश में 2 लाख लोग ऐसे हालातों में रह रहे हैं, जिनकी कल्पना भी नहीं की जा सकती है.
होन्ग-कोन्ग में न सिर्फ घर खरीदना बल्कि किराए पर लेना भी बहुत महंगा होता हिया. इसलिए यह लोग किराय पर भी कहीं नहीं रह सकते. कॉर्पोरेट के लिए मशहूर होन्ग-कोन्ग में ये लोग सड़कों पर भी अपना गुज़ारा नहीं कर सकते हैं क्योंकि वहां से भी इन्हें भगा दिया जाता है. आखिर में मजबूरन यह कॉफिन होम ही इनका सहारा बनते हैं. यह कॉफिन होम होन्ग-कोन्ग की चकाचौंध का वह दाग है, जिसे वह दुनिया से छिपाने की कोशिश करते हैं. वो बात और है कि इन लोगों के हालात कैसे न कैसे करके दुनिया के सामने आ ही जाते  हैं. 
कैसे होते हैं कॉफिन होम और लोग यहां पर कैसे रहते हैं?
कहते हैं कि घर छोटा ही हो मगर अपने पास जरूर हो. हालांकि, कॉफिन होम के आगे ये बातें गलत पड़ जाती हैं. अगर कोई आपको कहें कि आपको सिर्फ 6 फुट के कमरे में अपनी जिंदगी बितानी है तो आप क्या कहेंगे? सिर्फ इतना ही नहीं. उस 6 फुट के कमरे में जिसमें में आप बड़ी मुश्किल से समा पाएंगे उसमें ही आपको अपना खाना भी बनाना है और अपनी ज़रूरत की सारी चीज़ें जैसे पंखा, बेड और फ्रिज भी रखना है. जिस चीज़ को सोचने में ही इतना बुरा लग रहा है तो कल्पना कीजिए कि लोग वहां भला रहते कैसे होंगे. कॉफिन होम को बनाने का तरीका बहुत ही आसान है. एक 400 स्क्वायर फुट के मकान को 20 हिस्सों में बाँट दो. कमरों का साइज़ इतना छोटा रखो की बिल्डिंग में ज्यादा से ज्यादा कमरे बन पाएँ भले ही उसमें कोई इंसान गुस पाएँ या नहीं. डीलरों को पता है कि इसी का नाम मजबूरी है. कुछ जगहों पर कमरे थोड़े बड़े भी हैं जो उन लोगों के लिए बनाए गए हैं जिनके अपने परिवार हैं मगर अधिकाँश लोगों के लिए यह उतने ही बड़े बनाए जाते हैं जिसमें सिर्फ वह अकेले रह पाएं.  यहां रहने वाले लोगों के अपने तरीके हैं. कोई ऐसे सोता है कि वो करवट नहीं ले सकता तो कोई ऐसे सोता है कि वो पैर भी सीधे नहीं कर सकता. इन्हें बस इस बात का आसरा रहता है कि इनके सर के ऊपर एक छत है.
बाथरूम जाना यहां पर एक बड़ी चुनौती है. ऐसा इसलिए क्योंकि एक बाथरूम को करीब 20-25 लोग इस्तेमाल करते हैं. इतना ही नहीं यह गंदगी इन्हीं लोगों में बीमारी का कारण भी बनती है. जिस तरह से लोग इन कमरों में किसी लाश की तरह बिना हिले पड़े रहते हैं उन्हें देखकर ही यहाँ का नाम कॉफिन होम रखा गया था. इस सब के बाद भी यहाँ रहने के लिए लोगों को करीब 250 अमेरिकी डॉलर किराए के रूप में देने पड़ते हैं.

कभी प्रवासियों के लिए बनाए गए थे ये 'कॉफिन होम'
अगर आप सोच रहे हैं कि कॉफिन होम होन्ग-कोन्ग के गरीब लोगों के लिए हुआ है तो आप गलत हैं. ऐसा इसिलए क्योंकि कॉफिन होम का इतिहास आज का नहीं बल्कि सालों पुराना है. इनकी शुरुआत उस समय में हुई थी जब सालों पहले कई चीनी प्रवासी काम की तलाश में यहाँ पर आए थे. उनके रहने के लिए कोई जगह मौजूद नहीं थी और इसलिए सबसे पहले उनके लिए इन कॉफिन होम को बनाया गया.
हालांकि, उस समय यह आज से थोड़ा बड़े हुआ करते थे लेकिन हालात आज से भी बुरे थे. ऐसा इसलिए क्योंकि 1950 के दशक में हज़ारों की संख्या में चीनी प्रवासी यहाँ आए थे. ऐसे में उनके लिए रहने की जगह मौजूद नहीं थी तो शुरुआती कॉफिन होम लोहे से बनाए गए थे. गर्मी में वह लोहे के बने घर आग से तपते थे और सर्दी में वह बर्फ से ठंडे हो जाते थे. जिस तरह से कसाईखाने में मुर्गियों को लोहे के पिंजरे में रखा जाता है. कुछ ऐसे ही प्रवासियों को भी यहां रखा जाता था. 

आज यह कॉफिन होम काफी बदल गए हैं, मगर यहां पर रहने वालों की जिंदगी आज भी वैसी ही है. आज भी यहाँ पर लोग किसी जिंदा लाश की तरह रहते हैं. कॉफिन होम में लोगों की ज़िंदगी एक त्रासदी है. यह लोग अब इसमें ढल चुके हैं. अब सिर्फ इनकी आँखें इस अँधेरे में बस उम्मीद की एक रौशनी ढूँढती रहती है. आशा है कि आने वाले वक्त में वो उम्मीद इन्हें मिल जाए. 
 

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