एक छोटा-सा फैलने वाला झाड़ीनुमा पौधा है जो दुनिया के कई हिस्सों में पाया जाता है। इसकी पत्तियां नुकीली कांटेदार और मुलायम होती हैं, जबकि तना छोटे बाल सदृश कांटों से भरा होता है। इसपर पीले फूल आते हैं और बीज भूरे रंग का सरसों के बीज जैसा होता है
सत्यानाशी का फल चौकोर, कांटेदार, प्याले-जैसा होता है, जिनमें राई की तरह छोटे-छोटे काले बीज भरे रहते हैं, जो जलते कोयलों पर डालने से भड़भड़ बोलते हैं। उत्तर प्रदेश में इसको भड़भांड़ , सत्यानाशी, कुटकुटारा, पीला धतूरा, फिरंगी धतूरा, तिल्मखार, हरयाणवी में कंडारी भी कहते हैं
सत्यानाशी प्लांट कई प्रकार के इंफेक्शंस से बचाव करने में मददगार हो सकता है और मेटाबॉलिक डिसऑर्डर से राहत प्रदान करने की क्षमता रखता है. प्राचीन काल में इसका उपयोग कैंसर के इलाज में किया जाता था. इसके तने और पत्तियों से मेथनॉलिक अर्क तैयार किया जा सकता है, जो आपकी सेहत को सुधारने में संजीवनी बूटी जैसा काम कर सकता है.
इसमें एंटीऑक्सीडेंट, एंटी-इंफ्लेमेटरी और एंटीमाइक्रोबियल एंटी फंगल गुण पाए जाते हैं, जो इसे त्वचा संबंधी समस्याओं के लिए एक प्रभावी उपचार बनाते हैं जो बैक्टीरिया, वायरस और फंगस को खत्म करने में मदद करते हैं. ये स्किन के संक्रमण, घाव, फोड़े-फुंसियों को भी ठीक कर सकता है.
सत्यानाशी के दूध को घाव पर लगाने से पुराने और बिगड़े हुए घाव ठीक होते हैं।
छाले, फोड़े, फुंसी, खुजली, जलन, सिफलिस आदि रोग पर सत्यानाशी पंचांग का रस या पीला दूध लगाने से लाभ होता है।
सत्यानाशी के बीजों को पीसकर लगाने से सोयरायसिस में लाभ होता है।
कुष्ठ रोग और रक्तपित्त (नाक-कान अंगों से खून बहने की समस्या) में सत्यानाशी के बीजों के तेल से शरीर पर मालिश (satyanashi ke fayde) करें। इसके साथ ही 5-10 मिली पत्ते के रस में 250 मिली दूध मिलाकर सुबह और शाम पिलाने से लाभ होता है।
इस पौधे की जड़, तना, फूल और पत्तियां तक बेहद फायदेमंद हैं. इनका सही मात्रा और चिकित्सक की देखरेख में सेवन करने से यह एजिंग को रोकने में काफी हद तक कारगर है.
सत्यानाशी का इस्तेमाल अस्थमा, ब्रोंकाइटिस और खांसी के इलाज में भी किया जा सकता है. अपने एंटी इंफ्लामेटरी गुणों के कारण इसका अर्क फेफड़ों को साफ करता है और रेस्पिरेटरी सिस्टम को बेहतर बनाता है.
सत्यानाशी का उपयोग मलेरिया और बुखार के इलाज में भी किया जाता है क्योंकि इसमें एंटीपायरेटिक गुण पाए जाते हैं जो बुखार को कम करने में मदद करते हैं.
सत्यानाशी पंचांग का रस निकालकर उसको आग पर उबालें। जब वह रबड़ी के समान गाढ़ा हो जाय तब 500 मिली रस, 60 ग्राम पुराना गुड़ और 20 ग्राम राल मिलाकर, खरल कर लें। इसकी 250 मिग्रा की गोलियां बना लें। 1-1 गोली दिन में तीन बार गर्म पानी के साथ लेने से दमे में बहुत लाभ होता है।
जलोदर यानी एसाइटिस रोग बहुत विकट होता जिसमें लीवर के बहुत ज्यादा नुक्सान के कारण पेट में पानी भर जाता है और बहुत मुश्किल उपचार है पर
5-10 मिली सत्यानाशी पंचांग रस को दिन में 3-4 बार पिलाने से पेशाब खुलकर आता है तथा जलोदर रोग में बहुत लाभ होता है।
आंखो के लिए भी ये पौधा वरदान है सत्यानाशी पंचांग से दूध निकाल लें 1 बूंद (पीले दूध) में तीन बूंद घी मिलाकर आंखों में काजल की तरह लगाने से मोतियाबिंद और रतौंधी में लाभ होता है।
ग्राम सत्यानाशी दूध को 50 मिली गुलाब जल में मिला लें। इसे रोजाना दो बार दो-दो बूंद आंखों में डालें। इससे आंखों की सूजन, आंखों के लाल होने आदि नेत्र विकारों में फायदा होता है
महिलाओं के लिए भी सत्यानाशी का पौधा बहुत युट्राइन फाइब्रॉयड और सिस्ट में बहुत फायदेमंद होता है, दरअसल ये महिलाओं की पीरियड्स की इरेगुलेरिटी को ठीक करता है और फर्टिलिटी को भी बढ़ाता है.
** इसके बीज खाने के लिए बहुत विषैले होते हैं*** पर तेल बाह्य प्रयोग कर असाध्य चर्मरोग में चमत्कारिक लाभ देता है
डॉ० जयवीर सिंह
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जींद हरियाणा
9350272972
साभार 🙏🙏
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