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शनिवार, 9 नवंबर 2024

आध्यात्मिक गुरु रजनीश उर्फ ओशो एक परिचय

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 रजनीश यानी ओशो का जन्म चंद्रमोहन जैन के नाम से एक तेरापंथी जैन परिवार में हुआ था:

रजनीश का जन्म 11 दिसंबर, 1931 को मध्य प्रदेश के रायसेन ज़िले के कुचवाड़ा गांव में हुआ था.

उनके पिता का नाम बाबूलाल और मां का नाम सरस्वती जैन था.

वे अपने पिता की 11 संतानों में सबसे बड़े थे.

बचपन से ही उन्हें दर्शन में रुचि थी.

उन्होंने जबलपुर से पढ़ाई की और बाद में जबलपुर यूनिवर्सिटी में लेक्चरर के तौर पर काम किया. 

 

रजनीश के बारे में कुछ और खास बातेंः

वे एक भारतीय विचारक, धर्मगुरु, और रजनीश आंदोलन के प्रणेता थे. 

 

वे समाजवाद, महात्मा गांधी, और रूढ़िवादी हिंदू धर्म के आलोचक थे. 

 

उन्होंने पूर्वी दर्शन और फ़्रॉयड के मनोविश्लेषण का समन्वय लोगों के सामने पेश किया. 

 

उन्होंने खुले शब्दों में 'सेक्सुअल लिबरेशन' की वकालत की. 

 

उन्होंने जटिल अवधारणाओं को सामान्य भाषा में पेश किया. 

 

वे 19 जनवरी, 1990 को 58 साल की उम्र में इस दुनिया से अलविदा कह गए.


वर्ष 1957 में दर्शनशास्त्र के प्राध्यापक के तौर पर रजनीश रायपुर विश्वविद्यालय से जुड़े। लेकिन उनके गैर परंपरागत धारणाओं और जीवनयापन करने के तरीके को छात्रों के नैतिक आचरण के लिए घातक समझते हुए विश्वविद्यालय के कुलपति ने उनका स्थानांतरण कर दिया। अगले ही वर्ष वे दर्शनशास्त्र के प्राध्यापक के रूप में जबलपुर विश्वविद्यालय में शामिल हुए। इस दौरान भारत के कोने-कोने में जाकर उन्होंने गांधीवाद और समाजवाद पर भाषण दिया; अब तक वह आचार्य रजनीश के नाम से अपनी पहचान स्थापित कर चुके थे।


वे दर्शनशास्त्र के अध्यापक थे। उनके द्वारा समाजवाद, महात्मा गाँधी की विचारधारा तथा संस्थागत धर्म पर की गई अलोचनाओं ने उन्हें विवादास्पद बना दिया। वे मानव कामुकता के प्रति स्वतंत्र दृष्टिकोण के भी हिमायती थे जिसकी वजह से उन्हें कई भारतीय और फिर विदेशी पत्रिकाओ में "सेक्स गुरु" के नाम से भी संबोधित किया गया।


१९७० में ओशो कुछ समय के लिए मुंबई में रुके और उन्होने अपने शिष्यों को "नव संन्यास" में दीक्षित किया और अध्यात्मिक मार्गदर्शक की तरह कार्य प्रारंभ किया। उनके विचारों के अनुसार, अपनी देशनाओं में वे सम्पूूूर्ण विश्व के रहस्यवादियों, दार्शनिकों और धार्मिक विचारधारों को नवीन अर्थ दिया करते थे। १९७४ में पुणे आने के बाद उन्होनें अपने "आश्रम" की स्थापना की जिसके बाद विदेशियों की संख्या बढ़ने लगी, जिसे आज ओशो इंटरनॅशनल मेडिटेशन रेसॉर्ट के नाम से जाना जाता है. तत्कालीन जनता पार्टी सरकार के साथ मतभेद के बाद १९८० में ओशो "अमेरिका" चले गए और वहां ओरेगॉन, संयुक्त राज्य की वास्को काउंटी में रजनीशपुरम की स्थापना की। १९८५ में इस आश्रम में सामुहिक फ़ूड पॉइज़निंग की घटना के बाद उन्हें संयुक्त राज्य से निर्वासित कर दिया गया.


ओशो की मृत्यु १९ जनवरी १९९० को, ५८ वर्ष की आयु में, पुणे, भारत में आश्रम में हुई। मौत का आधिकारिक कारण हृदय गति रुकना था, लेकिन उनके कम्यून द्वारा जारी एक बयान में कहा गया है कि अमेरिकी जेलों में कथित जहर देने के बाद "शरीर में रहना नरक बन गया था" इसलिए उनकी मृत्यु हो गई। उनकी राख को पुणे के आश्रम में लाओ त्ज़ु हाउस में उनके नवनिर्मित बेडरूम में रखा गया था। ओशो की समाधि पर स्मृतिलेख है, 'न जन्में न मरे - सिर्फ 11 दिसंबर, 1931 और 19 जनवरी, 1990 के बीच इस ग्रह पृथ्वी का दौरा किया'। साभार विकिपीडिया 

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